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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
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ऋषिकेश में मानकों के विपरीत भवन निर्माण को हरिद्वार विकास प्राधिकरण नोटिस तो देता है पर इस दिशा में पहल के नाम पर मौन हो जाता है। यहां प्राइवेट के साथ कई सरकारी भवनों के खिलाफ भी नोटिस जारी हुए हैं लेकिन किसी किस्म की कार्रवाई होती कहीं नहीं दिखती
 
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  टाटा के 'रतन'
 
रतन टाटा के रिटायर होने से पहले टाटा ग्रुप की शान में चार चांद लग गया है। टाटा ग्रुप भारत की सबसे अमीर कंपनी बन गई है। उसकी मार्केट वेल्यू ३,७१,००० करोड़ रुपये हो गयी। मुकेश अंबानी दूसरे और अनिल चौथे नंबर पर हैं। टाटा ग्रुप के बाद मुकेश अंबानी का रिलायंस इंडस्ट्रीज लिमिटेड है। वैसे अगर

अंबानी बधुओं के मार्केट वेल्यू को मिला कर देखा जाए, तो टाटा को दूसरे स्थान पर रखना पड़ेगा। हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने रतन टाटा को 'दशक के उद्योगपति' के सम्मान से सम्मानित किया है। टाटा ने हमेशा राष्ट्र को प्राथमिकता दी और व्यापार को विश्वास तथा मूल्यों से जोडे़ रखा। उन्होंने कहा कि टाटा समूह हर भारतीय के जीवन को किसी न किसी रूप में छूता है। वैसे रतन टाटा अपना वायदा पूरा करने के लिए जाने जाते हैं। टाटा समूह की मूल कंपनी के प्रमुख रतन टाटा ने १५ अगस्त से ताज हेरिटेज विंग को दोबारा खोले जाने की औपचारिक द्घोषणा करते हुए कहा कि यह उनके लिए विशेष अवसर है। अत्याधुनिक मल्टी मीडिया प्रणालियों से लैस और एक आपातकालीन निकास मार्ग से होटल के इस विंग की शान-ओ-शौकत और सुविधाएं बढ़ गई हैं। आजादी की वर्षगांठ से दो दिन पहले इस ऐतिहासिक होटल को फिर से खोलने की द्घोषणा करते हुए टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा ने इसे 'सम्मानित बुजुर्ग महिला' बताया, जो बुरी तरह क्षतिग्रस्त होने के बाद फिर से खड़ी हो गई है। अट्ठाइस दिसंबर १९३७ को मुंबई में जन्मे रतन टाटा ने बचपन से ही चुनौतियों का सामना किया है। रतन जब सात साल के थे तब उनके माता-पिता अलग हो गए और उन्हें उनकी दादी ने पाल-पोस कर बड़ा किया। मुंबई में स्कूल की पढ़ाई के बाद उन्होंने अमेरिका का रुख किया और कारनेल यूनिवर्सिटी से आर्किटेक्चर में इंजीनियरिंग की। १९८१ में रतन टाटा को टाटा इंडस्ट्रीज का चेयरमैन चुना गया और उनके नेतृत्व में कंपनी ने कई हाईटेक उद्योगों में हाथ डाला। इसके बाद १९९१ में रतन टाटा को टाटा ग्रुप का चेयरमैन बनाया गया। १६ साल के भीतर ही रतन ने कंपनी का कायाकल्प कर दिया। टाटा मोटर्स और टीसीएस की न्यूयार्क स्टॉक एक्सचेंज में लिस्टिंग कराई। रतन टाटा की अध्यक्षता में कोरस समूह का टाटा कंपनी में सफलतापूर्वक अधिग्रहण किया गया, जो एक एंग्लो-डच एल्यूमीनियम और इस्पात निर्माता है। इस अधिग्रहण के साथ रतन टाटा भारतीय व्यापार जगत में एक प्रतिष्ठित व्यक्ति बन गये। अपनी पारखी नजर और कारोबारी समझ के बलबूते २००० में टाटा ने दुनिया की सबसे बड़ी चाय निर्माता कंपनी टेटले का अधिग्रहण किया। वर्तमान में वे टाटा समूह के अध्यक्ष हैं, जो भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक समूह है। रतन टाटा ने एक और सपना देखा और वह था लखटकिया कार बनाने का। पूरी दुनिया यही कहती रही कि इस कीमत पर इंजन से चलने वाली कार बनाना संभव नहीं है। नई दिल्ली के आटो एक्सपो में जनवरी, २००८ को इस कार को सबके सामने लाकर अपने सपने को उन्होंने पूरा किया। इधर रतन टाटा के उत्तराधिकारी की तलाश की जा रही है। वहीं टाटा समूह के चेयरमैन रतन टाटा का कहना है कि जरूरी नहीं है कि उनका उत्तराधिकारी पारसी ही हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी कुर्सी संभालने वाला व्यक्ति एक अच्छा इंसान होगा, वह न पारसी विरोधी होगा न पारसी समर्थक। रतन टाटा पिछले २० वर्षों से समूह का अध्यक्ष पद संभाल रहे हैं। समिति की नीति के तहत सेवानिवृत्ति की उम्र ७५ वर्ष है और रतन टाटा २०१२ में उसे पूरा कर रहे हैं। इसलिए अब रतन टाटा की जगह नए उत्तराधिकारी की तलाश हो रही है। टाटा ग्रुप अपनी ईमानदारी और ऊंचे सिद्धातों के लिए जाना जाता है। एकाकी जिंदगी बिताने वाले रतन टाटा बैचलर हैं और मुंबई के कोलाबा में रहते हैं। वह कभी -कभार ही पार्टियों में नजर आते हैं। वह फार्च्यून मैगजीन की दुनिया के पच्चीस सबसे ताकतवर उद्योगपति की लिस्ट में शामिल हैं।

 
राज दरबार
 
गहलोत की कूटनीति
 
राजस्थान में कांग्रेस सरकार को सत्ता में आए करीब डेढ़ साल बीत गए। लेकिन कई कांगे्रसियों के सपने अभी तक पूरे नहीं हो पाए हैं। न जाने और कितना इंतजार करवायेंगे मुख्यमंत्री अशोक गहलोत। लालबत्ती की चाह नेताओं में साफ देखी जा सकती है। गहलोत बार-बार नेताओं को ढाड़स बंआँाा रहे हैं। शर्त रख दी कि उन्हें निकाय चुनाव में सफलता हासिल करनी होगी। मतलब साफ है जिस इलाके में पार्टी की जीत होगी वहीं के लोग लालबत्ती के हकदार होंगे। दावेदार अब आलाकमान से गुहार लगाने लगे हैं। सूबेदार सीपी जोशी इस मामले में बचाव की मुद्रा में दिख रहे हैं। लगातार दूसरी बार किसी के हाथ कुछ नहीं लगा तो क्या फायदा। तीन साल बचे हैं दावेदार सैकड़ों की संख्या में हैं। सभी अपने-अपने बायोडाटा के साथ दिल्ली और जयपुर की परिक्रमा करने में लगे हैं। अब देखना ये है कि कितनों के सपने पूरे हो पाते हैं।
 

बेपरवाह बहनजी

 
वैसे बहन मायावती करती वही है जो उनकी इच्छा होती है। पुलिया बनवानी हो या पार्क एक बार ठान लिया तो क्या मजाल कि कोई उन्हें रोक ले। विपक्ष पहले से ही उन पर राजकोष के दुरुपयोग का आरोप लगाता रहा है। लेकिन इस बार अतिरिक्त मांग पूरक बजट में है। ४९० करोड़ का। ऐसे में सियासी तापमान न बढ़े ऐसा भला कैसे हो सकता है। सरकार की साख जाए तो जाए पर मायावती का इरादा बदल जाए
ऐसा संभव नहीं है। अदालत का भी खौफ नहीं है मायावती को। सूबे के एक इलाके में सूखा है तो पूर्वांचल में दिमागी बुखार का प्रकोप। अस्पतालों की व्यवस्था किसी सी छुपी नहीं है। ४९० करोड़ की रकम पत्थरों के बजाए इंसानों पर खर्च होती तो राज्य की जनता उन्हें दुआएं देती। अब विपक्ष को बैठे बिठाए नया मुद्दा हाथ लग गया है। पर बहनजी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। भले जो हो मायावती पत्थर का शहर बसाने में विशेष रुचि ले रही हैं।
 
येचुरी की हाजिरजवाबी
 

माकपा नेता सीताराम येचुरी की प्रतिभा का लोहा सभी मानते हैं। उन्होंने विजयवाड़ा में आयोजित पार्टी के सम्मेलन में इसका बखूबी परिचय दिया। वैसे दिल्ली में माकपा का कोई प्रवक्ता नहीं है। इसलिए इसकी जिम्मेदारी अक्सर येचुरी के कंआँाों पर रहती है। लेकिन उन्होंने विजयवाड़ा के संवाददाता सम्मेलन में कमाल कर दिया। मीडियाकर्मियों ने जब लालगढ़ से संबंआिँात सवाल पूछे तो येचुरी ने बांग्ला में जवाब दिया।

इतना ही नहीं तेलंगाना पर पूछे गये प्रश्न का जवाब तेलुगु में दिया। और जब अच्युतानंद की बात आयी तो मलयालम में जवाब देकर सबको लाजवाब कर दिया। यही नहीं पत्रकारों के प्रश्नों का जवाब अंग्रेजी और हिन्दी में खूब दिया। ऐसे बहुत कम राजनेता हैं जिन्हें कई भाषाओं का ज्ञान है। वैसे येचुरी इससे पहले भी अपनी हाजिरजवाबी का कई नमूना पेश कर चुके हैं।

 
योग गुरु बने एंबेसडर
 
राजनीति हो या समाज सेवा बाबा रामदेव का दखल सभी जगहों पर है। वैसे योग गुरु रामदेव का कारोबार दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रहा है। परिवारवाद का विरोआँा करने वाले बाबा के सभी कारोबार की देखरेख उनका परिवार ही कर रहा है। या यूं कहें कि बाबा ने सारी जिम्मेदारियां अपनों के ही कंआँाों पर डाल रखी है। वैसे बाबा की माया से कोई भी अछूता नहीं है। इन दिनों केन्द्रीय मंत्री सुबोआँा कांत सहाय बाबा पर कुछ ज्यादा ही मेहरबान हैं। उनके
लिए मंत्री जी हरिद्वार और झारखंड में मेगाफूड पार्क बनवा रहे हैं। इसका जिम्मा है बाबा के भाई राम भरत पर। कभी पुराने सहयोगी रहे बालकृष्ण फार्मेसी कर्ताआँार्ता हैं। वैसे बाबा मंच से अपने प्रोडट्क्स का प्रचार भी करते हैं। जड़ी बूटी को कौन पूछे, क्रीम, साबुन, पाउडर, मंजन, तेल भी बेच रहे हैं। बाबा इन दिनों अपने ब्रांड के खुद ही ब्रांड एंबेसडर भी हैं। वैसे राजनीति के अखाड़े में भी कूदने की तैयारी कर रहे हैं।
 
 
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शहर के सुनियोजित विकास के लिए बने हरिद्वार विकास प्राधिकरण को देखकर लगता है कि अब यह अप्रासांगिक हो गया है। प्राधिकरण में ध्वस्तीकरण एवं काम रोको आदेश की फाइलों का अम्बार लगा है। अब उन पर धूल की परत
 
गांधीजी मुझे इसीलिए याद आए। उनके द्वारा संपादित समाचार पत्रों का प्रसार मात्र कुछ हजार होता था लेकिन उनका
 
रतन टाटा के रिटायर होने से पहले टाटा ग्रुप की शान में चार चांद लग गया है। टाटा ग्रुप भारत की सबसे अमीर कंपनी बन गई है।
 
बिहार विधानसभा चुनाव होने में चंद महीने रह गये हैं। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी है।
 
उत्तराखण्ड गठन के बाद से ही प्रदेश को अमीरजादों की ऐशगाह बनने से रोकने और पहाड़ियों को उनकी ही जमीन से बेदखल करने की प्रवृति पर अंकुश लगाने
कुमाऊं मंडल के कपकोट तहसील स्थित सुमगढ़ गांव वालों के लिए १८ अगस्त को आसमान से तबाही बरसी। सुबह आठ बजे इस गांव में बादल फटने से एक
ग्रामीण क्षेत्र में खोले गए सहकारी बैंक एवं समितियां उत्तराखण्ड में किसानों को लाभ देने के बजाय राजनेताओं के
 
लगभग दो साल की जद्दोजहद के बाद उत्तराखण्ड सरकार ने अपनी बहुप्रतिक्षित वॉल्वो बस सेवा शुरू कर ही दी। यह बसें
रूस के जंगलों में लगी आग दुनियाभर के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। आग से अब तक करीब पचास से अधिक लोगों की जानें जा
 
हिन्दी में लद्घु पत्रिकाओं की संख्या अब सैकड़ों की सीमा पार कर गई है। मेट्रो नगरों की तो बात ही क्या मंझले और
 
बुढ़िया द्घर को बड़ा साफ रखा करती थी। इसलिये सत्या और सव्यसाची को दो जोड़ी चप्पल रखने पड़ते थे।
 
धर्म जीना सिखाता है। सच्चा धर्मगुरु जीवन को सुख-शांति और रोशनी से भर देता है। धर्म को दुकान बनाने वाले बेशुमार
 
कॉमनवेल्थ गेम्स के होने में कुछ ही दिन बाकी हैं। हमारे खिलाड़ी अपने- अपने खेल की तैयारियों में जुटे हुए हैं।
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