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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
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भारतीय हॉकी अब किसकी?
 
दिल्ली हाईकोर्ट ने आईओए के इंडियन हॉकी फेडरेशन को भंग करने के फैसले को निरस्त करने और आईएचएफ की कमान वापस केपीएस गिल के हाथ में देने का फैसला क्या सुनाया एक नई जंग शुरू हो गई कि

अफसोस गरूर टूटने में समय न लगा। सुपर आठ के तीनों मैच गंवाने के साथ ही हम टूर्नामेंट से बाहर हो गए। सभी भारतीयों का दिल जो टूटा सो टूटा, क्रिकेट जगत में मानो तहलका मच गया और शुरू हुआ दौर आरोपों और बचाव का

हॉकी और इससे जुड़े खिलाड़ियों को कितना होगा यह एक बड़ा सवाल है

दिल्ली हाईकोर्ट ने २१ मई को केंद्र और ओलंपिक एसोसिएशन (आईओए) के उस फैसले को निरस्त कर दिया जिसमें इंडियन हॉकी फेडरेशन की मान्यता रद्द कर दी गई थी। कोर्ट ने दोनों पर १०-१० हजार रुपये का हर्जाना भी लगाया। गौरतलब है कि आईएचएफ के सेक्रेटरी के . ज्योतिकुमारन को एक स्टिंग ऑपरेशन में कथित तौर पर दिखाया गया था कि वो एक खिलाड़ी को टीम में शामिल करने के लिए रिश्वत ले रहे थे। इसके बाद इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन ने आईएचएफ को भंग कर दिया था। चूंकि भारत को २०१० हॉकी वर्ल्ड कप की मेजबानी करनी थी और इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन ने यह ऐलान कर दिया था कि बगैर किसी स्पोर्ट्स बॉडी के भारत से वो मेजबानी छीनी जा सकती है। ऐसे में आनन-फानन में आईओए ने 'हॉकी इंडिया' का गठन कर दिया। कोर्ट ने यह कहते हुए केंद्र और आईओए के उस फैसले को गैरकानूनी करार दिया कि किसी भी स्पोर्ट्स बॉडी के खिलाफ कोई भी फैसला करने से पहले उसे कारण बताओ नोटिस भेजना चाहिए लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

इंडियन हॉकी फेडरेशन के तत्कालीन अध्यक्ष केपीएल गिल ने कोर्ट में केंद्र सरकार और इंडियन ओलंपिक एसोएिएशन के फैसले को चुनौती दी थी। आज उनका कहना है कि 'कुछ लोगों ने अपने निजी एजेंडे के लिए हमारी फेडरेशन का 'अपहरण' किया था और उसे कोर्ट ने गलत साबित कर दिया। आखिर ये साबित हो ही गया कि हम सही थे और हमारे साथ जो हुआ, वो गलत था।' कोर्ट के इस फैसले को वो अपनी जीत मानते हुए लगभग दो साल बाद भारतीय हॉकी की कमान वापस अपने हाथ में लेने को बेकरार हैं। वहीं दूसरी तरफ है हॉकी इंडिया जो आईएचएफ को फिर से बहाल करने के दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बावजूद देश में हॉकी का संचालन करते रहने के मूड में हैं क्योंकि उसे इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन (एफआईएच) और एशियन हॉकी फेडरेशन (एएचएफ) का समर्थन हासिल है। हॉकी इंडिया के सचिव नरिंदर बत्रा ने कहा कि कोर्ट के फैसले से हम पर असर नहीं पड़ेगा। एफआईएच और एएचएफ ने हमें मान्यता दी है, आईएचएफ को नहीं।

बहरहाल, ये तो वक्त ही बताएगा कि आखिर भारतीय हॉकी की कमान किसके हाथों में होगी। ये तो सर्वविदित है कि गिल ने अपने चौदह साल के कार्यकाल में भारतीय हॉकी को कुछ नहीं दिया। भारतीय हॉकी भ्रष्टाचार और द्घूसखोरी में द्घिरी रही। उनके कार्यकाल में पहली बार हॉकी टीम ओलंपिक २००८ में क्वालिफाई भी नहीं कर पाई और इसी कारण उन्हें इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन ने हटा दिया। आईएचएफ भंग करने के बाद जब भारतीय हॉकी की कमान पांच सदस्यीय समिति एडहाक के हाथों में दिया गया ताकि हॉकी की खस्ता हालत में कुछ सुधार हो सके लेकिन यहां भी वही आलम दिखा। एडहाक के बनने के कई (६-७) महीनों तक आलम यह था कि भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने एक भी अंतरराष्ट्रीय मैच नहीं खेला था। फिर इंटरनेशनल हॉकी फेडरेशन की धमकी (वर्ल्ड कप २०१० की मेजबानी छिने जाने की) के बाद महिला और पुरुष खिलाड़ियों के लिए एक ही बॉडी 'हॉकी इंडिया' का तो गठन हो गया लेकिन वो भी महज दावे के अलावा कुछ खास नहीं कर पाई। नौबत यहां तक आ गई कि खिलाड़ियों को अपनी मैच फीस को हासिल करने के लिए वर्ल्ड कप की तैयारियों से इंकार करने जैसा फैसला लेना पड़ा। और महिला खिलाड़ियों से किए वादे कि उनसे पुरुष खिलाड़ियों जैसा ही बर्ताव किया जाएगा, महज वादे भर दिखे। खिलाड़ियों को कभी प्रैक्टिस कैंप में परेशानी झेलनी पड़ी तो कभी सिरीज जीतकर लाने के बाद भी किसी ने नहीं पूछा।

इन उदाहरणों से तो साफ जाहिर होता है कि हुक्मरान कोई भी हो, भारतीय हॉकी दिन प्रतिदिन गर्त में जाती रही। फिर से सवाल भले ही उठ रहा है कि अब हुक्मरान कौन, लेकिन इससे भी अहम सवाल कि हॉकी और हॉकी खिलाड़ियों का भला कब होगा? आज भी हॉकी खिलाड़ी उपेक्षा की गर्त में डुबे दिखते हैं। वह समय कब आएगा जब भारतीय हॉकी अपनी चमक वापस हासिल करेगी? वो दिन कब आएगा जब महिला हॉकी को सिरीज जीतने के बाद भी उपेक्षा का सामना नहीं करना पड़ेगा? वो समय कब आएगा जब कोई हॉकी खिलाड़ी भूख मिटाने के लिए सब्जी बेचते नहीं दिखेगा? अब भी वक्त है कि इन सवालों के जवाब ढूंढ लिए जाएं नहीं तो कहीं ज्यादा देर न हो जाए।

 
ओलंपिक से बाहर करने की धमकी
 

देर से ही सही लेकिन खेल मंत्री एमएस गिल की आंखें खुलीं और उन्होंने दशकों से विभिन्न खेल फेडरेशन पर राज कर रहे हुक्मरानों के लिए फतवा जारी कर दिया कि उनका कार्यकाल १२ साल से अधिक का नहीं होगा। यह सुनते ही उन हुक्मरानों को मानो सदमा लग गया या कह लें डर लग गया कि कहीं उनकी कुर्सी न छिन जाए। फिर उनके बीच अपनी कुर्सी बचाने की होड़ चल पड़ी। इस होड़ में अचानक फैसला आता है इंटरनेशनल ओलंपिक काउंसिल का, जिसे सुनकर उनके चेहरे फिर से खिल उठे। इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन और राष्ट्रीय खेल संद्घों के पदाधिकारियों के कार्यकाल को सीमित करने के खेल मंत्रालय के निर्देश पर इंटरनेशनल ओलंपिक काउंसिल ने २२ मई को विरोध जताया। भारत सरकार के तर्क को खारिज करते हुए आईओसी ने चेतावनी दी है कि खेल मंत्रालय का यह आदेश भारत को ओलंपिक परिवार से बाहर कर सकता है। आईओसी ने आईओए को एक पत्र लिखकर विरोध जताया। आईओसी की इस चेतावनी से उन पदाधिकारियों में मानो खुशियों की लहर दौड़ गई जो खेल मंत्रालय के इस फैसले की चपेट में आने से भयभीत थे। इसमें सबसे ऊपर नाम आता है इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी का, जो पिछले १४ साल से इस पद पर कार्यरत हैं। उसके बाद एक दूसरा बड़ा नाम है विजय कुमार मल्होत्रा का, जो पिछले ३१ साल से राष्ट्रीय तीरंदाजी संद्घ की कमान संभाल रहे हैं।

गौरतलब है कि खेल मंत्रालय ने कुछ समय पहले इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन और नेशनल खेल संद्घों के पदाधिकारियों के कार्यकाल को सीमित करने का आदेश दिया था। खेलमंत्री एमएस गिल के जारी इस आदेश में कहा गया कि १२ साल से ज्यादा समय से खेल संद्घों के अध्यक्ष पद पर बैठे लोगों को मौजूदा कार्यकाल खत्म होते ही अपनी कुर्सी गंवानी पड़ेगी। नए नियमों के तहत खेल संद्घों के अध्यक्ष ज्यादा से ज्यादा १२ साल तक पद पर रह सकते हैं। सचिव और कोषाध्यक्ष चार-चार साल के दो कार्यकाल ही पूरा कर सकते हैं। इसके अलावा एसोसिएशन का प्रेसिडेंट ७० साल से ज्यादा का नहीं होगा। खेल मंत्री के इस फरमान से खेल संद्घों पर विराजमान कई आलाअधिकारियों की कुर्सी हिल सकती थी।

खेल मंत्रालय ने ऐसा फैसला क्यूं लिया, इसका जवाब शायद हम सभी को पता है। यह बात भी पता है कि उनकी यह पहल आसान नहीं क्योंकि वे लोग राजनीतिक दिग्गज हैं। और इस राह में एक सबसे बड़ी अड़चन थी वो ये कि इन निर्देशों को लागू करने में इंटरनेशनल ओलंपिक कमिटी की ओर से भी दिक्कत आ सकती थी। इस तरह के नियमों के मुताबिक अगर ऐसा लगता है कि किसी देश में खेलों के क्षेत्र में राजनीतिक दखल हो रहा है तो वहां होने वाले सभी खेल आयोजनों को रद्द कर दिया जा सकता है और चूंकि इस साल भारत को कॉमनवेल्थ गेम्स का आयेजन करना है और ऐसे में आईओसी आड़े आती है तो कुछ करना मुश्किल खड़ी कर सकता है। तो लो जिस बात का अंदेशा था आखिर वही हुआ।
आईओसी खेल मंत्रालय के इस फैसले के बीच आ ही गया। खेलमंत्री एमएस गिल को लिखे संयुक्त पत्र में कहा गया कि अगर मंत्रालय इस तरह के नए नियमों को लागू करने पर जोर देता है तो इस मुद्दे को अगले महीने होने वाली आईओसी की कार्यकारी बोर्ड की बैठक में रेफर किया जाएगा। इसके नतीजे में भारत को ओलंपिक परिवार से निलंबित किया जा सकता है या फिर उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है। खेलमंत्री भला अब क्या कह सकते हैं। ये तो उन्हें चुप करने का सबसे कारगर तरीका था। उन्होंने बस इतना ही कहा कि यह विवाद देश में सुलझना चाहिए था।

 
 
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