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सरकारें आम आदमी के हितार्थ योजनाएं तो बनाती हैं पर ये योजनाएं कितनी सार्थक हो पाती हैं इसकी एक बानगी उत्तराखण्ड में देखी जा सकती है। यहां सरकार में शामिल रहे लोगों ने ही गरीबों के लिए बनी योजना में अपने हित साआँा लिए। अनुसूचित |
जाति एवं जनजाति के लोगों को उद्योग लगाने के लिए आवंटित जमीन में लाभ लेने वालों में कांग्रेस के प्रदेश अआँयक्ष यशपाल आर्य, कांग्रेस के ही पूर्व मंत्री रामप्रसाद टम्टा तथा वामसेफ नेता हरीश चंद सहित भाजपा नेता रमाकांत जैसे नाम हैं
अनुसूचित जाति और जनजाति के उत्थान के लिए अविभाजित उत्तर प्रदेश की सरकार ने ४९ साल पहले एक योजना बनायी थी, जिसमें इन्हें कुटीर उद्योग से जोड़ने की परिकल्पना की गयी थी। इसके लिए सरकार ने नैनीताल जिले के हल्द्वानी में मृतप्राय हो चुके आईटीआई परिसर को उपयोग में लाने का निर्णय लिया। लगभग ६ एकड़ जमीन और १५ शेडनुमा इमारतों को उद्योग की विभिन्न श्रेणियों में बांट ३० वर्षों की लीज पर आवंटित किया गया। इस जमीन का आवंटन अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों के बीच होना था, लेकिन नियमों को ताक पर रख नेताओं ने भी अपने नाम से जमीन आवंटित करा ली। इतना ही नहीं अब तक इस जमीन पर कोई उद्योग नहीं लगा पर लीज का समय उत्तराखण्ड सरकार बढ़ाती रही।
लीज की अवधि के दौरान उद्योग स्थापित नहीं कर पानेवाले को अपात्र द्घोषित करने और योजना के तहत दी गई सुविधाओं से वंचित करने का भी प्रावधान बनाया गया था। लेकिन सरकार की यह योजना भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी। जिन प्लॉटों और शेडों को उद्योग धंधे स्थापित करने के लिए दिया गया था उनमें वर्षों बाद उद्योग-धंधे शुरू होने के बजाय भव्य और आलीशान द्घर बना लिये गये। कुछ लोगों ने द्घर किराए पर भी दे रखे हैं। गौरतलब है कि प्लॉट महज १० रुपये प्रतिवर्ष के रेंट पर लीज दी गयी साथ ही शेड के लिए २५ रुपये प्रति महीना किराया तय किया गया।
इस गड़बड़झाले में कई नामी-गिरामी लोग भी शामिल हैं। लंबे समय तक शासन-प्रशासन कुंभकर्णी नींद में रहा। अब जाकर उत्तराखण्ड सरकार जागी और मामले की जांच करायी गई। जांच में करीब ९० प्रतिशत आवंटन में कोई उद्योग नहीं होने के कारण इन्हें अवैध द्घोषित तो कर दिया, लेकिन आज तक कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गयी।
हल्द्वानी शहर के बरेली रोड पर स्थित राजकीय औद्योगिक संस्थान (आईटीआई) ५०-६० के दशक में बंद होने के कगार पर पहुुंच गया था, जिसे तृतीय पंचवर्षीय योजना में बंद कर दिया गया। १९६१ में आईटीआई की ६ एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया गया, जिसे ४ मार्च १९६५ को उद्योग विभाग को हस्तांतरित कर दिया गया। उस समय इस जमीन की कीमत २५ लाख आंकी गयी थी। उद्योग विभाग ने इसे ३ जुलाई १९७४ को समाज कल्याण विभाग के हवाले कर दिया।
समाज कल्याण विभाग के जिम्मे जब यह आईटीआई आया उस समय इसमें ४० फुट चौड़े और ६० फुट लंबे हॉल के साथ २५ फुट की कार्यशाला भी थी। इसके अलावा १२ फुट व ११ फुट के दो कमरे, शौचालय, एक स्टोर और स्नान द्घर भी था। १९ प्लॉटों में से प्रत्येक २४०० स्क्वायर फुट का था, जिन्हें छोटे-छोटे उद्योग लगाने के लिए १९ लोगों के बीच आवंटित किया गया।
आवंटन के बाद आईटीआई के पुराने भवन में सभी १९ प्लॉटों और १५ शेडों में क्या चल रहा है, किन-किन प्लॉटों में उद्योग धंधे स्थापित किये गये और उनमें क्या गतिविधियां चल रही हैं इस पर समाज कल्याण विभाग ने कोई ध्यान नहीं दिया। जबकि विभाग का कार्यालय आईटीआई परिसर में ही था। कार्यालय की नाक के नीचे ही अवैध कार्य होते रहे लेकिन विभागीय अधिकारी आंखें मूंदे रहे। जिन प्लॉटों में उद्योग धंधे चलने चाहिए थे वहां मकान, भवन आदि धड़ल्ले से बनाए जाते रहे। सबसे पहले इसकी शुरुआत एक नेता ने की उसके बाद दूसरे और तीसरे ने। धीरे-धीरे उद्योग धंधों की जगह मकान बनाने का ऐसा अवैध सिलसिला शुरू हुआ जो अभी तक रुकने का नाम नहीं ले रहा है।
वह तो भला हो उद्योग बंधु का, जिसकी गत जनवरी माह में हुई बैठक में उद्योग धंधों की जगह प्लॉटों में द्घर बनाए जाने और शेडों में आवासीय गतिविधियां शुरू करने के विरोध में स्वर बुलंद हो गये। इसके बाद समाज कल्याण विभाग के सहायक प्रबंधक आरके टम्टा ने साहस जुटाते हुए भाजपा-कांग्रेस सहित उन सभी नेताओं को नोटिस भेजने का काम किया जो नियमों का पालन नहीं कर रहे थे। इस पर भी अवैध काम करने वालों के कान में जूं तक नहीं रेंगी। इससे आहत हो समाज कल्याण विभाग के सहायक प्रबंधक ने हल्द्वानी एसडीएम को इस बात से अवगत कराया।
हल्द्वानी उपजिलाधिकारी ने इसकी जांच कराई तो पूरे मामले से पर्दा हट गया। जांच के अनुसार आवंटन के १९ में से महज ७ को छोड़कर अन्य सभी १२ प्लॉटांे में औद्योगिक इकाईयां चालू ही नहीं हुईं। यही नहीं बल्कि कई ने तो अपने प्लॉटों में निर्माण कार्य तक नहीं कराये। इनमें राम प्रसाद टम्टा से लेकर शिव शंकर टम्टा और यशपाल आर्य तक दर्जनों नेता ऐसे हैं जिन्होंने समाज कल्याण विभाग के नियम कानूनों को धता बताते हुए इन भूखण्डों पर कोई भी उद्योग स्थापित नहीं किया और ना ही इन पर अपना कब्जा छोड़ा है। इसी के साथ आधा दर्जन से अधिक प्लॉटों में संबंधित उद्यमियों द्वारा उद्योग स्थापित न करने के चलते आवंटित प्लॉटों को निरस्त कराने की कार्रवाई करने के आदेश भी अब दे दिए गये हैं।
तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने नैनीताल जिले के हल्द्वानी में जब शिल्पियों को आर्थिक स्तर से मजबूती प्रदान करने के लिए इस सेंटर की स्थापना की तो इसका सबसे ज्यादा फायदा नेताओं ने ही उठाया। भारतीय जनता पार्टी और कांगे्रस के अलावा अन्य पार्टियों के नेताओं ने अपने रसूख का इस्तेमाल कर यहां प्लॉट आवंटित करा लिये। इनमें सबसे पहला नाम कांगे्रस के पूर्व समाज कल्याण मंत्री और बागेश्वर से विधायक रहे रामप्रसाद टम्टा का आता है। इसी प्रकार वामसेफ के वरिष्ठ नेता हरीश चन्द्र ने भी यहां प्लॉट कब्जा रखा है। उन्होंने तमाम नियम कानूनों को धता बता इस प्लॉट में भव्य भवन का निर्माण कर लिया है। जिसे उद्योग की लिए आवंटित किया गया था। जबकि रामप्रसाद वाले प्लॉट में अभी एक गड्ढा खोदने के सिवा कुछ नहीं हुआ है। इसी के साथ रमाकांत पुत्र फकीर राम भी भाजपा का एक नेता है। जिनको भी यहां प्लॉट मिला मुक्तेश्वर से विधायक और उत्तराखण्ड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य को भी यहां एक प्लॉट आवंटित किया गया। इस प्लॉट में चारदीवारी करके एक टीनशेड लगा दिया गया है। बावजूद इसके कि सरकार ने उक्त प्लॉट की अभी तक श्री आर्य के नाम रजिस्ट्ररी नहीं की है।
यह योजना उन निम्न वर्ग के लोगों के लिए थी जो गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन कर रहे थे। इस के जरिये सरकार उनके हुनर को सामने लाना चाहती थी। इन प्लॉटों पर वह अपने उद्योग धंधे लगाते, इसके लिए सरकार ने समाज कल्याण विभाग से ऋण देने का प्रावधान किया था। यहां सवाल यह भी उठता है कि धनाढ्य और वैभवपूर्ण जीवन जी रहे इन नेताओं को गरीब कैसे मान लिया गया? और किस आधार पर इन्हें प्लॉट आवंटित कर दिए गये?
नेताओं पर सरकार की मेहरबानी यहीं तक सिमित नहीं रही, बल्कि लीज की शर्तों के उल्लद्घंन के बावजूद उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। लीज की शर्तों के अनुसार अगर ३० साल में कोई आवंटी प्लॉट में निर्माण आदि कराकर उसमें व्यावसायिक गतिविधियां संचालित नहीं कर पायेगा तो स्वतः ही लीज निरस्त मानी जाएगी। ३० साल की लीज का व्यावसिक गतिविधियों के चालू होने के आधार पर नवीनीकरण किया जायेगा। अगर आवंटी इसमें अक्षम साबित होता है तो लीज आगे नहीं बढ़ायी जा सकती। लेकिन नेताओं पर लीग के ये नियम लागू नहीं किए गए। कई नेताओं के प्लॉट आवंटन को ३० साल ज्यादा हो गये। आज तक उनमें संबंधित कार्य नहीं करा पाये। इसके बावजूद लगातार उनके प्लॉट आवंटन की लीग का नवीनीकरण होता रहा।
उधर राजकीय औद्योगिक आस्थान (आईटीआई) के पुराने परिसर को अनुसूचित जाति जनजाति के लोगों के लिए उद्यम केन्द्र बनाते समय बरेली रोड पर ३५ दुकानें भी बनाई गई थीं। १९७०-७१ में बनी इन दुकानों को अनुसूचित जाति के लोगों के लिए आरक्षित किया गया था। तब दुकान की ५ हजार रुपये की कई सालों की किस्तें बनाई गई थीं। जैसे ही दुकान वालों ने ५ हजार की किस्तें पूरी की वे उनके तथाकथित मालिक बन गये। इसके बाद उन्होंने मनमाने ढंग से इन्हें बेच दिया। जबकि दुकान देते समय यह करार किया गया था कि इनका क्रय-विक्रय नहीं किया जायेगा। आज जिन लोगों के पास यह दुकानें हैं वह इनके वास्तविक मालिक नहीं हैं। समाज कल्याण विभाग ऐसे लोगों पर भी कोई कार्रवाई करने से बचता रहा है। कारण यह बताया जाता है कि इन दुकानों का कोई रिकॉर्ड ही विभाग के पास नहीं है। |