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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
 
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यमकेश्वर विधानसभा की दो विशेषताएं-एक इसमें सुविधाओं के नाम
 
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इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस खेमेबाजी से द्घिरी है। पार्टी में कई धड़े हैं। हर का सूबेदार है। और हर सूबेदार के कंधे पर मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा का भार है। ऐसे मुश्किल हालात में कांग्रेस की स्थिति बेहतर इसलिए दिख रही है क्योंकि उसको भाजपा की नाकामियों और कमजोरियों का लाभ मिलने वाला है। कांग्रेस अपनी खूबियों नहीं बल्कि भाजपा की खामियों के सहारे सिहांसन को पाने का सपना देख रही है
 
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  ़ ़ ़मगर भरोसेमंद नहीं
   
 

हरक सिंह रावत की एक निजी विशेषता यह हे कि वो चाहे किसी भी दल में रहें उनकी नजर स्वार्थ-सिद्धि की उस मीनार पर रहती है जहां वो खुद को आसीन देखना चाहते हैं। भाजपा-बसपा से होते हुए वे आज कांग्रेस तक पहुंचते हैं। जिस दल में भी रहते हैं, ऊंचा ओहदा उनका नसीब न जाता है। उनका विवादों से गहरा नाता रहा है। अध्यक्ष पद, नेता प्रतिपक्ष के लिए अपने ही दल के लोगों से सेटिंग करने में गुरेज नहीं करते। लेकिन सब कुछ के बावजूद विश्वसनीय नहीं

 

हैं-पार्टी, स? और जनता किसी में नहीं। फिलहाल उनकी स्थिति कमजोर नजर आ रही है। मुख्यमंत्री का सुनहरा ख्वाब पालने वाले हरक सिंह रावत की जमीन सरकने लगी है

उत्तराखण्ड में कांग्रेस के दमदार लेकिन दागदार अतीत वाले नेता डॉ हरक सिंह रावत का राजनीतिक सफर कम दिलचस्प नहीं है। महत्वाकांक्षी हरक सिंह हमेशा अपने फायदे के लिए अपनी सवारी बदलते रहे हैं। इसी कारण कभी किसी पार्टी या गुट में टिके नहीं। अपने राजनीतिक कद को बढ़ाने के लिए एक हाथ दे और दूसरे हाथ ले की नीति अपनाई लेकिन उसमें भी इनकी विश्वसनीयता स्थाई नहीं रही। जिस कारण आज अपनी पार्टी में ही इनके कई दुश्मन हैं। फिर भी रावत ने जिस दल का दामन थामा वहां उन्हें कोई न कोई बड़ा पद और सम्मान जरूर मिला। वर्तमान में दो-दो पार्टी छोड़ कांग्रेस में आए रावत नेता प्रतिपक्ष हैं और मुख्यमंत्री पद के दावेदार भी माने जाते हैं जबकि पुराने और खांटी कांग्रेसी हाथ मलते रह गए।
पौड़ी जनपद में श्रीकोट स्थित गंगनाली गांव के नारायण सिंह रावत के द्घर १५ दिसम्बर १९५९ को जन्मे डॉ हरक सिंह रावत ने ८० के दशक में गढ़वाल विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति से अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की। छात्र जीवन के बाद गढ़वाल और रूहेलखण्ड विश्वविद्यालय से स्वर्ण पदक प्राप्त रावत वर्ष १९८५ में पब्लिक सर्विस कमीशन के तहत प्रवक्ता बने और गढ़वाल विश्वविद्यालय में नियुक्त हुए। लेकिन छात्र राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने वाले रावत को प्रवक्ता की नौकरी ज्यादा दिनों तक नहीं भायी। वर्ष १९९१ में भाजपा के टिकट पर पौड़ी से विधानसभा चुनाव लड़े और जीते भी। इसके बाद वे राजनीतिक क्षेत्र में पूरी तरह प्रवेश कर गए। लेकिन आर्थिक लोभवश उन्होंने प्रवक्ता पद से इस्तीफा नहीं दिया। १९९१ से अब तक वे कई बार विधायक, मंत्री और मंत्री दर्जा प्राप्त पद पर रहे। इसके साथ-साथ गढ़वाल विश्वविद्यालय में प्रवक्ता पद पर भी बने रहे। इस तरह लंबे समय से लाभ के दो पदों पर बने रहना उनकी ईमानदार छवि पर सवाल खड़ा करता है। पिछले साल जब इस पर विवाद बढ़ा तो उन्होंने इस्तीफा दे दिया जो अभी तक मंजूर नहीं हुआ।
वर्ष १९९१ में पौड़ी सीट से जीत कर रावत पहली बार उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे। तब तत्कालीन भाजपा की कल्याण सिंह सरकार में उन्हें पर्यटन मंत्री बनाया गया। वे उस कैबिनेट के सबसे युवा मंत्री थे। वर्ष १९९३ में एक बार फिर हरक सिंह रावत भाजपा के टिकट पर पौड़ी से ही चुनाव लड़े और दोबारा विधायक निर्वाचित हुए। भाजपा में रहते हुए उन्होंने आलाकमान पर अपनी शर्तें थोपनी चाही। बयानबाजी के कारण खासे विवादों में भी रहे। ऐसे ही विवादों के चलते भाजपा ने पौड़ी से तीसरी बार उन्हें टिकट नहीं दिया। जिसके बाद हरक सिंह के संबंध भाजपा से बिगड़ गए। भाजपा को छोड़ उन्होंने बहुजन समाजवादी पार्टी का दामन थामा। बसपा मे जाने के बाद हरक सिंह रावत चुनाव तो नहीं जीते लेकिन बसपा ने हरक सिंह रावत को खादी ग्रामोद्योग बोर्ड का चेयरमैन बनाया जो कि कबिना मंत्री स्तर का पद था।
तब और आज भी बसपा का पर्वतीय इलाके में पकड़ नहीं के बराबर है। रावत इस सच्चाई को उसी समय भांप गए थे। इसलिए रावत को बसपा में अपना राजनीतिक भविष्य अंधकार में नजर आने लगा। आखिर डूबती नैया को पार लगाने के लिये एक बार फिर भाजपा का दरवाजा खटखटाया। लेकिन भाजपा ने उन्हें चारा नहीं डाला। तब १९९७ में रावत दल बदलकर कांग्रेसी हो गए। भाजपा से दो बार विधायक रहने का लाभ भी मिला। उसी साल कांग्रेस ने रावत को उत्तर प्रदेश वर्किंग कमेटी का अध्यक्ष बना दिया। अलग उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद वर्ष २००२ के पहले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर लैंसडाउन विधानसभा से चुनाव लड़े और विजयी हुए। २००७ में भी हरक सिंह लैंसडाउन विधानसभा से दोबारा चुनाव लड़े और जीते।
आज हरक सिंह अपने आप को उत्तराखण्ड कांग्रेस के बड़े चेहरे के तौर पर साबित कर चुके हैं। उत्तराखण्ड कांग्रेस में हरीश रावत, सतपाल महाराज और विजय बहुगुणा के गुट हैं। हरक सिंह खुद के हित के मुताबिक इनमें से किसी एक गुट में शामिल होकर अपनी राजनीतिक गोटियां फिट कर लेते हैं। लेकिन वे कभी किसी गुट के प्रति विश्वसनीय नहीं रहे हैं। अपना हित और राजनीति के दूरगामी परिणामों के समीकरणों के हिसाब से ही हरक सिंह रावत ने अपनी आस्था अलग- अलग गुट के प्रति दिखाई है। चाहे वह नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी का मामला हो या प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी को पाने के लिये। वे हर ऐसे वक्त पर अपनों का साथ छोड़ने में कोई कोताही नहीं बरतते।
नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी के लिए हरक सिंह रावत ने जिस तरह से लाबिंग की थी, उससे उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षा साबित होती है। कांग्रेसी सूत्रों की मानें तो उन्होंने तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष यश्पाल आर्य के साथ समझौता किया था कि नेता प्रतिपक्ष के लिये वे हरक सिंह रावत का विरोध न करें और हरक सिंह रावत यशपाल आर्य का दोबारा अध्यक्ष पद के लिये कोई विरोध नहीं करेंगे। तब पार्टी ने टीपीएस रावत और प्रीतम सिंह के विरोध को तवज्जों नहीं दी। टीपीएस रावत ने इसका काफी विरोध किया और पार्टी आलाकमान को कई बार पत्र भी लिखे। लेकिन हरक सिंह रावत ने जिस तरह से अपने पक्ष में गोटियां बैठाई थी उससे टीपीएस रावत की एक नहीं चली।
नेता प्रतिपक्ष बनने के बाद हरक सिंह रावत प्रदेश अध्यक्ष बनने के लिये फिर से लालायित हो उठे। उन्होंने इसके लिये तमाम हथकण्डे अपनाये। वे हरीश रावत गुट में शामिल हो गए। हरीश रावत ने भी हरक सिंह का साथ दिया। हरक सिंह रावत ने अध्यक्ष बनने के लिये हरीश रावत के साथ समझौता किया था कि उन्हें (हरीश रावत को) प्रदेश के नए कांग्रेसी मुख्यमंत्री बनाने के लिये पूरा सहयोग करेंगे। इस बार हरक सिंह को मात मिली। पार्टी आलाकमान ने यशपाल आर्या को दोबारा अध्यक्ष बनाया। अब वे मुख्यमंत्री बनने के लिये अपनी लॉबिंग में जुटे हैं। अपनी महत्वकांक्षा और हित के लिये समय-समय पर साथ देने वाले
नेताओं के साथ वादा-खिलाफी करके रावत सतपाल महाराज, हरीश रावत और विजय बहुगुणा गुट के साथ अपने संबंध खराब कर चुके हैं। यशपाल आर्य के साथ तो उनके संबंध पहले से ही कटु हैं। कांग्रेसी सूत्रों की मानें तो चारों गुट हरक सिंह रावत को डोईवाला विधानसभा में द्घेरने की रणनीति बनाने में लगे हैं। जिस तरह से हरक सिंह रावत का स्थानीय नेताओं में भारी विरोध हो रहा है उससे तो लगता है कि हरक सिंह रावत को चुनाव जीतने में भारी मुश्किलों को समाना करना पड़ सकता है।
डॉ हरक सिंह रावत ने एक नया शिगुफा भी छोड़ा हैं। इस बार उनका बयान आया है कि अगर कांग्रेस ने उनको मुख्यमंत्री प्रमोट नहीं किया तो वे विधायक पद से ही इस्तीफा दे देंगे। उनके इस बयान से लगता है कि रावत अपने को पार्टी का प्रमुख नेता और स्वयं को मुख्यमंत्री पद का प्रबल दावेदार मानते हैं। हरक सिंह रावत ने लैंसडाउन सीट से अपनी दावेदारी छोड़ दी है। इस सीट पर अपने पीआरओ विनोद रावत का नाम आगे किया है। स्वयं
डोईवाला से चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन डोईवाला में कोंग्रेस के कई नेताओं ने इसका भारी विरोध किया है। डोईवाला से हरक सिंह रावत की चुनावी नैया पार लगना बहुत कठिन लग रहा है और वे स्वयं लैंसडाउन से अपनी दावेदारी छोड़ चुके हैं।

   
 
 
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