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लद्घु पत्रिकाओं की बदलती भूमिका |
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हिन्दी में लद्घु पत्रिकाओं की संख्या अब सैकड़ों की सीमा पार कर गई है। मेट्रो नगरों की तो बात ही क्या मंझले और छोटे नगर कस्बे, तक इनके उद्गम स्थल बन गये हैं। इसी प्रकार सुविख्यात लेखक ही नहीं ज्ञात अथवा नितान्त अज्ञात लेखक भी इनके संपादक के रूप में दिखाई देने लगे हैं। इनकी निरन्तर होती संख्या वृद्धि से हिन्दी भाषी समाज का हर्षित होना |
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स्वाभाविक है। उसे लगता है हिन्दी भाषा का प्रचार प्रसार बढ़ रहा है। लोगों में साहित्य और दूसरे गंभीर विषयों को पढ़ने की मनोवृत्ति विकसित हो रही है। पहले कभी कविता, कहानी, आलोचना, निबंध आदि के अलावा और कुछ पत्रिकाओं में पढ़ने को मिलता ही नहीं था और इनके रचनाकार, लिखने वाले भी गिने चुने ही होते थे। उनमें भी स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों की भरमार रहती थी। वह स्थिति अब बदल गई है। विषयों का दायरा जिस कदर बढ़ता जा रहा है और पाठ्य सामग्री में विविधता का सामवेश होता जा रहा है उसी तरह विभिन्न वर्गों, व्यवसायों से जुड़े लेखक इस क्षेत्र में अपना-अपना स्थान बनाने में लगे हैं। परिणाम यह हुआ है कि हिन्दी में विभिन्न विषयों से जुड़ी शब्दावली का उदारतापूर्वक स्वागत हो रहा है। इससे भाषा तो समृद्ध हो ही रही है पाठकों का शब्द भण्डार भी बढ़ रहा है। संपादक अब खाली समय में पाठकों का मन बहलाये रखने की सामग्री परोसने की बजाय उन्हें ज्ञान के विविध अनुशासनों में हो रहे अधतन अनुसधानों से अवगत करवाने के प्रयास में जुटे हैं। यह सब देख-सुनकर निश्चय ही मन खुशी से भर उठता है।
लेकिन क्या सचमुच पत्रिकाओं की संख्या में अतिशय वृद्धि होना जिज्ञासु पाठकों के वृत का विस्तार होना है? क्या लोगों में खरीदकर पढ़ने का रुझान बढ़ रहा है? क्या हिन्दी समाज में नवीनतम ज्ञानार्जन की ललक बढ़ रही है? जब इस तरह के सवालों के यथार्थ परक उत्तर खोजने के लिए हम निकलते हैं तो मन को एक खास तरह का झटका लगता है। हकीकत यह है कि पत्रिकाओं की संख्या बढ़ने के बावजूद पाठकों की संख्या में कोई खास इजाफा नहीं हो रहा है। मुश्किल से दो चार दर्जन पत्रिकाएं ही ऐसी हैं जिन्हें ग्राहकों से इतना पैसा मिल जाता है कि वे अपने पैरों से चल सकें। अधिकतर के लिए विज्ञापन ही ऑक्सीजन का काम करते हैं या फिर वे पत्रिकाएं चल पाती हैं जिन्हें किन्हीं साहित्य रसिक उद्योगपति/उच्च पदस्थ सरकारी अफसर या राजनेता का समर्थन प्राप्त रहता है। कुछ पत्रिकाएं संरक्षक या आजीवन सदस्य बनाकर भी अपना वजूद बनाये रखने की कोशिश में लगी रहती है। हालत यह है कि अधिकतर पत्रिकाएं ग्राहकों से अधिक उन लेखकों, संपादकों के पास मुफ्त जाती हैं जिन्होंने किसी तरह से अपने नाम का सिक्का साहित्य के बाजार में चला लिया है। नामवर लेखकों के पास हर पत्रिका अपना अंक भेजना चाहती है यह जानते हुए भी कि उनके पास इतना समय होता ही नहीं कि वे हर एक के कम से कम पठनीय मैटर को ही पढ़ लें। वे पत्रिकाओं में अपनी या अपने बारे में छिपी सामग्री देखते हैं या उस पर सरसरी नजर डाल लेते हैं जो उन्हें अपडेट रखने में सहायक हो सकता है। देसी विदेशी नई पुस्तकों की समीक्षाएं उन्हें इस काम में अधिक सहायक होती हैं। इस तरह पत्रिकाओं की यह बाढ़ न तो ग्राहकों की संख्या बढ़ा रही है और न ही इससे वह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि लोगों में ज्ञानार्जन की इच्छा तीव्र हो रही है।
हां, इनसे एक लाभ यह जरूर हुआ है कि स्तरीय पत्रिकाओं में जो लेखक छप नहीं पाते थे उन्हें दूसरे तीसरे स्तर की पत्रिकाओं में जगह मिल जाती है। इससे लेखकों, कवियों, कहानीकारों की संख्या बढ़ी है। कई पत्रिकाओं में तो ऐसी सामग्री तक छपी देखी जा सकती है जिसे पाठक तो क्या स्वयं संपादक भी पढ़ना नहीं चाहते। जाहिर है यह सब उन्हें मजबूरी में करना होता है। बहुत सी ऐसी पत्रिकाएं हैं जिनके संपादक अवैतनिक तो होते ही हैं अपनी गांठ से पैसा तक लगाकर उन्हें छपवाते है और स्वयं ही उसका प्रकाशन, प्रूफरीडिंग व विक्रय/वितरण आदि करते हैं। उनके लिए हर लेखक मूल्यवान होता है क्योंकि उन्हें पत्रिका के पन्ने भरने के लिए सामग्री की जरूरत रहती है। इस जरूरत ने एक ऐसा पाठक समूह बनाया है जो पढ़ता चाहे कम है लेकिन लिखता खूब है और अपनी रचना के बदले में पत्रिका पाने का हकदार बन जाता है। परिणाम यह होता है कि जिस उत्साह से पत्रिकाएं निकलती हैं जल्दी ही निकालने वालों का वह उत्साह मन्द पड़ने लगता है। पहले वे अनियमित होती हैं या अपनी प्रकाशनावधि लंबी करती हैं और धीरे-धीरे काल के गाल में समा जाती हैं। लेकिन क्रम टूटता नहीं है। एक बन्द होती है तो दूसरी निकल आती है।
इन सारी स्थितियों पर नजर रखने और इनकी समस्याओं का समाधान तलाशने के लिए लद्घु पत्रिकाओं के संपादकों, लेखकों व साहित्यकारों का एक अखिल भारतीय संगठन बना हुआ है जो कभी-कभी अपने सम्मेलन कर अपने होने का प्रमाण देता रहता है। लेकिन अफसोस है उसने अब तक कोई ठोस काम किया हो ऐसा दिखाई नहीं देता। वह सरकार से लड़कर डाक व्यय को न्यूनतम करवा सकता था। हर पत्रिका को विज्ञापन अथवा अन्य किसी रूप में सरकार से आर्थिक अनुदान मिल सके ऐसी व्यवस्था करवा सकता था और एक ऐसा नेटवर्क भी तैयार करवा सकता था जिससे पत्रिकाओं की वितरण व्यवस्था सही हो सके। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है।
लद्घु पत्रिकाओं का आन्दोलन दरअसल बड़े उद्योगपतियों के प्रतिष्ठानों से निकलने वाली उन चिकनी पत्रिकाओं का विकल्प देने के लिए हुआ था जो कुछ खास तरह की सामग्री अपने चहेते लेखकों से लिखवाकर छाप रही थी ताकि समाज में यथास्थिति बनी रहे और पाठक वर्ग दैनिक जीवन की विषम होती स्थितियों से अनजान बना रहे। शुरू में लद्घुपत्रिकाओं ने इनका विकल्प बनने की कोशिश की। नतीजतन स्त्रियों, बच्चों, दलितों, किसानों, आदिवासियों और अन्य शोषित, वंचित वर्गों की समस्याएं न केवल प्रकाश में आई बल्कि चर्चा व आंदोलन का विषय भी बनी। आज वैश्वीकृत उदारीकरण ने जिस तरह देश की बहुसंख्य आबादी को विषमता की खाई में धकेल दिया है इसे रेखांकित करने में इस वैकल्पिक मीडिया ने जितना योगदान किया है उसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। लेकिन यह भी सच है कि इस विचारधारा विहीन प्रयास ने लोगों को उस तरह आंदोलित नहीं किया जिससे वे व्यवस्था को बदलने के लिए मजबूर कर पाती।
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जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध |
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इतिहास अपने आप को कई बार कितने क्रूर तरीके से दोहराता है। नवम्बर २००७ की द्घटना, गुवाहाटी में द्घटी। अप्रैल २०१० को पश्चिम बंगाल की वीरभूम में दोहराई गई। दोनों लड़कियां आदिवासी थी। पहली की उम्र १६ साल की थी तो दूसरी की १७ बरस! एक फरक यह था, गुवाहाटी की द्घटना का पता तुरन्त लगा, वहीं |
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वीरभूम की द्घटना का पता लगने में चार महीने लग गए।
कारण अलग-अलग था उन्हें सरेआम निर्वस्त्र कर देने का। शायद इन बालाओं ने इस क्रूर और विभत्स समाज का चेहरा सबसे नजदीक से उनके ऊपर बीतते सबसे द्घृणित कहर के रूप में महसूस किया। इसके पहले तो वे दुनिया को अभी समझ ही नहीं पायी होंगी और युवा होने की उमंग में अपनी ही दुनिया में डूबी होंगी कि अचानक इस पुरुषों की दुनिया से पाला पड़ा।
उसे बस इतना ही पता था कि उसके गांव के उसके समुदाय के लोग अपने लिए सरकार से अपना हक मांगने जा रहे हैं। अचानक प्रदर्शनकारियों के बीच कुछ असामाजिक तत्व द्घुसे, उन्होंने मारपीट शुरू की और देखते ही देखते समूचे जुलूस में भगदड़ मच गयी। इसके पहले कि वह कुछ समझ पाती उसके सारे कपड़े फाड़े जा चुके थे। वह स्वयं को बचाने के लिये भीड़ से भागी, काफी दूर भागती गयी। और शहर के तमाम संभ्रांत कहे जाने वाले पुरुष एवं युवा उसके पीछे अपने मोबाइल और कैमरा लेकर भाग रहे थे ताकि उसे अपने स्क्रीन पर कैद कर बाद में भी चटखारे ले सकें। काफी दूर बदहवास भागती इस लड़की को देख आखिर भागीराम नामक एक दुकानदार को रहम आयी और उसने अपना शर्ट उतार कर उसे ढंक दिया। जो उसके पीछे-पीछे भागे वे एक प्रकार के पुरुष थे और जिसने ढका वह भी पुरुष ही था लेकिन दूसरे प्रकार का। जैसा कि दूसरी द्घटना में भी देखने को मिला कि इस निर्वस्त्र का उन लोगों ने जो एमएमएस बनाया जो ग्यारह मिनट का क्लिपिंग था जिसे नेट पर डाला गया था और इसका मकसद भी आनन्द उठाना ही होगा लेकिन यह क्लिपिंग कुछ पत्रकारों के हाथ लग गयी और अब उन्हीं के कारण दोषियों पर कार्रवाई की सम्भावना बन पाई। वरना सच्चाई यही थी कि मामले को लेकर कोई शिकायत तक दर्ज नहीं हो पाती।
दरअसल वीरभूम की इस मासूम का कसूर यह था कि वह अपनी जाति के बाहर किसी लड़के से प्यार करती थी। जब गांववालों को यह पता चला तो पंचायत बैठी और पंचायत में लिए फैसले के तहत उसे निर्वस्त्र किया गया और मारते-पीटते तथा तरह-तरह से प्रताड़ित करते तीन गांवों की सरहद में आठ किलोमीटर तक द्घुमाया गया। गुवाहाटी की द्घटना की तरह यहां भी तमाम लोगों ने इस पीड़िता की रोते कलपते भागते तस्वीरें उतारना जरूरी समझा और यह कोशिश नहीं की कि यह अत्याचार बन्द हो।
पत्रकारों के दबाव पर प्रशासन हरकत में आया। पांच लोग आठ अगस्त तक गिरफ्तार हो चुके थे। शेष की तलाश हो रही है। फिलहाल उस लड़की एवं उसके परिवार को पुलिस सुरक्षा में रखा गया है। पिछले दिनों जिले की पुलिस का मुखिया डीआईजी स्वयं उस लड़की से मिलने आया और उसे भरोसा दिया कि उसके साथ न्याय होगा।
कोई भी संवेदनशील इंसान यह कल्पना कर सकता है कि इनके ऊपर उस समय क्या बीत रहा होगा जब द्घटना को अंजाम दिया जा रहा होगा। जब जानवर से भी गए-गुजरे ढंग से, लार टपकाते, आंखें और मुंह फाडे़ मर्द लोग उन्हें चारों ओर से द्घेरे होंगे तथा उसे दौड़ा रहे होंगे। दोनों ही वर्तमान में किस मनःस्थिति में होंगी और ताउम्र क्या वे इस आपबीती को भूल पायेंगी? हम सब यही मांग करें कि सख्त कार्रवाई हो दोषियों के खिलाफ। लेकिन क्या जितने दर्शक थे जिन्होंने भी मौके को हाथ से निकलने नहीं दिया होगा वे सब पकड़े जाएंगे? जब पंचायत फैसला ले रही थी तब उनके इस फैसले के खिलाफ पत्थर या जूता-चप्पल क्यों नहीं बरसाया गया? गांव के कथित इज्जतदार लोग क्या कर रहे थे? जब लड़की अपने हाथों से अपना शरीर ढक कर थोड़ी सी लाज बचाने का प्रयास कर रही थी और दोनों तरफ से उसके हाथ खींच लिये जाते थे। किस मिट्टी से बने थे वे लोग?
कुछ समय पहले मुंबई में नववर्ष के अवसर पर बाहर निकले एक युवा जोड़े के साथ युवाओं के एक समूह ने जिस तरह बेइज्जती की थी, किस तरह युवक की पत्नी को निर्वस्त्र कर दिया था और सभी निर्लज्ज हंस रहे थे, वह द्घटना भी सूर्खियां बनी थीं।
गुवाहाटी शहर की द्घटना से लेकर वीरभूम के आदिवासी बहुल इलाके में द्घटी द्घटना तक या मुल्क की औद्योगिक राजधानी कहे जाने वाले मुंबई की इस द्घटना से कई निष्कर्ष निकलते हैं। एक तो यह कि द्घटनाएं भले ही कम सूर्खियां बनती हों, मगर स्त्री के प्रति हिंसा की भावना हर स्तर पर व्याप्त है। दूसरे, हमारे समाज का स्वरूप बहुत कुछ भेड़ियाधंसान जैसा है, जिसमें लोग इसलिए आगे गड्ढे में कूदने को तैयार हो जाते हैं क्योंकि आगे वाला कूद रहा है। |
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