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क्या चुनाव आयोग की सख्ती से प्रदेश में हुए चुनावों में नेताओं के खर्च पर लगाम लग सका ?

 
 
   
 
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आस्था की पगडंडी पर चलने वालों
 
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  विवादों में एंट्रिक्स-देवास करार
   
 

पिछले साल विवाद में द्घिरने के बाद एंट्रिक्स-देवास करार रद्द कर दिया गया। रद्द हुआ यह करार इन दिनों देश के शीर्ष वैज्ञानिकों के बीच जारी टकराव की जड़ बन गया है। सरकार ने इस करार से जुड़े रहे इसरो के पूर्व अध्यक्ष जी माधवन समेत चार वैज्ञानिकों को काली सूची में डाल दिया है। इसका आशय है कि उन्हें अब सरकारी पदों पर नियुक्त नहीं किया जाएगा। साथ ही वे सरकार की किसी समिति और

 

संस्था के सदस्य नहीं हो सकते। नायर व अन्य वैज्ञानिकों ने सरकार के इस फैसले पर सवाल खड़े किए हैं और इसके लिए इसरो के मौजूदा अध्यक्ष के राधाकृष्णन को जिम्मेदार ठहराया है।
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन 'इसरो' की व्यावसायिक शाखा एंट्रिक्स ने यहां एक स्थानीय अदालत में देवास मल्टीमीडिया के खिलाफ याचिका दायर की है। एंट्रिक्स के वकील की दलीलें सुनने के बाद जज डीबी पाटिल ने मामले की अगली तारीख २५ फरवरी तय कर दी है। देवास ने पेरिस स्थित अंतरराष्ट्रीय पंचाट से मामले में मध्यस्थता की अपील की है। इस बहुचर्चित मामले में पांच सदस्यीय एक उच्च स्तरीय टीम भी बैठाई गई थी। इसके अध्यक्ष प्रत्यूष सिन्हा हैं। समिति ने नायर और तीन वरिष्ठ वैज्ञानिकों ए भास्कर नारायण, केआर श्रीधर मूर्ति और केएन शंकर को एंट्रिक्स देवास सौदे में दोषी ठहराया है। इस समिति ने इसरो के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर और तीन अन्य अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को ही केवल दोषी नहीं ठहराया है बल्कि शुरुआत से ही देवास के कामकाज और परिचालन की जांच किए जाने की सिफारिश भी की है। पांच सदस्यीय टीम के निष्कषोर्ं और सुझावों के अनुसार देवास की स्थापना फोर्ज एडवाइजर्स यूएसए द्वारा दिसंबर २००४ में एक लाख रुपए की शेयर पूंजी और दो शेयरधारकों के साथ की गई थी। शेयरधारकों में इसरो के पूर्व वैज्ञानिक वेणुगोपाल डी (नौ हजार शेयर) और उमेश एम (एक हजार शेयर) शामिल थे। एंट्रिक्स के साथ समझौता जनवरी, २००५ में हुआ। उस साल के अंत तक साधारण शेयर पूंजी बढ़कर पांच लाख रुपये हो गई और शेयरधारकों की संख्या १२ हो गई। मार्च २०१० के अंत तक देवास के शेयरधारकों की संख्या बढ़कर १७ हो गई। इनमें शेयरधारकों में फोर्ज एडवाइजर्स के तीन सदस्य और मारिशस स्थित दो कंपनियां 'कोलंबिया कैपिटल देवास लि' तथा 'टेलीकॉम देवास लि' शामिल थीं। सिन्हा की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा तैयार रिपोर्ट में कहा गया है कि एंट्रिक्स देवास सौदे में पारदर्शिता का अभाव है और उसने वैज्ञानिकों के खिलाफ कार्रवाई की सिफारिश की है। सभी वैज्ञानिक सेवानिवृत्त हो चुके हैं। अब इस एंट्रिक्स-देवास मामले में सरकार प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग से जांच कराने पर विचार कर रही है। सरकार कुछ अज्ञात सरकारी अधिकारियों की गतिविधियों और सरकारी धन की कीमत पर देवास का अनावश्यक पक्ष लेने के मामले में भी जांच पर विचार कर रही है। इस मामले को इडी और प्रवर्तन निदेशालय को सौंपने के कई कारण बताए जाते हैं। उच्च-स्तरीय टीम की जांच में कई स्तरों पर व्यापक अनियमितताएं सामने आई हैं इसलिए आगे इस जांच को प्रवर्तन निदेशालय और ईडी को सौंपने की जरूरत बताई जा रही है। कई सरकारी अधिकारियों पर भी शक है।
सरकारी नियुक्तियों के लिए प्रतिबंधित किए गए इसरो के पूर्व चेयरमैन जी माधवन नायर को उम्मीद है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस आदेश को पलट देंगे। हालांकि, केंद्रीय मंत्री वी नारायणसामी ने इस आदेश की समीक्षा से इनकार किया है। नायर ने दो हफ्ते पहले प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर नौकरियों पर प्रतिबंध आदेश को रद्द करने की अपील की थी। उनके अनुसार, एकतरफा जांच में वैज्ञानिकों की छवि खराब करने की कोशिश की गई है। प्रधानमंत्री कार्यालय के राज्य मंत्री वी नारायणसामी ने भी कई सवाल उठाये। राज्य मंत्री के मुताबिक केंद्र सरकार ने एंट्रिक्स कॉरपोरेशन तथा देवास मल्टीमीडिया के बीच समझौता राष्ट्रीय सुरक्षा के कारणों से रद्द किया, न कि स्पेक्ट्रम की बिक्री में राजस्व के तथाकथित नुकसान के कारण।
कुल मिलाकर यह मामला न्यायालय और समिति की रिपोर्ट के ऊपर निर्भर करता है। लेकिन इसरो के पूर्व प्रमुख जी माधवन नायर को आशा है कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उन पर तथा तीन अन्य वैज्ञानिकों पर सरकारी नौकरी पाने के लिए लगायी गयी पाबंदी को वापस लेने का आदेश दे सकते हैं। जबकि केन्द्रीय मंत्री वी नारायणसामी ने सरकार के फैसले की समीक्षा की संभावना से इनकार कर दिया है। नायर के मुताबिक एंट्रिक्स-देवास करार कोई मुद्दा नहीं है और न ही इसे मुद्दा बनाना चाहिए।

   
  राजनीतिक बदलाव की राह पर
   
 
मालदीव में सत्ता परिवर्तन विश्व के राजनीतिक परिदृश्य और हालिया इतिहास की एक अनूठी द्घटना है। इसका अनूठापन सत्ता परिवर्तन के तरीके तथा उसके बाद की परिस्थितियों में देखा जा सकता है। पिछले वर्ष अरब देशों में आई क्रांति तानाशाही हटाने के लिए हुई, लेकिन अब तक वहां की जनता को राजनीतिक स्थिरता नहीं मिल पायी है। अशांति पहले से ज्यादा है और भविष्य संदेह के द्घेरे में
  है। पिछले कई सप्ताह से राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद के खिलाफ विरोध- प्रदर्शन चल रहे थे और जब उन्होंने देशहित में इस्तीफा दे दिया तो एक दिन बाद ही उसी रिपब्लिक चौक पर जहां अब तक लोग विरोध करने उतर रहे थे, शांति विराजमान थी। यहां लोग अपने परिवार के साथ द्घूम रहे थे। यह लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति उनकी प्रबल आस्था ही थी कि अपनी कुर्सी बचाने के लिए उन्होंने न आपातकाल की द्घोषणा की, न सैन्यबल का सहारा लिया। वे नहीं चाहते थे कि कोई खून- खराबा हो, इसलिए राष्ट्रपति पद की जिम्मेवारी उपराष्ट्रपति मोहम्मद वाहिद हसन मानिक को सौंप दी। यह नौबत इसलिए आई, क्योंकि विपक्षी दलों के विरोध के साथ-साथ पुलिस के भी एक हिस्से ने नशीद के खिलाफ बगावत का झंडा उठा लिया था। मालदीव में राजनीतिक संकट उत्पन्न हुआ और फिलहाल टल गया, कम से कम ऐसा ही विश्व पटल पर दिखाई देता है। लेकिन आशंका यह है कि वर्तमान शांति कहीं आने वाले तूफान की सूचना तो नहीं दे रही। यह तूफान मालदीव में आए या किसी और देश में, विश्व के शांतिप्रिय, उदार देशों को इस पर नजर रखनी चाहिए। राष्ट्रपति पद पर चुने जाने के बाद उनसे एक सूझ-बूझ वाले व्यावहारिक नेतृत्व की उम्मीद की जाती थी। लेकिन यह अपेक्षा धरी की धरी रह गई। संसद में नशीद की मालदीव डेमोक्रेटिक पार्टी का बहुमत नहीं था, विधायी कार्यों के लिए वे दूसरे दलों पर निर्भर थे। लेकिन नशीद न तो नए राजनीतिक सहयोगी बना पाए और न ही विपक्षी दलों से तालमेल बिठा सके। २०१० में विपक्षी पार्टियों ने संसद में सारे विधेयकों को रोक कर एक गतिरोध पैदा कर दिया था। फिर कट्टरपंथी समूह हमेशा से नशीद को अस्थिर करने की खोज में बैठे थे। गयूम राष्ट्रपति चुनाव में अपनी हार अब भी पचा नहीं पाए हैं। उनके समर्थक भी मौके की तलाश में थे। जब नशीद ने भ्रष्टाचार के आरोप में फौजदारी अदालत के एक वरिष्ठ जज की गिरफ्तारी का आदेश दिया तो उनके सभी विरोधियों को लगा कि आग भड़काने का इससे अच्छा अवसर नहीं हो सकता। कुछ हफ्तों से राजधानी माले में लगातार विरोध-प्रदर्शन हो रहे थे। पुलिस भी उनसे जा मिली और हालात बेकाबू हो गए। वर्ष २००८ में मोहम्मद नशीद ने पहली बार मालदीव का परिचय लोकतंत्र से करवाया था। ३० वर्षों से चली आ रही मौमून अब्दुल गयूम की तानाशाही को खत्म किया था। मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में तो नशीद ने सफलताएं अर्जित की थी लेकिन वे मालदीव में लोकतंत्र की जीत नहीं दिलवा सके। जनता का बहुमत पूर्व राष्ट्रपति गयूम के पक्ष में ही रहा। संसद में भी बहुमत गयूम समर्थकों का रहा।
कुछ राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि नशीद के सत्ता संभालने के बाद एक तरह से संवैधानिक ठहराव आ गया था। क्योंकि अधिकतर राजनीतिक दल गयूम समर्थक हैं। मालदीव की वर्तमान स्थिति की भूमिका पिछले कुछ समय से लिखी जा रही थी। एक वरिष्ठ न्यायाधीश को जब ये कहकर हटाया गया कि वे विपक्ष के प्रति वफादार हैं। तब नाशीद के लिए असली परेशानी शुरु हुई। पहले तो मानवाधिकार कार्यकर्ता इसके खिलाफ सामने आ गए। फिर ये विवाद इतना गरमा गया कि संयुक्त राष्ट्र से दखल देने की मांग होने लगी। लेकिन इसकी जड़ में दरअसल राष्ट्रपति नशीद और पूर्व राष्ट्रपति गयूम के बीच की राजनीतिक खींचतान है। चार साल पहले चुनाव जीतने के बाद ही नाशीद पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के मु्‌द्दों पर एक मुखर स्वर बनकर उभरे थे। उन्होंने समुद्र के भीतर कैबिनेट की बैठक करके विश्व को यह संदेश दिया था कि अगर जलवायु परिवर्तन को लेकर सचेत न हुए, तो भविष्य में ऐसे द्वीपीय देशों के जलमग्न होने का खतरा बना रहेगा। लेकिन अपनी अलहदा शैली के बावजूद वे गयूम के समर्थकों का निरंतर विरोध झेलते रहे और धार्मिक कट्टरपंथियों का भी, जो उन पर इस्लाम विरोधी होने का आरोप लगाते हैं। भारत ने १९८८ में कमांडो भेज कर तब के राष्ट्रपति गयूम का तख्ता पलटने की कोशिश नाकाम कर दी थी। पर इस बार की उथल-पुथल को उसने मालदीव का आंतरिक मामला कह कर हाथ डालना ठीक नहीं समझा। दरअसल, तब और अब की स्थितियों में बुनियादी फर्क है। उस समय तख्ता पलटने की कोशिश में लिट््‌टे के लड़ाके शामिल थे, जिन्हें मालदीव के कट्टरपंथियों ने भाड़े पर बुलाया था। फिलहाल उपराष्ट्रपति मोहम्मद वहीद हसन ने राष्ट्रपति पद संभाल लिया है। वहीद संयुक्त राष्ट्र में काम कर चुके हैं और कूटनीति के अच्छे जानकार हैं। मानिक यूनिसेफ के अधिकारी रहते हुए उन्होंने अफगानिस्तान में तालिबान हुकूमत के पतन के बाद स्कूलों के पुनर्निर्माण और चिकित्सा सुविधाएं मुहैया कराने में मदद की थी। इसलिए यह उम्मीद की जा सकती है कि वे नशीद की प्रगतिशील विरासत को कायम रखेंगे। हो सकता है वे मालदीव में आयी अस्थिरता को संभाल लें। लेकिन इस उथल-पुथल के बाद मालदीव में कट््‌टरपंथियों का हौसला और बढ़ गया है और उनके दबाव से निपटना नए राष्ट्रपति के लिए आसान नहीं होगा।
 
 
 
 
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