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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
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ऋषिकेश में मानकों के विपरीत भवन निर्माण को हरिद्वार विकास प्राधिकरण नोटिस तो देता है पर इस दिशा में पहल के नाम पर मौन हो जाता है। यहां प्राइवेट के साथ कई सरकारी भवनों के खिलाफ भी नोटिस जारी हुए हैं लेकिन किसी किस्म की कार्रवाई होती कहीं नहीं दिखती
     
 
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पर्दे से गायब होती जोड़ियां
 

पहले पर्दे पर कई जोड़ियां मशहूर हुईं। अशोक कुमार-देविका रानी, राज कपूर-नर्गिस, देवानंद-सुरैया, दिलीप कुमार-मधुबाला, गुरु दत्त-वहीदा रहमान, अमिताभ-रेखा, शाहरुख-काजोल आदि इसकी लंबी फेहरिस्त है। लेकिन नब्बे के दशक के पश्चात यानी शाहरुख-

पहले पर्दे पर कई जोड़ियां मशहूर हुईं। अशोक कुमार-देविका रानी, राज कपूर-नर्गिस, देवानंद-सुरैया, दिलीप कुमार-मधुबाला, गुरु दत्त-वहीदा रहमान, अमिताभ-रेखा, शाहरुख-काजोल आदि इसकी लंबी फेहरिस्त है। लेकिन नब्बे के दशक के पश्चात यानी शाहरुख-काजोल के बाद ऐसी जोड़ी फिर से बनती नहीं दिखाई दे रही। हालांकि अक्षय कुमार-कैटरीना कैफ, सैफ अली खान-करीना कपूर और हालिया रणवीर कपूर-सोनम की जोड़ी मीडिया में चर्चा पा रही है लेकिन यह समय के हिसाब से बहुत छोटी-छोटी जोड़ियां हैं। इसकी तुलना अगर राज कपूर-नर्गिस, दिलीप कुमार-मधुबाला या अमिताभ-रेखा, संजय दत्त-माधुरी दीक्षित की जोड़ी से करें तो यह बौना साबित होती है। पहले के दर्शकों के जेहन में इन जोड़ियों को लेकर स्पष्ट फ्रेम बन गए थे। लोग रेखा को अमिताभ के साथ, नर्गिस को राज कपूर के साथ और वहीदा को गुरु दत्त के साथ ही देखना चाहते थे। दरअसल, पर्दे के बाहर असल जिंदगी में भी ये एक-दूसरे से प्यार करते थे और इसके किस्से अखबारों में छपते थे। जिसे लोग बड़े चाव से पढ़ते-देखते थे। आज की जोड़ी में सैफ-करीना की जोड़ी हालांकि असल जिंदगी में भी प्यार करते हैं लेकिन उनकी फिल्में उस हिसाब से हिट नहीं हुईं, जिस तरह से पुरानी जोड़ियों की। 'रेस' या 'कुर्बान' का हाल देखा जा सकता है। यहां यह नहीं कहा जा रहा है कि पर्दे की हिट जोड़ी को वास्तविक जिंदगी में भी प्यार करना ही चाहिए। पर्दे पर जोड़ी बनाने के लिए यह कहीं से भी जरूरी नहीं है। वर्ना संजय दत्त-माधुरी दीक्षित, अनिल कपूर या ऋषि कपूर के साथ श्रीदेवी की जोड़ी या शाहरुख खान-काजोल की जोड़ी हिट नहीं होती। ये जोड़ियां रुपहले पर्दे पर ही दिखाई देती हैं, निजी जिंदगी से इसका कुछ लेना-देना नहीं है। गौर से देखा जाए तो एक तरह से फिल्मी पेयर की परंपरा शाहरुख खान-काजोल के बाद धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाती है। इसके कई कारण हो सकते हैं। पहला और सबसे महत्वपूर्ण यह कि अब अधिकतर फिल्मों के विषय तात्कालिक द्घटनाओं पर केंद्रित हैं। लव-स्टोरी की तरफ निर्माता-निर्देशक कम ध्यान दे रहे हैं। हालांकि इस दौरान प्रेम-कथा पर आधारित फिल्में सुपरहिट रही हैं लेकिन इसकी संख्या कम है। 'राजनीति', 'रेड अलर्ट', 'लमहा', 'वेडनेस डे', 'पीपली लाइव', 'तारे जमीं पर' आदि के विषय प्रेम कथा से दूर बिल्कुल अलग-अलग हैं। जिसमें जोड़ी का रहना ज्यादा मायने नहीं रखता। इधर पिछले पांच-सात वर्षों से प्रियदर्शन की फिल्में भी खूब आई हैं। उनकी सभी फिल्में हास्य-विनोद से परिपूर्ण होती हैं। कहने का मतलब यह हास्य-विनोद फिल्मों का भी दौर है। उदाहरणार्थ 'हलचल', 'हेराफेरी', 'मालामाल विकली'आदि। इन सभी फिल्मों में जोड़ी से ज्यादा महत्वपूर्ण कॉमेडी है। इस बीच दर्शकों का नजरिया भी बदला है। अब दर्शक किसी भी नायिका को किसी भी हीरो के साथ देखने के आदी हो गए हैं। इसी तरह कई बड़े स्टार ऐसे हैं, जिन्होंने बहुत कम बार एक ही अभिनेत्रियों को अलग-अलग फिल्मों में दोहराया है। इसका अच्छा उदाहरण आमिर खान है। उनकी फिल्म 'लगान' में ग्रेसी सिंह, 'गजनी' में आसीन, 'फना' में काजोल, थ्री इडियट्स में करीना हैं। यानी वे नायिकाओं को दोहरा नहीं रहे। दर्शकों को भी यह अच्छा लग रहा है। ये सभी फिल्में हिट हैं। उधर अब बॉलीवुड में हॉलीवुड नायिकाओं का धीरे-धीरे पदार्पण भी हो रहा है। पहले 'रंग दे बसंती' में एलिस पेटन दिखी तो इधर 'काइट्स' में बारबरा मोरी। इसी तरह कई बार डेट्स प्रोबलंब्स की वजह से भी जोड़ी नहीं बन पाती। यह भी देखा गया है कि कई निर्माता-निर्देशक नई कहानी के लिए बिल्कुल ही नई अभिनेत्रियों को पर्दे पर उतारते हैं। एक तो इन्हें पारिश्रमिक कम देना पड़ता है, दूसरा, दर्शक भी नई नायिकाओं की एक झलक पाने के लिए प्रेक्षागृह तक पहुंचते हैं। जैसे महेश भट्ट नये कलाकारों को मौका देते हैं। इसके अलावा इधर कुछ ऐसे विषय पर भी फिल्म बनी, जिसमें दो व्यक्ति के बीच प्यार तो है लेकिन इनके बीच उम्र का बहुत फासला रहता है। मसलन, 'निःशब्द', 'चीनी कम', 'जोगर्स पार्क'। इन सभी फिल्मों के नायक, नायिकाओं से उम्र में काफी बड़े हैं। इसी तरह 'एक छोटी सी लव स्टोरी' और 'दिल चाहता है' की नायिका, नायक से काफी बड़ी हैं। उधर 'गर्ल फ्रैंड' (लेस्बिलन) का विषय ही बिल्कुल अलग है। इसमें नायक है ही नहीं।
 
 
प्रियंका के नखरे
 

कहते हैं कि नायिकाओं के नखरे बहुत होते हैं। 'फैशन' फिल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी प्रियंका को देखकर तो ऐसा ही कहा जा सकता है। दरअसल, प्रियंका नाडियाडवाला बैनर की फिल्म 'अंजाना अंजानी' में बतौर नायिका काम कर रही हैं। किरदार की मांग के हिसाब से प्रियंका को अपने बाल छह इंच कटवाने थे। इसके लिए वह तैयार नहीं हो रही थी। बहुत मान-मनौअल के बाद वह अंततः मानी। और अब जब बाल कट गए तो उल्टा खुश है। छह इंच बाल कम करने से वह और स्मार्ट लगने लगी हैं। चलो खुश है तो कोई बात नहीं, लेकिन किसी भी कलाकार को हमेशा अपने किरदार को ध्यान में रखना चाहिए। ऐसी कई अभिनेत्रियां हैं जिन्होंने रोल की वजह से बाल कटवाए। शबाना आजमी और नंदिता दास ने 'वाटर' के लिए बाल कटवाए। हाल में रामू खेमे की हीरोइन अंतरा माली ने भी अमोल पालेकर की फिल्म के लिए बाल कटवाए हैं। 'अंजाना-अंजानी' २४ सितंबर को रिलीज हो रही है।
 
ईमेज तोड़ने कि जल्दी
 
देखा गया है कि अगर कोई कलाकार किसी एक इमेज में बंध जाए तो वह धीरे-धीरे ऐसे रोल करते तंग आने लगता है और वह इस इमेज से बाहर निकलना चाहता है। हॉलीवुड अभिनेत्री जेमा आर्टेटन के साथ आज कल कुछ ऐसा ही हो रहा है। जेमा को एक सेक्सी और हॉट नायिका के तौर पर जाना जाता है। वह जेम्स बांड सीरीज की फिल्म करती रही
हैं लेकिन अब वह इससे निकलना चाहती हैं। अपनी इमेज को वह तोड़ना चाहती हैं, इसके लिए चाहे जो भी करना पड़े। वह कहती हैं, 'जेम्स बांड फिल्म ने मुझे हॉट लड़की के तौर पर स्थापित किया लेकिन अब मैं अपने आप को साबित करना चाहती हूं। और उसका समय अब आ गया है।'इसके लिए वह किसी भी निर्माता-निर्देशक के साथ काम करने को तैयार है। कम बजट की फिल्म हो या रोल छोटा ही क्यों न हो, वह सब कुछ के लिए तैयार है। सही भी है क्योंकि बाद में इमेज से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। एक बार जिस इमेज में बंध गए, दर्शक बार-बार आपको उसी भूमिका में देखना चाहता है। मालूम हो कि जेमा ने गए जून को इटालियन सेल्स मैनेजर स्टीफेना से शादी रचाई है।
 
 
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शहर के सुनियोजित विकास के लिए बने हरिद्वार विकास प्राधिकरण को देखकर लगता है कि अब यह अप्रासांगिक हो गया है। प्राधिकरण में ध्वस्तीकरण एवं काम रोको आदेश की फाइलों का अम्बार लगा है। अब उन पर धूल की परत
 
गांधीजी मुझे इसीलिए याद आए। उनके द्वारा संपादित समाचार पत्रों का प्रसार मात्र कुछ हजार होता था लेकिन उनका
 
रतन टाटा के रिटायर होने से पहले टाटा ग्रुप की शान में चार चांद लग गया है। टाटा ग्रुप भारत की सबसे अमीर कंपनी बन गई है।
 
बिहार विधानसभा चुनाव होने में चंद महीने रह गये हैं। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी है।
 
उत्तराखण्ड गठन के बाद से ही प्रदेश को अमीरजादों की ऐशगाह बनने से रोकने और पहाड़ियों को उनकी ही जमीन से बेदखल करने की प्रवृति पर अंकुश लगाने
कुमाऊं मंडल के कपकोट तहसील स्थित सुमगढ़ गांव वालों के लिए १८ अगस्त को आसमान से तबाही बरसी। सुबह आठ बजे इस गांव में बादल फटने से एक
ग्रामीण क्षेत्र में खोले गए सहकारी बैंक एवं समितियां उत्तराखण्ड में किसानों को लाभ देने के बजाय राजनेताओं के
 
लगभग दो साल की जद्दोजहद के बाद उत्तराखण्ड सरकार ने अपनी बहुप्रतिक्षित वॉल्वो बस सेवा शुरू कर ही दी। यह बसें
रूस के जंगलों में लगी आग दुनियाभर के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। आग से अब तक करीब पचास से अधिक लोगों की जानें जा
 
हिन्दी में लद्घु पत्रिकाओं की संख्या अब सैकड़ों की सीमा पार कर गई है। मेट्रो नगरों की तो बात ही क्या मंझले और
 
बुढ़िया द्घर को बड़ा साफ रखा करती थी। इसलिये सत्या और सव्यसाची को दो जोड़ी चप्पल रखने पड़ते थे।
 
धर्म जीना सिखाता है। सच्चा धर्मगुरु जीवन को सुख-शांति और रोशनी से भर देता है। धर्म को दुकान बनाने वाले बेशुमार
 
कॉमनवेल्थ गेम्स के होने में कुछ ही दिन बाकी हैं। हमारे खिलाड़ी अपने- अपने खेल की तैयारियों में जुटे हुए हैं।
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