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केन्द्र की उम्मीदों पर पानी फिर गया। वह विपक्ष समेत देश को समझाने में विफल रही कि यहां एफडीआई राष्ट्रहित में हैहैं। लेकिन यहां रसातल में पहुंच चुकी कांग्रेस अब इससे नीचे तो जा नहीं सकती। चुनाव आयोग ने देश के पांच राज्यों में विधान सभा चुनाव की द्घोषणा कर दी है। उत्तर प्रदेश में ४०३, पंजाब में ११७, मणिपुर में ६०, उत्तराखंड में ७० और गोवा में ४० सीटों के लिए चुनाव होने हैं।
पिछले साल से राहुल ने उत्तर प्रदेश में काफी समय बिताया है और एक प्रमुख विपक्ष की भूमिका निभायी है। इसका चुनावी लाभ उन्हें मिलेगा। यानी सीटें बढ़ेंगी ही। सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव ने इस बार चुनाव की कमान अपने पुत्र अखिलेश यादव को सौंपी है। इस मार्फत वो राहुल की काट भी पेश कर रहे हैं। युवाओं को अपने से जोड़ने की एक तरकीब भी है। पिछले विधानसभा में सपा को बुरी मात मिली थी। इस समय जो नेताओं की भाग दौड़ दिखाई दे रही है। वह सपा के पक्ष में है। नेता सपा की ओर मुखातिब हैं। लिहाजा राजनीतिक विश्लेषकों की राय है कि उसकी सीटें बढ़ेंगी। जब कांग्रेस और सपा की सीटें बढेग़ी तो लाजिमी है कि बसपा को सीटें खोनी पड़ सकती हैं। भाजपा और कांगे्रस जहां सूची जारी करने में लगी है वहीं बसपा अभी भी मंत्री और विधायकों को पार्टी से
निकालने में जुटी हुई है। एक-एक कर अब तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री अपने इक्कीस मंत्रियों की छुट्टी कर चुकी हैं।
दूसरी तरफ भाजपा उमा भारती की मौजूदगी के बावजूद कोई चमत्कार करने की स्थिति में नहीं दिख रही है। उसके हालात जस के तस रहने वाले हैं। ऐसे में बहुत संभव है वहां किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिले और त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर सामने आए। उधर चुनावी गेम प्लान बनाने में कांग्रेस भी पीछे नहीें है। पहले मुस्लिमों को ४ .५ फीसदी आरक्षण फिर रशीद मसूद को कांग्रेस वर्किंग कमेटी (सीडब्ल्यूसी) में विशेष आमंत्रित सदस्य का ओहदा। कांग्रेस का इलेक्शन गेम प्लान मुलायम के मुस्लिम वोट बैंक में सीधे सेंधमारी का लग रहा है। सपा के पास मुस्लिम चेहरे के रूप में बड़ा नाम अकेले आजम खां बचे हैं। इससे साफ होता है कि कांग्रेस ने आजम फैक्टर की काट में ही मसूद का कद बढ़ाया है। अगली रणनीति मुस्लिमों को बड़ी संख्या में टिकट देने की हो सकती है। मसूद को यह ओहदा राहुल गांधी की रैली में मुस्लिमों की भीड़ जुटाने के बदले न्यू ईयर गिफ्ट माना जा रहा है। हॉलांकि कांग्रेस में उनकी एंट्री के समय ही तय हो गया था कि उन्हें सीडब्ल्यूसी में जगह दी जाएगी लेकिन उस समय तमाम अगर-मगर भी थे। इसके साथ ही देखने वाली बात यह होगी कि इस बड़े राज्य में अन्ना का प्रभाव क्या दिखता है। अजीत चौधरी से गठबंधन उसे कितना लाभ पहुंचता है।
उत्तर प्रदेश के अंग रहे उत्तराखण्ड में कांग्रेस का सीधा
मुकाबला भाजपा से है। सपा, बसपा, उक्रांद, परिवर्तन पार्टी या टीपीएस रावत की पार्टी खाता ही खोल पाए तो गनीमत है। विधायक और कैबिनेट मंत्री दिवाकर भट्ट तथा विधायक ओम
गोपाल रावत ने बीजेपी का दामन थाम लिया है। ये दोनों नेता उत्तराखंड क्रांति दल का साथ छोड़कर बीजेपी में शामिल हुए हैं। विधानसभा चुनावों से ठीक पहले इन दोनों नेताओं के पार्टी छोड़ने से उक्रांद की स्थिति काफी कमजोर हो गयी है। जबकि भाजपा-कांग्रेस में कांटे की टक्कर है। मामला दो से चार प्रतिशत इधर-उधर वोट का ही है। भाजपा की कमजोर कड़ी उसके शासन में बढ़ा भ्रष्टाचार है तो कांग्रेस की उसके भीतर की खेमेबंदी । कांग्रेस को यहां अन्ना से भी भ्ाय है। खुदा न खास्ता अगर अन्ना या उनकी टीम ने कांग्रेस के खिलाफ प्रचार कर दिया तो उसकी लुटिया डूब सकती है।
पंजाब में भी कांग्रेस की साख दाव पर है । यहां उसकी लड़ाई अकाली दल और भाजपा से है। तीसरी शक्ति के रूप बसपा ेंेंेंेंेंेंेंेंसमीकरण को बदलने की कूवत रखती है। बीएसपी को लेकर अब तक अटकलें थीं कि उसका पूर्व मंत्री मनप्रीत सिंह बादल के नेतृत्व वाली पंजाब पिपुल्स पार्टी (पीपीपी) के साथ गठबंधन में शामिल हो जाएगा। इस दिशा में बातचीत आगे भी बढ़ी, लेकिन दोनों ओर से शतोर्ं की लंबी फेहरिस्त के चलते नतीजा नहीं निकल पाया। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल ने भी ४८ उम्मीदवारों की पहली सूची जारी कर दी है। और उधर कांग्रेस पार्टी से टिकट की इच्छा रखने वाले लोग दिल्ली में डेरा डाले हुए हैं।
कांग्रेस शासित एक अन्य राज्य मणिपुर में २८ जनवरी को चुनाव होना है। लगातार अलगाववादी हिंसा से जुझ रहे इस पूर्वोतर राज्य में चुनाव शांति की उम्मीद जगा सकते हैं। गोवा में ३ मार्च को चुनाव होंगे। यह राज्य अस्थिर शासन के कारण समस्याओं से द्घिरा रहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस चुनाव में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिल जाएगी ताकि वह स्थिर सरकार दे सके।
आजाद हुईं औरतें
सऊदी अरब कट्टर इस्लामिक देश है जहां सदियों से तमाम प्रतिबंधों के बोझ तले दबी महिलाओं को बहुत कम अधिकार हासिल हैं। यहां महिलाओं के गाड़ी चलाने और पुरुष संरक्षक की सहमति के बिना कहीं जाने पर भी रोक है। ऐसे में यहां महिलाओं को अपने फैसले खुद करने का अधिकार मिलना एक ऐतिहासिक कदम है। सऊदी अरब में महिलाओं को अब वोट डालने और चुनावों में खड़े होने के लिए पुरुषों से अनुमति लेने की जरूरत नहीं होगी। उन्हें यह सुविधा २०१५ में होने वाले नगरपालिका चुनावों में पहली बार मिलेगी।
सऊदी अरब की शूरा परिषद के सदस्य फहद अल आंजी ने २९ दिसंबर को एक बयान में कहा कि देश के सुल्तान ने महिलाओं को चुनावी प्रक्रिया में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी है, लिहाजा अब उन्हें अपने पुरुष अभिभावकों से इजाजत लेने की जरूरत नहीं है। उन्हें वर्ष २०१५ के नगर निगम चुनावों में हिस्सा लेने के लिए किसी भी अन्य व्यक्ति से अनुमति नहीं लेनी होगी। इसके अलावा वे कामकाज के लिए भी बगैर इजाजत द्घर से बाहर निकल सकेंगी। सऊदी के सरकारी अखबार अल-वतन में शूरा काउंसिल मेंबर के हवाले से यह द्घोषणा जारी की गई है।
महिलाओं के खिलाफ शाही पाबंदियों में नरमी की ओर यह एक अहम कदम है, लेकिन कुछ सुधारक इससे ज्यादा की मांग कर रहे हैं। देश में सिर्फ नगर निगम के ही चुनाव खुले ढंग से होते हैं। शूरा काउंसिल में सिर्फ पुरुष हैं और इसे कानून बनाने का कोई अधिकार नहीं है। राजा को सलाह-मशवरा देने की जिम्मेदारी इसी काउंसिल पर रहती है। अगले टर्म से शूरा काउंसिल में महिलाओं को बतौर सदस्य शामिल किया जाएगा। ऐसे में अब महिलाएं राजा को सलाह-मशवरा देने में कानूनी अधिकार प्राप्त
होंगी।
इससे पहले बीते सितंबर माह में ही किंग अब्दुल्ला बिन अब्दुल अजीज ने अपने भाषण के दौरान मौजूदा कानून में संशोधन करने का वचन दिया था। हालांकि किंग के ताजा फैसले के बावजूद सऊदी अरब में पुरुष संरक्षक कानूनों में कोई बदलाव नहीं किया गया है। दरअसल सऊदी अरब की महिलाओं को आज भी बिना पुरुष संरक्षण के बाहर द्घूमने, काम करने, विदेश में पढ़ाई, शादी, तलाक लेने और किसी पब्लिक हॉस्पिटल में दाखिल होने की मंजूरी नहीं दी जाती है।
किंग अब्दुल्ला ने महिलाओं के अधिकारों पर जोर देना शुरू किया है, लेकिन वे कट्टरपंथी मौलानाओं को लेकर सतर्क हैं। ये मौलाना
सामाजिक सुधारों को चुनौती दे चुके हैं। सऊदी अरब के राजशाही परिवार की सत्ता धार्मिक व्यवस्था पर निर्भर है। किंग अब्दुल्ला ने हालांकि इस बात का भी ख्याल रखा कि इस मुद्दे को ज्यादा बढ़ावा न दिया जाए। चूंकि कई बार सऊदी के अति रूढ़िवादी मौलवियों ने इन बदलावों का विरोध किया है।
पश्चिम एशिया में लोकतांत्रिक और
सामाजिक सुधारों के लिए चल रहे आंदोलनों के बीच सऊदी अरब में एक अहम फैसला लिया गया। इस फैसले के बाद अगले सत्र से महिलाएं शूरा काउंसिल में भी हिस्सा ले सकेंगी। चूंकि शूरा निर्वाचित संस्था नहीं है और इसके द्वारा बनाए गए कानून भी बाध्यकारी नहीं हैैं। इसलिए रायशुमारी या सलाह देने के काम में मुस्लिम महिलाओं को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
सऊदी अरब के इतिहास में दूसरी बार स्थानीय निकाय चुनाव हुए। कुल ८१६ सीटों के लिए हुए चुनाव में ५,३२४ प्रत्याशी सम्मिलित हुए। चुनाव में करीब १० .२ लाख मतदाताओं ने अपने मताधिकार का इस्तेमाल किया। अगला चुनाव चार साल बाद होगा। तब तक महिलाओं को इंतजार करना होगा पर फिर भी इसे एक अच्छी खबर की तरह लिया जा रहा है। उम्मीद है कि अब महिलाओं को उनकी जिंदगी से जुड़े मुद्दों पर होने वाले फैसलों में भागीदारी का मौका मिलेगा और समाज मे एक हितकारी बदलाव आयेगा।
ट्यूनीशिया और मिस्त्र की क्रांति के बाद, अरब देशों में एक विद्रोही माहौल बन गया है। सउदी अरब सरकार ऐसे कदम उठा कर अपनी बदलती हुई प्रगतिशील मानसिकता का परिचय देने का प्रयास कर रही है।
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