 |
धर्म जीना सिखाता है। सच्चा आँार्मगुरु जीवन को सुख-शांति और रोशनी से भर देता है। आँार्म को दुकान बनाने वाले बेशुमार आँार्मगुरुओं के बीच श्री रामकृपाल जी रोशनी के ऐसे दिव्य पुंज हैं जिनके सान्निआँय मात्र से व्यक्ति के भीतर का |
अंआँाकार मिट जाता है। गहन आँयान-साआँाना द्वारा प्राप्त ऊर्जा से ये कई चमत्कार भी करते हैं। मानव-जीवन के कष्टों को दूर कर उसके भीतर आनंद प्रवाहित करने का संकल्प लिए श्री रामकृपाल जी के उदात्त विचार
मुरारी लाल के द्घर एक दिन चोरी हुई। रात में उनके द्घर में चोर द्घुस गया। वे खर्राटे मार के सो रहे थे। पत्नी ने उन्हें उठाया देखो आवाज आ रही है कोई चोर द्घुस आया है। हड़बड़ी में उठे और वे द्घर के बाहर गये और बोले कौन है, उधर से आवाज आई, कोई नहीं है। वे वापस लौट गए और फिर लेट गए। पत्नी ने कहा क्या हुआ उन्होंने कहा कोई नहीं है। मैंने पता कर लिया है। वहां कोई नहीं है दोनों सो गए। सवेरे पत्नी ने कहा मैंने तुमको उठाया था और तुम बाहर जाकर वापस लौट आए कि कोई नहीं है। और देखिए सारा का सारा सामान गायब है। मुरारी लाल ने कहा मैं तुम्हें बताता हूं मैं उठा था, बाहर भी गया था आवाज भी दी थी और साफ-साफ मैंने अपने कानों से सुना था। यही अवाज आई थी कि यहां कोई नहीं है।
सर उस आदमी के द्घर दुबारा चोरी होनी ही थी। वही चोर १५-२० दिन बाद फिर द्घुस गया उसके द्घर। और इस बार जब आवाज हुई। मुरारी लाल जगे। वो सीधे चोर के पास पहुंचे और कहा कि अब की तुम मुझे धोखा नहीं दे सकते हो। अब मैंने तुम्हें पकड़ लिया है। तुम सीधे चलो थानेँ वो उसको लेकर थाने जाते हैंँ काफी दूर पहुंच जाते हैंँ आधे रास्ते में चोर उनसे कहता हुजूर मुझसे एक गलती हो गई है। मैं अपना जूता आपके द्घर ही भूल आया हूं। उन्होंने कहा कि अब इतनी लम्बी दूरी हम चलकर आ चुके हैं। थाना नजदीक है तुम जाओ और जूते लेकर आओ मैं यहीं तुम्हारा इंतजार करता हूं। मुरारी लाल इंतजार ही करते रहे। शाम को द्घर पहुंचे पत्नी ने कहा कि चोर का क्या हुआ। मुरारीलाल ने कहा चोर इस बार भी धोखा दे गया। मुझसे बोला मैं जूता लेकर आता हूं मैं इंतजार ही करता रहा।
आप समझ सकते हैं अब जब भी मौका लगेगा ये चोर मुरारी लाल के द्घर में जरूर द्घुसेगा और हुआ यही। महीना भर भी नहीं हुआ। वहीं चोर फिर मुरारीलाल के द्घर द्घुस गया। फिर वही हुआ आधी रात के समय चोरी हुई। लकिन अबकी बार मुरारीलाल ने चोर को दबोच लिया और कहा कि तुम दो बार मुझे बेवकूफ बना चुके हो। अब मैं तुम्हें सीधे थाने लेकर चलता हूं। इस बार मैं तुम्हें बिल्कुल नहीं बचने दूंगा। तुम्हें नहीं छोड़ूंगा और उसको लेकर गुस्से में थाने की ओर चल दिए और जब थोड़ी दूर थाना रह जाता है। तो चोर कहता है हुजूर मैं कसम खाकर सच बोलता हूं कि मैं कम्बल छोड़ आया हूं। मेरा कम्बल तुम्हारे द्घर पर ही रह गया है। इसलिए चलकर हमें कम्बल लेना पडेग़ा नहीं तो हम सर्दी में मर जाएंगे। उसने कहा तुम कई बार मुझे धोखा दे चुके हो। इस बार मैं तुम्हें नहीं जाने दूंगा। तुम यहीं रुको मैं कम्बल लेकर आता हूं। वो कम्बल लेकर लौटते हैं। चोर जा चुका होता है। वापस लौटते हैं पत्नी से कहते हैं तीसरी बार भी धोखा दे गया चोर बड़ा होशियार था। आपको हंसी आ गई।
मुरारीलाल की कहानी हंसने योग्य लगती है। लेकिन हम सबके अन्दर मुरारीलाल बैठा हुआ है, जो गलती आप आज करते हैं कल भी दोहराते हैं दूसरे दिन भी बंदन नहीं करते, तीसरे दिन भी दोहराते हैं। लगातार दोहराते हैं। क्या अपने ऊपर हंसते हैं आप लोग। नहीं हंसते। क्योंकि आपकी जिंदगी कुछ है ही नहीं, कुछ गलतियों को दोहराते जाने के अलावा आपकी जिदंगी कुछ है ही नहीं। मनोवैज्ञानिकों ने इस विषय पर अध्ययन किया। तुम लोगों की जिदंगी है क्या, उन्होंने देखा कि एक महीने की रूटीन बना कर सैकड़ों की जिंदगी को देखा। महीने में जो आदमी काम करता है। ठीक वहीं काम अगले महीने करता है और ठीक वही काम उसके अगले महीने करता है। ३० दिन जो काम तुम करते हो ठीक वही काम तुम दोहराते रहते हो। यानी वही नॉनसेंस, वही मूढ़ता वही बेवकूफियां दोहराते रहते हो। और अपनी गलतियों से, अपने अनुभवों से कोई सीख लेकर अपने जीवन में परिर्वतन नहीं करते हो। तनाव मुक्त आनन्दमय जीवन उसी को मिल सकता है। जो अपने अनुभवों से सीख ले ले और उन्हें दोहराए नहीं।
एक बहुत ही विस्फोटक महत्वपूर्ण सूत्र है जो बात गलत दिख जाए अगर आज क्रोध आया जो आपको लगे कि इसने आज तक हमें लाभ नहीं दिया है तो जब भी क्रोध पकड़े आपको होश में रहना चाहिए। दोहराने का अवसर नहीं देना चाहिए। अपने अनुभव से जो व्यक्ति सीख लेता है, वही सच्चा ज्ञान प्राप्त कर सकता है। और यह भरा पड़ा है। आपके अन्दर अगर आपके भीतर सीखने की तत्परता है, तो हर क्षण आप होश संभालने को तैयार रहें।
शिष्य का अर्थ ही होता है सिक्ख यानी जो सीखने को तैयार है। इसलिए सदगुरु नानक ने अपने धर्म का नाम रखा सिक्ख धर्म। जो शिष्य होने को तैयार हो जाए। यानी सीखने को तैयार हो जाए। सदगुरु के पास जाएं तो सिर्फ इसलिए जाएं वो कुछ सीख देगा तब तो वो शिष्य है और सीखने को तत्पर नहीं है, तो व्यर्थ है धर्म के नाम पर कुछ भी करना। जिन्दगी रोज तुम्हें अवसर देती है कि तुम कुछ पल कुछ सीख लो।
एक सूफी फकीर था। हसरत। बड़ी यात्रा थी। किसी गांव में रात ठहरने की जरूरत हुई। इधर-उधर गांव में भटकता रहा। ठहरने का कोई स्थान नहीं मिल रहा था। उस गांव में एक बहुत बड़ा चोर था। उसने देखा कि ये आदमी कुछ भटका हुआ लगता है। ठहरने की जगह खोज रहा है पर पा नहीं रहा है। सूफी फकीर साधू था।
श्री सिद्ध सुदर्शन आँााम
अवंतिका चिरंजीव विहार, गाजियाबाद
मोबाइल न. : ०९८९१००७३५९ |