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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
 
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यमकेश्वर विधानसभा की दो विशेषताएं-एक इसमें सुविधाओं के नाम
 
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इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस खेमेबाजी से द्घिरी है। पार्टी में कई धड़े हैं। हर का सूबेदार है। और हर सूबेदार के कंधे पर मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा का भार है। ऐसे मुश्किल हालात में कांग्रेस की स्थिति बेहतर इसलिए दिख रही है क्योंकि उसको भाजपा की नाकामियों और कमजोरियों का लाभ मिलने वाला है। कांग्रेस अपनी खूबियों नहीं बल्कि भाजपा की खामियों के सहारे सिहांसन को पाने का सपना देख रही है
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उम्र पर विवाद
 

कभी बंग्लादेश की थल सेना को सलामी देने पर तो कभी जम्मू कश्मीर में तैनात आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट को लेकर विवादों में रहे भारतीय थल सेना अध्यक्ष इनदिनों अपनी जन्म तिथि को लेकर खासी चर्चा में हैं। उनके जन्मदिन पर विवाद खड़ा हो गया है। जिसके कारण रिटायरमेंट

को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है। सेना प्रमुख और सरकार का रुख इस मुद्दे पर अलग-अलग है।विजय कुमार सिंह के मुद्दे को ग्रेनेडियर एसोसिएशन के वकील ने उच्चतम न्यायालय में उठाया है। इसमें कहा गया है कि थल सेना प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण पद पर बैठे व्यक्ति की जन्मतिथि को लेकर जारी विवाद राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से उचित नहीं है। याचिकाकर्त्ता ने न्यायालय में अनुरोध किया है कि वह जनरल सिंह की जन्मतिथि का वर्ष १९५० के बजाय १९५१ करने का निर्देश दे।
खबरों के मुताबिक जनरल सिंह ने रक्षा सचिव से कहा था कि उम्र का मामला ११ लाख फौजियों के अगुवा के तौर पर उनके सम्मान से जुड़ा है। जनरल वीके सिंह ने साफ कहा था कि इसका अर्थ सेना अध्यक्ष के दफ्तर में एक और साल बने रहने का कतई नहीं है, जो उन्हें तब मिल जाता जब रक्षा मंत्री उनकी जन्मतिथि १० मई, १९५१ स्वीकार कर लेते। सेना के रिकॉर्ड में जनरल वीके सिंह की १० मई, १९५० और १० मई, १९५१ के तौर पर दो जन्म तिथियां दर्ज हैं। उनके हाईस्कूल सर्टिफिकेट पर १० मई, १९५१ की जन्म तिथि दर्ज है।
इससे पहले जनरल सिंह सेना की पूर्वी कमान के कमांडिंग-इन-चीफ रहे हैं। राजपुताना रेजिमेंट की तीसरी पीढ़ी के अफसर विजय कुमार सिंह ने पिलानी के बिरला पब्लिक स्कूल से अपनी शिक्षा ग्रहण की है। वह डिफेंस सर्विस स्टाफ कॉलेज से ग्रैजुएट हैं। सिंह को १९७० में बतौर एनडीए अफसर तैनाती मिली थी। साल १९७१ में बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में जनरल वीके सिंह जंग के मैदान में भी थे। इसके अलावा १९८७ में श्रीलंका में हुए ऑपरेशन पवन में हिस्सा लेने के लिए उन्हें युद्ध सेवा मेडल मिला था। उन्हें अमेरिका वार कालेज के हॉल ऑफ फेम में शामिल कर संस्था का
सर्वोच्च सम्मान प्रदान किया गया। हॉल ऑफ फेम से सम्मानित होने वाले वे भारत के पहले सेना प्रमुख बने। जनरल वीके सिंह सम्मान पाने वाले दुनिया के ३७वें सैन्य अधिकारी हैं। सिंह को एलओसी और ऊंचे पहाड़ी इलाकों में काम करने का लंबा तजुर्बा है।
इस संबंध में बीते १६ दिसंबर को सुनावाई होनी थी लेकिन उच्चतम न्यायालय की दो सदस्यीय खंडपीठ के एक सदस्य न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर ने इस मामले में सुनवाई से खुद को अलग कर लिया। जिसके कारण सुनवाई नहीं हो सकी। फिर इसकी अगली सुनवाई ५ जनवरी को हुई जिसमें ??? यह जन्मतिथि
स्वीकार की गई।
इस मामले पर आगे की योजना के बारे में जानकारी लेने के लिए रक्षा सचिव शशि कांत शर्मा ने सेना प्रमुख से उनके दफ्तर में मुलाकात की। जहां पर जनरल सिंह ने रक्षा सचिव से कहा था कि उनके साथ ऐसा बर्ताव हो रहा है, मानो वह पाकिस्तानी सेना के प्रमुख हैं। इसके बाद वीके सिंह ने केंद्रीय रक्षा मंत्री एके एंटनी से मुलाकात की। एंटनी की तरफ से थलसेना अध्यक्ष जनरल वीके सिंह की जन्म तिथि को लेकर की गई शिकायत को खारिज कर दिया गया।
रक्षा मंत्री के शिकायत खारिज करने के बाद वे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी से मिले। मुखर्जी ने जनरल सिंह को कोर्ट की शरण में न जाने की सलाह दी। प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को भी इस मामले की जानकारी है। जनरल सिंह ने अब तक उम्र के मसले पर कोर्ट जाने का कोई संकेत नहीं दिया है लेकिन फिर भी वे रक्षा मंत्रालय के एक वर्ग द्वारा अपमानित महसूस कर रहे हैं। वीके सिंह ने रक्षा सचिव से मुलाकात के दौरान यह भी कहा था कि रक्षा मंत्रालय उनकी छवि खलनायक जैसी बना रहा है।
रक्षा मंत्रालय के आयु विवाद की अर्जी खारिज कर दिए जाने के बाद निगाहें अब थलसेना प्रमुख के अगले कदम पर जा टिकी हैं। रक्षा मंत्रालय जहां इस मामले में पूरी तरह चुप्पी साधे हुए है वहीं सिंह आत्मसम्मान की इस लड़ाई को सही मुकाम तक ले जाने के लिए उपलब्ध विकल्पों पर विचार कर रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, तकनीकी रूप से जनरल सिंह के लिए इस मामले में अपना पक्ष सही साबित करने के लिए केवल न्यायिक प्रक्रिया ही शेष बची है। इसके लिए वे सैन्य ट्रिब्यूनल के अलावा सीधे सर्वोच्च न्यायालय भी जा सकते हैं।
इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए रक्षा मंत्रालय के साथ-साथ सेना प्रमुख कार्यालय भी पूरी तरह चुप है। रक्षा मंत्रालय सेना प्रमुख की जन्मतिथि १९५१ मानने से दो बार इनकार कर चुका है। ऐसे में यदि वे कोर्ट की शरण नहीं लेते तो थलसेना प्रमुख के रूप में उनका कार्यकाल आगामी ३१ मई को समाप्त हो जाएगा। अदालत से राहत मिलने की स्थिति में उन्हें सेना प्रमुख के रूप में दस माह का अतिरिक्त कार्यकाल मिल सकता है।

 
 
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