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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
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ऋषिकेश में मानकों के विपरीत भवन निर्माण को हरिद्वार विकास प्राधिकरण नोटिस तो देता है पर इस दिशा में पहल के नाम पर मौन हो जाता है। यहां प्राइवेट के साथ कई सरकारी भवनों के खिलाफ भी नोटिस जारी हुए हैं लेकिन किसी किस्म की कार्रवाई होती कहीं नहीं दिखती
 
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बुड्ढा-बुढ़िया की कहानी
 

वो दास्तां जो, हमने कही भी
हमने लिखी
आज वो ... . .
खुद से सुनी है
(गुलजार)

बुढ़िया द्घर को बड़ा साफ रखा करती थी। इसलिये सत्या और सव्यसाची को दो जोड़ी चप्पल रखने पड़ते थे। स्कूल से निकलने के बाद दोनों ने जूते पहनने छोड़ दिये थे। बुढ़िया के हिसाब से द्घर

से बाहर जाने के लिये अलग जोड़ी चप्पलें होना चाहिये, जैसी मन चाहे वैसी खरीद लो। पर द्घर के अन्दर रबर की हवाई चप्पल पहनो। द्घर की चप्पलें द्घर के दरवाजें से बाहर नहीं जानी चाहिये, और बाहर के चप्पल-जूते अन्दर नहीं आने चाहिये वरना द्घर गन्दा हो जायेगा। सत्या के मामा जी जो पटना में ही रहते थे, छठ पूजा के दो दिन बाद उन लोगों से मिलने आये, और इस जूते उतारने की बात पर चिढ़ गये- और बाहर से ही प्रसादी दे कर के चले गये थे। द्घर शीशे की तरह चमकना चाहिये, इसके लिये बुढ़िया कई बार ताने देती कि उसके पोछे का कपड़ा, सत्या और सव्यसाची के कपड़े से ज्यादा साफ है। ऐसे में कोई साइकिल लेने के लिये सोचे भी कैसे? साइकिल रखने की जगह कहां है? गली में छोड़ा नहीं जा सकता। अन्दर गेट के बिलकुल पास तो मोटरसाइकिल लगती है। प्रियांशु और मनिन्दर का रूम बड़ा था। वहां साइकिल अन्दर लगायी जा सकती थी। किन्तु सत्या और सव्यसाची कहां रखेंगे साइकिल? आंगन के पार रूम में साइकिल कैसे ले कर जाया जायेगा? साइकिल के टायर की मिट्टी से पूरा आंगन गन्दा हो जायेगा। कुल मिला कर इस बात का ये असर था कि क्लास दूर होने के बावजूद, किसी भी चिक-चिक से बचने के लिये उन लोगों ने साइकिल नहीं खरीदी थी। हर जगह पैदल-पैदल जाना होता था। लेकिन ज्यादा दूर जाना हो, जैसे महेन्द्रू से गांधी मैदान, तो ऑटो रिक्शा पकड़ के जाया जाता। बुढ़िया को ये बात पता तो थी ही। आखिर उसने एक दिन पूछ ही लिया। ''सत्या, तुम लोग साइकिल क्यों नहीं खरीद लेते?'' सत्या ने दुखी हो कर कहा, ''आंटी, भइया सोच तो रहा था लेकिन, हम लोग साइकिल कहां रखेंगे? दरवाजे के ठीक पास तो मोटर साइकिल रहता है।'' आंटी अपने गीले हाथ पल्लू में पोछते हुए कहने लगी,''अरे, तुम लोग उसको कन्धा पर उठा के अन्दर अपने रूम में रख लेना थोड़ा-सा उठा के आंगन पार कर लोगे, फिर तो रूम आ ही जायेगा। अब हम तो तुम लोग का रूम साफ करते नहीं हैं। ऐसे ही तुम लोग गन्दा कर के रखते हो, थोड़ा और हो जायेगा। इतना तुम लोग पढ़ते रहते हो; चलो तुम नहीं, पर सव्यसाची , वो तो पढ़ता है न? तुम लोग कभी नाश्ता नहीं करते, दोपहर में एक-दो बजे कुछ खाते हो, शाम में भी क्या खाते हो, वो थोड़ा-सा चना का भून्जा। रात में भी पता नहीं होटल में क्या मिलता होगा? सत्या ने थोड़ा सोचा, फिर कहा, '' आपको तो कहा था कि पेइंग गेस्ट रख लीजिये । आप ही नहीं मानी।'' इस पर बुढ़िया थोड़ा सकपका गयी, ''देखो तुम को बता देते हैं, तुम्हारे अंकल को पसंद नहीं अगर हम थोड़ा-सा भी ज्यादा खाना दे दें। तुम लोग से पहले, काफी पहले, गुड्डी का दुल्हा यहां किरायेदार था। उन लोग को हम ऐसे रखे थे, और हर दिन अंकल हमको डांटते थे कि हम दही ज्यादा दे दिये, रोटी ज्यादा दे दिये। हमको कैसा तो लगता था, ए सत्या, दुर्गा कसम, हम सच बोलते हैं, मेरा कलेजा फट जाता था। अगले महीने हम झगड़ा कर के मना कर दिये कि हम को बर्तन मलना पड़ता है। बर्तन का क्या है, तुम लोग तो मेरे लिये टोनू जैसे हो। लेकिन ये सब हमसे नहीं देखा जाता है। हम सव्यसाची को बोलेंगे कि साइकिल खरीद ले। कल बता रहा था कि तुम भी क्लास करने वाले हो। कहीं कोचिंग करोगे?'' ''नहीं आंटी, ट्यूशन करेंगे। वो बढ़िया होता है। भइया अब सोच रहे हैं कि साइंस कॉलेज से अच्छा है कि इस बार फिर आई .आई .टी . का इम्तिहान दे दे। हम भी उसके लिये तैयारी करेंगे। इसलिये एक जगह हम आज से क्लास करने जायेंगे। द्घर पर कुछ खास पढ़ाई होता नहीं। बाकी जहां पहले पढ़ते थे वो बहुत बेकार निकला, मेरा अडवांस पैसा ले कर भाग गया। अब वहां पर कोई नहीं है। दो हजार रुपए डूब गये।'' बुढ़िया ने काफी हमदर्दी जताई। कोचिंग वगैरह ऐसे ही होते थे, कब किसका पैसा ले कर कौन भाग जाये, किसका जीवन बरबाद कर दे, किसी बात की कोई जिम्मेदारी नहीं। बच्चे नहीं समझते, लेकिन शायद हर बार समझना भी नहीं चाहते। वही हुआ था जिसके लिए सव्यसाची सत्या को मना करते आया था कि कोचिंग में मत पढ़ो। अब सत्या ने कान पकड़े कि भइया की ही बात मानेगा। बुढ़िया ने जाते-जाते बताया कि आज शाम बड़ी बेटी संजना आ रही है। पटेलनगर से और दामाद ''संजय जी'' भी आयेंगे। तीन-चार महीने के बाद आज वो लोग आ रहे थे। दीवाली बीत चुकी थी। दीवाली तो सत्या और सव्यसाची ने सन्दलपुर में ही मनाई थी। एक बात पता चली थी कि बुढ़िया की मंझली लडक़ी पिछली दीवाली में चल बसी थी। सत्या सब बातों को पीछे छोड़ कर, चुपचाप बुढ़िया के हिसाब से '' गार्भेज'' भरी गलियों से निकल के जा रहा था। सत्या ने अभी तक पटना में अपना समय बरबाद ही किया था, बुढ़िया की बातें उसे द्घर की याद दिलाती थी। बुढ़िया के हिसाब से, ''संजय जी'' बिल्कुल जैकी श्राफ जैसे लगते थे। जब अमेरिका में उनकी गोतनियों ने फोटो देखा था, तो वहां पर सब को यही बोला था, नुन्नू ने 'जैकी श्राफ'- को अपना दामाद चुना है। बाद में अमेरिका वाले आये। गुड्डी और संजना, दोनों की शादी पटना के पांच सितारा होटल, मौर्या से करवायी थी। होटल मौर्या मामूली तो है नहीं . . .बड़े सुन्दर फोटो आये थे शादी वाले। बुढ़िया के अनुसार लोग जब होटल मौर्या में खाने आये थे तो उनको अच्छा-अच्छा गिफ्ट देना चाहिये था। लेकिन लोग-बाग आये, तीन-चार सौ रुपया का थाली में खाना खाये और दिये क्या- एक दीवाल द्घड़ी! अब इतना द्घड़ी हो गया है द्घर में क्या किया जाये? एक द्घड़ी सत्या के रूम में भी दिया जा सकता था पर अंकल गुस्सा करते। लेकिन एक बात थी, न तो 'संजय जी' जैकी श्राफ जैसे लगते थे, न ही गुड्डी का दूल्हा आमिर खान जैसा लगता था। पहले इस बात पर सत्या को बड़ी हंसी आई फिर उसे याद आया कि उसे सन्दलपुर में एक रिक्शा वाला नाना पाटेकर की तरह लगता था, उसका लम्पट बेटा शाहरुख खान की तरह। चूंकि शाहरुख खान सव्यसाची का पसन्दीदा हीरो था, इस बात पर भी वो पिट चुका था। उसने मन-ही-मन मान लिया था कि लोगों की शक्लें तरह-तरह के लोगों से मिलती हैं। ऐसे ही सोचते-सोचते सत्या खजांची रोड पहुंच गया था। ''आर्य महिला विद्यालय- यहीं कहीं कुछ होगा। पता यहीं का था। क्या नाम था गणित वाले सर का, ''सदानन्द कुमार''। पता नहीं, कैसा पढ़ाते होंगे, छः -सात महीना में भइया किसी इंजीनियरिंग कॉलेज चला जायेगा, फिर हम क्या करेंगे? अकेले रहना पड़ेगा? भइया का तो आई .आई .टी . हो जायेगा, हम क्या करेंगे? फिर उमर भी बढ़ जायेगा। फिर ये सब दिन कितने याद आयेंगे। सोचो, हम दस साल बाद यहां आयेंगे तो क्या ये दिन याद रहेगा? किसको याद कि कौन बुड्ढा कौन बुढ़िया, हर दिन क्यों कोई याद करे? देखो सामने से एक लड़का आ रहा है। कितना मोटा, भारी भरकम है। क्या पता मेरा ये सब से अच्छा दोस्त बन जाये। कौन जानता है? . . .सुनिये, आपको पता है कि सदानन्द कुमार कहां पढ़ाते है?'' जवाब आया-''हम भी वही ढूंढ रहे हैं।'' और ये कह के वो लड़का एक गली में अन्दर चला गया। अन्दर क्लास में सत्या के बगल में वो ही बैठा हुआ था। पता चला कि जनाब राजेन्द्रनगर में रहते थे, नाम है विशाल गौरव। विशाल गौरव साइंस कॉलेज में बारहवीं में पढ़ता था। उसके दसवीं में ९४ प्रतिशत आये थे। ये सुनते ही सत्या के हाथ पांव फूल गये। आज तक उसे सव्यसाची ही सबसे तेज लगता था, पर विशाल गौरव के नम्बर काफी ज्यादा थे। और बाद में उसने बता भी दिया कि साइंस कॉलेज में उसका रोल नम्बर दो है। यानी कि पूरे बिहार में दूसरा नम्बर। सत्या सोचने लगा कि इसमें विद्यार्थी वाला कोई लक्षण नहीं है। द्घर पर भी रहता है, मतलब गृहत्यागी भी नहीं है। फिर उसने मन-ही-मन निर्णय किया कि प्रत्यक्ष को प्रमाण की क्या आवश्यकता? निःसंदेह ये उत्तम विद्यार्थी है। पूरे बिहार में दूसरा नम्बर! सत्या को बड़ी शरम आ रही थी, कैसे वो उठ के भाग जाये। तो बात बदलने के लिये उसने पूछा, ''मुझे एक साइकिल लेनी है। कहां से लूं?'' विशाल ने कहा-''महावीर मन्दिर है न पटना जंक्शन पे, वहीं पर एक सरदार जी की दुकान है। तुमको छूट भी दे देगा।'' ''नहीं दिया तो?'' ''नहीं , दे देगा। नहीं तो फिर हमको चलना पड़ेगा। हमको जानता है।'' सत्या ये सुन कर बहुत खुश हो गया कि बिहार का दूसरे नम्बर का सबसे तेज लड़का अब उसका दोस्त बन गया है।, वरना कौन किसकी मदद करना चाहता है। शाम के समय बुड्ढा अपने दामाद के साथ बैठे बातें कर रहा था। फिर उसने आवाज लगायी, ''सव्यसाची, सुनो तो। इनसे मिलो, संजय जी, मेरे बड़े दामाद। ये लड़का बड़ा होनहार है। सव्यसाची को हमने अपने गार्जियनशिप में रखा है। हम उसको कोई दिक्कत नहीं होने देते हैं। अगर भइया अमेरिका बुलाये तो हम इसको भी अमेरिका ले चलेंगे। संजय जी, आपको भी ले चलेंगे। सव्यसाची, तुम को ताश खेलना आता है?'' सव्यसाची ने कहा, ''आता तो है, लेकिन आंटी बोली रही थीं कि टोनू भइया वापस आने वाले हैं। कल-परसों में। उस समय खेलेंगे, चार लोग हो जायेंगे न। इस पर बुड्ढे ने सुझाया-''क्यों, सत्या है न।'' सव्यसाची ने बड़ी कसैली आवाज में जोर दे कर कहा,'' नहीं , वो नहीं खेलेगा।'' सव्यसाची ने इतने जोर से कहा तो बुड्ढा सकपका गया, और कुछ नहीं कहा। कह के जैसे ही सव्यसाची रूम में आया तो सत्या ने पूछा, ''खुद खेलते हो, हम को ताश खेलने से मना कर दिये?'' ''तुम कभी खेले हो ताश? खेल पाओगे? मान लो खेल भी लिये तो क्या करोगे .. . .ताश का नशा बहुत बुरा होता है। जब हम सीखे थे तब अपना तीन महीना बरबाद कर दिये थे। हम बड़े हो गये हैं, अपना समय बचा लेंगे, तुम नहीं कर पाओगे। तुम विद्यार्थी हो, वैसे यहां पढ़ने आये हो या ताश खेलने?'' सत्या ने तल्खी से उल्टा जवाब दिया,''वही तो हम पूछ रहे हैं? पढ़ने आये हो या ताश खेलने?'' बस फिर वही हुआ, सत्या बुरी तरह से पिट गया। बुढ़िया आंगन से देखती रही कि कैसे सव्यसाची ने चार थप्पड़ मारे और सत्या चुपचाप खामोश बैठा रहा। बुढ़िया आ कर बोली, ''कितना मारते हो तुम, छोटा लड़का है। समझ जायेगा। इससे पहले सव्यसाची कुछ बोलता, गेट पर किसी ने खटखटाया। बुढ़िया ने पूछा, ''कौन है?'' आवाज आयी,''कोई रूम खाली है क्या?'' सत्या ने बाहर आ कर देखा, एक लम्बा, थुलथुल, खूब गोरा, बड़ी चौड़ी आंखों वाला लड़का खड़ा था। बातें हो रही थी,'' बंगाली हूं। हां जी, सपन कह के बुला लीजिये। भागलपुर द्घर हुआ मेरा! नहीं नहीं . . .. खाना-वाना नहीं बनायेंगे। रिश्तेदार? नहीं-नहीं कोई नहीं आयेगा। अंकल से बात करनी होगी? कब हो सकती है? अभी हैं? भीतर आ जाऊं?'' सत्या भीतर आ कर सव्यसाची को बोला, कोई लड़का रहने आया है। अकेला है। आंटी शायद ऊपर उत्तम वाला रूम दे देंगी।'' सव्यसाची ने सत्या का ताना सुन कर पढ़ना शुरू कर दिया था। अभी किताब खोली ही थी। सत्या ने जो बात जुबान पर रोक रखी थी, बोल डाली, ''लगता है कोई तेज लड़का है?'' ऐसी बात सुन कर सव्यसाची झल्लाया, ''तेज क्यों?'' सत्या बिछावन पर बैठ गया। उसे अन्देशा था कि सव्यसाची किसी न किसी बात के लिये उसे डांटेगा। ये सोच कर सहमते हुए धीरे से बोला, ''बंगाली है न!, इसलिये।'' सव्यसाची ने गंभीर होते हुए कहा, ''बंगाली है तो क्या हुआ? ये क्या बात हुई?'' इस पर सत्या ने कहा, ''अरे, सुभाष बोस, टैगोर, शरतचन्द्र सत्यजित राय सभी बंगाली थे। बंगाली लोग की बात ही और होती है।'' सव्यसाची किताब बंद करके बोला, ''ये क्या बात हुई? बंगाली है तो तेज होगा? ऐसे तेज मूर्ख तो हर जगह होता है। ऐसे कैसे कह सकते हो? दिमाग है या बेच के आलू चाट खा गये हो?'' सत्या ने सहमते हुए कहा, ''अच्छा, मानो ये तेज नहीं भी हुआ, लेकिन आज मेरा एक दोस्त बना, विशाल गौरव। वो बहुत तेज है। पढ़ने में बहुत होशियार है।'' सव्यसाची ने अपनी कॉपी पर लिखना रोक दिया और सत्या को देखा, ''क्या हुआ ऐसा, उसके सर के पीछे भगवान वाला चक्र चल रहा था क्या?'' सत्या ने हिम्मत कर के रुखी आवाज में कहा,''उसको ९४ प्रतिशत नम्बर है दसवीं में। उतना तुमको भी नहीं है। साइंस कॉलेज में है बारहवीं में, रोल नम्बर 'दो' है।''
 
यह ज्ञानपीठ की गरिमा का मामला है
 
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति, पूर्व पुलिस अधिकारी और लेखक संपादक विभूति नारायण राय का एक साक्षात्कार 'नया ज्ञानोदय' के बेवफाई सुपर विशेषांक-दो में छपा है। पिछले कुछ दिनों से हिन्दी लेखकों के बीच यह साक्षात्कार चर्चा का विषय बना हुआ है। दरअसल श्री राय ने इस साक्षात्कार में हिन्दी लेखिकाओं के लिए 'छिनाल' शब्द का

प्रयोग किया है। इस आपत्तिजनक शब्द पर कुछ लेखिकाओं ने न सिर्फ अपना विरोध दर्ज किया बल्कि मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल से मिलकर श्री राय की बर्खास्तगी की मांग की। कपिल सिब्बल ने इन लेखिकाओं से यह कह कर कि श्री राय अपने साक्षात्कार में प्रयुक्त कुछ शब्दों के लिए माफी मांग चुके हैं, अपना पल्ला झाड़ लिया। लेकिन इन लेखिकाओं का कहना था कि श्री राय सिर्फ अपनी नौकरी बचाने के लिए माफी मांग रहे हैं, उन्हें अपने कहे पर लेशमात्र भी अफसोस नहीं है। उल्लेखनीय है कि इससे पहले श्री राय एक टीवी चैनल पर बातचीत के क्रम में 'छिनाल' शब्द के प्रयोग को यह कह कर जायज ठहरा चुके थे कि मैंने इसका प्रयोग अपनी जड़ से कटी हुई स्त्री के लिए किया था। इसी क्रम में श्री राय ने प्रेमचंद के लेखन का हवाला देते हुए यह बतलाने का प्रयास किया था कि उनके यहां इस शब्द का प्रयोग सैकड़ों बार हुआ है। श्री राय के इस तर्क ने लेखिकाओं के क्रोध को भड़का दिया। देखते-देखते श्री राय के साक्षात्कार का विरोध ने एक आंदोलन का रूप ले लिया। इस आंदोलन में हिन्दी के अनेक पुरुष रचनाकार भी शामिल हो गए। आगे की रणनीति तय करने के लिए तीन अगस्त को साहित्य अकादमी के 'कौस्तुभ सभागार' में लेखकों पत्रकारों की एक सभा का आयोजन किया गया। उस सभा में इन पंक्तियों का लेखक भी उपस्थित था। राजेन्द्र यादव ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा कि श्री राय को 'छिनाल' शब्द के प्रयोग से बचना चाहिए था। 'छिनाल' तद्भव शब्द है और इसका कोई संधि-विच्छेद नहीं होता। साथ ही राजेन्द्र यादव ने यह भी कहा कि श्री राय का साक्षात्कार बहुत अच्छा है और इसे लेकर उन्हें बर्खास्त करने की मांग करना एक फासिस्ट तरीका है। सभा में उपस्थित अधिकतर लेखकों ने राजेन्द्र यादव की बात का विरोध किया और श्री राय को सामंती प्रवृति वाला दलित और स्त्री विरोधी व्यक्ति बताया। मैत्रेयी पुष्पा ने दो-टूक शब्दों में कहा कि राजेन्द्र जी पुरुष हैं इसलिए वे एक स्त्री के दर्द को नहीं समझ सकते। मुझे महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की छात्राएं अपना दर्द बतलाती हैं कि उन्हें किस तरह से वहां पेरशानियों का सामना करना पड़ता है। मैत्रेयी पुष्पा ने बड़े आहत स्वर में यह कह कर लोगों को स्तब्ध कर दिया कि श्री राय ने मुझे व्याख्यान देने के लिए जब अपने विश्वविद्यालय में बुलाया तो मैं उनके भाई विकास नारायण राय के साथ गई और व्याख्यान देकर तुरंत वापस लौट आयी। इस पर श्री राय ने मुझसे कहा कि कब तक तुम्हें विकास बचाता रहेगा। अभी बातचीत चल ही रही थी कि मैत्रेयी पुष्पा के पास एक फोन आया। इसके बाद उन्होंने बताया कि फोन ज्ञानपीठ के आलोक जैन का था। उन्होंने कहा कि विभूति नारायण राय को ज्ञानपीठ की सदस्यता से हटा दिया गया है। प्रेम भारद्वाज ने साक्षात्कार वाले प्रकरण पर हस्ताक्षर-अभियान चलाए जाने का सुझाव दिया जिस पर सभी ने अपनी सहमति प्रकट की। साक्षात्कार में छपे स्त्री-विरोधी शब्दों के लिए 'नया ज्ञानोदय' के संपादक को भी समान रूप से जिम्मेदार ठहराते हुए यह निर्णय लिया गया कि छह अगस्त को ज्ञानपीठ के कार्यालय पर प्रदर्शन करते हुए 'ज्ञानपीठ' से उन्हें बर्खास्त करने की मांग की जाएगी। साथ ही इस बात का भी निर्णय लिया गया कि लेखकों पत्रकारों का एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति से मिलकर श्री राय को बर्खास्त करने की मांग करेगा। इस बीच कुछ लेखक संगठनों ने श्री राय के साक्षात्कार की आलोचना करते अंतरराष्ट्रीय हिन्दी हुए प्रतिवाद किया है। महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति अशोक वाजपेयी ने दो कदम और आगे बढ़ते हुए न सिर्फ श्री राय की बर्खास्तगी की मांग की बल्कि लेखकों से यह आह्‌वान भी किया कि वे अपनी पुस्तकें ज्ञानपीठ से वापस ले लें और हिन्दी विश्वविद्यालय से तत्काल अपना संबंध तोड़ लें। इस बीच एक नाटकीय द्घटनाक्रम में श्री राय ने एक अंगे्रजी अखबार में यह कह कर लोगों को चौंका दिया कि मैंने तो 'बेवफा' शब्द का प्रयोग किया था, साक्षात्कारकर्ता ने उसे 'छिनाल' शब्द में बदल दिया। इस संदर्भ में रवींद्र कालिया का भी बयान आया कि लगता है कि साक्षात्कार छपने में कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ी अवश्य हुई है। यह गड़बड़ी कहां हुई है इसे रवींद्र कालिया ने नहीं बताया। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक साक्षात्कारकर्ता की ओर से कोई बयान या स्पष्टीकरण नहीं आया है। इस मसले पर लोगों को ध्यान देना चाहिए कि कहीं साक्षात्कारकर्ता जो उसी विश्वविद्यालय में श्री राय के अधीन कार्यरत हैं, को 'बलि का बकरा' तो नहीं बनाया जा रहा है। यदि साक्षात्कारकर्ता यह स्वीकार कर भी लेता है कि उसने ही बेवफा की जगह 'छिनाल' शब्द लिख दिया था तो भी श्री राय का अपराध कम नहीं होता। क्योंकि इसी साक्षात्कार में श्री राय ने एक स्त्री-रचनाकार की आत्मकथा की ओर इशारा करते हुए उसका शीर्षक 'कितने बिस्तरों में कितनी बार' रखने का सुझाव दिया है। इस तरह हम देख सकते हैं कि श्री राय ने बार-बार अपना बयान बदलकर खुद को हास्यास्पद बना लिया है। दरअसल, पिछले कुछ समय से जिस तरह वे हिन्दी के लेखकों को सभा-सेमिनार के नाम पर बुलाकर कृतार्थ कर रहे थे उससे उन्हें यह विश्वास हो गया था कि हिन्दी का लेखक बड़ा ही निरीह प्राणी होता है। उसे नोट के चंद पत्ते दिखाकर गुलाम बनाया जा सकता है। दुर्भाग्य से हिन्दी के कुछ लेखकों ने अपने व्यवहार से श्री राय को ऐसी राय बनाने में मदद भी की। इसलिए श्री राय को पहले यह लगा कि भला हिन्दी का लेखक मेरा क्या बिगाड़ सकता है इसलिए वे शुरू में स्त्रियों के प्रति अपनी कुत्सित टिप्पणी को सही ठहराते रहे फिर बात बिगड़ती देखकर क्षमा मांगी और अंततः यह कहना शुरू किया कि मैंने तो 'छियाल' शब्द का प्रयोग किया ही नहीं है। वैसे लेखक जो यह मानते हैं कि चूंकि श्री राय ने माफी मांग ली है इसलिए इस मसले को यही समाप्त समझना चाहिए उन्हें श्री राय द्वारा लगातार बदले जा रहे बयान का गंभीरता से मनोविश्लेषणात्मक अध्ययन करना चाहिए। क्योंकि यह सौ फीसदी सच है कि आज भी श्री राय स्त्रियों के प्रति व्यक्त अपने विचार को बेहद सटीक और मूल्यवान मानते हैं। इसलिए मेरा तो यह स्पष्ट मत है कि श्री राय की बर्खास्तगी या माफी की मांग करने से ज्यादा अच्छा यह होगा कि हम उन्हें एक ऐसे लेखक के रूप में याद रखें जो आज के समस्त स्त्री-लेखन को छिनालवृत्ति मानते हैं और 'ऑपरेशन ग्रीन हंट' को नक्सलवाद से मुक्ति का एकमात्र उपाय। अब थोड़ी सी बात उस पत्रिका के बारे में भी कर ली जाए जिसमें श्री राय का विवादित साक्षात्कार छपा है। 'नया ज्ञानोदय' नाम की इस पत्रिका का पांच प्रेम-महाविशेषांक निकलने के बाद अब बेवफाई सुपर विशेषांक अपनी प्रगति पर है। पता नहीं कि इस बेवफाई सुपर विशेषांक के कितने अंक निकलेंगे। इस पत्रिका का जो पांच प्रेम महाविशेषांक निकला उसके बारे में संपादक की ओर से यह प्रचारित किया गया कि इन अंकों की आठ बार आवृति की गई है। अभी जो बेवफाई सुपर विशेषांक-दो निकला है उसमें यह स्पष्ट लिखा है कि 'प्रेम महाविशेषांक की अभूतपूर्व सफलता। (अब तक आठ बार पुनर्मुद्रण)'। जब मैंने इसके पीछे की सच्चाई जानने के लिए ज्ञानपीठ कार्यालय में फोन किया तो मुझे बताया गया कि सिर्फ पहले अंक का आठ बार पुनर्मुद्रण हुआ है। तो कायदे से तो यह लिखा जाना चाहिए था कि प्रेम महाविशेषांक-एक का आठ बार पुनर्मुद्रण। लेकिन सारी नैतिकता को ताक पर रखकर रवींद्र कालिया यह झूठ प्रचारित कर रहे हैं और खुद को सबसे बड़ा संपादक मान रहे हैं। अब इसे इस पत्रिका के प्रेम महाविशेषांक-एक में छपी रचनाओं की ओर ध्यान देना चाहिए और इस बात का आकलन करना चाहिए कि इस अंक को विशिष्ट बनाने में संपादक महोदय की क्या भूमिका है? यह स्पष्ट है कि इस अंक में विश्व की श्रेष्ठ रचनाओं का संग्रह किया गया है। कोई व्यक्ति विशेष की पचास श्रेष्ठ कहानियों का संग्रह करके उसे ५० रुपये में पाठकों के लिए उपलब्ध कर दे और यदि यह पुस्तक हाथों-हाथ बिक जाए तो इसमें उस व्यक्ति की एक संकलनकर्ता के अलावा और क्या भूमिका हो सकती है। इससे बड़ा आश्चर्य और क्या हो सकता है कि रवींद्र कालिया यह मान कर चल रहे हैं कि हिन्दी का पाठक यह मोटी सी बात भी नहीं समझेगा। इस पत्रिका के जो अब तक पांच प्रेम महाविशेषांक और दो बेवफाई सुपर विशेषांक निकले हैं, उसमें छपी रचनाओं में से यदि वैसी रचनाओं को हटा दिया जाए जो पहले ही कहीं न कहीं छपकर पर्याप्त लोकप्रियता अर्जित कर चुकी है तो शेष जो बचेगा वह कितना पठनीय और महत्वपूर्ण होगा इसका अंदाजा लगाना कठिन नहीं है। यह तो वैसी ही बात हुई कि किसी पत्रिका का संपादक हिन्दी-आलोचना पर अपनी पत्रिका का पांच अंक केंद्रित करे और पहले अंक में आचार्य रामचंद्र शुक्ल के 'हिन्दी साहित्य का इतिहास', दूसरे अंक में हजारी प्रसाद द्विवेदी की 'कबीर', तीसरे अंक में रामविलास शर्मा की 'महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिंदी नवजागरण', चौथे अंक में मुक्तिबोध की 'एक साहित्यिक की डायरी' और पांचवें अंक में नामवर सिंह की 'छायावाद' छाप दे। इसलिए पत्रिकाओं के भविष्य के लिए यह जरूरी है कि इस तरह की परंपरा को तुरंत बंद किया जाए। प्रेम महाविशेषांक के बाद बेवफाई सुपर विशेषांक की आवश्यकता इस पत्रिका के संपादक महोदय को क्यों महसूस हुई इसका कोई सटीक उत्तर उनके पास नहीं है। कोई कहानी या कविता क्यों प्रेम कहानी या प्रेम कविता है या क्यों बेवफा कहानी या बेवफा कविता है इसे स्पष्ट करना संपादक ने जरूरी नहीं समझा। दरअसल इस तरह के विभाजन का प्रयास ही अपने आप में हास्यास्पद है। यह सीधे-सीधे चर्चा में बने रहने का हथकंडा मात्र है। रवींद्र कालिया 'बेवफाई सुपर विशेषांक-दो' के अपने सम्पादकीय में लिखते हैं, 'बेवफाई को केंद्र में रखकर ज्ञानरंजन से लेकर शर्मिला बोहरा जालान तक अत्यंत भावपरक कहानियां लिखी गई हैं।' प्रश्न यह उठता है कि क्या सचमुच इन कहानीकारों ने बेवफाई को केंद्र में रखकर ये कहानियां लिखी हैं। इन कहानियों को बेवफा कहानी के रूप में छापने से पहले संपादक महोदय ने लेखकों से इसकी अनुमति ली थी। यह जानने के लिए मैंने प्रियंवद से संपर्क किया। प्रियंवद की कहानी 'नदी होती लड़की' को प्रेम कहानी के रूप में प्रेम महाविशेषांक-चार में छापा गया है जबकि उनकी 'अधेड़ औरत की प्रेम' को बेवफा कहानी के रूप में 'बेवफाई सुपर विशेषांक-दो में छापा गया। मैंने प्रियंवद से यह जानना चाहा कि क्या आप मानते हैं कि 'नदी होती लड़की' एक प्रेम कहानी है और 'अधेड़ औरत का प्रेम' बेवफा कहानी है? और रवींद्र कालिया ने आप से इस संदर्भ में कोई संपर्क किया था? प्रियंवद ने साफ इनकार करते हुए कहा कि 'इस तरह के विभाजन के मैं खिलाफ हूं और यदि प्रेम या बेवफाई के तत्व खोजना ही पड़े तो मुझे तो 'अधेड़ औरत का प्रेम' एक मार्मिक प्रेम कहानी लगती है।' आज जो लेखक इस तरह के विभाजन में अपनी रचनाओं के छापे जाने का विरोध नहीं कर रहे हैं वे इसके लिए तैयार रहें कि जब रवींद्र कालिया संभोग महाविशेषांक या केलि महाविशेषांक निकालेंगे तो इसमें भी उनकी कहानियों या कविताओं को संभोग कहानी या केलि कहानी और संभोग कविता या केलि कविता के रूप में छापा जाएगा। बेवफाई सुपर विशेषांक में ही खगेंद्र ठाकुर का एक लेख छपा है- 'वामपंथी नजरिए से बेवफाई'। जब मैंने खगेंद्र ठाकुर से यह जानना चाहा कि क्या आपने ही यह शीर्षक दिया था तो उनका कहना था कि मैंने तो बेवफाई शीर्षक दिया था रवींद्र कालिया ने उसे 'वामपंथी नजरिए से बेवफाई' कर दिया। किसी लेख के शीर्षक के साथ इस तरह का खिलवाड़ करना उचित नहीं है। एक और तथ्य की ओर ध्यान देना चाहिए। बेवफाई सुपर विशेषांक-एक में यह सूचना छपी है कि बेवफाई सुपर विशेषांक-दो में नोबाकोव का उपन्यास 'लोलिता' संपूर्ण छापा जाएगा। लेकिन जब वह छप कर आया तो उसमें 'लोलिता' नहीं था। किस वजह से 'लोलिता स्थगित किया गया, इसकी चर्चा रवींद्र कालिया ने नहीं की। यह द्घटिया संपादन का एक और उदाहरण है। ज्ञानपीठ एक प्रसिद्ध प्रकाशन-गृह है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह के विवाद के कारण यह प्रकाशन-गृह चर्चा में है वह इसकी प्रतिष्ठा के विपरीत है। ज्ञानपीठ के सदस्यों को मिल बैठकर इस पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और उन प्रवृत्तियों पर लगाम लगाना चाहिए जो सस्ती लोकप्रियता पाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार दिख रही है। क्योंकि यह ज्ञानपीठ की गरिमा का मामला है। ह

 
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शहर के सुनियोजित विकास के लिए बने हरिद्वार विकास प्राधिकरण को देखकर लगता है कि अब यह अप्रासांगिक हो गया है। प्राधिकरण में ध्वस्तीकरण एवं काम रोको आदेश की फाइलों का अम्बार लगा है। अब उन पर धूल की परत
 
गांधीजी मुझे इसीलिए याद आए। उनके द्वारा संपादित समाचार पत्रों का प्रसार मात्र कुछ हजार होता था लेकिन उनका
 
रतन टाटा के रिटायर होने से पहले टाटा ग्रुप की शान में चार चांद लग गया है। टाटा ग्रुप भारत की सबसे अमीर कंपनी बन गई है।
 
बिहार विधानसभा चुनाव होने में चंद महीने रह गये हैं। सभी राजनीतिक दलों ने अपनी-अपनी तैयारियां शुरू कर दी है।
 
उत्तराखण्ड गठन के बाद से ही प्रदेश को अमीरजादों की ऐशगाह बनने से रोकने और पहाड़ियों को उनकी ही जमीन से बेदखल करने की प्रवृति पर अंकुश लगाने
कुमाऊं मंडल के कपकोट तहसील स्थित सुमगढ़ गांव वालों के लिए १८ अगस्त को आसमान से तबाही बरसी। सुबह आठ बजे इस गांव में बादल फटने से एक
ग्रामीण क्षेत्र में खोले गए सहकारी बैंक एवं समितियां उत्तराखण्ड में किसानों को लाभ देने के बजाय राजनेताओं के
 
लगभग दो साल की जद्दोजहद के बाद उत्तराखण्ड सरकार ने अपनी बहुप्रतिक्षित वॉल्वो बस सेवा शुरू कर ही दी। यह बसें
रूस के जंगलों में लगी आग दुनियाभर के लिए चिंता का विषय बनती जा रही है। आग से अब तक करीब पचास से अधिक लोगों की जानें जा
 
हिन्दी में लद्घु पत्रिकाओं की संख्या अब सैकड़ों की सीमा पार कर गई है। मेट्रो नगरों की तो बात ही क्या मंझले और
 
बुढ़िया द्घर को बड़ा साफ रखा करती थी। इसलिये सत्या और सव्यसाची को दो जोड़ी चप्पल रखने पड़ते थे।
 
धर्म जीना सिखाता है। सच्चा धर्मगुरु जीवन को सुख-शांति और रोशनी से भर देता है। धर्म को दुकान बनाने वाले बेशुमार
 
कॉमनवेल्थ गेम्स के होने में कुछ ही दिन बाकी हैं। हमारे खिलाड़ी अपने- अपने खेल की तैयारियों में जुटे हुए हैं।
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