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चुनावी महाभारत का शंखनाद होते ही उत्तराखण्ड के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी दलों भाजपा-कांग्रेस के बीच तलवारें खिंच गई हैं। दोनों में कांटे की टक्कर है। मगर थोड़ा सा पलड़ा कांग्रेस के पक्ष में इसलिए झुका दिखाई दे रहा है कि एंटी इनकम्बेन्सी फैक्टर काम कर सकता है। शासन में रहने का जो नुकसान होता है उसी कमी को एक्सपोज कर कांग्रेस अपने लिए जीत की पटकथा लिखने की तैयारी में जुटी है। महिलाओं के प्रति बेरुखी, बढ़ता भ्रष्टाचार, अपने कार्यकर्ताओं को ठेकेदार बनाने, विकास की कछुआ गति भाजपा सरकार की कमजोरी रही है। लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं कि कांग्रेस पूरी तरह फार्म में है और हर कमजोरी से दूर। अलबत्ता कांग्रेस के भीतर की खेमेबंदी और विभिन्न धड़ों के प्रमुखों के मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा चुनाव में हार की वजह बन सकती है
उत्तराखण्ड में अगर कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी खत्म कर दी जाय और चुनावों में अनुशासनात्मक रवैया अपनाया जाए तो उसे आगामी विधानसभा में बहुमत लाने से कोई नहीं रोक सकता। यह राय यहां के आम आदमी की है। किसी भी दल के लिए भाग्य विधाता बनने वाला यही आम आदमी होता है, जो पिछले सत्तासीन पार्टी की पांच साल की विफलताओं और सफलताओं की समीक्षा करते हुए निर्णायक बनता है। ३० जनवरी को होने वाले चुनावों का दिन जैसे-जैसे नजदीक आता जा रहा है
राजनीतिक पार्टियों की अच्छाई और बुराई की चर्चाओं में तेजी आ रही है। प्रदेश में राष्ट्रीय पार्टियां कांग्रेस और भाजपा ही निर्णायक स्थिति में होती हैं। हालांकि कहीं-कहीं उनका खेल बनाने और बिगाड़ने में छोटे दलों की भी
भूमिका होती है। इन सब के बीच कांग्रेस पार्टी लगातार अपनी स्थिति मजबूत करने में लगी है। पिछले १० दिनों के बीच में कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कुमाऊं और गढ़वाल की यात्रा ने कांग्रेसियों में जैसे नई ऊर्जा ला दी है।
आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस
महिलाओं को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए पूरी तैयारी कर रही है। सर्वविदित है कि उत्तराखण्ड की द्घरेलू अर्थव्यवस्था पूरी तरह महिलाओं पर निर्भर है। द्घर से लेकर खेत खलिहान तक महिलाओं की ही भूमिका अग्रणी होती है। पिछले डेढ़ सालों में भाजपा द्वारा महिला जिला पंचायत अध्यक्षों के प्रति अपनाए गए रवैये भी कांग्रेस का प्लस प्वाइंट बनेगा। इनमें सबसे महत्वपूर्ण पिथौरागढ़ की जिलापंचायत अध्यक्ष का मामला है। इस मामले को लेकर जिस तरह भाजपा के कई वरिष्ठ नेताओं पर उंगली उठी वह पार्टी के लिए शर्मनाक है। एक अनुसूचित जाति की महिला को भाजपा के नेताओं ने कठपुतली की तरह अपने इशारों पर नचाना चाहा। जब उनके अनुरूप यह नहीं चली तो उसे पदच्युत कर दिया गया। इसके बाद सुनीता देवी को जिला पंचायत अध्यक्ष बनाया गया तो उसके प्रति भी वही रवैया अख्तियार किया गया। सुनीता देवी ने गत दिनों भाजपा नेताओं पर ठेके लेने के लिए अनैतिक दबाव बनाने सहित लाखों रुपये मांगने की बात कहकर न केवल सनसनी फैला दी थी बल्कि पिथौरागढ़ में केंन्द्रीय राज्यमंत्री हरीश रावत के समक्ष भाजपा छोड़ कांग्रेस में शामिल हो गई थी। इसी तरह का मामला देहरादून की जिला पंचायत अध्यक्ष मधु चौहान के संदर्भ में सामने आया। भाजपा ने अपनी ही जिला पंचायत अध्यक्ष के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाकर उसे हटाने की पूरी तैयारी कर ली थी अगर उचित समय पर वह नैनीताल हाईकोर्ट में न जाती तो शायद उनको न्याय नहीं मिलता। ऊधमसिंहनगर की जिला पंचायत अध्यक्ष सुशीला गंगवार के साथ ही हल्द्वानी की ब्लॉक प्रमुख शांति भट्ट भी भाजपा की महिला विरोधी राजनीति का शिकार हुई। हालांकि सुशीला गंगवार ने रुद्रपुर विधायक
तिलकराज बेहड़ के समर्थन के चलते अपनी कुर्सी बचा ली थी। भाजपा की इस महिला
विरोधी छवि को कांग्रेस चुनावों में भुनाने का पूरा प्रयास कर रही है। हालांकि कांग्रेस के इस प्रयास को पलीता लगाने के लिए भाजपा भी हाथ -पांव मार रही है। भाजपा के बेड़े में जल्द ही शामिल हुई हल्द्वानी की पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष रेनू अधिकारी इसका उदाहरण है। अब तक कुमाऊं में भाजपा को कोई महिला नेत्री ढूंढ़े नहीं मिल रही थी। रेनू अधिकारी के भाजपा में शामिल होते ही पार्टी में महसूस की जा रही यह कमी तो दूर हुई ही साथ में हल्द्वानी विधानसभा से भी एक प्रत्याशी मिल गया। गौरतलब है कि भाजपा को हल्द्वानी में कोई ऐसा मजबूत उम्मीदवार नहीं मिल रहा था जिसको वह इंदिरा हृदयेश के सामने उतार सके। रेनू अधिकारी को पहले से ही इंदिरा विरोधी माना जाता है। हालांकि रेनू अधिकारी के पति महेन्द्र अधिकारी को कांग्रेस की राजनीति में लाने का श्रेय इंदिरा हृदयेश को ही जाता है।
भाजपा की पिछले पांच साल की विकास कार्यों में कछुआ गति और अनियमितताओं को भी कांग्रेस महत्वपूर्ण मुद्दा बना रही है। इसका सबसे मजबूत उदाहरण है कुमाऊं में वर्ष २०१० में आई आपदा। आपदा के नाम पर मची लूट- खसोट का ही नतीजा है कि जो कार्य पिछले साल तक पूरे हो जाने चाहिए थे वे अभी तक नहीं हुए हैं। हल्द्वानी नैनीताल राष्ट्रीय राजमार्ग के साथ ही हल्द्वानी-अल्मोड़ा नेशनल हाइवे की हालत में अभी भी ज्यादा बदलाव नहीं आया है। केन्द्र सरकार द्वारा आपदा के लिए दिए गए ५०० करोड़ और राज्य सरकार के द्वारा दी गई १०० करोड़ की धनराशि का सदुपयोग न होना भी कांग्रेस के लिए लाभकारी सिद्ध हो सकता है। आपदा प्रभावितों का अभी तक पुनर्वास नहीं हो सका है। अल्मोड़ा के बाडी बल्टा सहित बागेश्वर के सुगमगढ़ के बदहाल लोगों का पुनर्वास न होना भाजपा की
विफलता ही कही जायेगी। चार माह पूर्व जब कांग्रेस ने सत्याग्रह यात्रा निकाली तो इस मुद्दे पर भाजपा को जमकर द्घेरा था। उस दौरान कांग्रेस की इस सत्याग्रह यात्रा को लोगों का भारी समर्थन मिला था। इसी तरह कांग्रेस द्वारा गत माह आयोजित की कई सत्ता परिवर्तन रैलियों में भी
लोगों का जनसैलाब उमड़ा था। यह जनसैलाब कांग्रेस को समर्थन से ज्यादा सत्ता विरोधी रहा। कांग्रेस ने सरकार के विरोध में कई धरना-प्रदर्शन किए। जिनका अप्रत्यक्ष लाभ चुनावों में उसे मिलेगा। उनमें सबसे महत्वपूर्ण रहा युवा कांग्रेसियों के द्वारा भाजपा सरकार में भ्रष्टाचार के आरोप में द्घिरे मंत्रियों के द्घरों का द्घेराव। केन्द्रीय राज्यमंत्री हरीश रावत के पुत्र तथा युवा कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष आनंद रावत द्वारा हरिद्वार से इस कड़ी की शुरूआत की गई। जिसमें हरिद्वार के विधायक तथा भाजपा सरकार में कैबिनेट मंत्री मदन कौशिक के द्घर का द्घेराव करने के बाद हल्द्वानी में गोविंद सिंह बिष्ट के खिलाफ द्घेराबंदी की गई। गोविंद सिंह बिष्ट के खिलाफ की गई द्घेराबंदी में कांग्रेस को अध्यापक वर्ग का समर्थन मिला। वर्षों से सुगम और दुर्गम के चक्कर में लूट-पिट रहे अध्यापकों ने विरोध मार्च में शामिल होकर कांग्रेस को मजबूती प्रदान की। इस प्रदर्शन में सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि कांग्रेस अध्यापकों की सहानुभूति हासिल करने में कामयाब रही। प्रदेश में यह पहला मौका था जब किसी पार्टी ने अध्यापकों के साथ वर्षों से हो रहे ट्रांसफर उद्योग पर अपना स्वर मुखर किया था।
भाजपा की अगर पिछले पांच साल की नाकामयाबियों को देखें तो उसमें सबसे मुख्य बात यह निकलकर आई कि उसने सत्ता में रहते अपना मजबूत कैडर स्थापित नहीं किया। लोगों का आरोप है कि भाजपा ने पार्टी के समर्थकों को कार्यकर्ता नहीं बल्कि ठेकेदार बनाया। यही वजह रही कि विकास कार्यों में गुणवत्ता के मानकों की जमकर अवहेलना हुई। लोगों का कहना है कि
भाजपा ने काम नहीं किया बल्कि अपने कार्यकर्ताओं को ही खुश किया। आज उत्तराखण्ड में ठेकेदारी की नई पौध पैदा हुई है। ठेकेदारी संस्कूति में अधिकतर भाजपा नेताओं के ही रिश्तेदार हावी रहे। यही वजह रही कि भाजपा जनप्रतिनिधियों का व्यक्तिगत प्रदर्शन खराब रहा। इसको आगामी विधानसभा चुनावों में कांग्रेस कैश करा सकती है। बागेश्वर के नवीन भट्ट कहते हैं, ''किसी भी विधानसभा क्षेत्र में चले जाइये, जहां भी आपको विकास कार्य होते दिखेंगे वहीं आपको पार्टी नेता ठेकेदार के रूप में दिखाई देंगे।'' कांग्रेस के नेतृत्व वाली एनडी तिवारी सरकार में यह न के बराबर था। लेकिन भाजपा सरकार ने पिछले पांच बरस में इस मामले में रिकॉर्ड तोड़ वृद्धि की है। भाजपा सरकार की यह ठेकेदारी नीति उसके लिए द्घातक हो सकती है।
लेकिन वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस सरकार
विरोधी मुद्दों पर भाजपा को द्घेरने की बजाय अपने आप में ही उलझ कर रह गई है। कांग्रेस नेताओं की राजनीति का इस समय तराजू में मेढक तौलने के मुहावरे से तुलना की जा सकती है। यही वजह है कि प्रदेश के दो मंडलों में पार्टी के छह गुट बन गए हैं। जिनमें कुमाऊं में एक गुट केन्द्रीय राज्यमंत्री हरीश रावत का है तो दूसरा प्रदेश अध्यक्ष यशपाल आर्य का जबकि तीसरा इंदिरा हृदयेश का है। इसी तरह गढ़वाल में सांसद सतपाल महाराज के गुट के साथ ही सांसद विजय बहुगुणा तथा हरक सिंह रावत के अपने-अपने गुट हैं। इसी गुटबाजी के कारण सभी गुटों के नेता विधानसभा चुनावों में अपनी उम्मीदवारी का दावा ठोक रहे हैं। हालांकि कांग्रेस ने कुछ दिनों पूर्व गुटबाजी से दूर हटकर हरिद्वार जिले में कई नेताओं को अपनी पार्टी में शामिल कराकर मिशन २०१२ के लिए अच्छा संकेत दिया है। यहां बसपा के मंगलौर से विधायक काजी निजामुद्दीन के साथ ही इसी दल के इकबालपुर से विधायक चौधरी यशवीर सिंह को पार्टी में शािमल कराकर
मुस्लिमों के साथ ही पिछड़ों का वोट बैंक अपने पाले में करने की कोशिश की है। समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अमरीश कुमार ने भी सपा छोड़कर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण कर ली है। इसे भी कांग्रेस की महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। अमरीश को अगड़ों का नेता माना जाता है। यह सब केन्द्रीय राज्यमंत्री हरीश रावत की ही पहल का नतीजा है। जिसे पार्टी के लिए सकारात्मक कहा जा रहा है। कांग्रेस के नेताओं में एकजुटता नहीं थी जिसके चलते वह तीन माह पूर्व हरिद्वार जिला पंचायत अध्यक्ष का चुनाव हार गई थी। जबकि उसी हरिद्वार जिले में कई विधायकों का पार्टी छोड़ कांग्रेस में आना
लाभकारी माना जा रहा है।
अगर कांग्रेस के लिए मुद्दों की बात करें तो उसके एजेंडे में वही द्घिसे-पिटे और रटे रटाए मुद्दे हैं जिनके सहारे वह २०१२ विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करना चाहती है। इनमें पलायन,
बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी और सड़क आदि शामिल हैं। हालांकि अभी पार्टी का द्घोषणा पत्र जारी नहीं हुआ है। भ्रष्टाचार के मुद्दे को कांग्रेस इस बार प्रमुखता से उठा रही है जिसमें आपदा राहत कार्यों में अनियमितता के साथ ही पूर्व मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' के कार्यकाल में हुए द्घोटाले भी में शामिल है। इनमें हरिद्वार का कुंभ द्घोटाला के अलावा सिटुरजिया द्घोटाला तथा विद्युत जल परियोजना के मसलों पर कांग्रेस भाजपा को द्घेर सकती है। हालांकि पिछले पांच सालों से भाजपा के पास भी कांग्रेस को नीचा दिखाने के लिए एनडी तिवारी सरकार में हुए ५६ द्घोटालों का मामला कम नहीं था। लेकिन जिनके खुद के द्घर शीशे के बने हों वह दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते वाली कहावत को चरितार्थ करते हुए
भाजपा ने इस मामले में चुप्पी साधे रखी।
मजेदार बात यह है कि २००७ के विधानसभा चुनावों में भाजपा इस मुद्दे को लेकर जनता के बीच गई थी तब उत्तराखण्ड की जनता ने उन पर विश्वास व्यक्त करते हुए उम्मीद जाहिर की थी कि सत्ता में आते ही भाजपा अपने वादे पर अमल करते हुए ५६ द्घोटालों से पर्दा हटाएगी और आरोपियों को जेल की सजा खिलायेगी। लेकिन भाजपा ऐसा नहीं कर पाई। कांग्रेस के लिए आगामी विधानसभा चुनावों में एनडी तिवारी सरकार के कार्यकाल के दौरान स्वीकृत हुई योजनाओं को भाजपा द्वारा ठंडे बसते में डालना भी अहम मामला है। जिसमें देहरादून के आईटी पार्क के अलावा अल्मोड़ा और रुद्रपुर के मेडिकल कॉलेज भी शामिल हैं। इसके अलावा केन्द्रीय सहायता प्राप्त योजनाओं पर दिए जाने वाले धन को भाजपा सरकार द्वारा खर्च न कर पाने और करोड़ों की धनराशि लैप्स हो जाने के मामले सहित राजीव गांधी सड़क योजना और मनरेगा में हो रही धांधली को सामने लाकर भाजपा की द्घेराबंदी का भरपुर मौका कांग्रेस के पास है। |