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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
 
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यमकेश्वर विधानसभा की दो विशेषताएं-एक इसमें सुविधाओं के नाम
 
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इस बार के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस खेमेबाजी से द्घिरी है। पार्टी में कई धड़े हैं। हर का सूबेदार है। और हर सूबेदार के कंधे पर मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा का भार है। ऐसे मुश्किल हालात में कांग्रेस की स्थिति बेहतर इसलिए दिख रही है क्योंकि उसको भाजपा की नाकामियों और कमजोरियों का लाभ मिलने वाला है। कांग्रेस अपनी खूबियों नहीं बल्कि भाजपा की खामियों के सहारे सिहांसन को पाने का सपना देख रही है
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  बुनियादी सुविधाओं का अकाल
   
 
 

राज्य गठन के पूर्व उत्तरकाशी जनपद का पूरा क्षेत्र एक ही विधानसभा के अंतर्गत आता था। बाद में यहां दो नए विधानसभा क्षेत्र बनाए गए यमनोत्री और पुरौला। पुरौला अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीट है और यहां से पहले चुनाव में भाजपा के मालचंद ने जीत दर्ज की थी। २००७ के चुनाव में कांग्रेस के राजेश जुवांठा ने स्वतंत्र उम्मीदवार मालचंद को हराया। तब भाजपा ने मालचन्द का टिकट काटकर अमृत सिंह को उम्मीदवार बनाया।

मालचंद ने पार्टी से टिकट नहीं मिलने पर
निर्दलीय चुनाव लड़ा था। भाजपा को मालचंद के बगावत की वजह से यह सीट गंवानी पड़ी थी। चुनाव के दौरान नेताओं ने जनता से लंबे- लंबे वादे किए लेकिन पांच साल बीत चुके हैं, एक भी वादा जमीनी हकीकत नहीं बन पाया है।
पुरौला से विधायक राजेश जुवांठा ने पिछले चुनाव में द्घूम-द्घूमकर इस क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या स्वास्थ्य सेवाओं को दुरुस्त करने का वादा किया था। जनता ने राजेश जुवांठा को जिता तो दिया लेकिन लोगों की स्वास्थ्य संबंधी समस्या खत्म नहीं हुई। पूरे विधानसभा क्षेत्र में एक भी महिला डॉक्टर तैनात नहीं है। न केवल दूर-दराज के गांवों बल्कि कस्बाई महिलाओं को भी इलाज के लिए १५० किलोमीटर दूर देहरादून जाना पड़ता है। महिलाओं को प्रसव कराने के लिए भी उधर का ही रूख करना पड़ता है।
राजेश जुवांठा ने चुनाव में इन समस्याओं को खत्म करने का वादा किया था। इस बीच भाजपा कार्यकाल के दोनों मुख्यमंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक' और मेजर जनरल (सेवानिवृत) भूवन चन्द्र खण्डूड़ी पुरौला दौरे पर आए। मुख्यमंत्री के अलावा स्वास्थ्य मंत्री भी पुरौला दौरे पर कई बार आ चुके हैं। लेकिन आज तक विधायक ने इन
लोगों के सामने क्षेत्र की इस समस्या को नहीं उठाया। आम लोगों ने ही हरेक बार मंत्रियों के सामने इस समस्या को रखा। पर इसके बावजूद उनकी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।
पुरौला विधानसभा क्षेत्र में एक जिला
चिकित्सालय है लेकिन यहां के हालात अन्य राजकीय अस्पतालों के सामान ही हैं। पुरौला
चिकित्सालय में फार्मास्टि का पद वर्षों से रिक्त है। महिला डॉक्टर की आज तक यहां तैनाती नहीं हो पाई है। ईएनटी और सर्जन का काम मेडिसीन के डॉक्टर ही कर देते हैं। इससे बुरी स्थिति और क्या हो सकती है कि फिजिसियन डॉक्टर को सर्जरी या प्लास्टर करना पड़ता है। कुल मिला कर इस अस्पताल में मात्र तीन डॉक्टर हैं। जिनके कंधों पर पूरे अस्पताल का जिम्मा है। अस्पताल के ओपीडी रजिस्टर में दर्ज रोगियों का आंकड़ा प्रतिदिन दो सौ के करीब है। दो सौ मरीजों को तीन डॉक्टर देखते हैं, उसमें भी एक डॉक्टर को सभी प्रकार के मरीजों का इलाज करना होता है। पुरौलावासी राकेश असवाल कहते हैं कि पिछले चुनाव में विधायक ने स्वास्थ्य संबंधी सभी समस्याओं को दूर करने की बात कही थी। पहले के विधायक ने भी इस ओर ध्यान नहीं दिया था। स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हों इसलिए कांग्रेस को वोट दिया था। इस विधानसभा क्षेत्र में कई ऐसे गांव हैं, जहां से पुरौला आने में पूरे एक दिन लग जाते हैं। यहां आकर मरीजों को चिकित्सा के बदले रेफर लेटर मिलता है।
अधिकतर ग्राम सभा में प्राथमिक स्कूल हैं। जो सर्व शिक्षा अभियान के तहत खोले गए हैं लेकिन ये सिर्फ भवन के रूप में हैं। इस क्षेत्र के आधा दर्जन से अधिक प्राथमिक स्कूलों में एक भी शिक्षक नियुक्त नहीं है। नतीजा स्कूल में ताला लटका दिया गया है। ऐसा ही एक प्राथमिक स्कूल पवाणी गांव में है। पवाणी गांव के
प्राथमिक स्कूल में कभी ५० से ज्यादा बच्चे पढ़ाई करते थे। आज उस स्कूल में ताला लटका है। क्योंकि स्कूल के एक मात्र शिक्षक का तबादला हो गया है। अब उन ५० बच्चों का भविष्य अंधकार में डूब गया। पवाणी गांव के अलावा मोरी तहसील में ही गंगार, पोसला आदि ऐसे गांव हैं, वहां के स्कूलों में आज भी ताला लटक रहा है। पवाणी गांव के बृजपाल भंडारी कहते हैं कि गांव का स्कूल बहुत पुराना है। पहले यहां दूर-दराज गांव के बच्चे भी आते थे। कई जगह स्कूल खुल जाने के कारण बच्चे थोड़े कम हुए थे फिर भी ५० से ज्यादा बच्चे यहां थे लेकिन पिछले साल ही यहां के शिक्षक का तबादला हो गया तब से कोई शिक्षक नहीं आए है। इस कारण गांव के बच्चे दूसरे स्कूल में जाने लगे। कुछ ने स्कूल जाना ही छोड़ दिया। विधायक को इसकी जानकारी है लेकिन वे इसके लिए सीधे-सीधे सरकार को दोषी ठहराते हैं। इसके ठीक उलट पुरौला तहसील में कई ऐसे स्कूल भी है जहां छात्र से ज्यादा शिक्षक हैं। शिक्षक की नियुक्ति बेशक शिक्षा विभाग करता हो लेकिन क्षेत्र का जनप्रतिनिधि होने के कारण विधायक किसी स्कूल में शिक्षक का तैनाती करा सकता है।
बावजूद इसके राजेश जुवांठा इसके लिए सरकार को दोषी ठहराते हैं।
देहरादून-यमनोत्री राष्ट्रीय राजमार्ग पर बसे मटियाली गांव में आवामन की कोई समस्या नहीं है लेकिन इस गांव में पिछले कई माह से पेयजल की आपूर्ति नहीं हो रही है। इस इलाके में पेयजल आपूर्ति करने वाली पाइप लाइन कई माह पूर्व टूट गई थी जिसके बाद उसकी मरम्मत नहीं हुई है। नतीजा ग्रामीणों को कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ता है। परिवार वाले और मवेशियों को पानी पिलाने के लिए बच्चों को भी पानी ढोना पड़ता है जिस कारण ये बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं।
आठवीं कक्षा का छात्र आनंद भी स्कूल से छुट्टी लेकर पानी भरने का काम करने लगा है। ताकि परिवार वाले और मवेशी पानी पी सकें। आनंद कहता है कि पिछले तीन महीने से गांव में पानी नहीं आ रहा है। द्घर में दादा-दादी रहते हैं। बूढ़े होने के कारण दूर से वे पानी नहीं ला सकते हैं। इसलिए मुझे पानी लाना पड़ता है। हर सप्ताह में दो दिन ही स्कूल जाते हैं। बाकी दिन पानी ढोते हैं। यही हाल नीरज का भी है। नीरज भी पानी ढोने के लिए स्कूल नहीं जाता है। पीने एवं अन्य कार्यों के लिए इन्हें पानी दो किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है।
पुरौला क्षेत्र की सबसे बड़ी खासियत इलाके के अधिकतर गांवों का सड़क मार्ग से जुड़ा होना है। तहसील का करीब ९९ फीसदी गांवों तक सड़क पहुंच चुकी है। यह सड़क पिछले कई वर्षों से बनी हैं। कुछ सड़क हाल के वर्षों में बनाई गई हैं। इसलिए पुरौला विधानसभा क्षेत्रवासियों को सड़क मार्ग की शिकायत नहीं है। हां, सड़कों का रख-रखाव और मरम्मत कार्य सही से नहीं होने के कारण टूटी हुई जरूर है लेकिन यहां के बहुत कम लोगों को पैदल गांव तक जाना पड़ता है। इसके पीछे क्षेत्र के लोगों का जागरूक होना बताया जाता है। साथ ही यह क्षेत्र काश्तकारों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। इलाके के नीचले हिस्से में नकदी फसलों की खेती होती है तो ऊपरी खेतों में सेब, अखरोट, आडू के बगान है। अच्छी पैदावर होने के कारण यहां के काश्तकार खुशहाल हैं। यही वजह है कि अधिकतर गांवों तक सड़क पहुंच गई है। इस इलाके से पलायन भी बहुत कम हुआ है। नौकरी करने वाले या फिर पढ़ाई के लिए क्षेत्र के लोगों ने गांव छोड़ा है अन्यथा यहां से पलायन बहुत कम हुआ है।
क्षेत्र के विधायक राजेश जुवांठा अपनी निधी से खर्च करने में आगे हैं। ये अपने हिस्से की ६० फीसदी निधी खर्च कर चुके हैं लेकिन इन पर आरोप है कि विधायक निधी से आवंटित कार्य के लिए खुलमखुला ३० फीसदी कमीशन लेते हैं। कमीशन के बाद ही काम ठेकेदार को दिया जाता है। पूर्व विधायक मालचन्द एवं स्थानीय लोग इस आरोप को सही बताते हैं। मालचन्द का कहना है कि मैं विरोधी नेता होने के कारण आरोप नहीं लगा रहा। कमीशन खोरी की बात बच्चा-बच्चा जानता है। दो साल पूर्व इन्होंने एक गांव में पक्की गली करने के लिए १० लाख रुपये अपनी निधी से दिए थे। उसके ठेकेदार ने भी इन पर ३० फीसदी कमीशन मांगने की बात कबूल की है।
पुरौला ब्लॉक प्रमुख लोकेन्द्र रावत कहते हैं कि विधायक जी हमेशा क्षेत्रवासियों के साथ खड़े रहे हैं। विपक्षी पार्टी की सरकार होने के बावजूद उन्होंने काम किए हैं। कुछ लोग नाराज हो सकते हैं लेकिन अधिकांश नहीं।
भाजपा नेता अमृत सिंह के मुताबिक यदि विधायक ने एक भी काम किया हो तो वे जनता को बताएं। प्रदेश सरकार ने कई योजनाएं पुरौला को दीं, जिस पर काम हुए हैं। विधायक ने कुछ नहीं किया।
राजेश जुवांठा लोगों के आरोप को नकारते हैं। उनका कहना है कि हमने स्वास्थ्य समस्याएं दूर करने के लिए कई बार मंत्री को पत्र लिखा लेकिन आश्वासन से आगे बात नहीं बढ़ी। यदि भाजपा को लगता है कि मैंने कुछ नहीं किया तो उनकी सरकार थी उन्हें यहां डॉक्टर नियुक्त करना चाहिए था। हमने आज तक ठेकेदार से कमीशन नहीं लिया। यहां तक कि निधि का भी शत- प्रतिशत काम करवाया है। जो कह रहे हैं कि क्षेत्र में कोई काम नहीं हुआ है वे भाजपा के कार्यकर्ता होंगे।

   
 
 
 
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सहज और सरल स्वभाव वाले प्रकाश पंत के कंधों पर कई भारी-भरकम मंत्रालय का भार
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