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रजिया कांपते हाथों से अपनी अम्मी की बांह पर नींद का इंजेक्शन लगा देती है, चंद लम्हों में रहमत गहरी नींद में डूब जाती है। रजिया रहमत के दाहिने हाथ की हथेली थाम गौर से देखने लगती है। डॉक्टर बनने से बहुत पहले की बात है, रजिया ने रहमत |
की हथेली थाम कहा था, ''अम्मी आपका चेहरा तो मुस्सवर ने लाजवाब बनाया ही है, गुलाब-दर-गुलाब प्यासे गुलाबों की तह जमाकर गदेली बनायी होगी।''
''बस कर रजिया! ये बात तेरे अब्बू कहते तो यकीन कर लेती,'' तिलिस्मी नजरों से खाबिंद जज साहब को निहारते हुए रहमत ने कहा था।
हंस पड़े थे जज साहब, ''भाई अल्लाह ने तो हमें सिर्फ कलम थमायी है, वह भी गुनहगारों को सजा देने के लिए। तुम्हारी अम्मी की तारीफ के कसीदे पढ़ने के लिए तो शायर बनना पड़ेगा, जो कह सके कि गुनगुनी चांदनी चुराकर अल्लाह के फनकार ने तुम्हारी जिल्द को रंगा है ़ ़ ़ और!''
रजिया ने बीच में ताली पीट दी थी, ''जादू वह जो सर पर चढ़के बोले, क्या शरबती अलफाजों को संजोया है आपने, कि शायर शर्मिंदा हो जाये।'' रहमत ने गहरी चितवन से देखा था मानो पूछा हो ़ ़ ज़ो कहा, सच कहा है क्या जज साहब!
फिर मन की बात सात परत के नीचे छुपा रजिया की हथेली सहलाते हुए रहमत ने कहा था, ''किताबों में दीदा लगाइए बेबी, अम्मी का नूर तो आपको मिल ही गया, अब अब्बा का जहन भी हासिल करके दिखाइए।''
जज साहब को लगा कि तब्दील हुई जिंदगी का खुरदरा सफर पूरा करते हुए मंजिल पर पहुंच रहे थे कि जलजले ने द्घेर लिया है।
टप ़ ़ ़टप! रजिया के आंसू रहमत की हथेली पर गिर रहे थे। रहमत नींद के सफर में गाफिल लेटी थी। जज साहब को लगा कि अपने सारे दर्द को छुपाकर अभी जाग उठेगी, सुर्ख बंद पपोटे अचानक ही खुल जाएंगे और हंसते हुए रहमत सवाल उछाल देगी, ''क्यों जज साहब, अल्लाह ने जब उम्र की लकीर महदूद रखी है तो आप क्यों लंबी उम्र की दुआ कर रहे हैं। चलिए सौ साल आपके साथ जीने के लिए और मांगे लेती हूं, मगर ़ ़ ़''
इस मगर का जवाब क्या उनके पास है? ़ ़ ़टहलते हुए वे बाहर निकल आते हैं। इलाहाबाद की सिविल लाइंस मुर्झायी बत्तियों में बेसुध सो रही थी, ऊपर पीला चांद हारे हुए जुआरी की तरह थकी हुई चाल से आसमान में चल रहा था। द्घड़ी देखी, बारह बज रहा था ़ ़ ऩ दिन और न रात के बीच खड़े हुए हैं, महसूस होता है। उनका पूरा वजूद माजी की भंवर में द्घिरा, न उभर पा रहा है और न डूब पा रहा है। अचानक उन्हें लगा कि वे हाशिमपुर रोड की छोटी-सी कोठी के बरामदे में खड़े हैं। गेट पर कोई झिझका हुआ साया खड़ा है मगर आवाज लगाने की जुर्रत नहीं कर रहा है कि कोठी के लोगों की नींद न खराब हो जाये। गेट पर जल रहे ग्लोब की रोशनी में जाड़ों की ओस बार-बार सतरंगिया हो जाती है। वे सायरा को आवाज देना चाहते हैं कि होश संभालता है ़ ़ य़े तो बाहर लगा अमलतास का पेड़ है जिसकी परछाई सलाखों को काट झाड़ियों पर पसर गयी है और वे सिविल लाइंस की कोठी में खड़े हैं न कि हाशिमपुर की छोटी-सी कोठी के बरामदे में।
उस दिन वे वहीं थे। तब वे नौजवान एडवोकेट थे। सायरा ने वक्त पर उठा दिया था, ''हुजूर चांद-सितारे रुखसत हो चुके हैं। हवा आपके इस्तकबाल में नज्म गुनगुना रही है। अगर जनाब उठे नहीं तो आफताब आपके बिस्तर पर शू शू कर देगा'' द्घड़ी देखी तो पांच बजा था।
बरामदे में गाऊन डाल बाहर आये तो लगा कि ठिठुरता हुआ कोई बाहर खड़ा है। कोई चोर हो सकता है गुमान में नहीं आया, क्योंकि उन दिनों चाहे शहर आज की तरह अमीर नहीं था पर चोर बहुत कम थे। कानून का डर था और कानून ईमानदार था। गेट खोल बाहर आये तो किसी ने बुर्के की नकाब नीचे डाल आदाब किया। चेहरा तो छुप गया मगर हाथों की खूबसूरती ने नजर कैद कर ली। आवाज सुनकर सायरा पहुंची और मियां को जादू की छड़ी की तरह बिना हिलते-डुलते देख पूछा, ''कौन हैं आप?'' चिलमन उठी तो बेखुदी के साथ सायरा गले से लिपट गयी, ''अरे हुस्न परी तुम! ़ ़ य़ा खुदा, बर्फ की तरह जमी हुई हो, क्या देर से बाहर खड़ी थीं? ़ ़ ़बुलाया क्यों नहीं आवाज देकर?''
रफीक साहब ने कदम बढ़ाया ही था कि सायरा ने ऐसी निगाह से देखा कि एबाउट टर्न हो गये। सायरा कह रही थी, ''रहमत है, जिसके हुस्न की चर्चा आपसे किया करती थी। जिधर मुस्कुराकर देख लेती थी ़ ़ ़, वहां कब्रगाह बन जाता था। काजी ने परीशां होकर ताकीद अता की थी कि बिना बुर्के के यह लड़की बाहर नहीं निकलेगी। मगर बुर्का चेहरा ढंकता है, हाथ तो निगाह में आ ही जाते हैं।
एडवोकेट रफीक बाहर नहीं जा सके। चाय पीते हुए लगा कि रहमत का नाम कयामत होना चाहिए था। उन्होंने महसूस किया कि संदल के बदन में आंखें परीशां हैं। वे उठ गये तो सहेलियां लंबी गुफ्तगू में जुट गयीं। अदालत के लिए तैयार हुए तो सायरा ने रूमाल पकड़ते हुए कहा, '' ़ ़ ़बेहद पेरशानी में है रहमत! मियां अनवर सैनिट्री इंस्पेक्टर लगे हुए थे। कायदे कानून के कायल थे, लोग चिढ़ने लगे। एक मुलाजिम ने बहाने से सौ का नोट तुड़वाया तभी एंटीकरप्शन वाले आ गये और दस्तखत किया नोट जेब से बरामद कर लिया। खुद जिसने नोट तुड़वाया था उसी ने इल्जाम लगाया कि हर महीने सौ रुपये लेते थे, नहीं तो गैर हाजिर कर देते थे।''
रफीक साहब ने पूछताछ की तो फफक उठी रहमत, ''एक सच्चे नमाजी को अल्लाह ने क्यों जेर करने के लिये चुना है। अगर उन्हें सजा हुई तो खुदा के इंसाफ से मेरा एत्माद उठ जाएगा।
मुकदमें का फैसला चार महीने में हुई तीन जिरहों में हो गया। अनवर मियां आजाद होने पर शुक्रिया अदा करने भी नहीं आये और न ही रहमत को साथ ले गये। दूसरे दिन रफीक और सायरा रहमत को रसूलाबाद की गाड़ी में बैठा आये। जब सायरा की बगल में बैठी रहमत स्टेशन जा रही थी, कार चलाते हुए रफीक साहब को लगा कि चंदन का जंगल पीछे छूट रहा है। चांदनी छू लेगी मैला बदन हो जाएगा, जरूर शायर ने रहमत को देख के ही कहा होगा।
कोठी पर लौटकर महसूस हुआ कि रहमत के जाते ही दीवारों की कलई फीकी हो गयी है। उनके मिजाज को पढ़के रहमत ने कहा, ''परायी औरत कोई चांद-सूरज नहीं होती है वकील साहब! कि जाने के बाद फिर आ जाये।''
मगर रफीक साहब के रुख से सायरा बहुत डरी हुई थी। औरत चाहे जितनी आजाद खयाल हो, खाबिंद की आंखों में दूसरी औरत की तस्वीर देखते ही तड़प उठती है। जानलेवा दर्द उठा था रात में सायरा के, फौरत अस्पताल ले जाना पड़ा था। पेट में बच्चा टेढ़ा हो गया था! तीन दिन बाद एहतियातों की फेहरिस्त लिये सायरा को वापस लाये थे कि रहमत उदास चेहरे के साथ बरामदे में बैठी मिली। वकील साहब को लगा कि अल्लाह ने मदद भेजी है मगर हंसते हुए दर्द सहने वाली सायरा के अंदर कलेजा चीरती एक चीख भी उभरी थी। रहमत अपनी उदासी भूलकर कामकाज में लग गयी।
डिनर के बाद बताया, ''अनवर ने हमें तलाक दिया है, क्योंकि उसकी पैरवी के दौरान हम यहां रहे। उनके खयाल में पुलिस और वकील को सिर्फ औरत की बोटी से सरोकार होता है। उस पर तुम्हारी जैसी खूबसूरत औरत तो कतई नहीं बच सकती है।'' रहमत की आंखों से आंसू झर रहे थे, वह कह रही थी, ''क्या यही अल्लाह का इंसाफ है?''
रफीक साहब को लगा कि आंसू नहीं आसमान से सितारे टूट रहे हैं। अगर रोती रही तो कयामत हो जाएगी। सायरा उसे चुप कराती और खाबिंद की आंखों में जगी आस को भी पहचानती। एक निःश्वास खींचती है सायरा तभी अंगारों की तरह जल उठते हैं, रहमत के गाल। वह कह रही थी, ''क्या औरत अल्लाह की इतनी बेगैरत शै है कि उसे कभी भी आदमी जब चाहे दुत्कार कर जीने के हक से महरूम कर सकता है।''
ठंडी सांस खींची थी सायरा ने, उसका बीमार चेहरा और पीला हो गया था, ''आदमी के फरेब ने हमेशा औरत को गारत किया है। कुसुर आदमी का हक है और सजा औरत की किस्मत।'' फिर चंद क्षण खाबिंद के चेहरे पर खेलती परेशानी को आंक सायरा कहती है, ''इसे अपना ही द्घर समझो। इस वक्त इस द्घर को तुम्हारी बहुत जरूरत है। ये अपना रूमाल भी नहीं तलाश पाते हैं और मैं बिस्तर पकड़े हुए हूं।''
रहमत ने सायरा को सीने में समेट लिया था और सायरा की तीमारदारी और वकील साहब की खातिरदारी में मसरूफ हो गयी। सात दिन बाद रजिया ने दुनिया में कदम रखा। सायरा की हालत खराब थी। जिद करके वह अस्पताल से द्घर आ गयी। डॉक्टरनी रोज देखने आती पर हालात बद से बदतर होती गयी।
एक दिन रफीक साहब और रहमत को इसरार से अपने पास बैठाया और आहिस्ता- आहिस्ता अपनी बात कहने लगी, ''लगता है कि मेरा वक्त करीब है।'' फिर खामोश रही कुछ क्षण।
मेरी दो खास ख्वाहिशें हैं। वकील साहब जजी का इम्तहान पास करें और रजिया बे मां की न कहलाए। ये दोनों काम रहमत के सुपुर्द करती हूं।''
पागल हो उठी थी रहमत, ''मुझे दोजख में भेज दो पर तुम हजार साल जीओ सायरा। मैं अपने खून की हर बूंद तुम्हारे लिये सर्फ कर सकती हूं। तुम अच्छी हो जाओ। वकील साहब मुझे कहीं छोटी-मोटी नौकरी दिला देंगे।''
''खा जाएंगे तुम्हें मर्दुए। मुझे इलहाम हो गया है कि मैं जाने वाली हूं। तुम्हारा हाथ इन्हें थमाकर सुकून से मर सकूंगी।''
दूसरे दिन काजी साहब कोठी पर आये और निकाह पढ़ गये। सायरा की आंखों में आंसू और होंठों पर मुस्कुराहट थी। रात में चांद खिड़की से झांका और सायरा की रूह अंजाने सफर पर चली गयी। खिड़की से बाहर खाने के लिए दी गई दवाइयां धूल चाट रही थीं।
डॉक्टरनी को सायरा के ऊपर दवा का असर न होना अजीब-सा लग रहा था।
वकील साहब को चटपट सायरा का जाना और रहमत का आना बड़ा अजीब लग रहा था। यही हाल रहमत का था। दोनों को लगा कि सायरा मरी नहीं थी, उसने खुदकुशी की थी। वे एक-दूसरे की आंखों में अपने सवाल का जवाब खोजते रह गये, तभी रजिया रो पड़ी थी और दौड़ गयी थी रहमत सायरा की हिदायत याद करके।
एक-दूसरे के सामने निगाहें मिलाने से कतराते हुए वकील रफीक अहमद ने कहा था, ''मेरी आंखों में तुम्हारी चाहत पढ़ ली थी शायद उसने, पर अपनी ही औलाद रजिया को कैसे भूल गयी?''
बीच में ही रोक दिया था रहमत ने, ''नहीं, मुझे बहुत चाहती थी। भंवर से उबारने के लिए जहान छोड़ दिया। मैं रजिया को देखूंगी वकील साहब, आप जज बनकर सायरा का सपना पूरा करिए।''
रफीक अहमद जज तो बन गये मगर दूसरे कमरे में रजिया के पास लेटी रहमत को उठा के अपने कमरे में लाने की तमन्ना पूरी नहीं कर सके। जब भी कदम बढ़ाते सायरा की रोती हुई आंखें और तंज से भरी मुस्कुराहट उनके दिमाग में तूफान उठा देती ़ ़ ़तुम्हारी चाहत के लिए मरी हूं मियां।
रहमत की हिरणी जैसी आंखें खामोशी से दामन पकड़ने की कोशिश करती हैं और जज साहब कतरा के निकल जाते। इसीलिए तो जब रजिया ने उसकी खूबसूरती की तारीफ की तो कह दिया, ''काश, यह बात तुम्हारे अब्बा कहते।''
रजिया को जगाकर सोने भेज देते हैं, जज साहब और रहमत के सिराहने बैठ उसकी हथेली थाम लेते हैं। उन्हें लगता है कि रहमत के होंठ उसी तरह तिरछे हो गए हैं जिस तरह निकाह देखते हुए रोती हुई सायरा के।
एक गहरी सांस जज साहब के सीने से फूट पड़ती है। उन्हें लगा कि रहमत कह रही है ़ ़ ़द्घड़ी देखिए जज साहब! अब आये हैं, जबकि रहमत सफर के लिए रवाना हो रही है।
एक साया किसी अंजाने कोने से आया जिसमें संदल महक रहा था और गायब भी हो गया। द्घबरा के रहमत के चेहरे को निहारते हैं, रूह सफर पर जा चुकी थी।
सोचते रहते हैं अजीब से रिश्ते को लेकर ़ ़ ऱजिया की मां सायरा थी मगर अम्मी का दर्जा मिला रहमत को। उन्होंने तो बस खोया भर। सायरा गयी और रहमत भी बिना रिश्ता कायम हुए चली गयी।
अचानक, कभी सायरा के और कभी रहमत के तिरछे होंठ उन्हें अपने चारों तरफ चक्कर काटते हुए दिखायी देते हैं। जज साहब चीखना चाहते हैं ़ ़ ़मुझे क्यों दिक् कर रही हो, मैंने क्या किया है?
दोनों होंठ एक होकर बोलने लगते हैं ़ ़ ़तुम्हारी आंखों में रहमत की तस्वीर देख मैंने खुदकुशी की थी। रहमत मिल गयी तो उसे तरसा के खुदकुशी के लिए मजबूर कर दिया। ़ ़ ़ ़तुम मुजरिम हो ़ ़ ़दो औरतों की खुदकुशी के जिम्मेदार।
जज साहब द्घबरा के चीख उठते हैं। रजिया अपने कमरे से दौड़ी हुई आती है। ़ ़ ़ ़अब्बा का बदहवास चेहरा देख धक्-धक् करने लगता है उसका दिल। फिर आगे बढ़कर अब्बा का सर अपने सीने में छुपा लेती है ़ ़ ़''अब्बू सब्र कीजिए।''
जज साहब सहमे हुए अंदाज से सीने में सर छुपाये रहते हैं और कमरे में मुजरिम ़ ़ ़ ़मुजरिम कहते होंठ चक्कर लगाते रहते हैं। |
कल मैंने एक खूबसूरत तितली देखी थी प्यारी सी'' पत्नी बोली थी पर उसने पत्नी को अनसुना कर लान के लिए कुछ हिदायतें दी थी। ''आज द्घास में पानी दे देना और नए पपीतों की पौध में भी, न तो माली का कोई अता-पता है, आज भी आएगा या नहीं, न ही बरसात का, ऐसे में द्घास सूख जाएगी और पपीते के पौधे मर चुके होंगे।''
-''जाओ मैं नहीं करने वाली कुछ भी, तुम जानो या तुम्हारा माली, मैंने ठेका नहीं ले रखा है पूरे द्घर को संवारने को . . . ''
-''अरे रे क्या जिक्र कर रही थी तुम . . .कैसी तितली थी . . .बताओं तो भई .. .. .''
-''कैसे आदमी हैं आप, मेरी सुनते ही नहीं . . . द्घास फूस तो नहीं हूं मैं . . .मैं भी तो तुम्हारी हर बात में इंट्ररेस्ट लेती हूं, यहां तक कि जो नई-नई तितलियां देखकर आते हो उनमें भी . . . .''
-''अरे सुनो तो, तुम्हारी कल वाली तितली फिर मंडरा रही है फूल पर, देखो-देखो . . .'' उसने पत्नी को खुश की एक असफल सी कोशिश भर की थी . .. .।
-''नहीं, ये वह नहीं है, वह तो काली थी . . . .एकदम से काली . . .काली स्याह . . .''
-''तो फिर मोगरे के सफेद फूलों पर बैठी होगी . . .काली तितली हमेशा सफेद फूलों पर ही मंडराया करती है।''
-''तुम्हारा सिर . . .'' पत्नी खीज कर अंदर जा चुकी थी, वह नहाना छोड़ तौलिए में ही पत्नी के पीछे-पीछे भागा भी . . .पर कुछ अधिक नहीं कर पाया। पत्नी आंसुओं को छुपाने का असफल प्रयास कर रही थी . . .पर आंसू थे कि सिंदूरी गालों पर मचलने को तत्पर, जैसे मक्खन में केसर द्घोलकर बनाए हों पत्नी के गाल भगवान ने, उसने अपनी अंगुली की पोर से आंसुओं को पूछना चाहा था। पर पत्नी ने उसके हाथ को झटक दिया था और बेडरूम को अंदर से लॉक कर लिया था।
क्या करहे वह, इसी ऊहापोह में बुत बना खड़ा था . . .पत्नी का दुःखी होना भी उचित था . . .वह क्यों नहीं सुनता उसकी . . .फिलहाल वह पत्नी को सिसकने से रोकने के लिए कुछ नहीं कर सकता था . . .''तुम तो तितलियों के हौहार्द हो, हमारी सुनते ही नहीं। अब हम तितली थोड़े ही ना रहे हैं . . .चर्बी चढ़ गई है, पहलवान हो गए हैं . . .मुट्टली बानो . . . ''पता नहीं और क्या-क्या . . .।''
कुछ ही दिनों पहले पत्नी तुनक कर बोली थी। पत्नी की वह सपाट बयानी उसे अंदर से छील सी गई थी। केसर से सिंदूरी गालों पर आंसू छलछला आए थे, पर उस रोज उसने आंसुओं को जाया नहीं होने दिया था, चूम लिया था और पत्नी अपनी आंखों में उमड़ते-द्घुमड़ते बादलों को बरसने से रोकने में कामयाब हो गई थी . . .।
पर अबकी बार नहीं हुई कामयाब . . .बादल बरस रहे थे . . .जमकर बरस रहे थे . . .वह डोर पीटने के अलावा और क्या कर सकता था . . .सिसकते देखता रहा, बस।
भला हो बच्चों का जो स्कूल से लौट आए थे, मम्मी की आवाज लगाते ही वह बाहर निकल आई थी, और वह चुपचाप दुःखी हो कुर्सी पर डह गया था . . .बेटा उसकी गोद में आकर बैठ गया था . . .पर बेटी समझ गई थी कया द्घटा होगा थोड़ी दे पहले यहां।
-''क्या तुम रो रही थी मम्मी . . .'' बेटी ने अपनी मां से पूछा था।
-''नहीं तो . . .'' रूआसी पत्नी ने झूठ बोला था।
-''नहीं कैसे . . .''
और पत्नी फफक पड़ी थी . . .दोनों अबोध आवाक् थे . . .उसने अपराध बोध से सिर झुका लिया था। बेटी उसे द्घूरती हुई अपने कमरे में चली गई थी। उसे आज बहुत बुरा लगा था। उसने एक बार फिर असफल प्रयास किया था पत्नी को खुश करने का।
-''चलो मैकडोनल्डस चलते हैं वहीं लेंगे लंच . . .'' वह बोला था।
-''नहीं मुझे नहीं जाना . . .'' रूआसी पत्नी बोली थी।
बच्चा मचल गया था . . .चलो ना मम्मी, मुझे मैकडोनल्डस का चाऊमीन बहुत अच्छा लगता है और इटालियन पिज्जा भी . . .बेटी भी पिज्जा पर जान देती है, हूं . . .बोलकर अपने कमरे में द्घुस गई थी।
बच्चों का मन रखने के लिए पत्नी तैयार हो गई थी . . .''चलो चलते हैं मुझे दुःखी किया है, तो कम से कम लंच बनाने की तो छुट्टी होनी ही चाहिए . . ''. उसने बेटी से कहा ''स्केल के कपड़े उतार कर तैयार हो जाओ मैं भी तैयार होती हूं।''
बेटा तैयार होने को बाथरूम में द्घुस गया था, पर बेटी अभी नार्मल नहीं हो पाई थी . . .''नहीं जाना मुझे कहीं भी . . .'' गुस्से में बोली थी बेटी।
वह गैराज में गाड़ी निकालने चल दिया था . . .वह दुःखी था। पत्नी के प्रति अपने इस रुखे व्यवहार से, वह अपराधबोध वश स्वयं को अपराध महसूस कर रहा था। सुनना चाहिए मुझे पत्नी को . . .गलती करता हूं मैं . . .यद्यपि सौदाई रहा हूं मैं तितलियों का, यह भी कभी तितली हुआ करती थी मेरी . . .पर यह हाड़ मांस की पत्नी है, २४ द्घंटों मेरे साथ जीने वाली, तितली नहीं है . . .उसने गैराज से गाड़ी निकाल पोर्च में लगा दी थी . . .वे लोग अभी बाहर नहीं आए थे . . .वह अपने अतीत में गुम होता ही चला गया . . .
-''डीयर मजा ही आ गया मेरे पड़ोस में एक बाबू आई है . . .बहुत ही सुंदर है . . .क्या बताशा से होंठ . . .दक्षिण भारतीयों जैसे . . .ऊपर का होंठ थोड़ा छोटा है, पर नीचे वाला गुद्देदार . . .और मीठा-मीठा सा . . .''
-''दक्षिण भारतीय होगी . . .''
-''नहीं यार, पंजाबी है . . .क्या फेयर कलर पाया है, खुला-खुला सा मोतिया रंग . . .पहली ही पोस्टिंग है, पता नहीं . . .क्यों चली आई बाबूगिरी करने . . .कम्प्यूटर भी जानती है . . .दो चार इंटरव्यू दे-दिला देती तो कोई भी कंपनी वाला रख लेता . . .''
-''कया पता, बेचारी की क्या परिस्थितियां होंगी . . .''
-''बाप की जगह लगी है, कम्पनसेट ग्राउंड पर। दूसरे सैक्सन में थे उसके पापा, चल बसे थे . . .''
-''तुमने बात नहीं की . . .''
-''की थी, बातें भी की थी . . .पर दूसरा सैक्सन पूरा का पूरा उमड़ पड़ा था . . .उसके बाप को याद कर-कर के दुःख व्यक्त कर रहे थे, और उसके गालों से आंसू गिर रहे थे . . .इतने खूबसूरत गाल भला आंसुओं के लिए होते हैं . . .''
-''नहीं वे तो तुम जैसों द्वारा सहलाने के लिए होते हैं . . .'' पत्नी ने कमेंट की थी और बुरा सा मुंह बना लिया था। |