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केंद्र सरकार के एक साल पूरा होने की खुशी में बहुत दिनों बाद मनमोहन सिंह मीडिया से रू-ब-रू हुए। उन्होंने अपनी उपलब्आिँा पर पीठ थपथपाई, लेकिन सच तो यह है कि सरकार अब तक नक्सलवाद, आतंकवाद और महंगाई जैसे गंभीर |
मुद्दों पर लगाम लगाने में कामयाब नहीं हो सकी है। वहीं प्रतिपक्ष सिर्फ सदन में हंगामा करके अपने कर्तव्यों का पालन करता रहा। प्रतिपक्ष की भूमिका सरकार में ही शामिल मंत्रियों ने अपने विवादित बयानों से निभाई। कुल मिलाकर संवाददाता सम्मेलन
राहुल गांआँाी-सोनिया गांआँाी पर केंद्रित रहा
यूपीए-२ की पहली सालगिरह महंगाई की मार झेल रही आम जनता के लिए कोई नया संदेश लेकर नहीं आई। वैसे किसी भी सरकार के कामकाज का मूल्यांकन एक साल में नहीं किया जा सकता, लेकिन डॉ मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए सरकार पहले पांच साल शासन कर चुकी है। ऐसे में लोगों का यूपीए सरकार से उम्मीद करना कतई गलत नहीं था। यूपीए सरकार ने लोगों को मायूस किया। आतंकवाद, नक्सलवाद, महंगाई, भ्रष्टाचार के मुद्दे पर सरकार विफल दिखाई पड़ी, वहीं विदेश नीति पर अमेरिकी छाया स्पष्ट दिखाई पड़ी। इस बार अपने ही मंत्रियों ने विपक्ष की भूमिका निभाई। मंत्रियों की बयानबाजी, बेलगाम साथियों की मनमानी के बीच एक साल पूरा करने वाली सरकार के सामने वही चुनौतियां मुंह फाड़े खड़ी है- महंगाई और गरीबी। किसानों द्वारा आत्महत्या करने का सिलसिला नहीं रुका। पचास करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले गये। बावजूद इसके प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपनी पीठ थपथपाई। सरकार की पहली वर्षगांठ पर हुए संवाददाता सम्मेलन में प्रधानमंत्री अपनी कुर्सी बचाने के लिए चिंतित जरूर दिखे।
लंबे समय तक पत्रकारों से दूर रहे प्रधानमंत्री ने नई दिल्ली के विज्ञान भवन में मीडिया के तीखे सवालों का सामना किया। सवाल-जवाब के दौरान प्रधानमंत्री ने बताया कम और छुपाया ज्यादा। करीब डेढ़ द्घंटे तक चली इस प्रेस कांफ्रेंस से देश को कोई महत्वपूर्ण संदेश नहीं मिला। शुरू में वे कुछ असहज लगे लेकिन धीरे-धीरे सहज हो गए। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चेहरे पर न तो उत्साह था, न ही ताजगी। सरकार के अंतर्विरोधों और गठबंधन की मजबूरियों का तनाव उनके चेहरे पर जरूर था। 'द्घोटाले पर द्घोटाला और हिंसा पर हिंसा' पर प्रधानमंत्री गोलमोल जवाब देते रहे। सोनिया से मतभेद को मनगढंत खबर करार दिया। मीडियाकर्मियों को न तो ए राजा पर संतोषजनक जवाब मिला और न आईपीएल द्घोटाले का।
आतंकवाद और नक्सलवाद को सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती करार देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी सरकार ने इस समस्या को कभी भी कमतर नहीं आंका। लेकिन वे इस खतरे से निपटने की संकल्पबद्धता प्रदर्शित नहीं कर सके। इसी तरह महंगाई, आतंकवाद और पाकिस्तान से संबंधों को लेकर पूछे गए सवालों के भी वैसे ही जवाब सुनने को मिले जैसे इसके पहले कई बार मिल चुके हैं।
प्रधानमंत्री के संवाददाता सम्मेलन में मुख्य रूप से राहुल गांधी और सोनिया गांधी ही छाए रहे। बकौल मनमोहन सिंह यूपीए-२ में उन्हें अभी और टास्क पूरा करना है और इसे पूरा करने तक अपनी कुर्सी पर बने रहने की आवश्यकता बतलायी। कार्यकाल के बीच में प्रधानमंत्री पद पर राहुल की ताजपोशी के सवाल पर प्रधानमंत्री ने गोल-गोल जवाब दिया लेकिन इतना जरूर कहा कि राहुल कैबिनेट में आने की पूरी योग्यता रखते हैं और इस मामले पर उनसे मैंने कई बार बात भी की है। जब उनसे पूछा गया कि छह साल प्रधानमंत्री रहने के बाद क्या वह संन्यास की तो नहीं सोच रहे हैं। प्रधानमंत्री का जवाब था मुझे जो काम सौंपा गया है वह अभी पूरा नहीं हुआ है और जब तक यह पूरा नहीं हो जाता तब तक संन्यास की बात सोचना ही बेमानी है।
कुल मिलाकर केंद्रीय शासन का बीता एक वर्ष असफलता की ही कहानी कहता है, क्योंकि न तो नस्सलवाद पर लगाम लग सकी, न आतंकवाद पर और न ही महंगाई पर। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि केंद्र सरकार के कुछ मंत्री बेलगाम होते दिख रहे हैं। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री का आकलन कुछ भी हो, आम जनता इस निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए विवश है कि आर्थिक मामलों से जुड़े एक दर्जन से अधिक मंत्रालयों में कोई भी ऐसा नहीं जो अपनी छाप छोड़ने में सफल रहा हो। इनमें से कुछ मंत्रालय तो ऐसे हैं जिन पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अपने बेलगाम मंत्रियों की जुबान को काबू में करने की इच्छाशक्ति अब तक नहीं दिखाई।
प्रधानमंत्री की टीम में कुछ ऐसे भी शामिल हैं जो प्रधानमंत्री की परवाह नहीं करते। शरद पवार, डीएमके के मंत्री और ममता बनर्जी। शरद पवार ने अभी तक अपनी मर्जी ही चलाई है। आईपीएल द्घोटाले की बात हो या महंगाई की किसी के लिए जिम्मेदार नहीं दिखे। प्रधानमंत्री भी उन पर लगाम नहीं लगा सके। यही कुछ हाल रेलमंत्री ममता बनर्जी का रहा। वे प्रधानमंत्री की परवाह नहीं करती। डीएमके के मंत्री तो सरेआम वो कर रहे हैं जो चाहते हैं। टू-जी स्पेक्ट्रम द्घोटाले के दोषी ए राजा को वे हटा तक नहीं सके। वहीं मनमोहन सिंह अपने ही पार्टी के नेताओं से कम परेशान नहीं रहे। शशि थरूर को आखिरकार बाहर का रास्ता देखना पड़ा। वहीं जयराम रमेश के चीन में दिए गये बयान पर प्रधानमंत्री लाचार दिखे। मनमोहन सिंह ने सीबीआई के गलत इस्तेमाल के आरोप को भी निराधार बताया। उन्होंने यह भी साफ किया कि सरकार का समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल जैसे दलों से कोई गुप्त समझौता नहीं है।
जहां तक एक साल की विदेश नीति की बात है इसमें भी सरकार कोई खास उपलब्धि हासिल नहीं कर पायी। पाकिस्तान से बातचीत के मसले पर अमेरिका का दबाव साफ नजर आया। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मजबूरी में वार्ता करनी पड़ रही है। पाकिस्तान पर सरकार दबाव बनाने में कामयाब नहीं रही। भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के अधुरे रहने के सवाल पर सिंह ने सभी राजनीतिक पार्टियों से विवादास्पद असैन्य परमाणु दायित्व विधेयक का समर्थन करने के लिए कहा। अफगानिस्तान में भारतीय हितों पर लगातार हमले होते रहे और सरकार मूकदर्शक बनी रही। मुंबई हमले के आरोपी डेविड कोलमैन हेडली के बारे में अमेरिकी प्रशासन के आश्वासन पर ही सरकार को भरोसा करना पड़ा। वहीं अफजल गुरु की फांसी के मामले पर सरकार की चुप्पी कई सवालों को जन्म देती है।
जहां एक तरफ सरकार अपने लक्ष्य को पूरी तरह पाने में असफल रही वहीं विपक्ष भी बुरी तरह फ्लॉप रहा। प्रतिपक्ष सिर्फ सदन में हंगामा करता रहा। विपक्षी पार्टी बीजेपी की हताशा भी साफ दिखी। विपक्ष सरकार को किसी भी मसले पर द्घेरने में कामयाब नहीं हुआ। कटौती प्रस्ताव हो या महंगाई पर बुलाई गई विपक्ष की रैली सब बुरी तरह फ्लॉप रही। भाजपा नेताओं ने पानी-पीकर प्रधानमंत्री के प्रेस कांफ्रेंस की आलोचना की। लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने यूपीए को 'अनलिमिटेड प्रोब्लम्स अलायंस' करार दिया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा कि वे कठिन या मुश्किल सवालों के जवाब देने से बचते रहे। भाजपा ने आरोप लगाया कि यूपीए सरकार आम आदमी के साथ धोखाधड़ी की है और उसे निराश किया है। महंगाई, भ्रष्टाचार और नक्सली हिंसा उसकी 'उपलब्धियां' हैं। साथ ही साथ सीबीआई के दुरुपयोग के मार्फत पहला वर्ष पूरा करने की बात कही। वहीं राजद और सपा नेता महिला आरक्षण के मुद्दे पर सरकार को गीदड़ भभकी देते नजर आये।
इससे उत्साहित नहीं हुआ जा सकता कि प्रधानमंत्री ने यह आश्वासन दिया कि दिसंबर तक महंगाई कम हो जाएगी। महंगाई तो तब कम होगी जब उस पर काबू पाने की इच्छाशक्ति दिखाई जाएगी। दुर्भाग्य से यही वह चीज है जो सरकार में नजर नहीं आती। लेकिन दूरदर्शिता दिखाते हुए अंत में सिपहसालारों की कैबिनेट की बैठक से परे बयानबाजी पर नाराजगी जताई। वैेसे पिछली बार के मुकाबले इस बार प्रधानमंत्री पर सहयोगी दलों का कम दबाव है,साथ ही उन्हें लोगों का सकारात्मक जनादेश भी मिला है। जहां तक विकास या आर्थिक मोर्च की बात है सरकार आर्थिक मंदी से उबरने को अपनी बड़ी सफलता भले ही मान ले लेकिन असंगठित क्षेत्र में आय और रोजगार की दशा सुधर गई हो ऐसा संकेत भी नहीं मिलता। वहीं दूसरी तरफ जनता महंगाई की मार से त्रस्त है। अब ऐसे में मनमोहन सिंह का एक साल कितनी उपलब्धियों भरा रहा इसका निर्णय देश की विकास गति को देखकर ही लगाया जा सकता है। |