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पहले पर्दे पर कई जोड़ियां मशहूर हुईं। अशोक कुमार-देविका रानी, राज कपूर-नर्गिस, देवानंद-सुरैया, दिलीप कुमार-मधुबाला, गुरु दत्त-वहीदा रहमान, अमिताभ-रेखा, शाहरुख-काजोल आदि इसकी लंबी फेहरिस्त है। लेकिन नब्बे के दशक के पश्चात यानी शाहरुख- |
पहले पर्दे पर कई जोड़ियां मशहूर हुईं। अशोक कुमार-देविका रानी, राज कपूर-नर्गिस, देवानंद-सुरैया, दिलीप कुमार-मधुबाला, गुरु दत्त-वहीदा रहमान, अमिताभ-रेखा, शाहरुख-काजोल आदि इसकी लंबी फेहरिस्त है। लेकिन नब्बे के दशक के पश्चात यानी शाहरुख-काजोल के बाद ऐसी जोड़ी फिर से बनती नहीं दिखाई दे रही। हालांकि अक्षय कुमार-कैटरीना कैफ, सैफ अली खान-करीना कपूर और हालिया रणवीर कपूर-सोनम की जोड़ी मीडिया में चर्चा पा रही है लेकिन यह समय के हिसाब से बहुत छोटी-छोटी जोड़ियां हैं। इसकी तुलना अगर राज कपूर-नर्गिस, दिलीप कुमार-मधुबाला या अमिताभ-रेखा, संजय दत्त-माधुरी दीक्षित की जोड़ी से करें तो यह बौना साबित होती है।
पहले के दर्शकों के जेहन में इन जोड़ियों को लेकर स्पष्ट फ्रेम बन गए थे। लोग रेखा को अमिताभ के साथ, नर्गिस को राज कपूर के साथ और वहीदा को गुरु दत्त के साथ ही देखना चाहते थे। दरअसल, पर्दे के बाहर असल जिंदगी में भी ये एक-दूसरे से प्यार करते थे और इसके किस्से अखबारों में छपते थे। जिसे लोग बड़े चाव से पढ़ते-देखते थे। आज की जोड़ी में सैफ-करीना की जोड़ी हालांकि असल जिंदगी में भी प्यार करते हैं लेकिन उनकी फिल्में उस हिसाब से हिट नहीं हुईं, जिस तरह से पुरानी जोड़ियों की। 'रेस' या 'कुर्बान' का हाल देखा जा सकता है। यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि पर्दे की हिट जोड़ी को वास्तविक जिंदगी में भी प्यार करना ही चाहिए। पर्दे पर जोड़ी बनाने के लिए यह कहीं से भी जरूरी नहीं है। वर्ना संजय दत्त-माधुरी दीक्षित, अनिल कपूर या ऋषि कपूर के साथ श्रीदेवी की जोड़ी या शाहरुख खान-काजोल की जोड़ी हिट नहीं होती। ये जोड़ियां रुपहले पर्दे पर ही दिखाई देती हैं, निजी जिंदगी से इसका कुछ लेना-देना नहीं है। गौर से देखा जाए तो एक तरह से फिल्मी पेयर की परंपरा शाहरुख खान-काजोल के बाद धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती है।
इसके कई कारण हो सकते हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण यह कि अब अधिकतर फिल्मों के विषय तात्कालिक द्घटनाओं पर केंद्रित हैं। लव-स्टोरी की तरफ निर्माता-निर्देशक कम ध्यान दे रहे हैं। हालांकि इस दौरान प्रेम-कथा पर आधारित फिल्में सुपरहिट रही हैं लेकिन इसकी संख्या कम है। 'राजनीति', 'रेड अलर्ट', 'लमहा', 'वेडनेस डे', 'पीपली लाइव', 'तारे जमीं पर' आदि के विषय प्रेम कथा से दूर बिल्कुल अलग-अलग हैं। जिसमें जोड़ी का रहना ज्यादा मायने नहीं रखता।
इधर पिछले पांच-सात वर्षों से प्रियदर्शन की फिल्में भी खूब आई हैं। उनकी सभी फिल्में हास्य-विनोद से परिपूर्ण होती हैं। कहने का मतलब यह हास्य-विनोद फिल्मों का भी दौर है। उदाहरणार्थ 'हलचल', 'हेराफेरी', 'मालामाल विकली'आदि। इन सभी फिल्मों में जोड़ी से ज्यादा महत्वपूर्ण कॉमेडी है।
इस बीच दर्शकों का नजरिया भी बदला है। अब दर्शक किसी भी नायिका को किसी भी हीरो के साथ देखने के आदी हो गए हैं। इसी तरह कई बड़े स्टार ऐसे हैं, जिन्होंने बहुत कम बार एक ही अभिनेत्रियों को अलग-अलग फिल्मों में दोहराया है। इसका अच्छा उदाहरण आमिर खान है। उनकी फिल्म 'लगान' में ग्रेसी सिंह, 'गजनी' में आसीन, 'फना' में काजोल, थ्री इडियट्स में करीना हैं। यानी वे नायिकाओं को दोहरा नहीं रहे। दर्शकों को भी यह अच्छा लग रहा है। ये सभी फिल्में हिट हैं।
उधर अब बॉलीवुड में हॉलीवुड नायिकाओं का धीरे-धीरे पदार्पण भी हो रहा है। पहले 'रंग दे बसंती' में एलिस पेटन दिखी तो इधर 'काइट्स' में बारबरा मोरी। इसी तरह कई बार डेट्स प्रोबलंब्स की वजह से भी जोड़ी नहीं बन पाती। यह भी देखा गया है कि कई निर्माता-निर्देशक नई कहानी के लिए बिल्कुल ही नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारते हैं। एक तो इन्हें पारिश्रमिक कम देना पड़ता है, दूसरा, दर्शक भी नई नायिकाओं की एक झलक पाने के लिए प्रेक्षागृह तक पहुंचते हैं। जैसे महेश भट्ट नये कलाकारों को मौका देते हैं। इसके अलावा इधर कुछ ऐसे विषय पर भी फिल्म बनी, जिसमें दो व्यक्ति के बीच प्यार तो है लेकिन इनके बीच उम्र का बहुत फासला रहता है। मसलन, 'निःशब्द', 'चीनी कम', 'जोगर्स पार्क'। इन सभी फिल्मों के नायक, नायिकाओं से उम्र में काफी बड़े हैं। इसी तरह 'एक छोटी सी लव स्टोरी' और 'दिल चाहता है' की नायिका, नायक से काफी बड़ी हैं। उधर 'गर्ल फ्रैंड' (लेस्बिलन) का विषय ही बिल्कुल अलग है। इसमें नायक है ही नहीं। |