 |
उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन में सबसे मुखर और तल्ख तेवर वाले आंदोलनकारी रहे दिवाकर भट्ट मौजूदा भाजपा सरकार में राजस्व, भू-प्रबंआँान, आपदा प्रबंआँान, खाद्य एवं नागरिक तथा पुनर्वास मंत्री हैं। इतने सारे मंत्रालयों को संभाल रहे भट्ट में पहले वाली आक्रमकता और मुखरता अब नहीं दिखती। शायद सत्ता स्वभाव बदल देती है। राज्य की एक मात्र क्षेत्रीय |
पार्टी उत्तराखण्ड क्रांति दल किन कारणों से हाशिए पर है। उसके सरकार में शामिल होने की क्या वजहें हैं? जिन सपनों और उद्देश्यों को लेकर उत्तराखण्ड की लड़ाई लड़ी गई क्या इन दस सालों में वे पूरे हुए? इन सब मुद्दों पर बात हुई इस बार 'दि संडे पोस्ट' के टॉक ऑन टेबल कार्यक्रम में। आमंत्रित थे
कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट। उनके साथ इस बातचीत में शामिल हुए वरिष्ठ पत्रकार और राज्य आंदोलनकारी सुरेश नौटियाल, दैनिक 'जनसत्ता' के फजल इमाम मल्लिक, 'दैनिक जागरण' के अमरनाथ झा तथा
'दि संडे पोस्ट' साप्ताहिक की संपादकीय टीम। पेश है इस दौरान किए गए सवालों पर दिवाकर भट्ट के जवाब :
अपूर्व जोशी : वर्ष १९७९ में ऑल असम स्टूडेंट यूनियन ने असम में क्षेत्रीय भावनाओं को उभारा और एक मजबूत राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी। यूनियन के नेता प्रफुल्ल कुमार महंत दो बार राज्य के मुख्यमंत्री बनने में सफल रहे। उसी साल उत्तराखण्ड में भी आंदोलन शुरू हुआ। क्या कारण रहे कि उस आंदोलन की अगुवाई करने वाले आप लोग आज राज्य में पूरी तरह हाशिए पर चले गए?
उत्तराखण्ड अलग राज्य बनाने के लिए १९७९ में हमलोगों ने एक संगठन बनाया था। अलग राज्य बनने के बाद शासन चलाने की ना समझ थी, न सोच। एक ही मकसद था अलग राज्य बनाना जिसमें हमलोग सफल रहे। जहां तक हाशिए की बात है तो अभी ज्यादा समय नहीं हुआ है। हमलोगों को शासन में शामिल हुए तीन साल हुए हैं। दो साल अभी बाकी हैं। हम हाशिए पर नहीं हैं। सत्ता में आने के बाद कई काम किए हैं। जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है नया भूमि सुधार विधेयक। पुराने कानून में सस्ती दर पर भूमि दी जाती थी। उसमें परिवार पति-पत्नी और नाबालिग बच्चों को माना जाता था। इससे उस द्घर के मां-बाप एवं सभी बालिग बच्चे अपने-अपने नाम से जमीन खरीद लेते थे। ऐसे में एक ही परिवार में ६-७ प्लॉट चले जाते थे। हमने नए विधेयक में सबसे पहले प्लॉट का एरिया ५०० वर्ग मीटर से द्घटाकर २५० वर्ग मीटर किया। फिर इसमें परिवार की परिभाषा बदली। नए विधेयक के अनुसार परिवार में मां-बाप, पति-पत्नी और बालिग बच्चों को शामिल किया गया। बालिग बच्चे जब तक पूर्णतः अलग नहीं रहते तब तक एक ही परिवार माना गया। पुराने कानून के अनुसार जमीन पर कंस्ट्रक्शन के बाद बेच सकते थे। जिस पर रोक लगाई गई। एक और त्रुटि थी पुराने कानून में, वह यह कि जब लोग अपने प्रोजेक्ट जमा कराते थे उस में मांग की गई भूमि आदि पर डीएम एवं अधिकारियों को ३ महीने के अंदर फैसला लेना होता था, नहीं तो तीन महीने के बाद आपत्ति होने पर जमीन देनी पड़ती थी। हमने इसे भी बदला। इस तरह विधेयक से भूमि माफिया, दलाल और बाहरी शक्तियों पर अंकुश लगाया गया।
सुरेश नौटियाल : आप कहते हैं कि जल, जंगल और जमीन उक्रांद का कांसेप्ट था। आप सत्ता में हैं फिर भी जल, जंगल और जमीन के
हक-हकूक के लिए लोग लड़ रहे हैं?
उत्तराखण्ड आजादी के पहले तीन हिस्सों में बंटा था। एक थी कुमाऊं कमिश्नरी। वह अंगे्रजों के अधीन थी। एक व्यवस्था थी टिहरी राज्य की। जहां टिहरी राजा का शासन था। एक और व्यवस्था थी हरिद्वार इलाके में कुंडीशा की। आजादी के बाद इन तीनों व्यवस्थाओं में थोड़ा-थोड़ा परिवर्तन होता चला गया। हक- हकूक की सबसे ज्यादा मांग जंगलों को लेकर है। तो मैं जंगलों की ही बात करता हूं। १९८० के पहले तक लोगों को खास परेशानी नहीं हो रही थी। तब इतनी जरूरत नहीं थी और लोगों में अज्ञानता भी थी। लेकिन १९८० में वनों से संबंधित अलग-अलग कानून बने। इसके बाद वहां के रहन-सहन पर बहुत प्रभाव पड़ा। उस एक्ट से राज्य पर बहुत ज्यादा प्रभाव पड़ा तो वन अधिनियम के खिलाफ राज्य में आंदोलन शुरू हुआ जो बाद में अलग राज्य आंदोलन में तब्दील हो गया। राज्य के साथ एक और त्रासदी १९९६ में हुई। जब गोडावर्मन एनजीओ ने सुप्रीम कोर्ट में एक रिट डाली थी। उस रिट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में कहा गया था कि जो क्षेत्र वन के रूप में जाना जाता हो या पहचाना जाता हो वह वन क्षेत्र माना जाएगा। इस फैसले से सबसे ज्यादा जनमानस प्रभावित हुआ। उत्तराखण्ड में तीन अलग-अलग व्यवस्थाओं की तरह ही यहां तीन प्रकार के वन हैं। पहला रिजर्व फॉरेस्ट, दूसरा सिविल फॉरेस्ट तथा निजी फॉरेस्ट। सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले ने सबको वन बता दिया और वन कानून सब पर लागू हो गया। इसका सबसे ज्यादा नुकसान उत्तराखण्ड को हुआ। नुकसान यह हुआ कि उत्तराखण्ड में करीब ६६ फीसदी वन हैं और नए कानून के मुताबिक जितने वन क्षेत्र में विकास कार्य होगा, उतनी जमीन सरकार के नाम करनी होगी। यदि हम ऐसा करने लगे तो खेती के लिए जमीन ही नहीं रहेगी। हमलोग वन लगाने के लिए जमीन देने को तैयार हैं लेकिन वह जमीन सरकार के नाम नहीं की जाएगी। नहीं तो उत्तराखण्ड में जंगल रह जाएगा और गांव खत्म हो जाएंगे।
सुरेश नौटियाल : क्या आपने इसके लिए केंद्र सरकार से बातचीत की है?
हमने सरकार को कई बार इस पर पत्र लिखा है लेकिन केंद्र सरकार सकारात्मक रुख नहीं अपना रही है। इसलिए हमलोग इसे राज्य कैबिनेट में विचार के लिए रख रहे हैं। वन कानून के कारण प्रदेश का विकास अवरुद्ध हो रहा है। क्योंकि हमारे पास नाप लैंड सीमित है। उद्योग लगाने के लिए जमीन उपलब्ध नहीं है। इसलिए हमलोग जल, जंगल जमीन के हक- हकूक की बात करते हैं।
प्रीति सिंह परिहार : आप विकास की बात कर रहे हैं, वहीं पिछले दिनों जब ऋषिकेश- कर्णप्रयाग रेल लाइन बनने की बात चल रही थी तो आपने केंद्र से अपील की कि वन भूमि न दी जाए। ऐसा क्यों?
ऐसा नहीं है। हमने ऐसी कोई अपील नहीं की थी। मैं पौड़ी के एक कार्यक्रम में गया था। जगह-जगह रेल को लेकर, सतपाल महाराज के बड़े-बड़े बोर्ड लगे थे। लोगों ने हमसे कहा कि अब तो रेल आ रही है तो मैंने कहा कि यह रेल आने वाली नहीं है। हमने कहा था कि यदि सांसद महोदय ज्यादा चिंतित हैं तो पहले फॉरेस्ट की हम पर लटकी तलवार हटाएं। जब तक यह नहीं होगा तब तक हमारी कई पीढ़ियां रेल के दर्शन नहीं कर पाएंगी। यह नारा भर रह जाएगा। जब तक फॉरेस्ट का कानून हम पर लागू है तब तक हम कैसे वन भूमि पर रेल लाइन बिछाएंगे। हम सड़क तो बना नहीं पा रहे हैं।
अपूर्व जोशी : अलग राज्य आंदोलन की अगुवाई करने वाली पार्टी राज्य के पहले चुनाव में ७० में से ४ सीट पर विजयी होती है। दूसरे चुनाव में एक और सीट गंवा देती है। वह भी केंद्रीय अआँयक्ष की। क्या उक्रांद को अब मृतप्राय मान लेना चाहिए?
हमारा दुर्भाग्य रहा कि हमारे कुछ साथी हमसे अलग हो गए। दरअसल, पार्टी में दो तरह की विचारधारा वाले लोग हैं। एक खांटी आंदोलनकारी हैं तो दूसरे पूर्णतः राजनीतिज्ञ। इस मिश्रण के कारण कार्यकर्ताओं में भी यही मिश्रण है। यही हमारे लिए नुकसानदायक रहा है।
अपूर्व जोशी : तो आप मानते हैं कि पार्टी में अंतर्कलह चरम पर है? पार्टी में इस प्रकार का बिखराव क्यों हुआ?
मैंने कहा न कि पार्टी दो विचारधाराओं में बंटी है। शुरुआत में भी मैंने कहा कि यह संगठन राज्य चलाने के लिए नहीं राज्य बनाने के लिए बना था। यदि राज्य बनाने और चलाने के लिए संगठन बनाया होता तो इसे ग्रासरूट (गांवों) से तैयार किया जाता। जबकि यह संगठन सड़कों पर बना है। आंदोलन, चक्का जाम, कार्यालय बंद सब सड़कों से होता था, गांव से नहीं। इसीलिए गांव के लोग हमसे नहीं जुड़े। राज्य बनने के बाद हमें लगा कि जो सपने हमने लोगों को दिखाए हैं वह सत्ता हासिल करने के बाद ही पूरे हो सकते हैं। लेकिन सत्ता तक पहुंचने के लिए हमलोग जब तक प्रयास करते तब तक समय निकल चुका था। अब कोशिश जारी है। आगे देखिए क्या होता है।
सुरेश नौटियाल : आप मानते हैं कि पार्टी नेतृत्व ने भूल की है?
यह तो सभी की जिम्मेदारी थी। आप भी थे, मैं भी था।
अपूर्व जोशी : आपके आंदोलनकारी साथी कम्युनिस्ट विचारआँाारा के थे और आपने भगवा पार्टी से गठबंआँान कर लिया। विचारआँाारा में परिवर्तन कैसे हो गया?
इमरजेंसी के बाद क्या हुआ था? कम्युनिस्ट और भाजपा दोनों सरकार में शामिल थीं। जब पूरब-पश्चिम मिल सकते हैं तो हम तो इतने दूर नहीं थे।
अपूर्व जोशी : तो उक्रांद और भाजपा में नजदीकियां भी थीं?
यह नजदीकियां अलग राज्य आंदोलन को लेकर है। भले ही भाजपा ने वोट के लिए अलग राज्य आंदोलन का समर्थन किया हो। विचारधारा अलग-अलग हो सकती है। मसलन वे कहते हैं गंगा अविरल बहनी चाहिए। गंगा विश्व की धरोहर है। हम नहीं मानते ऐसा। हम कहते हैं गंगा हमारी है। पहाड़ की है।
प्रेम भारद्वाज : आप भाजपा को क्या मानते हैं और क्या नहीं मानते?
मतभेद हैं दोनों पार्टियों के कुछ मुद्दों पर।
आकाश नागर : बीजेपी के साथ आपके गठबंआँान किस आआँाार पर हुए थे?
पहली शर्त थी, विकल्पधारियों की तत्काल वापसी। दूसरी, उत्तराखण्ड आंदोलनकारियों का चिन्हीकरण १९७९ से किया जाए। तीसरी जल, जंगल और जमीन पर राज्य के सिमटते अधिकार क्षेत्र को रोकें। चौथी शर्त थी धारा ३७१ इसके तहत राज्य की सीमा को इस प्रकार सुदृढ़ किया जाए कि बाहरी लोगों को आने का अवसर कम मिले। भूमि सुधार विधेयक लागू कर इसमें बहुत हद तक हम सफल हुए हैं। भाजपा से हमलोगों का कुल ९ बिन्दुओं पर समझौता हुआ। इनमें धारा ३७१, गैरसैंण राजधानी तथा परिसीमन इन तीन बिन्दुओं पर हमलोगों ने फैसला किया कि इस पर जो सहमति बनेगी वह किया जाएगा। गैरसैंण को राजधानी बनाने के लिए जनता को आगे आना होगा। क्योंकि राज्य और राजधानी दोनों जनता से जुड़े मुद्दे हैं। इस पर फैसला भी जनता को करना है। उक्रांद को गैरसैंण से ५०० वोट नहीं मिले। जबकि हम इसे राजधानी बनाना चाहते हैं, इसका मतलब क्या हुआ।
सुरेश नौटियाल : आप राजआँाानी को गैरसैंण से क्यों जोड़ रहे हैं? यह तो राज्य की राजआँाानी होगी। जिस पर कोई विवाद नहीं था। भाजपा सरकार ने उसे और विवादित बना कर कमीशन क्यों बैठा दिया?
आप कांग्रेस को दोषी क्यों नहीं मानते? राज्य बनाने का फैसला भारत की संसद ने किया। ठीक उसी तरह राज्य की राजधानी का फैसला विधानसभा में होगा।
अपूर्व जोशी : आप यह कहना चाहते हैं कि 'तुम मुझे वोट दो, मैं तुझे राजआँाानी दूंगा?'
एकदम सही। आखिर जिस मुद्दे को विधानसभा में हल होना है वह कैसे होगा जब तक इस मुद्दे पर विधानसभा में सहमति नहीं होगी। सहमति के बिना फैसला नहीं हो सकता है। उक्रांद ही नहीं, कोई भी राजधानी बनाने वाले दल बहुमत में आए और राजधानी बनाए।
अहसान अंसारी : क्या बीजेपी गैरसैंण को राजआँाानी बनाने के लिए तैयार नहीं है?
यह पूर्णतः साफ है कि बीजेपी-कांग्रेस राजधानी के पक्ष में कभी नहीं रहे हैं और न कभी हो सकते हैं। क्योंकि इन्हें राजधानी पर राजनीति नहीं करनी। इन्हें सबको साथ लेकर चलना है। यदि पहाड़ पर राजधानी की बात करेंगे तो ये मैदान में साफ हो जाएंगे। हमें ऐसा डर नहीं है। मैदान में हमारा वोट नहीं है। मेरा साफ कहना है कि राजधानी पहाड़ के अस्तित्व से नहीं है। यदि हम इसे गैरसैंण से जोड़ें और मुरादाबाद की सीमा तक ले जाएं और लोगों को समझाएं कि इससे पहाड़ को क्या लाभ है और मैदान को क्या लाभ है तथा पूरे राज्य को क्या लाभ होगा। यदि हम इसे समझाने में सफल रहे तो फिर राजधानी बनने में कोई समस्या नहीं आएगी। लेकिन हमलोग आंदोलनकारी तो हैं पर ग्रासरूट की राजनीति नहीं कर पाए।
सुरेश नौटियाल : जो प्रतिनिआिँा हमने चुने हैं भाजपा, कांग्रेस या उक्रांद आदि के, वे विआँाानसभा में इसका समर्थन नहीं कर रहे हैं?
आप इसका जो मतलब निकालें लेकिन मुझे लगता है राजधानी के विधेयक पर विधानसभा में कोई चर्चा नहीं हुई है। प्रतिपक्ष के नेता हरक सिंह रावत तो ५७ और गांवों को जोड़ने की बात कर रहे हैं। राजधानी का मुद्दा दूर गया, अब तो और भी बड़ी लड़ाई में हमलोग फंसने वाले हैं।
सुरेश नौटियाल : आपने भाजपा से ९ बिन्दुओं पर समझौता कर सरकार बनाई। तीन साल में इनमें से कितने पूरे हुए और कितने नहीं?
विकल्पधारियों की तत्काल वापसी हुई। दूसरा था जमीन को लेकर जिसे हमने भू-सुधार विधेयक के साथ पूरा किया। अन्य पर भी प्रोग्रेस है।
सुरेश नौटियाल : जमीन वाला मामला पूरा नहीं हुआ। हक-हकूक अभी भी लोगों को नहीं मिले हैं।
आप जिस हक-हकूक की बात कर रहे हैं वह फॉरेस्ट का मामला है और हमने नए विधेयक के साथ बाहरी लोगों पर रोक लगाकर अपने लोगों को हक-हकूक दिलाया है। फॉरेस्ट हमारे अधीन नहीं है। भारतीय संसद ने इसके लिए कानून बनाए हैं। हमारा उस पर कुछ नहीं चलता। हमने कई बार पत्र लिखा है। फॉरेस्ट कानून के कारण उत्तराखण्ड राज्य में बहुत दिक्कतें पैदा हो रही हैं या तो हम विकास करें या फिर लोगों के हक-हकूक को बचाएं। हमें दो में से एक रास्ता चुनना पड़ा। हमलोग चाह रहे हैं कि कोई मध्य मार्गीय हल निकले। इसके लिए बातचीत कर रहे हैं। इस मुद्दे पर हमें राजनीति से ऊपर उठकर एकजुट होकर काम करना होगा। यह पूरे राज्य की परेशानी है।
प्रेम भारद्वाज : वन कानून मामले पर आपने तो पत्र लिखे, पार्टी (उक्रांद) ने इस मुद्दे पर क्या किया?
पार्टी इस पर आंदोलन करेगी। इसके लिए पार्टी तैयारी शुरू कर रही है।
फजल इमाम मल्लिक : आपने अभी कहा कि आप जब अआँयक्ष थे तो चार विआँाायक थे। उसके बाद तीन सीट पर सिमट गए। इसका अर्थ हुआ कि यदि आप मंत्री पद छोड़कर फिर से अआँयक्ष बन जाएं तो शायद पार्टी की सीटें बढ़े।
हमारे अध्यक्ष पद से हटने के बाद पार्टी टूट गई थी। पार्टी टूटने के क्या कारण रहे इस पर अभी चर्चा करने की जरूरत नहीं है। हमारे अध्यक्ष रहते ही पार्टी को मान्यता मिली और सुविधाएं भी। जिस तरह अभी नौटियाल जी ने कहा कि मैंने पार्टी को हाइजेक कर लिया है तो शायद उस समय ऐरी जी ने पार्टी को हाइजेक कर लिया होगा।
फजल इमाम मल्लिक : आपने दो मुख्यमंत्रियों के साथ काम किया। दोनों में से किसके साथ आपका अनुभव बेहतर रहा?
मुझे लगता है कि दोनों में भारी अंतर है। पहले जीवनभर अनुशासित रहे। उनमें स्पष्टवादिता है, राजनीतिक गुण नहीं हैं। राजनीति के चार फैक्टर साम, दाम, दण्ड, भेद में उनमें 'भेद' वाला गुण नहीं है। इन चारों का समय के अनुसार प्रयोग नहीं करेंगे तो राजनीतिज्ञ नहीं हो सकते। निशंक जी कुशल राजनीतिज्ञ हैं। जनता के अनुकूल हैं। ये अंतर है दोनों में। मेरा दोनों के साथ काम करने का अच्छा अनुभव है।
फजल इमाम मल्लिक : आपके वर्तमान मुख्यमंत्री अपने को साहित्यकार कहते हैं। क्या आप उन्हें साहित्यकार मानते हैं?
मैं कौन होता हूं साहित्यकार मानने और न मानने वाला। भारत सरकार ने उन्हें पीएचडी की उपाधि दी है। उनकी कविता पर पूरे भारत ही नहीं, बल्कि सिंगापुर जैसे अन्य देशों में चर्चाएं हो रही हैं। यह उनकी काबिलियत ही तो है।
सुरेश नौटियाल : आपको एक बहुत जूनियर आदमी के साथ काम करके कैसा लग रहा है?
भारत में प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ काम करके वरिष्ठ मंत्रियों को जैसा लगा होगा, वैसा मुझे भी लग रहा है। इन स्थानों पर उम्र और अनुभव मायने नहीं रखते। संवैधानिक पद की अपनी गरिमा होती है। पद पर बैठे प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान और आदर करना हमारा कर्तव्य बनता है।
अपूर्व जोशी : आप राज्य के राजस्व मंत्री हैं पिछले डेढ़ वर्षों से पटवारी का असंतोष चरम पर है। राजस्व पुलिस का कार्य उन्होंने एक तरह से छोड़ दिया है। यह उत्तराखण्ड की यूनिक व्यवस्था है। कौशिक समिति ने भी इसे बनाए रखने की सिफारिश की थी। इस पर क्या कहेंगे?
सरकार ने राजस्व पुलिस की होने वाली परेशानी को माना है। उनकी जो भी मांगें हैं, सरकार उन्हें पूरा करने के लिए तैयार है। केवल एक मांग पर सरकार तैयार नहीं है क्योंकि वह संभव नहीं है। वे अपना वेतन स्केल चेंज करने की मांग कर रहे हैं जोकि संभव नहीं है। इसके लिए पूरा कानून बदलना होगा। हम उन्हें भत्ता, अन्य सुविधाएं, उपकरण देने के लिए तैयार हैं। यहां तक कि सरकार राजस्व पुलिस को ५,००० तक भत्ता देने को तैयार है लेकिन यदि वे कहें कि ५,००० भत्ता नहीं दीजिए और २,५०० वेतन बढ़ा दीजिए तो इससे कई प्रकार की परेशानियां उत्पन्न हो जाएंगी। उन्होंने जिस सेवा शर्त पर नौकरी शुरू की है, उसी पर करना चाहिए। हां, उनकी सुविधाओं में बदलाव किया जा सकता है। यदि हमने एक विभाग के कर्मचारियों के स्केल में बदलाव कर दिया तो कल पूरे राज्य के कर्मचारी आंदोलन करने लगेंगे। फिर क्या होगा आपको मालूम ही है।
अपूर्व जोशी : आखिर इसका निदान क्या है?
एक बात तो साफ है कि हम राज्य के अंदर पुलिस व्यवस्था रेगुलर नहीं करेंगे। क्योंकि पटवारी व्यवस्था वास्तव में बहुत अच्छी है। इसे खत्म नहीं करेंगे। राजस्व पुलिस की राजस्व विभाग में बहुत कम चलती थी जो थोड़ी-बहुत चलती थी वह पुलिस के काम में। यदि वे इस काम को करने से मना कर दें तो क्या करेंगे। क्योंकि राजस्व विभाग पूरा कंप्यूटराइज हो रहा है। खाता-खतौनी कंप्यूटराइज हो गया है। यदि हम कल राजस्व पुलिस की भर्ती निकाल दें तो यहां इतने प्रशिक्षित बेरोजगार राजस्व पुलिस हैं कि सरकार को इसकी कमी नहीं होगी। १९९६ से प्रशिक्षित राजस्व पुलिस बैठे हैं। हमने कहा भत्ता ले लो। वे सिर्फ अपनी समस्याएं देख रहे हैं। जबकि सरकार को अपने पूरे कर्मचारियों की समस्या देखनी होती है। वे पुलिस एक्ट की बात करते हैं। हमने उन्हें कहा है कि आप आज ज्वाइन करें एक महीने के अंदर पुलिस एक्ट आपके हाथ में होगा।
सुरेश नौटियाल : तकनीकी और प्रशासनिक स्तर पर आप सही हो सकते हैं लेकिन जिस प्रकार का संबंआँा आमलोगों और पटवारियों में रहा है वह पुलिस व्यवस्था के बाद नहीं रहेगा। क्योंकि जहां थाना प्रणाली है वहां क्राइम बढ़ा है।
मैंने कभी नहीं कहा कि पटवारी व्यवस्था को खत्म किया जाएगा, बल्कि यह कहा कि हमारे पास दूसरे पटवारी तैयार हैं। यदि आप काम नहीं करेंगे तो बेरोजगार प्रशिक्षित पटवारी की भर्ती करनी होगी। हमने राज्य आंदोलन में उनकी बहुत बड़ी भूमिका महसूस की है। इसलिए हम उनसे जबरदस्ती नहीं कर रहे हैं। मेरे कारण उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। मैंने रोक रखा है।
गुंजन कुमार : आप आंदोलनकारी रहे हैं। वर्तमान में राज्य के वरिष्ठ मंत्री हैं। राज्य के दस साल के सफर को आप एक आंदोलनकारी और मंत्री के रूप में किस प्रकार देखते हैं?
पहले मैं आंदोलनकारी के रूप में कहूं तो एकदम से संतुष्ट नहीं हूं क्योंकि जो कार्य २००० में राज्य बनने के बाद करना चाहिए था उसमें हम चूक गए। उसका परिणाम यह रहा कि उस समय जो निर्णय लिए गए वह गलत रहे। आज उसमें सुधार करना इतना आसान नहीं है। मसलन जब किसी मकान की नींव गलत पड़ जाती है और उस पर मकान खड़ा है तो उसकी बुनियाद खोद कर ठीक करना आसान नहीं होता है। यहां भी बुनियाद गलत पड़ गयी। उदाहरण स्वरूप आंदोलनकारियों के लिए जो नॉर्म्स बनाया गया कि ७ दिन जेल में रहा हो या ७ दिन पुलिस की किसी कार्रवाई से अस्पताल में रहा हो। मैं नहीं समझता कि कोई आंदोलनकारी दोनों में से किसी में सम्मिलित रहा है। क्योंकि कभी भी आंदोलनकारी जेल नहीं जाता था। यदि जेल चला जाता तो आंदोलन कौन करता। दूसरा, आंदोलनकारी को मार कर पुलिस ने उसे अस्पताल में भर्ती कराया हो यह भी संभव नहीं हो सकता। आंदोलनकारी यदि पिटता था तो वह अपना इलाज पुलिस से छुपकर चुपचाप कराता था। तो सच्चे आंदोलनकारी दोनों नॉर्म्स को पूरा नहीं करते हैं। आज जितने आंदोलनकारी बने हुए हैं वे स्वतंत्रता सेनानी की तर्ज पर हैं। जिस प्रकार स्वतंत्रता सेनानी का सर्टिफिकेट हमारे देश में बांटा गया है। उस दौरान जो जेल में थे या पुलिस के किसी अन्य कार्रवाई से अस्पताल में भर्ती कराए गए थे वे आंदोलनकारी बन बैठे हैं। और जो आंदोलनकारी सही में हैं वे बाहर हैं। तो ये बुनियाद गलत पड़ी। उस समय ४०० लोगों को नौकरी दी गई। आज उन्हें हटा नहीं सकते तथा उस नॉर्मस को बदलने की हिम्मत किसी में नहीं है। यह इसलिए असफल हुआ क्योंकि जिन लोगों ने सपने दिखाए थे वे लोग सत्ता में नहीं आ पाए। जनता को हम समझा नहीं पाये, जनता हमें नहीं समझ पायी।
सुरेश नौटियाल : क्या इस परिभाषा से आपकी सरकार आपको आंदोलनकारी मानती है?
इस राज्य में सिर्फ मैंने आंदोलन नहीं किया। बाकी सभी ने किया। यह सिर्फ हमारी सरकार ने नहीं किया। पूर्ववर्ती सरकार भी मुझे आंदोलनकारी नहीं मानती। सर्वप्रथम १९६० में पौड़ी के सांसद नेगी जी और सीमा नेगी राज्य की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठे थे। यह पहला आंदोलन था। उस समय आईटीआई और कई अन्य छात्रों को लेकर हम उनके पास गए थे। उनके बाद १९७०-७३ में भी आंदोलन किए। १९७८ में दिल्ली में पहली रैली मैंने निकाली। मैं शुरुआती काल से जुड़ा रहा हूं।
गुंजन कुमार : ऐसा क्यों हुआ कि उत्तराखण्ड राज्य का सपना दिखाने वाले लोग आंदोलन में सफल और सत्ता में आने में नाकामयाब रहे?
इसके कई कारण हैं। पहला मैंने पहले ही कहा है कि हमने राज्य चलाने की बात सोचकर आंदोलन शुरू नहीं किया था। इसलिए सत्ता तक पहुंचने के लिए हमारी कोई तैयारी नहीं थी। दूसरा आर्थिक संसाधन चाहिए था। वह तो लोगों से इकट्ठा कर लिया और लोगों ने दिया भी। लेकिन चुनाव लड़ने के लिए धन कहां से इकट्ठा करते। वे ताकतें जो पहले से ही उत्तराखण्ड में लूट-खसोट कर रही थीं वह कैसे चाहती कि हम यहां ताकतवर बनें। तो उन ताकतों से भी हमारा सामना हुआ।
अमरनाथ झा : आर्थिक संसाआँानों को कारण नहीं माना जा सकता क्योंकि उ.प्र. में जब पहली बार बसपा के ६०-७० विआँाायक जीते थे तो उनमें कई ऐसे विआँाायक थे जिनके पास एक स्वेटर तक नहीं था।
आप सही कह रहे हैं। लेकिन बसपा की जो सोच थी, उनका विचार, उनकी भाषा को समाज के एक तबके ने स्वीकार किया। वहां एक संप्रदाय सामने आया बसपा को जिताने के लिए। हमारे यहां तो कोई संप्रदाय है ही नहीं।
अमरनाथ झा : देश के अआिँाकतर राज्यों में क्षेत्रीय पार्टी प्रभावी है। जो भी राष्ट्रीय दल उनसे पंगा लेता है वह खत्म हो जाता है। आपने उत्तराखण्ड में इतना बड़ा आंदोलन किया। आप स्थानीय लोगों का समर्थन क्यों नहीं प्राप्त कर पाए?
आपने नॉर्थ-ईस्ट की बात की। मैं कहूंगा नॉर्थ-ईस्ट ही नहीं अन्य राज्यों की तुलना में हमलोग अलग हैं। पहाड़ में कोई नेता है। इसके बारे में कोई सुनता ही नहीं है। असम ने बाहरी और असामी के मुद्दे पर लड़ाई लड़ी। हमने तो पहाड़ी और देसी के मुद्दे पर लड़ाई लड़ी। हमने पहाड़ और मैदान के मुद्दे पर लड़ाई नहीं लड़ी। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में शासन का विकेंद्रीकरण चाहते थे।
अमरनाथ झा : मेरा सवाल राष्ट्रीयता को लेकर नहीं है। क्षेत्रीय पार्टी होने के बावजूद आप वहां के लोगों का दिल नहीं जीत पाए। क्यों?
मैंने पहले ही कहा कि हम तीन ताकतों में बंटे हुए थे। ब्रिटिश, नरेश (राजाओं) और मैदानी ताकत। मैं आज आपको एक कड़वा सच बता रहा हूं। हम १९६५ से आंदोलन कर रहे थे। आंदोलन के दौरान एक दिन हमलोग पौड़ी से कुमाऊं की तरफ जा रहे थे। रास्ते में एक जगह (चिबुलद्घाटी) कुछ लोग बैठे थे। हमलोग भी वहां बैठकर चाय पीने लगे। हमने वहां बैठे बड़े-बुजुर्गों से राज्य आंदोलन में शामिल होने की बात कही तो उन्होंने हमसे कहा कि अरे कुछ भी कर लो शासन तो कुमाऊं के लोग ही करेंगे। उन्होंने ही पूछा राजधानी कहां होगी। तब हमलोग सोच में पड़ गए। विशेषज्ञों के साथ बहुत सोच-विचार कर गैरसैंण तय किया गया। जैसे ही गेरसैंण को राजधानी द्घोषित किया, चारों तरफ के लोग आंदोलन में शामिल हो गए और राज्य बन गया। अब फिर वही समस्या आ गई है। गढ़वाल और कुमाऊं दोनों आपस में अलग हैं। एक-दूसरे को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। फिर मैदान वाले पहाड़ को अलग मानते हैं। तो हमलोग तीन-चार अलग ताकतों में बंटे हैं इसलिए हम मजबूत नहीं हो पा रहे हैं। सब अपने स्वार्थ की जिंदगी जी रहे हैं।
अपूर्व जोशी : आपकी सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग रहे हैं। स्टोन क्रेशर नीति में भारी बदलाव, जल विद्युत परियोजनाओं में आँाांआँाली, ऋषिकेश भूमि द्घोटाला, कुंभ मेले में हुई मौतों को छुपाया जाना, मेला कार्य में अनियमितता। कैसा सुशासन आपकी सरकार दे रही है?
मैं आपकी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखता हूं कि भ्रष्टाचार का मुद्दा हमारी सरकार में है। क्योंकि ऋषिकेश भूमि द्घोटाले पर मुख्यमंत्री ने विधानसभा में स्पष्ट द्घोषणा की है कि यदि इसमें थोड़ी भी सच्चाई होगी तो हम कार्रवाई करेंगे। जहां तक जल विद्युत परियोजनाओं में भ्रष्टाचार की बात है, उसमें भी उन्होंने कहा है कि यदि इसमें कुछ भी अनियमितताएं हुई हैं तो हम कब्र खोदकर भी दोषियों को निकालेंगे।
अपूर्व जोशी : पूर्व मुख्यमंत्री के कार्यकाल में हुए छप्पन द्घोटालों की जांच की बात कही गई थी। अब तक छप्पन में से मात्र ४ की जांच पूरी हुई है। वह भी सार्वजनिक नहीं की गई है। अब न्यायमूर्ति शंभुनाथ श्रीवास्तव को पिछले सप्ताह जांच आयोग का नया अआँयक्ष बनाया गया है। यानी मंशा साफ है। भ्रष्टाचार तुम भी करो, हम भी करेंगे और एक-दूसरे को बचाते रहेंगे। आपने किन लोगों से समझौता किया है? आपकी नैतिकता कचोटती नहीं है?
राजसत्ता में भावनाओं का कोई स्थान नहीं है। मैं अपना उत्तरदायित्व निभा रहा हूं। मैं राजधर्म भी निभाऊंगा और गठबंधन धर्म भी। इन दोनों धर्मों को निभाने के लिए कुछ न कुछ समझौता तो करना ही पड़ेगा। जो सपने हमने राज्य आंदोलन में देखे थे एक भी पूरा नहीं कर पाए इसलिए हमने भाजपा से कुछ बिन्दुओं पर समझौता किया। इनमें कुछ न कुछ हमें सफलता जरूर मिली। प्रदेश में जो बड़े-बड़े डैम लगाए गए, उसका खतरनाक प्रभाव सबको मालूम है। इसलिए हम लोगों ने बड़े डैम के बजाय छोटे डैम बनाने की पहल की। इससे स्थानीय लोग भी इस काम को कर सकते हैं। लोगों को रोजगार मिलेगा और राज्य में पर्यटन जैसे कई उद्योगों को बढ़ावा मिलेगा। इससे सीधे तौर पर स्थानीय लोग लाभान्वित होंगे। हमारे यहां उद्योग मैदान में ही सिमटा हुआ है। गांवों में २१वीं सदी की सुविधा नहीं है। इस कारण लोग पलायन कर रहे हैं। हमारी सरकार औद्योगिक पैकेज देने की बात करती है ताकि पहाड़ पर उद्योग लग सके, पर केंद्र पैकेज देने को तैयार नहीं है। छोटे डैम का मतलब है ५ मेगावाट से कम। जैसे गधेले, बरसाती नाले आदि। इसे हम स्थानीय लोगों को को-ऑपरेटिव बनाकर दे सकते हैं। बरसात में इनका पानी रोककर रख सकते हैं और बाद में इसी से बिजली उत्पन्न कर सकते हैं।
प्रेम भारद्वाज : आप एक आंदोलनकारी रहे हैं। उत्तराखण्ड सहित पूरे देश में आंदोलन का माहौल खत्म हो गया है। ऐसा क्यों हुआ?
अब के आंदोलन और तब के आंदोलन में काफी अंतर हो गया है। पहले आंदोलनकारी 'लाठी खाएंगे, गोली खाएंगे' के लिए तैयार रहते थे। अब के आंदोलनकारी कहते हैं कि 'गोली मारेंगे, गोला मारेंगे और बात मनवाकर रहेंगे।' जगह-जगह हिंसात्मक द्घटनाएं हो रही हैं। इसलिए लोग आंदोलन से नहीं जुड़ते हैं।
प्रेम भारद्वाज : लेकिन एक और कारण बताया जाता है। एनजीओ की जिस प्रकार देश में बाढ़ आयी है उन्होंने सरकार के लिए सेफ्टी बॉल्व का काम किया है। क्या यह सही है?
हम ऐसा नहीं मानते। उत्तराखण्ड में आंदोलन खत्म होने का मुख्य कारण यह था कि पहले हम उत्तर प्रदेश के अधीन थे। इसलिए जब भी सत्ता के खिलाफ कोई बात होती थी लोग एकजुट हो जाते थे। आंदोलन अपनी सीमाओं में अपना जगह बना लेता था। अब सत्ता अपने चूल्हे में आ गई है तो आप कैसे किसी का विरोध करेंगे। आज सभी लोग जनप्रतिनिधि, नेताओं एवं मंत्रियों से परिचय निकाल लेते हैं। ऐसे में विरोध किसके खिलाफ होगा।
प्रीति सिंह परिहार : आपने कहा कि आजकल नेताओं तक आमलोगों की पहुंच आम हो गई है, वहीं गढ़वाल में कई विभागों के मुख्यालय हैं जहां अआिँाकारी आमलोगों को उपलब्आँा नहीं हैं। यह कैसी शासन-व्यवस्था है?
सत्ता के विकेंद्रीकरण का मतलब ही यही था कि छोटी-छोटी जगहों से शासन चले। पहले उत्तराखण्ड में तीन जिले थे। देहरादून, गढ़वाल और कुमाऊं। फिर तीन से पांच बने। पांच से आठ और आज १३ जिले हो गए हैं। अब पौड़ी के अधिकारी देहरादून में बैठते हैं क्योंकि सरकार बहुत तेजी से काम कर रही है। उन्हें बार-बार देहरादून बुलाकर दिशा-निर्देश दिया जाता है। काम को तेजी से करने के लिए हो सकता है अधिकारी देहरादून में ही बैठने लगे हों। सरकार जनता की है। इसलिए तो जनता के विकास के लिए तेजी से काम करना जरूरी है।
आकाश नागर : आप खाद्य आपूर्ति मंत्री भी हैं। प्रदेश में सरकारी गल्ले से मिलने वाले अनाज, तेल, रसोईं गैस की कालाबाजारी हो रही है। आप इसे रोक नहीं पा रहे हैं।
जिस समय राज्य बना हमें केंद्र से कोटा का १८,४०० मैट्रिक टन गेहूं और १७,७०० मैट्रिक टन चावल मिलता था। यानी करीब ३६,००० मैट्रिक टन अनाज प्रदेश को मिलता था। उस समय प्रदेश में दो योजनाएं चलती थीं। लोगों को अनाज मिल जाता था इसलिए कोटा का अनाज नहीं लेते थे। यह योजना २००५ तक चली। उस वक्त बाजार भाव कम था। इसलिए लोग सस्ते सरकारी गल्ले की दुकान से अनाज नहीं लेते थे। इससे सरकार को लगा कि इनको अनाज की जरूरत नहीं और हमारा कोटा कम कर दिया गया। हमें १,६०० मैट्रिक टन गेहूं और ६,५०० मैट्रिक टन चावल दिया जाने लगा। दुर्भाग्य से २००५ में काम के बदले अनाज वाली योजना खत्म हो गई। लोग अनाज के लिए सरकारी दुकान में जाने लगे और दुर्भाग्य से ही बाजार भी अप हो गया। तब हमने केंद्रीय कूषि मंत्री से बहुत आग्रह किया था। आज कुल १७,००० मैट्रिक टन अनाज रेगुलर मिलता है। २००० में ३६,००० मैट्रिक टन और अब सिर्फ १७,०००। कितना अंतर है। जबकि हमें कुल ६२,००० मैट्रिक टन अनाज की जरूरत है। आप समझ सकते हैं कि जो एक आदमी को अनाज मिलना चाहिए था उतने में चार लोगों को दिया जा रहा है।
गुंजन कुमार : अनाज की कमी हो सकती है लेकिन तेल और रसोई गैस की कालाबाजारी क्यों हो रही है?
देखिए! अनाज की कालाबाजारी नहीं होती है। हां, हम मानते हैं कि तेल, रसोई गैस की कालाबाजारी होती है। यहां मैं आपको बता दूं कि तेल गैस एजेंसी वाले ऑयल कंपनी के एजेंट होते हैं। ऑयल कंपनियों का राज्य सरकार से कोई लेना-देना नहीं होता है। राज्य सरकार को औकात नहीं है कि वह किसी को एक भी पेट्रोल पंप का लाइसेंस दे दे। वह ऑयल कंपनी और केंद्र सरकार देती है। राज्य के पास सिर्फ एक कानून है आवश्यक उपभोक्ता एक्ट ३१७ जिससे हम पेट्रोल या गैस मालिक पर नकेल कस सकते हैं। उसे जेल में डाल सकते हैं। लेकिन हम ने एक को भी जेल में डाल दिया और वह पंप या एजेंसी दो दिन भी बंद हो गई तो आमलोग ही सरकार को गालियां देना शुरू कर देंगे। हमारी भी स्थिति ऐसी ही है। हमने ७८ नई गैस एजेंसियां मंजूर करवाई हैं। पहले १४४ थीं। ७८ बढ़ने से इनमें प्रतियोगिता भी बढ़ेगी। इसलिए अब गैस की कालाबाजारी नहीं होगी। इस प्रकार तेल में मिलावट की बात करते हैं तो हमारे यहां टेस्ट लैब नहीं है। यदि हम उन्हें पकड़ते हैं और पेट्रोल-डीजल का सैम्पल टेस्ट के लिए भेजते हैं तो वहां भी ऑयल कंपनियों की चलती है। वो पाक-साफ हो जाते हैं। इसका हर्जाना भी हमें ही भुगतना पड़ता है। हमने ५०० के करीब पेट्रोल पंप मशीनों को और ३,००० सिलेंडर पकड़कर उनका चालान किया है।
आकाश नागर : आपकी सरकार में ही नजूल भूमि सहित अन्य भूमि पर हुए अतिक्रमण को चिन्हित कर मुक्त कराने के लिए एक समिति बनी है। लेकिन आज तक एक नाली जमीन भी अतिक्रमण मुक्त नहीं करायी जा सकी हैं। क्या समिति सिर्फ दिखावे के लिए बनाई गई?
हमारे यहां दस प्रकार की भूमि है, जिसे अलग-अलग ग्रुप में रखा गया है। एक भूमि लोगों की पुश्तैनी है, दूसरी भूमि को हम नजूल भूमि कहते हैं। यह जमींदारी उन्मूलन एक्ट लागू होने के बाद जमींदारों से ली गयी थी। और काश्तकारों को खेती के लिए दी गई थी। अब उस पर कब्जा कर लिया गया है। वह आज भी बेनामी है। तीसरी भूमि है असमी पट्टे जिसे हमने पट्टे पर दिया है। पट्टे भी अलग-अलग थे। ५ साल, ३० साल और ९० साल के लिए। इसमें ५ साल और तीस साल वाले ने अपने पट्टे रिन्यू नहीं कराए तो उस पर उनका कब्जा है। चौथी भूमि है पुराने डैम को बनाने के लिए भूमि दी जाती थी। डैम बनने के बाद वह भूमि सरकार को वापस होनी चाहिए थी लेकिन नहीं की गयी। लोगों ने या कर्मचारियों ने कब्जा कर लिया। काशीपुर के तराई क्षेत्र में बांग्लादेशियों को बसाने के लिए भूमि दी जाती है। एक और एससी एसटी के लिए भूमि है। इन्हें बसाने के लिए दी गयी है। बिन्दुखत्ता जैसे बसाए गए गांव की जनसंख्या आज २५ हजार हो गई है। उसे राजस्व गांव नहीं माना जाता है। क्योंकि इसे सरकार ने नहीं बसाया था, बल्कि इस पर कब्जा कर लोग खुद बसे थे। स्थिति यह है कि लोगों ने पट्टे की जमीन बेच दी है। जिसने तीस साल पहले जमीन खरीदी अब सरकार उससे भूमि कैसे छीने। स्थिति यह हो गई है कि जिससे भूमि ली जाएगी वह कोर्ट चला जाएगा। इस पर सरकार अध्ययन कर रही है। हमलोगों ने विचार किया है कि १९८० के पूर्व जो स्थिति थी जिसका कब्जा था, उसे नियमित कर दिया जाए। चाहे वह किसी भी ग्रुप की जमीन हो। हम भी कानून से बंधे हैं। कानून के अध्ययन के बाद ही हम फैसला लेंगे ताकि कोई कोर्ट में न जाए।
गुंजन कुमार : भट्ट जी हमारे इसी कार्यक्रम में उत्तराखण्ड के एक वरिष्ठ नेता ने कबूल किया है कि नेपाल से सटे कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जहां माओवादियों का कब्जा है। वहां सरकार की नहीं चलती। क्या आप इसे सही मानते हैं?
वरिष्ठ नेता ने इस बात को बहुत सरल हृदय से कहा है। उन्होंने जो कहा कि नेपाल से सटे गांव में माओवादियों का कब्जा है। वह गांव सीमा के इस पार के नहीं हैं, बल्कि उस पार के हैं। हमारी जमीन पर किसी प्रकार का कब्जा नहीं है। आपने उनसे गलत सवाल कर दिया होगा।
अपूर्व जोशी : तो फिर सरकार माओवादी के नाम पर पैसे क्यों मांग रही है?
नहीं, हमने कभी नहीं कहा कि माओवादी राज्य में फैल रहे हैं। हमने आशंका व्यक्त की है कि जिस तरह से नेपाल में माओवादी हिंसक हो रहे हैं और हमारे राज्य की जो स्थिति है (तीन साल से सूखा पड़ता रहा है) उससे हमारे यहां भी स्थिति भयावह हो सकती है। वह पलायन करेंगे या फिर गलत शक्तियों के हाथ में चले जाएंगे।
गुंजन कुमार : आपकी सरकार ने ही कई लोगों को माओवादी बताकर गिरफ्तार किया है। इसमें कुछ पत्रकार भी शामिल हैं। उन पर मुकदमा भी चल रहा है। फिर आप कैसे कह रहे हैं कि उत्तराखण्ड में माओवादी नहीं हैं?
मैंने यह नहीं कहा कि माओवादी नहीं हैं। आप मेरे जवाब को गलत दिशा दे रहे हैं। मैंने कहा माओवादियों का किसी क्षेत्र पर कब्जा नहीं है। माओवादी तो पूरे देश में हैं।
प्रीति सिंह परिहार : २०१२ में होने वाले विआँाानसभा चुनाव को लेकर आपकी क्या तैयारी है?
महाभारत में अठारह दिन पहले तक दुर्योधन राजा था। अठारह दिन में सब साफ हो गया। अभी तो चुनाव में बहुत समय है।
|