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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
 
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यमकेश्वर विधानसभा की दो विशेषताएं-एक इसमें सुविधाओं के नाम
 
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इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस खेमेबाजी से द्घिरी है। पार्टी में कई धड़े हैं। हर का सूबेदार है। और हर सूबेदार के कंधे पर मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा का भार है। ऐसे मुश्किल हालात में कांग्रेस की स्थिति बेहतर इसलिए दिख रही है क्योंकि उसको भाजपा की नाकामियों और कमजोरियों का लाभ मिलने वाला है। कांग्रेस अपनी खूबियों नहीं बल्कि भाजपा की खामियों के सहारे सिहांसन को पाने का सपना देख रही है
 
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  गडकरी तुम धन्य हो!
   
 

भाजपा अध्यक्ष की जब ताजपोशी हुई थी तब उनके गृह प्रदेश महाराष्ट्र को छोड़ कहीं किसी ने उनका नाम तक नहीं सुना था। मीडिया ने उन्हें संद्घ की पसंद बताया था। राष्ट्रवाद और शुचिता की दुहाई देने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संद्घ की इस पसंद ने भाजपा का जो हश्र किया उससे तो केवल यही कहा जा सकता है कि तुम धन्य हो गडकरी! जो काम तमाम धर्मनिरपेक्ष ताकतें नहीं कर पाईं वह तुम अकेले दम पर करते और सफल होते नजर आ रहे हो।

 

कर्नाटक में रेड्डी बन्धुओं के हर कुकृत्य को न केवल येदियुरप्पा बल्कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का भी संरक्षण था। तब अनेक बार आरोप लगे थे कि रेड्डी बन्धु और येदियुरप्पा अपने आलाकमान को भारी आर्थिक मदद देते रहते हैं। भाजपा नेतृत्व को कभी भी येदियुरप्पा सरकार के कारनामों से कोई परहेज नहीं रहा। उत्तराखण्ड में भी निशंक सरकार के हर गलत कृत्य को गडकरी ने क्लीन चिट दे छुपाने का प्रयास किया। हाइड्रो पावर द्घोटाला हो या फिर सिटूरजिया भूमि द्घोटाला, नितिन गडकरी ने देहरादून पहुंच तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' की हौसला अफजाई की थी। और अब बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा में शामिल कराने के पीछे भी गडकरी का समर्थन सबसे महत्वपूर्ण रहा है

 

'' ज्यों लूट लें कहार ही दुल्हिन की पालकी हालात यही है आजकल हिन्दुस्तान की''

सुप्रसिद्ध गीतकार और कवि नीरज की यह दो पंक्तियां लोकपाल के नाम पर कांग्रेस को कोस रही भारतीय जनता पार्टी के सच को सामने लाती हैं। उत्तर प्रदेश की बसपा सरकार के दागी मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा को जिस निर्लज्जता के साथ भाजपा में शामिल किया गया उससे एक बार फिर साफ हो जाता है कि राम के नाम पर करोड़ों हिन्दुओं की भावनाओं को छल कर सत्ता तक पहुंची इस पार्टी द्वारा सशक्त लोकपाल के मुद्दे पर अन्ना हजारे को दिया जा रहा समर्थन मात्र एक छलावा है और दोबारा केन्द्र की सत्ता हथियाने के लिए किया जा रहा प्रपंच मात्र। चूंकि कांग्रेस किसी भी कीमत पर ऐसा कोई कानून नहीं बनाना चाहती जो आगे चलकर बरसों से
कांगे्रसी नेताओं द्वारा अर्जित काली कमाई को राष्टीय संपत्ति बनाने का मार्ग प्रशस्त करे। इसलिए उसके लोकपाल विरोध को हथियार बना भाजपा जो भ्रष्टाचार मुक्त रामराज लाने का स्वप्न फिर से जनता जनार्दन को दिखाने का प्रयास कर रही है, बाबू सिंह कुशवाहा की बदौलत अब ऐसा कर पाना संभव नहीं होगा। उत्तर प्रदेश के भ्रष्टाचार से पूरा देश वाकिफ है। जो कम जानकार हैं, वे भी कम से कम इस सत्य से वाकिफ हैं कि पिछले एक दशक से उत्तर प्रदेश में चाहे जिसकी भी सरकार रही हो भ्रष्टाचार ने दिन-दुनी रात चौगुनी तरक्की की है। समाजवादी पार्टी ने अमर सिंह की नीतियों पर चलकर उत्तर प्रदेश को बदहाल करने का नया कीर्तिमान बनाया था। तब राज्य में कानून- व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई थी। समाजवादी पार्टी तमाम प्रकार के अवांछनीय तत्वों का अखाड़ा बन गई थी। क्या ठग, क्या डकैत, बलात्कारी, लंपट, बाहुबली आदि सभी सपा में शामिल हो उत्तर प्रदेश को लूटने में जुट गए थे। २००७ में हुए चुनाव में बसपा ने जनता के आक्रोश को नारे में बदल उसे सफलतापूर्वक भुनाया था। मायावती ने तब कहा था-'चढ़ गुंडन की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर।' जनता ने विकल्पहीनता के चलते 'बहिनजी' के नारे पर विश्वास किया लेकिन बदले में उसे भारी धोखा और निराशा मिली। समाजवादी पार्टी द्वारा पोषित सभी अवांछनीय तत्व बसपा में शामिल हो गए। मुलायम सरकार के भ्रष्टाचार को मायावती सरकार ने कहीं पीछे छोड़ दिया। पिछले पांच वर्षों के दौरान उत्तर प्रदेश में सरकार केवल और केवल जनता के धन की लूट में जुटी नजर आई।
भले ही चुनाव से ठीक पहले मायावती ने अपने २१ दागी मंत्रियों को मंत्रिमंडल से बाहर निकाल दिया हो और सौ के करीबी सीटिंग विधायकों को भ्रष्टाचार के आरोप में पार्टी का टिकट न दिया हो, इस सच को वे छिपा नहीं सकती कि पूरे साढ़े चार साल तक उनके इन्हीं विधायकों और मंत्रियों ने जमकर चांदी काटी। जिन गुंडों की छाती पर चढ़ मायावती सत्ता में आईं उन्हें इन साढ़े चार वर्षों में पूरा सरकारी संरक्षण उन्होंने ही दिया। डीपी यादव, गुड्डू पंडित, मुख्तार अंसारी समेत दर्जनों ऐसे नाम हैं जिन्हें बसपा ने सरकार बनने के बाद दंडित करने के बजाए पुरस्कूत किया। हालात इतने बिगड़े कि नारा ही बदल गया। कहा जाने लगा 'गुण्डे चढ़े हाथी पर, गोली चलेगी छाती पर'।
जिन बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा ने गले लगाया है वे बसपा के कुशासन की पटकथा में महत्वपूर्ण किरदार रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग में कुशवाहा की लूट-खसोट का नतीजा रहा दो-दो मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की हत्या होना। केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन कार्यक्रम के तहत उत्तर प्रदेश को दिए गए लगभग दो हजार करोड़ की इस बंदरबांट की जांच अब सीबीआई कर रही है। निश्चित है कि आज नहीं तो कल कुशवाहा की इस मामले में गिरफ्तारी होगी ही। अपनी इस संभावित गिरफ्तारी से भयभीत कुशवाहा बसपा प्रमुख द्वारा पार्टी से निष्कासित किए जाने के बाद से ही अपने लिए एक सुरक्षित मंच तलाश रहे थे। सपा और कांग्रेस द्वारा इंकार कर दिए जाने के बाद आखिरकार उन्हें नितिन गडकरी के रूप में एक तारणहार मिल ही गया। भाजपा अध्यक्ष की जब ताजपोशी हुई थी तब उनके गृह प्रदेश महाराष्ट्र को छोड़ कहीं किसी ने उनका नाम तक नहीं सुना था। मीडिया ने उन्हें संद्घ की पसंद बताया था। राष्ट्रवाद और शुचिता की दुहाई देने वाले राष्ट्रीय स्वयं सेवक संद्घ की इस पसंद ने
भाजपा का जो हश्र किया उससे तो केवल यही कहा जा सकता है कि तुम धन्य हो गडकरी! जो काम तमाम धर्मनिरपेक्ष ताकतें नहीं कर पाईं वह तुम अकेले दम पर करते और सफल होते नजर आ रहे हो। कर्नाटक में रेड्डी बन्धुओं के हर कुकूत्य को न केवल येदियुरप्पा बल्कि भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व का भी संरक्षण था। तब
अनेक बार आरोप लगे थे कि रेड्डी बन्धु और
येदियुरप्पा अपने आलाकमान को भारी आर्थिक मदद देते रहते हैं। भाजपा नेतृत्व को कभी भी येदियुरप्पा सरकार के कारनामों से कोई परहेज नहीं रहा। उत्तराखण्ड में भी निशंक सरकार के हर गलत कूत्य को गडकरी ने क्लीन चिट दे छुपाने का प्रयास किया। हाइड्रो पावर द्घोटाला हो या फिर सिटूरजिया भूमि द्घोटाला, नितिन गडकरी ने देहरादून पहुंच तत्कालीन मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' की हौसला अफजाई की थी। और अब बाबू सिंह कुशवाहा को
भाजपा में शामिल कराने के पीछे भी गडकरी का समर्थन सबसे महत्वपूर्ण रहा है।
कुशवाहा की भाजपा में एन्ट्री से जहां
भाजपा को एक बड़े वोट बैंक में सेंध लगाने में मदद मिलेगी, वहीं चर्चा यह भी है कि अपने काले धन का एक बड़ा हिस्सा कुशवाहा ने बतौर चंदा भाजपा अथवा उसके नेताओं को चढ़ाया है। भले ही यह सत्य न हो लेकिन इससे तो इंकार नहीं किया जा सकता कि मायावती सरकार के सबसे भ्रष्ट मंत्रियों की सूची में कुशवाहा का नाम पहले नंबर पर रहा है। ऐसे में सशक्त लोकपाल कानून की मांग उठाने का नैतिक अधिकार भाजपा खो देती है। जो पार्टी तमाम प्रकार के दागी, अन्य पार्टियों के बागी, भ्रष्ट और अपराधी नेताओं की शरणस्थली बनती जा रही हो वह भले कितने ही प्रपंच कर ले, लोकपाल के नाम पर आंसू बहा ले या फिर राज्यों में लोकायुक्त कानून बनवा दे इस सच को नहीं ढांपा जा सकेगा कि अंततः भाजपा और कांग्रेस में कोई फर्क नहीं। दोनों ही अवसरवादी राजनीति की पोषक हैं जहां हर प्रकार की दुष्ट प्रवृत्ति को प्रश्रय मिलता है। अदम गोंडवी, जो २०११ के अंतिम माह में अपनी अंतिम यात्रा पर निकल गए, की एक गजल हमारे लोकतंत्र के इस भयावह सच को सामने लाती है-
काजू भूने प्लेट में विस्की गिलास में
उतरा है रामराज विआँाायक निवास में
पक्के समाजवादी हों, तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में
आजादी का ये जश्न मनाएं वे किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर द्घर की तलाश में
पैसे से आप चाहें तो सरकार जिता दें
पसंद बदल गई है यहां की नखास में
जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूं मैं होशोहवास में

   
 
 
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भाजपा अध्यक्ष की जब ताजपोशी हुई थी तब उनके गृह प्रदेश महाराष्ट्र को छोड़ कहीं किसी ने उनका नाम तक नहीं सुना था।
 
कभी बंग्लादेश की थल सेना को सलामी देने पर तो कभी जम्मू कश्मीर में तैनात आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट को
 
स्तंत्रता संग्राम और उत्तराखण्ड आन्दोलन की चिंगारी सर्वप्रथम स्याल्दे से ही शुरू हुई थी। आंदोलन की यह धरती
सहज और सरल स्वभाव वाले प्रकाश पंत के कंधों पर कई भारी-भरकम मंत्रालय का भार
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पुरौला विधानसभ क्षेत्र की बदहाली ही उसकी पहचान बन चुकी है। किसान बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। निचले
देहरादून। रक्षा मोर्चा कोटद्वार में मुख्यमंत्री भुवन चंद्र खंडूड़ी को तीन
 
अपनी उपेक्षा से आहत पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने राजनीतिक दाव खेला। उनके समर्थन से निरंतर विकास
 
पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनाव इस मायने में महत्वपूर्ण हैं कि इससे
 
धर्म जीना सिखाता है। सच्चा धर्मगुरु जीवन को सुख-शांति और रोशनी से भर देता है। धर्म को दुकान बनाने वाले बेशुमार
 
सचिन तेंदुलकर, राहुल द्रविड़, वीवीएस लक्ष्मण, वीरेंद्र सहवाग, महेंद्र सिंह धोनी और गौतम गंभीर ये वे नाम हैं
 
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