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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
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इंदौर हिन्दुत्व आतंक की राजधानी!
 
अजमेर, मक्का मस्जिद, मालेगांव बम आँामाकों के पीछे उजागर होते इस डरावने सच से हम क्या अहम नतीजा निकाल सकते हैं? यही कि हिन्दोस्तां की पुलिस मशीनरी को अगर बिना किसी पूर्वाग्रह के पेशेवर ढंग से काम करने की इजाजत दी जाए तो वह आसानी से सच्चाई की तह तक पहुंच सकती है। यह तभी संभव है जब सियासतदां अपने

विशिष्ट आग्रहों को उन पर न थोपें या उनकी जांच में गैरजरूरी दखलंदाजी न करें। पिछले दिनों भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने यह बयान दिया कि 'आतंकवाद का कोई आँार्म नहीं होता।' बात अपने आप में बिल्कुल दुरुस्त है

आजाद हिन्दोस्तां का पंद्ररहवां बड़ा शहर इंदौर, जो होलकर द्घराने की न्यायप्रिय शासक अहिल्याबाई होलकर के नाम से अधिक जाना जाता रहा है तथा आज की तारीख में मध्य प्रदेश की व्यावसायिक राजधानी है, वह इक्कीसवीं सदी की दूसरी दहाई के मुकाम पर एक अलग पहचान धारण करता जा रहा है। और यह एक ऐसी पहचान है जो हर न्यायप्रिय इंदौरवासी के लिए बेहद अपमान का सबब बन रही है। कुछ लोगों ने तो यह भी कहना शुरू कर दिया है कि जिस तरह जिहादी आतंकवाद के नाम पर कुछ गुमराह युवकों की करतूतों के चलते साझी संस्कूति एवं साझी विरासत के प्रतीक आजमगढ़ को बदनाम किया जा रहा है वही सिलसिला इंदौर के साथ भी हो रहा है।
इसे इत्तेफाक कहें या किसी संगठन विशेष की योजना का हिस्सा कि हाल में देश में हुई चंद आतंकी द्घटनाओं के तार इसी शहर से जुड़े दिखते हैं। और यहां हम जिसे जिहादी आतंकवाद कहा जाए सिर्फ उसकी बात नहीं कर रहे हैं। लोगों को याद होगा कि बामुश्किल तीन साल पहले इंदौर के पास स्थित पीतमपुुरा नामक औद्योगिक इलाके से पाबंदीशुदा 'सिमी' अर्थात स्टुडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया के चंद कार्यकर्ता ही नहीं उनके लीडर भी पकड़े गए थे। मध्य प्रदेश की पुलिस ने सिमी के नेटवर्क को नष्ट करने का दावा किया था। दरअसल जिहादी आतंकवाद का जवाब देने के नाम पर हिन्दुओं के उग्र हिस्से में जो हिंसक प्रतिक्रिया जन्म ले रही है, उसके कई सूत्र इसी शहर से जुड़े दिखते हैं। इनमें सबसे ताजा मसला ११ अक्तूबर २००७ में अजमेर शरीफ के दरगाह पर हुए बम विस्फोट से जुड़ा है। अब खुद पुलिस यह कह रही है कि अभिनव भारत के आतंकवादियों ने अजमेर बम धमाके को अंजाम दिया है, जिससे जुड़े कई कारिंदे इसी शहर में रह कर अपनी गतिविधियों का संचालन करते रहे हैं।

इस सिलसिले में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उससे यह बात अधिक पुष्ट हुई है। तीस अप्रैल को अजमेर के बिहारीगंज मुहल्ले से हुई देवेन्द्र गुप्ता की गिरफ्तारी इस मामले में अहम थी, जिसका मोबाइल फोन कई महीनों से पुलिस ने निगरानी में रखा था। अजमेर बम धमाके में जो सिम कार्ड बरामद हुए थे, उन्हें इन दिनों झारखंड में रहने वाले देवेन्द्र गुप्ता ने ही खरीदा था। देवेन्द्र की निशानदेही पर मध्य प्रदेश के रहने वाले चंद्रशेखर और विष्णु पाटीदार को दूसरे दिन गिरफ्तार किया गया, बाद में पाटीदार को शुरुआती पूछताछ के बाद रिहा किया गया। पुलिस रेकार्ड में यह बात भी दर्ज थी देवेन्द्र गुप्ता इंदौर निवासी सुनील जोशी नामक हिन्दुवादी संगठन के एक प्रचारक से भी जुड़ा था, जिसकी दिसम्बर २००७ में रहस्यमय ढंग से हत्या हुई थी।

पिछले दिनों राजस्थान के गृहमंत्री शांति धारीवाल ने मीडिया को यह भी बताया कि पुलिस को गुजरात के डांग जिले में सक्रिय स्वामी असीमानंद की भी तलाश है जो अजमेर बम धमाके का मुख्य सूत्रधार कहा जाता है। याद रहे कि पिछले साल ही राजस्थान आतंकवाद विरोधी दस्ते ने अपनी तफ्तीश में इस बात का संकेत दिया था कि गरीब नवाज की दरगाह पर जहां हिन्दू और मुसलमान दोनों प्रार्थना करने आते हैं, वहां के इस बम विस्फोट के पीछे अतिवादी हिन्दू समूहों का हाथ है। अंग्रेजी अख़बार 'मेल टुडे' ने ('मालेगांव एक्यूजड हैड रोल इन अजमेर, कूष्ण कुमार, १९ अप्रैल २००९) लिखा : ''महाराष्ट्र एटीएस का मानना है कि मालेगांव बम धमाके में जिन तीन संदिग्धों ने बम रखा था, उनकी गिरफ्तारी से ही हैदराबाद के मक्का मस्जिद एवं अजमेर शरीफ बम
धमाकों के सुराग मिल सकते हैं।''

ताजे समाचारों के मुताबिक राजस्थान आतंकवाद विरोधी दस्ते के लोग इन दोनों अभियुक्तों को मध्य प्रदेश के इंदौर तथा अन्य कई ठिकानों पर ले जाने की योजना बना रहे हैं ताकि इस बम विस्फोट में शामिल अन्य सूत्रों को तलाशा जा सके। इतना ही नहीं प्रस्तुत दस्ते ने महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी दस्ते से सुनील जोशी से जुड़ी फाइलें भी मंगाई हैं जिसने कथित तौर पर अजमेर बम धमाकों की योजना देवेन्द्र गुप्ता के साथ बनायी थी। दस्ते के अधिकारियों का यह भी मानना है कि गुप्ता एवं सुनील जोशी के फोन के विवरण बताते हैं कि दोनों एक दूसरे के गहरे संपर्क में थे।

अगर हम मालेगांव, अजमेर एवं मक्का मस्जिद बम धमाके में चली सीबीआई जांच पर गौर करें तो (हिन्दुस्तान टाइम्स, १० मई २०१०, इंदौर टेरर आउटफिट बिहाइंड थ्री ब्लास्टस!) वह इस बात को स्पष्ट करती है कि बम धमाके को अंजाम देने के काम में हिन्दुत्व के इन आतंकियों का हाथ सिर्फ इसी शहर तक सीमित नहीं है। जांच के मुताबिक चाहे मई २००७ के हैदराबाद के मक्का मस्जिद बम धमाके को देखें, अक्तूबर २००७ के अजमेर बम धमाके को देखें या सितम्बर २००८ के मालेगांव बम धमाके को देखें तो इंदौर के इस आतंकी मोड्यूल की अहम भूमिका नजर आती है। इस मोड्यूल के सदस्यों में सुनील जोशी, रामजी कलासांगरा, देवेन्द्र गुप्ता, समीर डांगे और स्वामी असीमानंद जैसों के नामों का विशेष उल्लेख है। मालूम हो कि हेमंत करकरे की अगुआई में जब मालेगांव बम धमाकों की जांच चल रही थी उस वक्त इनमें से कई नाम सुर्खियों में थे और उसी वक्त यह बात उजागर हुई थी कि रामजी कलासांगरा, असीमानंद जैसे लोग फरार हैं। वैसे यह भी महत्वपूर्ण है कि समझौता एक्सप्रेस बम विस्फोट में जो जांच हरियाणा पुलिस ने शुरू की थी, उसके भी कुछ सूत्र इंदौर तक पहुंचे दिखे थे। समझौता एक्सप्रेस के बम विस्फोट में जिन सूटकेसों को बरामद किया गया था तथा जिन अखबारों का इस्तेमाल हुआ था, उनकी टोह लेते हरियाणा पुलिस इंदौर पहुंची थी। वह उस दुकान पर भी पहुंची थी, जहां से ये सूटकेस बेचे गए थे। मगर पूरे कांड को लेकर मध्य प्रदेश पुलिस का जिस किस्म का असहयोगात्मक रुख था, उससे वह जांच आगे नहीं बढ़ पाई। हरियाणा पुलिस ने मध्य प्रदेश पुलिस के इस असहयोग की सार्वजनिक आलोचना भी की थी।

मामले की अधिक तहकीकात करने पर हम इस तथ्य से भी रू-ब-रू होते हैं कि दिसम्बर २००३ में जबकि मध्य प्रदेश में दिग्विजय सिंह की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार थी तब इस आतंकी मोड्यूल ने पहली दफा अपना हाथ आजमाया था। सीबीआई जांच बताती है कि भोपाल में हर साल आयोजित होने वाले मुसलमानों के सम्मेलन 'इत्तेमा' के दौरान जबकि दूरदराज से भी हजारों की तादाद में मुस्लिम भोपाल पहुंचते हैं, द्घांसीपुरा में रिमोट कंट्रोल से संचालित बम रखा गया था, जिसे पुलिस की सावधानी से निष्क्रिय किया जा सका। पिछले दिनों जब दिग्विजय सिंह गृहमंत्री पी चिदंबरम से मिलने पहुंचे तो उन्होंने नक्सलवाद की समस्या के साथ उनसे 'हिन्दू अतिवाद' की इस परिद्घटना पर भी बातचीत की थी। पत्रकारों से बात करते हुए दिग्विजय सिंह ने इस बात पर आश्चर्य प्रकट किया था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संद्घ के प्रचारक रहे सुनील जोशी की रहस्यमय हत्या की जांच में सूबे की पुलिस ने विशेष रुचि नहीं दिखाई और अपनी फाइल बंद कर दी।

अजमेर, मक्का मस्जिद, मालेगांव बम धमाकों के पीछे उजागर होते इस डरावने सच से हम क्या अहम नतीजा निकाल सकते हैं? यही कि हिन्दोस्तां की पुलिस मशीनरी को अगर बिना किसी पूर्वाग्रह के पेशेवर ढंग से काम करने की इजाजत दी जाए तो वह आसानी से सच्चाई की तह तक पहुंच सकती है। यह तभी संभव है जब सियासतदां अपने विशिष्ट आग्रहों को उन पर न थोपें या उनकी जांच में गैरजरूरी दखलंदाजी न करें। पिछले दिनों भाजपा के वरिष्ठ नेता वेंकैया नायडू ने यह बयान दिया कि 'आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।' बात अपने आप में बिल्कुल दुरुस्त है। मगर वह क्या इस संदर्भ में भी कुछ रोशनी डाल सकेंगे कि जब तक राजस्थान में उनकी अपनी पार्टी की हुकूमत थी, तब तक कम से कम अजमेर बम धमाके के असली सूत्राधारों तक पहुंचने में उनकी सरकार क्यों असफल रही?

ढाई साल से अधिक वक्त गुजर गया जब अजमेर शरीफ के बम धमाके में ४२ वर्षीय सैयद सलीम का इंतक़ाल हुआ था। महान सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की इस दरगाह पर ११ अक्तूबर २००७ को बम विस्फोट में जो दो लोग मारे गए थे, उनमें एक वह भी शामिल थे। मालूम हो कि इस धमाके में कई लोग बुरी तरह द्घायल भी हुए, जब वह प्रार्थना करने की मुद्रा में थे। गौरतलब है कि हैदराबाद के निवासी सैयद सलीम के आत्मीयजनों को उनकी इस असामयिक मौत से उपजे शोक के साथ-साथ एक और सदमे से गुजरना पड़ा था। और इसकी वजह थी पुलिस एवं जांच एजेंसियों का रुख जिन्हें यह लग रहा था कि सैयद सलीम खुद इस हमले के पीछे थे। हम कल्पना ही कर सकते हैं कि मामले की जांच के लिए राजस्थान से हैदराबाद पहुंची पुलिस की टीम ने परिवार को किस कदर मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया होगा और किस तरह शेष समाज के लोगों ने इस 'आतंकी' परिवार के साथ अपने रिश्तों को बिना कहे पुनर्परिभाषित किया होगा। लोगों को याद होगा कि अजमेर बम धमाके के बाद अक्सर जैसा कि उस वक्त़ की रवायत थी- जबकि अतिवादी हिन्दुत्व का मसला सुर्खियों में नहीं पहुंचा था- चंद अतिवादी इस्लामिक संगठनों को इस बम कांड के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था। कई लोगों को गैरकानूनी ढंग से हिरासत में लिया गया, तमाम लोगों से पूछताछ की गयी, सूचना पाने के लिए तमाम लोग यातना का शिकार बने। मीडिया भी इस मामले में पीछे नहीं रहा, उसने आतंकवादियों की योजनाओं और इस अमानवीय एवं बर्बर कूत्य के तर्जे अमल पर सनसनीखेज स्टोरी प्रकाशित की और बिना किसी सबूत के यह भी बताया कि इस द्घटना के सूत्र 'सरहद पार' से जुड़े हुए हैं। विडंबना यही कही जाएगी कि तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल ने भी यही राग अलापा था।

वे सभी जो हिन्दोस्तां के विभिन्न बम धमाकों के मामलों की खोजख़बर रखते रहे हैं वे बता सकते हैं कि अजमेर बम धमाके को लेकर रफ्ता-रफ्ता उजागर होते डरावने सच के पहले ही मक्का मस्जिद बम धमाके (मई २००७)- जिसमें नौ निरपराधों की मौत हुई थी और बाद में हुई पुलिस फायरिंग में भी चंद लोग मारे गए थे- की पुलिसिया कहानी पहले ही धराशायी हो गई है। यह बात अब इतिहास हो चुकी है कि किस तरह इस काण्ड के लिए पहले लश्कर ए तोएबा और सिमी को जिम्मेदार ठहराया गया था। हैदराबाद के विभिन्न इलाकों से निरपराध मुस्लिम युवकों को उठाया गया था और महीनों तक गैरकानूनी रूप से हिरासत में रखा गया था। सभी को जबरदस्त यातनाएं दी गयीं ताकि वह इस अपराध में अपनी सहभागिता कबूल करें। अंततः नागरिक अधिकार संगठनों को इन गैरकानूनी हिरासत के खिलाफ उच्च न्यायालय में हेबियस कार्पस याचिकाएं दायर करनी पड़ीं और उन्हें रिहा करवाना पड़ा।
उम्मीद की जानी चाहिए कि अब जबकि इक्कीसवीं सदी की पहली दहाई में हुए कई महत्वपूर्ण बम विस्फोटों में हिन्दुत्व आतंकियों की सहभागिता स्पष्ट हो रही है तो अब कम से कम पुलिस महकमे के लोग अपनी जांच में अधिक निष्पक्षता बरतेंगे और निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा फैलाई गई इस थियरी से सूफी स्थलों पर हमले का काम पारंपारिक किस्म के मुस्लिम ही करते हैं जो कथित तौर से सूफी मत की कई बातों से सहमत नहीं हैं- तौबा करेंगे।

 
 
 
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