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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
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ऋषिकेश में मानकों के विपरीत भवन निर्माण को हरिद्वार विकास प्राधिकरण नोटिस तो देता है पर इस दिशा में पहल के नाम पर मौन हो जाता है। यहां प्राइवेट के साथ कई सरकारी भवनों के खिलाफ भी नोटिस जारी हुए हैं लेकिन किसी किस्म की कार्रवाई होती कहीं नहीं दिखती
 
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  गांधीजी और 'निशंक'
   
 

गांधीजी मुझे इसीलिए याद आए। उनके द्वारा संपादित समाचार पत्रों का प्रसार मात्र कुछ हजार होता था लेकिन उनका जनमानस पर भारी असर था। मैं बहुत संजीदगी और जिम्मेदारी के साथ यह कह सकता हूं कि हमारा प्रसार दैनिक समाचार पत्रों की बनिस्बत बहुत कम जरूर है लेकिन उसे राज्य की हर सरकार को कुंभकर्णी नींद से जगाने का श्रेय जाता है

  हमें जिंदगी और आजादी मिलेगी . . . अब भविष्य हमारा होगा, जिसे संवारने के लिए हमें कड़ी मेहनत करनी होगी।' नेहरू की सोच विराट थी। उन्होंने दो गुटों में बंटे विश्व को नकारते हुए गुट निरपेक्ष आंदोलन को बढ़ावा दिया। शीत युद्ध के उस दौर में यह एक साहसिक-विराट और सोच भरा दुस्साहस था। नेहरू के सपनों का भारत भी विकास के अनूठे मॉडल को अपना कर आगे बढ़ने का था। गांधी के स्वराज को पीछे कर नेहरू ने औद्योगिकीकरण को महत्व दिया। पूंजीवादी व्यवस्था के साथ समाजवादी विचार को द्घोलकर एक नया मिश्रण तैयार करने की यह कोशिश शुरुआती दौर में तो सही प्रतीत हुई लेकिन जल्द ही आउट ऑफ ट्रैक हो गई। आज २१वीं शताब्दी में हम हर असफलता के लिए नेहरू-गांधी की नीतियों को दोष दे अपराधमुक्त होने का स्वांग रचते हैं। जो कुछ अच्छा हुआ उसमें सभी का योगदान, जो गलत हुआ उसके लिए कांग्रेस की गलत नीतियां जिम्मेदार। हकीकत में केवल कांग्रेस ही इस बदहाली के लिए जिम्मेदार नहीं है। जिस देश की जनता के भीतर राष्ट्रवाद लेशमात्र भी न हो उसका हश्र यही तो होना था। ६३ वर्षों में हमने शनैः शनैः अपने मुल्क को बर्बादी की कगार पर ला खड़ा करने का काम किया है। आज इस तथाकथित महान आदर्शों वाले देश में, राम के देश में, कूष्ण के देश में, तमाम प्रकार की वह शैतानी प्रवृत्तियां हावी हो चुकी हैं जो केवल और केवल पतन का मार्ग प्रशस्त कर सकती हैं। तो क्या इस सब के लिए गांधी-नेहरू जिम्मेदार हैं? जी नहीं। जिम्मेदारी हम सबकी है। गुनहगार हम सब हैं। ६३ वर्ष बाद यदि बेकारी, भुखमरी और बेबसी के सिवा अपने चारों तरफ कुछ नजर नहीं आ रहा तो इसके लिए मात्र कुछ हजार-लाख राजनेताओं को कैसे दोषी माना जा सकता है? कौन हैं यह नेता? किसी अन्य मुल्क के वासी? किसी अन्य ग्रह के प्राणी? यदि नहीं तो फिर यह हमारे बीच से ही निकले होंगे। इनके खून और हमारे खून में कोई फर्क नहीं होगा। तब क्योंकर कोई सुरेश कलमाडी राष्ट्रीय स्वाभिमान को गर्त में पहुंचाने तक की स्तर तक गिर जाता है? क्यों नहीं कोई शीला दीक्षित शर्म कर कुर्सी छोड़ नैतिकता का उदाहरण देती है? क्यों धर्म की दुहाई देकर कर सत्ता पाई आडवाणी एंड कंपनी भ्रष्टाचार के दलदल में धंस जाती है? क्योंकर देवताओं की जन्मभूमि कहलाए जाने पर इठलाती पहाड़ियां और हिम शिखर इतने बेबस हो गए नजर आते हैं कि आस्था के महाकुंभ में तमाम प्रकार के भ्रष्टाचार को चुपचाप सहने को विवश होते हैं? कारण बहुत साफ है, बहुत स्पष्ट है। राष्ट्रवाद का द्घोर अभाव और नैतिक पतन की पराकाष्ठा। इसको ऐसे भी समझा जा सकता है। दहेज एक अभिशाप है, ऐसा कक्षा पांच से हमें पढ़ाया गया लेकिन २१वीं सदी का भारतीय नवयुवक बगैर दहेज दुल्हन नहीं चाहता। आर्थिक भ्रष्टाचार से हम त्रस्त हैं लेकिन जब मौका मिलता है स्वयं ऐसा करने से नहीं हिचकिचाते। अपने अधिकारों के लिए लड़ते नहीं और कर्तव्यों के प्रति तिरस्कार का भाव रखते हैं। सिस्टम के खत्म होने का रोना रोते हैं और उसी सिस्टम की जड़ों पर मट्ठा चढ़ाने से हिचकिचाते नहीं। राजनीतिज्ञों को जमकर कोसते हैं किंतु अपने यहां हर उत्सव में वीआईपी को बुलाने की चाह रखते हैं। माओवाद-नक्सलवाद को जो उपजाऊ जमीन मिल रही है उसके पीछे समाज का संवेदनहीन होना सबसे बड़ा कारण है। कौन हैं भई यह माओवादी? क्या पाकिस्तानी एजेंट हैं? या फिर अमेरिका से प्रशिक्षण और पैसा पाए भाड़े के उग्रवादी? लालगढ़ और दंतेवाड़ा में कहां से इतनी भारी तादाद में यह पैदा हो रहे हैं। जाहिर सी बात है कि यह वहां के मूल निवासी हैं। वह अभागे जो इसी धरती, इसी मुल्क के लाल तो हैं लेकिन जिन्हें हमने उनके मूलभूत अधिकारों से वंचित रखा है। और अब जब वह हताशा की चरम पर हैं तो उन्हीं को देशद्रोही कहने का दुस्साहस हम कर रहे हैं। पाकिस्तान से भेजे जा रहे आतंकवादियों को रोक पाने में विफल होती फौज का इस्तेमाल अपने ही देशवासियों पर करने की अक्षम्य भूल केवल और केवल इस 'महान मूल्यों' वाले मुल्क में ही सोचा जा सकता है। एक ओर वह हैं जो लहू-पसीना बेचकर भी दो जून की रोटी के लिए तरस-तड़प रहे हैं, तो दूसरी तरफ उन्हीं की रोटी छीनने वाले हैं। ऐसे में आक्रोश की पराकाष्ठा खून-खराबे को ही तो जन्म देगी। साठ के दशक में लोहिया ने लिखा था, 'समूचा हिन्दुस्तान कीचड़ का तालाब है, जिसमें कहीं-कहीं कमल उग आए हैं। कुछ जगहों पर एय्याशी के आआँाुनिकतम तरीकों के सचिवालय, हवाई अड्डे, होटल, सिनेमाद्घर और महल बनाए गए हैं और उनका इस्तेमाल उसी तरह के बने-ठने लोग लुगाई करते हैं। लेकिन कुल आबादी के एक हजारवें हिस्से से भी इन सबका कोई सरोकार नहीं। बाकी तो गरीब, उदास, दुखी और भूखे-नंगे हैं।' आजादी के मात्र तेरह-चौदह साल बाद कहे लोहिया के यह वचन आज ज्यादा प्रासंगिक हैं। कॉमनवेल्थ खेलों के नाम पर ३५ हजार करोड़ का तमाशा, बड़े-बड़े मॉल, मल्टीप्लेक्स सिनेमाद्घर, अंतरराष्ट्रीय स्तर के हवाई अड्डे और जनता की गाढ़ी कमाई से कई सौ करोड़ के स्मारक बनवाया जाना, मूर्तियां लगाना, एय्याशी के अड्डे नहीं तो क्या हैं? बुंदेलखंड में भूख का राज है लेकिन मायावती हैं कि पार्कों पर अरबों व्यर्थ जाया कर रही हैं। सोनिया गांधी त्याग की मूर्ति का आवरण ओढ़े बैठी हैं और उनके नाक तले कलमाडी एंड गैंग लूट-खसोट में लगा है। इस लोकतंत्र के राजा मनमोहन ईमानदार बताए जाते हैं लेकिन इतने असहाय कि करुणानिधि के भ्रष्टतम सिपहसालार को अपना वजीर बनाने को विवश हैं। बैल्लारी में रेड्डी बंधु खनिज संपदा को खुलकर लूट रहे हैं लेकिन येदियुरप्पा रोने के सिवा कुछ नहीं कर रहे। आडवाणी ऐसे लौहपुरुष हैं जिनमें जंग लग चुका है। दूर से उन्हें लौह मानते रहिए पास से देखेंगे तो भुरभुरा का गिरता जंग ही दिखेगा, लौह नहीं। हमारे अपने राज्य में निशंक सरकार भ्रष्टाचार के नए कीर्तिमान बनाने में जुटी है किंतु उन्हें क्लीन चिट देने के लिए संद्घ के लाडले नितिन गडकरी बाध्य हैं। गुरु गोलवलकर ने क्या ऐसे समर्पित संगठन की चाह रखी थी। उन्होंने संद्घ के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए कहा था कि 'राजनीतिक क्षेत्र में अनेक अस्थायी बातें, अनेक आंदोलन करने पड़ते हैं। आप इनसे बच भी नहीं सकते। किंतु इसमें अपना जो मूलभूत विचार है, यदि उसका स्मरण न रहा तो काम करने का लाभ क्या? अपना विस्मरण न हो, यह भार आपके ऊपर है। यह सब काम करते समय अपना जो मूल है, जड़ है, उसका स्मरण यानी अपनी ध्येयवादिता, अपने जीवन का लक्ष्य, उसके अनुसार अपने चारों ओर कार्यकर्ताओं को बनाना, तदनुसार अपने कार्य का मार्गदर्शन करना, उसको उस ढंग से चलाना चाहिए। इसलिए बार-बार सब कार्यकर्ताओं को एकत्र बैठाकर, चिंतन-परामर्श करते हुए, आवश्यकता पड़ने पर गंभीर विचार-विनियम करते हुए यह अध्ययनशीलता सब में उत्पन्न करने की आवश्यकता है। अपनी ध्येयनिष्ठा, ध्येयवादिता, ध्येय का जागरण हृदय में अत्यंत स्पष्ट रखना चाहिए। कहीं पर भी उसको धुंधला नहीं होने देना चाहिए। संद्घ के द्वारा जिसका पोषण हुआ यह अपना आदर्शवाद अत्यंत प्रभावपूर्ण चेतना देने वाला सामर्थ्य है और उस कारण संद्घ को भी हमलोग बढ़ा देंगे। यह सब लोगों को ध्यान में रखना चाहिए।' तो क्या ऐसी बन सकी है महान राष्ट्रवादी आरएसएस? अपने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हैं भगत सिंह कोश्यारी। भ्रष्टाचार से दूर-दूर तक उनका वास्ता नहीं। सादगी में बेमिसाल लेकिन क्या सच्चे संद्घी भी हैं? क्यों नहीं निशंक सरकार के खिलाफ सड़क पर उतरने का साहस करते हैं? मातृभूमि से बड़ी है सरकार या पार्टी? नेताओं की छोड़िए अपनी बात करते हैं। अपनी माने आम भारतीय की। क्यों सह रहा है अन्याय को? भ्रष्टाचार को? दमन-शोषण को? क्यों नहीं विरोध के स्वरों से अपना स्वर मिलाने का साहस कर रहा है? कारण स्पष्ट हैं। स्वयं भी तो इसी लूट के खेल में हिस्सेदारी है भाई। और जो इस लूट में शामिल नहीं है, न ही प्रतिरोध की लड़ाई लड़ रहे हैं, वह सबसे ज्यादा गुनहगार हैं। उनकी नपुंसकता के चलते ही गुनहगारों को साहस मिल रहा है। जनकवि पाश के शब्दों में कहूं तो 'सबसे खतरनाक होता है मुर्दा शांति से भर जाना, द्घर से दफ्तर जाना, दफ्तर से द्घर आना।' ६३ वर्षों की इस यात्रा के बाद भी यदि यह मुर्दा शांति बरकरार रहती है तो निश्चित समझिए कि हमारा कोई भविष्य नहीं है। या तो एक राष्ट्र के तौर पर हमारा अस्तित्व आने वाले २० वर्षों में समाप्त हो जाएगा या फिर हम भी अमेरिकी प्रभुसत्ता के समक्ष द्घुटने टेक चुके राष्ट्रों की भांति हो चुके होंगे। बचपन में पढ़ा-सुना गीत जो शायद फैज अहमद फैज का है आज आजादी के ६४वें वर्ष में याद हो आया है। आप तक भी पहुंचे, इसलिए लिख देता हूं : सौ में सत्तर आदमी फिलहाल जब नासाज हैं, दिल पर रखकर हाथ कहिए देश क्या आजाद है? कोठियों से मुल्क की मय्यार मत आंकिए, असली हिन्दुस्तान तो फुटपाथ पर आबाद है।
 
 
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शहर के सुनियोजित विकास के लिए बने हरिद्वार विकास प्राधिकरण को देखकर लगता है कि अब यह अप्रासांगिक हो गया है। प्राधिकरण में ध्वस्तीकरण एवं काम रोको आदेश की फाइलों का अम्बार लगा है। अब उन पर धूल की परत
 
गांधीजी मुझे इसीलिए याद आए। उनके द्वारा संपादित समाचार पत्रों का प्रसार मात्र कुछ हजार होता था लेकिन उनका
 
रतन टाटा के रिटायर होने से पहले टाटा ग्रुप की शान में चार चांद लग गया है। टाटा ग्रुप भारत की सबसे अमीर कंपनी बन गई है।
 
बिहार विधानसभा चुनाव होने में चंद महीने रह गये हैं। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी है।
 
उत्तराखण्ड गठन के बाद से ही प्रदेश को अमीरजादों की ऐशगाह बनने से रोकने और पहाड़ियों को उनकी ही जमीन से बेदखल करने की प्रवृति पर अंकुश लगाने
कुमाऊं मंडल के कपकोट तहसील स्थित सुमगढ़ गांव वालों के लिए १८ अगस्त को आसमान से तबाही बरसी। सुबह आठ बजे इस गांव में बादल फटने से एक
ग्रामीण क्षेत्र में खोले गए सहकारी बैंक एवं समितियां उत्तराखण्ड में किसानों को लाभ देने के बजाय राजनेताओं के
 
लगभग दो साल की जद्दोजहद के बाद उत्तराखण्ड सरकार ने अपनी बहुप्रतिक्षित वॉल्वो बस सेवा शुरू कर ही दी। यह बसें
रूस के जंगलों में लगी आग दुनियाभर के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। आग से अब तक करीब पचास से अधिक लोगों की जानें जा
 
हिन्दी में लद्घु पत्रिकाओं की संख्या अब सैकड़ों की सीमा पार कर गई है। मेट्रो नगरों की तो बात ही क्या मंझले और
 
बुढ़िया द्घर को बड़ा साफ रखा करती थी। इसलिये सत्या और सव्यसाची को दो जोड़ी चप्पल रखने पड़ते थे।
 
धर्म जीना सिखाता है। सच्चा धर्मगुरु जीवन को सुख-शांति और रोशनी से भर देता है। धर्म को दुकान बनाने वाले बेशुमार
 
कॉमनवेल्थ गेम्स के होने में कुछ ही दिन बाकी हैं। हमारे खिलाड़ी अपने- अपने खेल की तैयारियों में जुटे हुए हैं।
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