 |
धर्म जीना सिखाता है। सच्चा धर्मगुरु जीवन को सुख-शांति और रोशनी से भर देता है। धर्म को दुकान बनाने वाले बेशुमार धर्मगुरुओं के बीच श्री रामकृपाल जी रोशनी के ऐसे दिव्य पुंज हैं जिनके सान्निध्य मात्र से व्यक्ति के भीतर का अंधकार मिट जाता है। गहन ध्यान-साधना द्वारा प्राप्त ऊर्जा से ये कई चमत्कार भी करते हैं। मानव-जीवन के कष्टों को दूर कर उसके भीतर आनंद प्रवाहित करने का संकल्प लिए श्री रामकृपाल जी के उदात्त विचार
|
उस परमात्मा के हृदय से प्रार्थना करने के लिये ये वृत्तियां ही सबसे बड़ी बाधा हैं। तुम्हें काम, क्रोध, लोभ, मोह से मुक्त करने में तुम्हारे भीतर की द्वंद ही सबसे बड़ी बाधा है। तुम्हारा मन या तो तुम्हें पागलपन में उलझा देता है या पाखंड में और तुम दोहरी जिंदगी जीने लगते हो। २४ द्घंटे तनाव में रहने वाला व्यक्ति कभी धार्मिक नहीं हो सकता, कभी आध्यात्मिक नहीं हो सकता। मैं कहता हूं कि परमात्मा कोई दाढ़ी-मूंछ वाला व्यक्ति नहीं है कि कहीं किसी कमरे में बैठा ले और तुम द्वार खोलोगे तो तुम्हें उसका दर्शन होगा। परमात्मा तो शांति और आनंद के रूप में तुम्हारे हृदय में प्रवेश करता है। शांति और आनंद रूपी परमात्मा तुम्हारे जीवन में इसलिए प्रवेश नहीं कर पाता है कि तुम दोहरी जिंदगी जी रहे हो। तुम्हारा चित्त टूटा रहता है। तुम्हारे मन के कई खण्ड हो चुके हैं और खंडित मन, हृदय और विखंडित भाव कभी परमात्मा के द्वार पर तुम्हें नहीं ले जा सकते हैं। कैसे वहां तक जाओगे आज इसी की चर्चा करना चाहता हूं। हजारों सालों से ये जो संस्कार और शिक्षायें हमारे ऊपर डाली गई हैं। उनसे एकाएक कैसे मुक्त हो पाओगे। शोध करने वालों का कहना है कि हमारा चित्त धरती पर अत्यधिक कामुक व्यक्तियों में से है। काम, क्रोध, लोभ, मोह इससे हम अभी भी मुक्त नहीं हो पाये हैं। आखिर इससे मुक्त होने का रास्ता क्या है? दो फकीर थे। एक बूढ़ा फकीर था और एक युवक दोनों साथ-साथ द्घूमते हुए आश्रम के पास से निकलते हैं। नदी पार करके उन्हें परम पूज्य गुरुदेव के चरणों में पहुंचना था। पहाड़ी के उस पार एक छोटी सी नदी थी। उस नदी के तट पर एक सुंदर युवती खड़ी थी। वो भी नदी पार करना चाहती थी। उस बूढ़े फकीर ने उस युवती को बड़ी लालची नजरों से देखा। स्त्री ने अपेक्षा की कि मेरा भी हाथ पकड़ कर मुझे भी नदी पार करा दें। बूढ़ा फकीर ३० साल से आश्रम में रहता था ब्रह्मचर्य के व्रत का पालन कर रहा था। उसने सोचा कि स्त्री का हाथ पकड़ कर कहीं मेरा ब्रह्मचर्य न नष्ट हो जाये। ऐसा सोच कर उसका हृदय कंपित हो गया और कामुकता से भर गया। फिर उसने कहा कि देखो मुझे तुमसे लेना एक न देना नहीं है मैं तुम्हारे चक्कर में नहीं पड़ सकता। इतना कह कर उसने उस युवती की ओर से मुंह फेर लिया और नदी पार करके उस ओर चला गया। नदी पार करते समय वो युवती ही उसके प्राणों में छाई रही। थोड़ी देर बाद उसने देखा कि उसका साथी युवा फकीर पीछे रह गया था क्योंकि उस बूढ़े फकीर के चित्त में युवती व्याप्त हो चुकी थी इसलिये वो अपने साथी को भूल गया। थोड़ी देर ठहरा तब उसे अपने साथी युवा फकीर की याद आई। पीछे मुड़ कर देखता है तो युवा फकीर उस सुंदर स्त्री को कंधे पर बिठा कर नदी पार करा रहा है। उस युवा फकीर ने उस युवती को नदी पार कराके किनारे पर छोड़ दिया। तेजी से बूढे़ फकीर की ओर बढ़ा। लेकिन बूढ़े फकीर ने क्रोध में आकर पीछे मुड़कर भी नहीं देखा, उससे बात भी नहीं की। आश्रम के द्वार पर पहुंचा तो उसने कहा कि आज तो परम पूज्य गुरुदेव से तुम्हारी शिकायत करनी ही पड़ेगी। तुमने इतना बड़ा पाप किया। तुम पथ भ्रष्ट हो गये, धर्म भ्रष्ट हो गये। तुमने उस युवा स्त्री को कंधे पर बिठा कर नदी पार कराई। उस युवा फकीर ने कहा कि मैं तो उस स्त्री को नदी पार कराके भूल ही गया था। तुम अब भी उस स्त्री का बोझ अपने हृदय में अपने चित्त में ढ़ो रहे हो। उसने तो उस युवती को उठा कर के नदी के उस पार छोड़ दिया और आगे बढ़ गया। लेकिन जिस वृद्ध फकीर ने उस युवती को छोड़ दिया था उसके चित्त में, उसके दिमाग में, उसके हृदय में वह युवती बैठ गई। हमारे और आपके चित्त की भी यही कहानी है। हमारे और आपके हृदय में भी काम, क्रोध, लोभ, मोह बैठे ही रहते हैं। आप २४ द्घण्टे उनको ढोते रहते हो और हम कितना ही करें, कितने ही बड़े साधू हों उनको नहीं छोड़ सकते। हम कितनी भी धार्मिकता में उतर जाये पर इन्हें नहीं छोड़ सकते। मैं कहता हूं कि फिर आप लोगों को साधू-सन्यासियों पर भ्रम क्यों नहीं होता है। एक साधू दूसरे साधू को नमस्कार नहीं करता। बड़ी अड़चन आती है कि पहले नमस्कार कौन करे। जिसने पहले दण्डवत कर लिया वो छोटा साधू हो गया। इनके अखाड़ों में कितनी लड़ाइयां है, राजनीतिज्ञ भी इतना नहीं लड़ते हैं। आप सोचते हो कि इनके आशीर्वाद से सब कुछ ठीक हो जायेगा। मगर वे झूठा जीवन जी रहे हैं। धर्म के नाम पर झूठा जीवन जीने वाले तुम्हारा कोई कल्याण नहीं कर सकते, तुम्हारा कोई उपकार नहीं कर सकते। तुम इनमें उलझो नहीं तुम इनके इर्द-गिर्द द्घूमो नहीं। ये लोग तुम्हारा सारा जीवन ठग रहे हैं। तुम्हारा धन भी बर्बाद कर रहे हैं। तुम्हारा चित्त भी उलझाये हुए हैं तुम्हें तरह-तरह से क्षति पहुंचा रहे हैं। तुम्हारा कोई भी कल्याण नहीं कर सकते। मैं सच्चे हृदय से अपने गुरुदेव को साक्षी मानकर कह रहा हूं तुम्हारा कल्याण करने वाला एक है वो कौन? वो तुम स्वयं हो। अप दीपो भवः। अपना दीपक स्वयं बनो। मैं यह नहीं कहता हूं कि तुम
अंधविश्वास में आकर मेरी उंगली पकड़कर चलते रहो। मैं तो तुम्हारे भीतर के दिये को जलाना चाहता हूं ताकि तुम स्वयं प्रकाशित हो सको, अपने को जानों वही सच्चा सद्गुरु है मैं तुम्हें जगाना चाहता हूं। तुम्हारे अलावा, तुम्हारे जीवन को कोई दूसरा आनंद से नहीं भर सकता है। तुम खुद ही उसे शांति और आनंद से भर सकते हो। |