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नैनीताल जिले के नंदन सिंह कुमटिया ने सरकार से इच्छा मृत्यु की गुहार लगाई है। नंदन उत्तराखण्ड राज्य गठन की लड़ाई जीतने वाले आंदोलनकारियों में से हैं। पर सरकारी उपेक्षा ने उन्हें जिंदगी से हार मानने के लिए मजबूर कर दिया है |
उन्होंने उत्तराखण्ड राज्य की न केवल परिकल्पना की थी, बल्कि उसके लिए हुए आंदोलन में लाठियां खाईं और जेल गए वह अब दर-दर की ठोकर खा रहे हैं। राज्य गठन के बाद आंदोलनकारियों को चिह्नित करके उन्हें नौकरी पर रखने की बातें हुईं। सैकड़ों
आंदोलनकारियों को सरकार ने राज्य आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका के चलते रोजगार देने के आदेश तो दे दिए लेकिन आज तक उन्हें नौकरी नहीं मिली।
ऐसे ही लोगों में एक नैनीताल जिले के गांव पुरनपुर, चकलुवा का नंदन सिंह कुमटिया है। नैनीताल जिलाधिकारी ने नंदन को आज से छह साल पूर्व ही सेवायोजित करने के लिए चयनित कर दिया था। नंदन दिल्ली की एक कंपनी की नौकरी से भी इस आस में हाथ धो बैठा कि उत्तराखण्ड सरकार उसे अब नौकरी तो दे ही देगी। लेकिन प्रशासनिक लापरवाही का शिकार हुआ यह आंदोलनकारी आज तक नौकरी नहीं पा सका है। नौकरी पाने के लिए भागदौड़ करते-करते वह एक दुर्द्घटना का शिकार हो ९० प्रतिशत अपाहिज होकर बिस्तर पर पड़ा हुआ है। कई बार वह आमरण अनशन पर भी बैठा। लेकिन हर बार उसे आश्वासन देकर टरका दिया जाता है। जिंदगी से हार मान चुका यह आंदोलनकारी सरकार से नौकरी की उम्मीद छोड़ इच्छा मृत्यु मांग रहा है।
द्घर के एक कोने में बने अंधेरे कमरे में अपनी जिंदगी के उन दिनों को याद करके नंदन सिंह असहज हो जाता है जब उसने छात्र जीवन के दौरान राज्य आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह बताता है कि १९९४ की बात है जब वह हल्द्वानी में स्नातक की पढ़ाई कर रहा था। पढ़ाई के दौरान ही राज्य आंदोलन शुरू हुआ तो उसने सबसे आगे बढ़कर काम किया। इसके चलते उसने कई बार पुलिस की लाठियां खाईं। द्घायल होने पर अस्पताल में भर्ती भी हुआ। १९९४ में उसने फतेहगढ़ (फरूर्खाबाद) केन्द्रीय कारागार में २५ दिन तक सजा काटी। जेल से रिहा होने के बाद भी नंदन चुप नहीं बैठा और पुनः राज्य आंदोलन की बागडोर संभाल ली। इसके बाद १९९६ में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने नंदन को न केवल राज्य आंदोलनकारी माना था बल्कि ५०,००० की सहायता राशि भी दी थी। इसी के साथ सरकार ने रियायत बरतते हुए नंदन के सारे मुकदमे भी वापस ले लिये जो उस पर उत्तराखण्ड राज्य के निर्माण की मांग करने के दौरान किये गये थे।
वर्ष २००० में उत्तराखण्ड राज्य अस्तित्व में आ गया। राज्य बनने के बाद २००४ में सरकार ने फैसला किया कि जिन्होंने राज्य के लिए आंदोलन किया था उन्हें चिह्नित करके उपहार के रूप में नौकरियां दी जायेंगी। सरकार ने आंदोलन के दौरान द्घायलों और जेल भेजे गए आंदोलनकारियों को सेवायोजित करने के लिए चयनित कर लिया। नैनीताल के तत्कालीन जिलाधिकारी ने उत्तर प्रदेश और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक नैनीताल की जांच की पुष्टि होने के बाद उत्तराखण्ड राज्य के लिए आंदोलित हो जेल में रहने वालों की लोक सेवा आयोग की परिधि से बाहर समूह 'ग' एवं 'द्घ' के तहत सीधी भर्ती की गयी। जिनमें हल्द्वानी के कुल पंद्रह आंदोलनकारियों को नौकरी पर रखे जाने के आदेश दिए गये। इनमें हल्द्वानी के रणजीत सिंह को मुख्य कोषाधिकारी, प्रमोद कुमार अग्रवाल, कमलेश सिंह क्वीरा, महेश चंद त्रिपाठी, हरिशंकर सिंह, लाखन सिंह, तारादत्त जोशी, मानिक मोहन शुक्ला, नर सिंह बिष्ट, जगमोहन सिंह खाती, गगन पाण्डेय, कमलेश भंडारी, नंदन सिंह कुमरिया तथा विनोद सिंह कन्याल को संयुक्त शिक्षा निदेशक कुमाऊं मंडल के अधीनस्थ नौकरी दी गयी। इसके अलावा चन्द्रशेखर को प्रभारी अधिकारी नजारत के तहत नौकरी दिये जाने के आदेश दे दिए गये। जिनमें एक नंदन सिंह कुमटिया को छोड़कर अन्य सभी लोगों को तत्काल प्रभाव से नौकरी पर रख लिया गया। अकेले नंदन के साथ ही प्रशासन का सौतेला व्यवहार रहा और उसे आरक्षण विरोधी बताकर सरकारी सेवा से दूर रखा गया।
नंदन कुमटिया बताता है कि जिस दौरान उसे उत्तराखण्ड में शिक्षा विभाग में नौकरी देने की द्घोषणा की गयी वह दिल्ली में मैक-डोनाल्ड में स्थाई नौकरी कर रहा था। लेकिन सरकारी नौकरी मिलने की इच्छा ने उसे दिल्ली की नौकरी छोड़ने को मजबूर कर दिया। वर्ष २००४ से लेकर २००६ तक दो साल वह नौकरी पाने के लिए मारा-मारा फिरता रहा। लेकिन उसे चारों ओर से मायूसी हाथ लगती इससे वह टेंशन में रहने लगा। इसी जद्दोजहद में सितंबर २००६ को जब नंदन मोटरसाइकिल से कालाढुंगी जा रहा था गुलजारपुर चौराहे पर उसकी मोटरसाइकिल कार से टकरा गयी और दुर्द्घटनाग्रस्त हो गयी। इस दुर्द्घटना में नंदन अपने दोनों पैर गवां चुका था। साथ ही उसकी रीढ़ की हड्डी में भी फैक्चर हो गया। इस तरह वह करीब नब्बे प्रतिशत विकलांग होकर वर्षों तक अस्पताल में अपना इलाज कराता रहा। इलाज में लाखों खर्च होने के चलते नंदन को अपनी जमीन तक बेचनी पड़ी जो उसकी आजीविका का एकमात्र साधन हुआ करती थी। इसके बाद भी वह कर्ज से नहीं उबरा। पिछले चार साल से नंदन की जिंदगी बिस्तर पर ही गुजर रही है। इस उम्मीद के साथ कि सरकार ने उसे आंदोलनकारी तो मान ही लिया है अब अगर पेंशन दे देगी तो उसकी बाकी की जिंदगी उसके सहारे गुजर जायेगी। लेकिन उसकी उम्मीद पूरी होती नहीं दिख रही।
पिछले चार साल से बिस्तर को सरसैय्या बनाकर एक कमरे में हिकारत के दिन बिता रहे नंदन की माता का स्वर्गवास हो चुका है। पिताजी ७५ साल के बुजुर्ग हैं। एक भाई है वह मजदूरी करके किसी तरह अपने परिवार का पालन पोषण कर रहा है। नंदन अविवाहित है, उसका कोई सहारा भी नहीं है। उसे दिन-रात यह चिंता सताए रहती है कि वह अब किसके सहारे जीवन की नैय्या पार करेगा। एक उम्मीद थी उसको भी सरकार की उपेक्षापूर्ण नीति ने झटक दिया।
नंदन बताता है कि उसने पिछले चार सालों में अपाहिज होकर भी मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक के दरबार में गुहार लगाई। चलने-फिरने में मोहताज होने के बावजूद उसने हौसला नहीं खोया। गत वर्ष जनवरी में वह जब हल्द्वानी में आमरण अनशन पर बैठा तब प्रशासन ने मुआवजा राशि देने का वादा किया था तथा कहा था कि राज्य आंदोलनकारी को प्रमाण पत्र भी देंगे। जो केवल आश्वासन ही सिद्ध हुआ। इसके बाद गत ५ अप्रैल को नंदन एक बार फिर हल्द्वानी स्थित एसडीएम कोर्ट के समक्ष आमरण अनशन पर बैठा। इस बार वह नौकरी लेने या सरकार से पेंशन पाने के लिए नहीं बल्कि जिल्लत भरी जिंदगी से आजिज आ इच्छा मृत्यु की मांग मनवाने के लिए। लेकिन एक बार फिर उसे आश्वासन का पुलिंदा थमा दिया गया। एक माह बाद उसके साथ न्याय की बात की गयी लेकिन आज दो माह होने के बाद भी कुछ नहीं हुआ। शायद अब सरकार को इंतजार है एक राज्य आंदोलनकारी की खामोशी भरी मौत का।
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