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अलीगढ़ और मथुरा में मुआवजे को लेकर आंदोलन कर रहे किसानों पर हुई पुलिस फायरिंग के बाद तनाव बढ़ गया है। इसकी गूंज संसद तक सुनाई दी और कई दिनों तक कार्यवाही बाधित हुई। सरकार की पेशकश को किसानों ने ठुकरा दिया। वे अपनी मांगों पर अड़े हैं। अब आने वाला समय ही बतायेगा कि उन्हें न्याय मिलेगा या नहीं |
किसानों की जमीन कभी सड़क बनाने तो कभी फैक्ट्री बनाने के नाम पर ले ली जाती है। सरकार पुरखों की जमीन इनसे ले लेती है, लेकिन उचित मुआवजा मांगने पर गोलियां बरसायी जाती हैं। इसके उदाहरण उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, मथुरा, अलीगढ़ आदि स्थानों पर देखने को मिले हैं। यहां किसानों का संद्घर्ष चला और कुछ स्थानों पर चल रहा है। किसानों की नियती बन गई है कि पुरखों की जमीन को वह कौड़ियों के भाव सरकार को देने पर मजबूर हो जाते हैं। सरकार यहां बिचौलिये का काम करती है। किसानों से सस्ती जमीन लेकर बड़े-बड़े बिल्डरों और कंपनियों को दे देती है। ऐसा क्यों नहीं होता कि निर्माण कंपनी या बिल्डर सीधे किसान से जमीन का भाव तय करें। क्या एक चुनी हुई सरकार एजेंट की भूमिका निभाने के लिए ही कुर्सी पर बैठी है?
पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ और मथुरा के किसानों का उग्र होता विरोध उनके दर्द और ठगे होने की दास्तान कहता है। उनकी दी हुई जमीन पर यमुना एक्सप्रेस वे बनाया जा रहा है। लेकिन उन्हें उचित मुआवजा नहीं मिला। अलीगढ़, मथुरा, और टप्पल के किसानों के साथ भी वही हुआ जो पूर्व में ग्रेटर नोएडा के द्घोड़ी बछेड़ा के लोगों के साथ हुआ था। द्घोड़ी बछेड़ा में ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे लोगों पर की गई पुलिस की अंधाधुंध गोलीबारी में मारे गये पांच किसानों का जख्म अभी सूखा भी नहीं था कि अलीगढ़ में यह हादसा हो गया। ६४वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर तीन किसान प्रदर्शन के दौरान पुलिस की गोलियों का निशाना बने और हमेशा के लिए इस दुनिया से चले गये। वहां प्रदर्शन रुकने का नाम नहीं ले रहा था। इसी दौरान प्रदर्शन कर रहे किसानों पर पुलिस ने फिर गोलियां चलायीं। ये किसान ग्रेटर नोएडा से आगरा तक जाने वाले ताज एक्सप्रेस हाइवे के लिए ली जा रही अपनी जमीनों का उचित मुआवजा मांग रहे थे। प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती के गृह जनपद गौतमबुद्ध नगर की सीमा से सटे अलीगढ़ जिले के किसान भी ग्रेटर नोएडा के समान मुआवजा मांग रहे थे, उन्हें मुआवजा के बदले मौत मिली।
अलीगढ़ के किसानों का कहना है कि जब उनके खेत की मेढ़ से जुड़े खेत का मुआवजा यमुना प्राधिकरण ८८० रुपया प्रति वर्ग मीटर दे रहा है तो उनको उसका आधा क्यों दिया जा रहा है। गौरतलब है कि मायावती के गृह जनपद गौतमबुद्ध नगर के किसानों को ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण आठ लाख ८० हजार रुपया प्रति बीद्घा मुआवजा दे रहा है जबकि उसकी सीमा से सटे अलीगढ़ के किसानों को महज चार लाख ४९ हजार रुपये प्रति बीद्घा मुआवजा दिया जा रहा है। यहां के किसान इसी असमान मुआवजे का विरोध कर रहे थे। जिन पर पुलिस ने कहर बरपाया। प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने अलीगढ़ में किसानों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुए हिंसक वारदातों को गंभीरता से लेते हुए न्यायिक जांच के आदेश दिए हैं। हिंसक द्घटनाओं में मारे गए लोगों को ताज यमुना प्राधिकरण ने पांच-पांच लाख रुपये मुआवजा देने की द्घोषणा की। किसानों पर हुई फायरिंग में मौत के बाद अलीगढ़ के जिलाधिकारी, कमिश्नर, एसएसपी और डीआईजी को हटा दिया गया। इसके बावजूद किसानों का गुस्सा थमा नहीं है।
इतना ही नहीं किसानों के आंदोलन को ठंडा करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने मुआवजा में मामूली बढ़ोतरी कर दी है। इसे बढ़ाकर ५७० रुपये प्रति वर्ग मीटर यानी पांच लाख ७० हजार रुपये बीद्घा कर दिया गया है। इसके अलावा सरकार की ओर से मृतकों के परिजनों को १०-१० लाख तथा द्घायलों को दो-दो लाख रुपये की आर्थिक सहायता देने की द्घोषणा की गई।
उल्लेखनीय है कि ग्रेटर नोएडा से आगरा तक १७० किलोमीटर लंबा ताज एक्सप्रेस वे बनाया जा रहा है। जिसे जेपी गु्रप बना रहा है। आठ लेन चौड़े इस एक्सप्रेस वे को बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार जमीन खरीदकर जेपी गु्रप को देगी। इसके चलते सरकार ने नोएडा और ग्रेटर नोएडा की तर्ज पर ही एक यमुना प्राधिकरण का गठन किया है। आठ लेन चौड़े ताज एक्सप्रेस वे को बनाने के एवज में जेपी ग्रुप को सरकार रोड के दोनों ओर ५०० मीटर तक ही जमीन निःशुल्क उपलब्ध कराएगी। जेपी इस जमीन को व्यावसायिक रूप में इस्तेमाल करेगा। जिसमें यमुना सिटी के साथ ही बड़े-बड़े माल्स और होटल बनाए जायेंगे। किसानों का गुस्सा इसी बात को लेकर है। यहां के छातंगा गांव के निवासी राजवीर सिंह चौधरी कहते हैं कि जमीन से हमारी रोजी रोटी चलती है जो सस्ते दामों में जा रही है। जबकि उस जमीन का व्यावसायिक उपयोग किया जा रहा है। हमारी जिस जमीन का अभी जेपी ग्रुप ने हमें मुआवजा तक नहीं दिया उस पर बिल्डर्स स्कीम निकालकर एक-एक फ्लेट को ४० से ५० लाख रुपये में बेच रहे हैं। यह हमारे साथ नाइंसाफी नहीं तो क्या है?
यहां यह भी बताना उचित होगा कि यमुना प्राधिकरण ने एक अप्रैल २०१० से ताज एक्सप्रेस वे के लिए ली जानेवाली जमीन के मुआवजे की दरें लागू की हैं। एक ही एक्सप्रेस वे के लिए अधिग्रहण की जा रही जमीनों का प्रत्येक जिले में अलग-अलग मुआवजा दर है। नई दरों के अनुसार गौतमबुद्ध नगर में यह ८८० है तो अलीगढ़ में ४४९ है। इसी तरह जनपद महा मायानगर में ४०८ तो मथुरा में ४२३ है जबकि आगरा में यह दर ४५९ रुपये प्रति वर्ग मीटर है। अकेले गौतमबुद्ध नगर की सीमा में ही ताज एक्सप्रेस वे के लिए ५४ हजार हेक्टेयर जमीन अधिगृहीत की जानी है। अलीगढ़ के किसानों को कीमतों में यह असमानता मंजूर नहीं थी। इसके चलते ही वे पिछले डेढ़ साल से यह मांग करते आ रहे थे कि उन्हें भी गौतमबुद्ध नगर के समान मुआवजा दिलाया जाए। किसानों का तर्क है कि जब प्राधिकरण एक है तो मुआवजे में दोगुने का अंतर क्यों? यह अंतर वे किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेंगे।
उल्लेखनीय है कि नोएडा विकास प्राधिकरण का क्षेत्रफल १६४१६ हेक्टेयर है जबकि ग्रेटर नोएडा विकास प्राधिकरण ८५००० हेक्टेयर जमीन पर बना रहा है। वहीं इससे अलग यमुना प्राधिकरण के पास २ ़५७ लाख हेक्टेयर जमीन प्रस्तावित है। इस तरह देखा जाय तो यमुना प्राधिकरण एशिया का सबसे बड़ा प्राधिकरण है। यमुना प्राधिकरण से करीब २० लाख लोग प्रभावित होंगे। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक इसकी लंबाई १७० किलोमीटर है। आठ लेन एक्सप्रेस वे वाले क्षेत्र में करीब १०१९ गांव अधिग्रहण सीमा में आते हैं। इस तरह से करीब एक्सप्रेस वे के लिए ५०,००० किसानों से जमीन ली जानी है। ग्रेटर नोएडा से आगरा तक महज ९० मिनट का समय का दावा करने वाली इसकी निर्माता कंपनी जेपी गु्रप इसके निर्माण पर ९९००० करोड़ खर्च करेगी। एक्सप्रेस वे के दोनों ओर पांच बड़ी टाउनशिप, सेज और इंडस्ट्रियल एरिया विकसित किया जायेगा।
अलीगढ़ में किसानों की मौत पर राजनीति गरमा गई है। इस मामले पर संसद में हंगामा हुआ। इसके बाद केन्द्र सरकार ने इसके लिए अलग कानून बनाने की बात कही है। वहीं उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने भी कहा कि किसानों की इच्छा के विरुद्ध जमीन नहीं ली जायेगी। वहीं चौगान में संद्घर्ष समिति के सदस्यों और कैबिनेट सचिव की पेशकश को ठुकरा दिया गया है। कैबिनेट सचिव ने ५८० रुपये प्रति वर्ग मीटर की दर से मुआवजा देने का प्रस्ताव रखा था। वहीं समाजवादी पार्टी ने भी सरकार के विरोध में आंदोलन कर रहे किसानों का साथ देने का मन बना लिया है।
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