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बिहार विधानसभा चुनाव होने में चंद महीने रह गये हैं। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। पिछले चुनावों से इस बार का विधानसभा चुनाव इसलिए भी भिन्न होगा क्योंकि बिहार में पहली बार ऐसा होगा कि पार्टियां या उम्मीदवार विकास के नाम पर वोट मांगने जनता के बीच जायेंगे। अब तक जाति समीकरण से चुनावी गणित सुलझाने वाले दल विकास का |
पहाड़ा पढ़ रहे हैं। वही सत्ताधारी गठबंधन के मुखिया नीतीश कुमार तो पहले से काम के बदले मजूरी मांगने की बात करते आ रहे हैं। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि क्या इस बार का चुनाव वाकई जाति और समुदाय के समीकरणों को ध्वस्त करेगा।
चुनावी दंगल में राजद-लोजपा गठबंधन मजबूती से ताल ठोंक रहा है। वहीं कांग्रेस ने अपने पत्ते अभी पूरी तरह से नहीं खोले हैं। सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का इरादा कांग्रेस का है। इसका नुकसान भाजपा-जदयू गठबंधन के साथ लालू-रामविलास को भी होगा। वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विश्वास है कि जनता उन्हें विकास के मुद्दे पर वोट जरूर देगी। लेकिन जदयू और भाजपा के सामने सबसे बड़ी समस्या उम्मीदवारों के चयन में आयेगी। हालांकि दोनों दलों ने सीटों का बंटवारा बहुत पहले ही कर लिया है। इतना ही नहीं मायावती के दस्तक ने सभी दलों के माथे पर शिकन ला दिया है। खतरा है वोट बैंक के बिखरने का। खास कर लालू-रामविलास को डर है कि कहीं उनके दलित वोट में वह सेंध न लगा दें।
बहरहाल, बीते १६ अगस्त को राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी के बीच सीटों का बंटवारा हुआ। समझौते के मुताबिक आरजेडी १६८ और लोजपा ७५ सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इतना ही नहीं दोनों दलों ने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री तक की द्घोषणा कर दी। लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री और एलजेपी की बिहार इकाई के अध्यक्ष और रामविलास पासवान के छोटे भाई पशुपति कुमार पारस को उपमुख्यमंत्री के रूप में पेश किया गया है। सबसे अहम बात यह है कि १५ सालों तक बिहार में शासन करने वाले लालू प्रसाद ने लोगों को यकीन दिलाने की कोशिश कि उनकी पार्टी बदल गई है। उन्होंने माना कि अब पहले वाली बात नहीं रही। अपने शासन काल की कुछ बदनामियों को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि अगर सत्ता में वे आये तो ऐसे तत्वों को बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह बदलाव एक दिन में नहीं आया। लालू प्रसाद नीतीश कुमार को मात देने के लिए हर चाल सोच समझ कर चल रहे हैं।
इन सबसे इतर सभी पार्टियां अंदरखाने जाति के समीकरण को घ्यान में रख कर गुणा-भाग करने में जुटे हैं। सभी का ध्यान मुसलमान और यादव के वोटों पर भी है। नीतीश मुसलमानों और यादव के वोटों में सेंध लगाने की जुगत कर रहे हैं, वहीं लालू- रामविलास उसे एक करने की फिराक में हैं। लालू प्रसाद रामविलास को साथ लेकर दलितों के वोट को अपनी झोली में करने की कोशिश में हैं। बिहार में दलितों और मुस्लिमों के वोटों की संख्या एक-तिहाई के करीब है। बिहार में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या ३९ है। मुसलमानों का १६ प्रतिशत वोट है। लगभग ६० सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक साबित होता रहा है। ऐसे में सभी की निगाहें इसी एक-तिहाई वोट को हासिल करने पर लगी हुई हैं। नीतीश कुमार पिछड़ी जाति के कुर्मी-कोयरी के वोट को अपना मान रहे हैं और महादलित बना कर एक अलग तरह के समीकरण को उन्होंने जन्म दिया है। साथ ही कांग्रेस की उपस्थिति से राज्य में अगड़े वोट बंट सकते हैैं। नीतीश भी इस बार बहुत सोच समझ कर अपनी चाल चल रहे हैं। वह एक नया सामाजिक समीकरण बना कर सत्ता तक पहुंचना चाहते हैं। उन्हें कुछ मुसलमानों के वोट मिलने का भरोसा है। २००५ के विधानसभा चुनाव में जदयू १३९ सीटों पर चुनाव लड़ा था। पिछले चुनाव में उसे २०.४६ फीसदी वोटों के साथ ८८ सीटों पर जीत हासिल हुई थी।
बहरहाल नेताओं के बयान के बीच जनता का मौन सबको आर्श्चचकित कर रहा है। बिहार में राजनीतिक चेतना का अभाव नहीं है। इसलिए चुनाव में कुछ ज्यादा उलटफेर की आशा नहीं की जा सकती। यह भी कहना मुश्किल होगा कि विकास का सिक्का चल ही जायेगा। क्योंकि बिहार में जाति की जड़ बहुत गहरी है। इन सबसे अलग यदि पार्टियां दबंग और अपराधी प्रवृति के उम्मीदवारों को मैदान में उतराती है तो कहीं उन्हें पिछली बार हुए संसद के चुनाव की तरह के नतीजे न देखने पड़े। पिछली बार संसदीय चुनाव में अपराधी प्रवृति के उम्मीदवारों को जनता ने नकार दिया था। इस बार हो रहे विधानसभा चुनाव बिहार के परिवर्तन की असली राह तय करेगा।
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