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कुमाऊं मंडल के कपकोट तहसील स्थित सुमगढ़ गांव वालों के लिए १८ अगस्त को आसमान से तबाही बरसी। सुबह आठ बजे इस गांव में बादल फटने से एक ही स्कूल के १८ बच्चे मौत के मुंह में समा गए। पानी की तेज धार में बह रहे दो शिक्षकों और आधा दर्जन बच्चों को किसी प्रकार बचाया जा सका। आपदा प्रबंधन टीम और पुलिस के जवान द्घंटों बाद द्घटनास्थल पर पहुंचे। इस द्घटना ने एक बार फिर से आपदा प्रबंधन विभाग को कठद्घरे में खड़ा कर दिया है।
पिछले एक सप्ताह से प्रदेश के पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश हो रही है। जिस कारण इन दिनों यहां बादल फटने और भूस्खलन की द्घटना आम हो गई है। इससे फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है लेकिन १८ अगस्त की द्घटना ने आपदा प्रबंधन में जुटे विशेषज्ञों को भी सोचने के लिए मजबूर कर दिया। आखिर इस प्रकार की आपदा से प्रदेशवासियों को कैसे निजात दिलाया जा सके। अभी आपदा से निजात दिलाना तो दूर समय पर राहत दल भी नहीं पहुंच पाता है। हर दिन की तरह १८ अगस्त की अहले सुबह सुमगढ़, बांसे, तप्तकुंड और सौंग गांव के २५ बच्चे पढ़ने के लिए सुमगढ़ स्थित प्राथमिक सरस्वती शिशु मंदिर पहुंचे। मां सरस्वती की वंदना कर ये बच्चे अपने-अपने कक्षा में चले गए। तभी मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। बारिश इतनी तेज थी कि स्कूल के ऊपर का पहाड़ दरक कर स्कूल भवन पर गिरने लगा। तबाही का यह मंजर इतनी तेज गति से आया कि स्कूल की बिल्ंिडग को मलबे में तब्दील होने में समय नहीं लगा। पढ़ाई कर रहे बच्चों को भागने तक का मौका नहीं मिला। आस-पास के लोगों को कुछ समझ में आता इससे पहले विद्यालय भवन मलवे में तब्दील हो गया। गांव वालों ने मलबे को हटाना शुरू किया था कि कुछ लोगों ने स्कूल के शिक्षक और कुछ बच्चों को पानी में बहते देखा। तब कुछ ग्रामीणों ने उन लोगों को पानी से बाहर निकाला।
सुमगढ़ गांव के कैलाश जोशी ने बताया कि कई लोगों के आंखों के सामने यह द्घटना हुई लेकिन इस को देखते रहने के अलावा लोग कुछ न कर सके। पहाड़ गिरना बंद होने के बाद बह रहे बच्चों को निकाला गया। उन्होंने आगे कहा कि उस वक्त किसी भी मोबाइल कंपनी का नेटवर्क काम नहीं कर रहा था। जिस कारण पुलिस को सूचना पहुंचाने में देरी हुई। गांव वाले खुद बचाव कार्य में जुट गए। करीब आठ द्घंटे बाद पुलिस का बचाव दल द्घटनास्थल पर पहुंचा। कपकोट थाना के प्रभारी चंचल शर्मा ने बताया कि करीब साढ़े दस बजे पुलिस के पास फोन आया। द्घटना की सूचना मिलते ही पुलिस की टीम, पीएसी, फायर ब्रिगेड सहित आपदा राहत दल के जवान सुमगढ़ के लिए रवाना हो गए। कुछ दूरी तय करने के बाद सुमगढ़ गांव जाने वाली सड़क को बंद पाया गया। जिसके बाद पुलिस टीम और आपदा प्रबंधन दल के जवान सात किलोमीटर पैदल दूरी तय कर द्घटनास्थल पर पहुंचे और राहत कार्य में जुट गये।
कपकोट तहसील सहित पूरे प्रदेश में बारिश से तबाही मची हुई है। यहां की अधिकतर सड़कें टूट गई हैं। उत्तरकाशी, पौड़ी, चमोली सहित सभी जिलों में कई एकड़ खेत बह गए हैं। सुमगढ़ गांव पिंगारी ग्लेशियर मार्ग पर पड़ता है। यहां के सरस्वती शिशु मंदिर में पांचवीं तक की पढ़ाई होती है। विद्यालय भवन सुमगढ़ और सोंग गांव को जोड़ने वाले पुल के पास है। जिला मुख्यालय से करीब ७४ किलोमीटर दूर इस गांव में लगभग सभी सुविधाएं थी। लेकिन कई दिनों से टेलीफोन और लाइट व्यवस्था ठप पड़ी है। यही स्थित पूरे प्रदेश की है। फिर भी सरकार कागजों पर आपदा प्रबंधन टीम बनाकर खुश हो रही है। यह तहसील एवं थाना स्तर से आगे नहीं बढ़ पाई है। जिस कारण आपदा के दौरान बचाव कार्य न होने के कारण कई मौत होती हैं। सुमगढ़ द्घटना में भी ऐसा ही हुआ। यदि इस टीम का गठन ग्राम सभा स्तर पर किया गया होता तो शायद कुछ बच्चों की जान बचाई जा सकती थी। सरकार कई बार इस प्रकार के मामले पर कहती रही है कि आपदा प्रबंधन टीम अकेले ऐसी द्घटनाओं से नहीं निपट सकती। इसके लिए ग्रामीणों को सहयोग करना होगा। सरकार के इस बयान पर कई समाजसेवी संस्थानों और बुद्धिजीवियों का कहना है कि सरकार आपदा प्रबंधन के तहत गांव के लोगों को प्रशिक्षित क्यों नहीं करती? स्थानीय लोग अपने इलाके के भौगोलिक परिस्थितियों से पूरी तरह वाकिफ होते हैं। वे ऐसे वक्त पर ज्यादा कारगार ढंग से बचाव कार्य कर सकते हैं। ऐसे भी प्रत्येक द्घटनास्थल पर सर्वप्रथम स्थानीय लोग ही पहुंच कर बचाव कार्य शुरू करते हैं। आपदा प्रबंधन राज्य मंत्री खजानदास कहते हैं, 'हमने आपदा प्रबंधन टीम बनाई है। इसे विस्तार दिया जा रहा है। हमें उम्मीद है इसे गांव तक पहुंचा देंगे।'
कपकोट क्षेत्र पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान राज्यसभा सांसद भगत सिंह कोश्यारी का विधानसभा क्षेत्र है। द्घटना के बाद पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण द्घटना है। सरकार हर सम्भव मदद कर रही है। बारिश के समय बादल फटने या भूस्खलन की सबसे ज्यादा द्घटना उत्तराखण्ड में होती है। आपदा टीम को मजबूत करने के लिए केन्द्र को मदद करनी चाहिए। ताकि प्रदेश सरकार इस टीम को सभी गांव में गठित कर सके। प्रदेश सरकार ने मृतकों के परिजनों को ५०-५० हजार रुपये देने की द्घोषणा की है। राज्य पुलिस के अलावा आईटीबीपी के १५० जवान को मौके पर भेजा गया। जो बच्चों के शव निकालने से लेकर बचाव कार्य में जुटे रहे।
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