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बात एनडीटीवी की समूह संपादक बरखा दत्त और हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादकीय सलाहकार वीर सांद्घवी पर लग रहे आरोपों की कर रहा हूं। बरखा दत्त उन लाखों लड़कियों की रोल मॉडल हैं |
जो पत्रकारिता में आ नाम कमाना चाहती हैं। वीर सांद्घवी के बारे में हालांकि यह सब नहीं कहा जा सकता लेकिन वह भारत के सबसे बड़े एवं प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचार पत्र के संपादक रह
चुके हैं और इन दिनों उसके संपादकीय सलाहकार भी हैं। ऐसे 'बड़े' पत्रकारों पर जब देश की शीर्ष जांच एजेंसी कुछ आरोप लगाए तो उसकी गंभीरता को समझा जा सकता है।
प्रभाष जोशी की कमी इस मौके पर भी भारी अखर रही है। अपने प्रिय शिष्यों तक को वह 'कागद कारे' में नहीं बख्शा करते थे। पेड न्यूज के खिलाफ देश भर में अलख जगाने का बीड़ा उन्होंने ही उठाया था। आज यदि वह होते तो निश्चित तौर पर इस पर मुखर हो न केवल लिखते, बल्कि जेहाद का ऐलान करते
विश्वसनीयता, अंग्रेजी में जिसे ट्रस्ट या फेथ कहा जाता है। कितना सकून देने वाला शब्द है यह। लेकिन शनैः शनैः जीवन के हर पहलू से इसका विलोप होता जा रहा है। कौन विश्वसनीय है और कौन नहीं, आज के दौर में यह तय कर पाना लगभग असंभव सा हो चला है। चाहे मामला व्यक्तिगत हो या सार्वजनिक, विश्वास का हर तरफ द्घोर अभाव हो चला है। आप दैनिक समाचार पत्रों की सुर्खियों पर नजर दौड़ा लें, पिता की हत्या संपत्ति के लिए बेटे कर रहे हैं, भाई भाई की जान का दुश्मन बना हुआ है। और तो और रक्त संबंधी अपनी काम पिपासा को बुझाने के लिए अपने ही परिवार की बच्ची का शोषण करने से नहीं हिचक रहे हैं। शायद इसीलिए इसे कलयुग कहा गया है। सार्वजनिक जीवन में तो इसका इतना क्षरण हो चुका है कि शब्द का अर्थ पूरी तरह खो चुका है। कौन है आज जिस पर आंख मूंद कर भरोसा किया जा सके? हर कोई भौतिक विकास की अंधी दौड़ में इस कदर शामिल हो चुका है कि नैतिक-अनैतिक का भेद रहा ही नहीं है। समाज के किसी भी वर्ग, लोकतंत्र के किसी भी स्तंभ का कमोबेश यही हाल है। इस प्रदूषित माहौल के बावजूद सार्वजनिक जीवन में कुछ चेहरे ऐसे भी होते हैं जिन्हें देख प्रेरणा मिलती है। यही वह चेहरे होते हैं जिनके दामन में यदि दाग लगे तो विश्वसनीयता शब्द ही निरर्थक प्रतीत हो जाता है। पिछले कुछ दिनों से ब्लॉगरों की दुनिया में देश के दो नामचीन मीडिया शख्सियतों को लेकर जो द्घमासान मचा रहा वह काबिलेगौर है और यह साबित करने के लिए काफी है कि इस दौर में, इस मुल्क में सब कुछ बिकाऊ है, विश्वसनीय कोई नहीं।
मैं बात एनडीटीवी की समूह संपादक बरखा दत्त और हिन्दुस्तान टाइम्स के संपादकीय सलाहकार वीर सांद्घवी पर लग रहे आरोपों की कर रहा हूं। बरखा दत्त उन लाखों लड़कियों की रोल मॉडल हैं जो पत्रकारिता में आ नाम कमाना चाहती हैं। बरखा दत्त उन तेवरों की प्रतीक हैं जिन्होंने आक्रामकता को हथियार बना नई पत्रकारिता को जन्म दिया। कारगिल युद्ध में सैनिकों के साथ-साथ चलने वाली बरखा निष्पक्ष और ईमानदार पत्रकारिता का पर्याय समझी जाती हैं। वीर सांद्घवी के बारे में हालांकि यह सब नहीं कहा जा सकता लेकिन वह भारत के सबसे बड़े व प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचार पत्र के संपादक रह चुके हैं और इन दिनों उसके संपादकीय सलाहकार भी हैं। ऐसे 'बड़े' पत्रकारों पर जब देश की शीर्ष जांच एजेंसी कुछ आरोप लगाए तो उसकी गंभीरता को समझा जा सकता है। नाना प्रकार के द्घोटालों का पर्याय बन चुके डीएमके नेता ए राजा को संचार मंत्री बनाने के लिए जोड़-तोड़ करने के गंभीर आरोप इन दो दिग्गज पत्रकारों पर लगाए गए हैं। यहां यह समझा जाना और समझाया जाना महत्वपूर्ण है कि राजा को संचार मंत्री बनाने या न बनाने के पक्ष में औद्योगिक समूहों का दबाव था। नीरा राडिया नाम की एक पब्लिक रिलेशन का काम करने वाली हाई-प्रोफाइल महिला ने बरखा दत्त और सांद्घवी के साथ मिलकर कांग्रेस पार्टी के कर्ताधर्ताओं को इस खूबी से मैनेज किया कि मनमोहन सिंह को न चाहते हुए भी ए राजा को संचार मंत्रालय सौंपना पड़ा।
ए राजा को लेकर शायद ही किसी को यह मुगालता हो कि वह ईमानदार राजनेता हैं और अपने मंत्रालय के कामकाज को पारदर्शिता और नियम-कानूनों के तहत चलाया करते हैं। लेकिन बरखा दत्त का नाम ऐसे द्घोटालेबाजी से जुड़ना स्तब्धकारी है। यह वही बरखा दत्त हैं जिन्होंने हैदराबाद की एक कंपनी को केवल इसलिए अदालत में द्घसीट लिया था क्योंकि उस कंपनी ने बरखा दत्त डॉट कॉम नाम की वेबसाइट का रजिस्ट्रेशन करा लिया था। न्यायालय के सामने बरखा की दलील थी कि चूंकि पूरे भारत में मैं बेहद मशहूर हूं इसलिए इस नाम से वेबसाइट यदि बनी तो लोगों को मेरा ही खयाल आएगा। हालांकि यह मुकदमा वह हार गईं लेकिन उनकी सोच सामने आती है कि बरखा दत्त नाम पर उनकी कॉपीराइट है। काश यह सोच उनकी तब जागती जब वह मीडिया द्घरानों के लिए दलाली कर रही थीं। 'हाथी के दांत दिखाने के और, खाने के और होते हैं', कहावत को इस प्रकरण से भली प्रकार समझा जा सकता है। शायद यही कारण है कि बरखा को और उन जैसे कई बड़े पत्रकारों को पद्म सम्मान मिल जाते हैं जबकि अपनी जान हथेली पर रख पत्रकारिता कर रहे गांव-कस्बों के पत्रकारों को पूछने वाला कोई नहीं है। दिल्ली दरबार की परिक्रमा करने वाले कई संपादक, पत्रकार और समाचार पत्रों के मालिक पद्मश्री, पद्म भूषण के साथ-साथ राज्यसभा तक पहुंचते ही ऐसे नापाक गठजोड़ के चलते हैं। सीबीआई के गोपनीय दस्तावेज कैसे लीक हो गए यह मैं नहीं जानता लेकिन यदि देश की शीर्ष जांच एजेंसी दो बडे़ पत्रकारों की गतिविधियों को संदिग्ध करार देती है तो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी जरूर रही होगी।
एनडीटीवी को निष्पक्षता के लिए जाना जाता है। लेकिन जब यह बात उभर कर सामने आती है कि नीरा राडिया उसके जनसंपर्क का काम भी देखती हैं तो समझ में नहीं आता कि सच क्या है और झूठ क्या? सत्ता के पास वह सब कुछ है जिसको पाने की चाहत में बड़े से बड़े का भी ईमान डोल जाए। मीडिया और पॉलीटिक्स वैसे भी एक-दूसरे के साथ इतने द्घुले-मिले रहते हैं जितना अपराधी और पुलिस। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि एक-दूसरे की पीठ खुजलाने का सिद्धांत यहां पर भी उतना ही लागू होता है जितना कहीं अन्य। कस्बाई पत्रकारों को अक्सर हेय दृष्टि से देखने वाले बड़े अंग्रेजीदां पत्रकार इस प्रसंग पर खामोश हैं। खामोश तो दरअसल पूरा मीडिया जगत है।
किसी भी बड़े अखबार के संपादक की कोई टिप्पणी मुझे इस प्रसंग पर पढ़ने को नहीं मिली है। आश्चर्य होता है उन पर जो कमोबेश निष्पक्ष और ईमानदार समझे जाते रहे हैं, वह भी क्यों चुप्पी साधे हैं? प्रभाष जोशी की कमी इस मौके पर भी भारी अखर रही है। अपने प्रिय शिष्यों तक को वह 'कागद कारे' में नहीं बख्शा करते थे। पेड न्यूज के खिलाफ देश भर में अलख जगाने का बीड़ा उन्होंने ही उठाया था। आज यदि वह होते तो निश्चित तौर पर इस पर मुखर हो न केवल लिखते, बल्कि जेहाद का ऐलान करते। प्रभाषजी, आप यदि यह सब देख पा रहे होंगे तो दुखी अवश्य होंगे कि आपके बनाए संपादकों और अन्य वरिष्ठों ने कैसे साफगाई से अपना पल्ला झाड़ लिया है। पिछले दिनों प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष न्यायमूर्ति गजेन्द्र नारायण ने जो कठोर टिप्पणी की थी वह काबिलेगौर है कि आज की पत्रकारिता वेश्यावृत्ति में बदल गई है। तो गम कैसा वेश्या धन कमाने के लिए तन का सौदा करती है, पत्रकार भी धन कमाने के लिए अपने धर्म का सौदा कर रहे हैं।
जय हो! |