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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
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ऋषिकेश में मानकों के विपरीत भवन निर्माण को हरिद्वार विकास प्राधिकरण नोटिस तो देता है पर इस दिशा में पहल के नाम पर मौन हो जाता है। यहां प्राइवेट के साथ कई सरकारी भवनों के खिलाफ भी नोटिस जारी हुए हैं लेकिन किसी किस्म की कार्रवाई होती कहीं नहीं दिखती
 
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सत्ता के लिए साथ-साथ
 

बिहार विधानसभा चुनाव होने में चंद महीने रह गये हैं। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। पिछले चुनावों से इस बार का विधानसभा चुनाव इसलिए भी भिन्न होगा क्योंकि बिहार में पहली बार ऐसा होगा कि पार्टियां या उम्मीदवार विकास के नाम पर वोट मांगने जनता के बीच जायेंगे। अब तक जाति समीकरण से चुनावी गणित सुलझाने वाले दल विकास का

पहाड़ा पढ़ रहे हैं। वही सत्ताधारी गठबंधन के मुखिया नीतीश कुमार तो पहले से काम के बदले मजूरी मांगने की बात करते आ रहे हैं। लेकिन सबसे अहम सवाल यह है कि क्या इस बार का चुनाव वाकई जाति और समुदाय के समीकरणों को ध्वस्त करेगा। चुनावी दंगल में राजद-लोजपा गठबंधन मजबूती से ताल ठोंक रहा है। वहीं कांग्रेस ने अपने पत्ते अभी पूरी तरह से नहीं खोले हैं। सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारने का इरादा कांग्रेस का है। इसका नुकसान भाजपा-जदयू गठबंधन के साथ लालू-रामविलास को भी होगा। वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विश्वास है कि जनता उन्हें विकास के मुद्दे पर वोट जरूर देगी। लेकिन जदयू और भाजपा के सामने सबसे बड़ी समस्या उम्मीदवारों के चयन में आयेगी। हालांकि दोनों दलों ने सीटों का बंटवारा बहुत पहले ही कर लिया है। इतना ही नहीं मायावती के दस्तक ने सभी दलों के माथे पर शिकन ला दिया है। खतरा है वोट बैंक के बिखरने का। खास कर लालू-रामविलास को डर है कि कहीं उनके दलित वोट में वह सेंध न लगा दें। बहरहाल, बीते १६ अगस्त को राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी के बीच सीटों का बंटवारा हुआ। समझौते के मुताबिक आरजेडी १६८ और लोजपा ७५ सीटों पर चुनाव लड़ेगी। इतना ही नहीं दोनों दलों ने मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री तक की द्घोषणा कर दी। लालू प्रसाद को मुख्यमंत्री और एलजेपी की बिहार इकाई के अध्यक्ष और रामविलास पासवान के छोटे भाई पशुपति कुमार पारस को उपमुख्यमंत्री के रूप में पेश किया गया है। सबसे अहम बात यह है कि १५ सालों तक बिहार में शासन करने वाले लालू प्रसाद ने लोगों को यकीन दिलाने की कोशिश कि उनकी पार्टी बदल गई है। उन्होंने माना कि अब पहले वाली बात नहीं रही। अपने शासन काल की कुछ बदनामियों को स्वीकार करते हुए उन्होंने कहा कि अगर सत्ता में वे आये तो ऐसे तत्वों को बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह बदलाव एक दिन में नहीं आया। लालू प्रसाद नीतीश कुमार को मात देने के लिए हर चाल सोच समझ कर चल रहे हैं। इन सबसे इतर सभी पार्टियां अंदरखाने जाति के समीकरण को घ्यान में रख कर गुणा-भाग करने में जुटे हैं। सभी का ध्यान मुसलमान और यादव के वोटों पर भी है। नीतीश मुसलमानों और यादव के वोटों में सेंध लगाने की जुगत कर रहे हैं, वहीं लालू- रामविलास उसे एक करने की फिराक में हैं। लालू प्रसाद रामविलास को साथ लेकर दलितों के वोट को अपनी झोली में करने की कोशिश में हैं। बिहार में दलितों और मुस्लिमों के वोटों की संख्या एक-तिहाई के करीब है। बिहार में अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या ३९ है। मुसलमानों का १६ प्रतिशत वोट है। लगभग ६० सीटें ऐसी हैं, जहां मुस्लिम वोट निर्णायक साबित होता रहा है। ऐसे में सभी की निगाहें इसी एक-तिहाई वोट को हासिल करने पर लगी हुई हैं। नीतीश कुमार पिछड़ी जाति के कुर्मी-कोयरी के वोट को अपना मान रहे हैं और महादलित बना कर एक अलग तरह के समीकरण को उन्होंने जन्म दिया है। साथ ही कांग्रेस की उपस्थिति से राज्य में अगड़े वोट बंट सकते हैैं। नीतीश भी इस बार बहुत सोच समझ कर अपनी चाल चल रहे हैं। वह एक नया सामाजिक समीकरण बना कर सत्ता तक पहुंचना चाहते हैं। उन्हें कुछ मुसलमानों के वोट मिलने का भरोसा है। २००५ के विधानसभा चुनाव में जदयू १३९ सीटों पर चुनाव लड़ा था। पिछले चुनाव में उसे २०.४६ फीसदी वोटों के साथ ८८ सीटों पर जीत हासिल हुई थी। बहरहाल नेताओं के बयान के बीच जनता का मौन सबको आर्श्चचकित कर रहा है। बिहार में राजनीतिक चेतना का अभाव नहीं है। इसलिए चुनाव में कुछ ज्यादा उलटफेर की आशा नहीं की जा सकती। यह भी कहना मुश्किल होगा कि विकास का सिक्का चल ही जायेगा। क्योंकि बिहार में जाति की जड़ बहुत गहरी है। इन सबसे अलग यदि पार्टियां दबंग और अपराधी प्रवृति के उम्मीदवारों को मैदान में उतराती है तो कहीं उन्हें पिछली बार हुए संसद के चुनाव की तरह के नतीजे न देखने पड़े। पिछली बार संसदीय चुनाव में अपराधी प्रवृति के उम्मीदवारों को जनता ने नकार दिया था। इस बार हो रहे विधानसभा चुनाव बिहार के परिवर्तन की असली राह तय करेगा।

 
दलों के भरे हैं खजाने
 
कोलकाता में पांच जनवरी १९५५ को जन्मी ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की राजनीति में बंगाल टाइगर के नाम से जानी जाती है। वामपंथ के गढ़ माने जाने वाले पश्चिम बंगाल में उन्होंने लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनाव में उन्हें करारी शिकस्त देकर
अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है। मध्यम वर्गीय परिवार में जन्मी ममता बनर्जी ने बसंती देवी कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद जोगेन्द्र चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से कानून की डिग्री ली। आम लोगों के बीच दीदी के नाम से जानी जाने वाली ममता ने अपना राजनीतिक करियर कांग्रेस पार्टी से शुरू किया। वर्ष १९७६-८० में अपनी प्रतिभा के बल पर प्रदेश महिला कांग्रेस की महासचिव रहीं। वर्ष १९८४ में कद्दावर वामपंथी नेता सोमनाथ चटर्जी को जादेवपुर लोकसभा सीट से हराकर सबसे युवा सांसद बनी। वह युवा कांग्रेस की जनरल सेक्रेटरी भी बनी। १९९१ में कोलकाता दक्षिण से लोकसभा सांसद निर्वाचित हुई। इसके पश्चात वह लगातार १९९६, १९९८, १९९९, २००४ और २००९ में उसी सीट से विजय प्राप्त कर लोकसभा पहुंचने में कामयाब रही। १९९१ में नरसिंह राव सरकार में एचआरडी, यूथ अफेयर्स एंड स्पोर्ट्स और महिला एवं बाल कल्याण मंत्रालय में बतौर राज्यमंत्री का पदभार संभाला। १९९७ में ममता बनर्जी ने कांग्रेस पार्टी को अलविदा कहकर तृणमूल कांग्रेस पार्टी का गठन किया। इसके बाद कांग्रेस से अलग होकर भाजपा के साथ गठबंधन किया। वह १९९९ की वाजपेयी सरकार में रेलमंत्री भी रही। नंदीग्राम और सिंगूर जैसे विषयों से उनका राजनीतिक पारा तेजी से पश्चिम बंगाल में चढ़ा। वर्ष २००९ के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने अप्रत्याशित जीत हासिल कर वामपंथ के गढ़ में जबरदस्त सेंध लगाई। इसके बाद स्थानीय निकाय चुनावों में भी ममता बनर्जी ने जीत हासिल कर पश्चिम बंगाल की राजनीति को एक नई दिशा दी। ममता बनर्जी एक करिश्माई नेत्री हैं। उनके पास कोई विशेष सुरक्षा, निजी वाहन या हेलीकॉप्टर, महंगी कारों का काफिला और विलासिता का साजो सामान नहीं है। आज भी वह उसी बाड़ी में रहती हैं, जहां उन्होंने अपनी जिंदगी का अधिकांश समय बिताया है। १९८४ में संसद के लिए चुने जाने के बाद से वह अपने एक सूत्रीय कार्यक्रम-वामदलों को सत्ता से उखाड़ने के अभियान से नहीं डिगीं। २५ साल के संद्घर्षकाल में उनके बहुत से साथी उन्हें छोड़कर चले गए। इस बीच उन्होंने राजनीतिक जीवन में बहुत से उतार-चढ़ाव भी देखे।
 
 
 
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शहर के सुनियोजित विकास के लिए बने हरिद्वार विकास प्राधिकरण को देखकर लगता है कि अब यह अप्रासांगिक हो गया है। प्राधिकरण में ध्वस्तीकरण एवं काम रोको आदेश की फाइलों का अम्बार लगा है। अब उन पर धूल की परत
 
गांधीजी मुझे इसीलिए याद आए। उनके द्वारा संपादित समाचार पत्रों का प्रसार मात्र कुछ हजार होता था लेकिन उनका
 
रतन टाटा के रिटायर होने से पहले टाटा ग्रुप की शान में चार चांद लग गया है। टाटा ग्रुप भारत की सबसे अमीर कंपनी बन गई है।
 
बिहार विधानसभा चुनाव होने में चंद महीने रह गये हैं। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी है।
 
उत्तराखण्ड गठन के बाद से ही प्रदेश को अमीरजादों की ऐशगाह बनने से रोकने और पहाड़ियों को उनकी ही जमीन से बेदखल करने की प्रवृति पर अंकुश लगाने
कुमाऊं मंडल के कपकोट तहसील स्थित सुमगढ़ गांव वालों के लिए १८ अगस्त को आसमान से तबाही बरसी। सुबह आठ बजे इस गांव में बादल फटने से एक
ग्रामीण क्षेत्र में खोले गए सहकारी बैंक एवं समितियां उत्तराखण्ड में किसानों को लाभ देने के बजाय राजनेताओं के
 
लगभग दो साल की जद्दोजहद के बाद उत्तराखण्ड सरकार ने अपनी बहुप्रतिक्षित वॉल्वो बस सेवा शुरू कर ही दी। यह बसें
रूस के जंगलों में लगी आग दुनियाभर के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। आग से अब तक करीब पचास से अधिक लोगों की जानें जा
 
हिन्दी में लद्घु पत्रिकाओं की संख्या अब सैकड़ों की सीमा पार कर गई है। मेट्रो नगरों की तो बात ही क्या मंझले और
 
बुढ़िया द्घर को बड़ा साफ रखा करती थी। इसलिये सत्या और सव्यसाची को दो जोड़ी चप्पल रखने पड़ते थे।
 
धर्म जीना सिखाता है। सच्चा धर्मगुरु जीवन को सुख-शांति और रोशनी से भर देता है। धर्म को दुकान बनाने वाले बेशुमार
 
कॉमनवेल्थ गेम्स के होने में कुछ ही दिन बाकी हैं। हमारे खिलाड़ी अपने- अपने खेल की तैयारियों में जुटे हुए हैं।
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