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  20-05-12 -- 26-05-12
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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
 
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उत्तराखण्ड के हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय
 
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  कहॉं ठहरा है पानी
   
 
उत्तराखण्ड में अभी तक उत्तर प्रदेश की तरह एनआरएचएम द्घोटाला उजागर नहीं हुआ है, लेकिन इस छोटे से प्रदेश की बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं और एनआरएचएम की कछुआ चाल से द्घोटाले की बू आ रही है। राज्य सरकार इसके तहत मिले साढ़े पांच सौ करोड़ रुपए खर्च कर चुकी है, लेकिन प्रदेश में
  स्वास्थ्य सेवाएं जस की तस हांफ रही हैं। दुष्यंत के शब्दों में-'यहां तक आते-आते सूख जाती हैं कई नदियां, हमें मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।' पानी कहां ठहरा हुआ है यह अब भी एक सवाल है
 
 
उत्तर प्रदेश में एनआरएचएम द्घोटाले ने
चार अधिकारियों की जान ले ली है। कई अधिकारी जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गये हैं। इस द्घोटाले से वहां चुनाव पूर्व राजनीतिक भूचाल आ गया था। जिसमें बहन मायावती के हाथी को द्घुटने टेकने पड़े। उत्तर प्रदेश से अलग राज्य बने उत्तराखण्ड में भी एनआरएचएम की स्थिति ठीक नहीं है। हालांकि यहां अभी इसमें द्घोटाले की परतें खुलनी बाकी हैं, लेकिन उसकी बू आने लगी है। प्रदेश में ७ साल पूर्व राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन शुरू हुआ था। तब से आज तक इस मिशन के तहत कई सौ करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं पर धरातल पर परिणाम जीरो नजर आता है। इस मिशन का एक पहलू यह भी है कि केन्द्र से जारी राशि का केवल आधा धन ही खर्च हो पाया है। शुरुआती वर्षों में इसकी स्थिति और भी बदतर थी। बाद के वर्षों में इसमें सुधार तो आया, लेकिन सैकड़ों करोड़ रुपए का इस्तेमाल अभी भी नहीं हो पाया है। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्थाओं को छोड़ भी दें तो शहरी क्षेत्र में भी कई अस्पताल डॉक्टर विहीन हैं।
केन्द्र की मनमोहन सरकार ने २००५ में देश भर में, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं दुरुस्त करने के लिए राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) योजना शुरू की थी। उत्तराखण्ड में भी उसी साल यह योजना लागू हो गयी थी। अभी तक इस योजना के तहत ८५ फीसदी धनराशि केन्द्र एवं १५ फीसदी राशि राज्य सरकार देती रही है। बताया जा रहा है कि इस साल से केन्द्र ने अपने हिस्से को द्घटाकर ७५ फीसदी कर दिया है। पहले वर्ष यानी २००५ में एनआरएचएम योजना के तहत राज्य के लिए २९ करोड़ ७७ लाख रुपए आवंटित किए गए थे। शुरुआती साल में जहां जोर-शोर से काम होना चाहिए था, वहीं उस साल राज्य केवल १० करोड़ ९९ लाख रुपए ही खर्च कर पाया। अर्थात आवंटित राशि की मात्र ३० फीसदी धनराशि ही खर्च की गयी।
दूसरे वर्ष भी इस स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ। पूर्व में धनराशि खर्च नहीं होने के
बावजूद वर्ष २००६ में इस योजना राशि को दोगुना किया गया। ताकि प्रदेश में स्वाथ्य सुविधाएं बेहतर बनायी जा सके। इस साल एनआरएचएम के लिए कुल ६० करोड़ ९ लाख रुपए आवंटित किये गये। इस राशि से उत्तराखण्ड जैसे छोटे से प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था को काफी हद तक दुरुस्त किया जा सकता था। लेकिन न मिशन अधिकारी ने इसको गम्भीरता से लिया और न ही राज्य के स्वास्थ्य महकमे ने इसमें दिलचस्पी ली। नतीजतन उस साल आवंटित राशि में से केवल १८ करोड़ ६३ लाख रुपए ही खर्च हो सके। सत्तर फीसदी पैसा खर्च नहीं किया गया। जिस कारण प्रदेशवासियों को एनआरएचएम का पूरा लाभ नहीं मिल पाया। इस पर मिशन के अधिकारियों ने तब कहा था कि प्रदेश की भौगोलिक स्थिति बेहद कठिन है। यहां स्वास्थ्य के अलावा अन्य योजना को लागू करने में थोड़ा वक्त लगता है। यहां की भौगोलिक स्थिति का अध्ययन कर लिया गया है। अगले वित्त वर्ष से इसके काम में तेजी आएगी। उसी वक्त अधिकारियों ने यह भी दावा किया था कि अगले दो-तीन वर्षों में यहां की स्वास्थ्य व्यवस्था मेट्रो सिटी की तरह हो जाएगी।
अधिकारियों के दावे की हकीकत प्रदेश के डॉक्टर विहीन अस्पतालों से सामने आ गयी है। सात साल बाद भी प्रदेश में स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है। इसमें रत्ती भर का भी बदलाव नहीं हुआ है। अस्पतालों में अब तक सिर्फ २०८४ नये बेड लगाए जा सके हैं। ये बेड भी तराई क्षेत्र मसलन देहरादून, हरिद्वार और हल्द्वानी आदि में ही लगे हैं। पहाड़ी जनपदों में कुछ बेड ही नए लगाए गए हैं। ऐसे भी यहां डॉक्टरों के बिना बेड खाली ही रहते हैं। एनआरएचएम की कामयाबी की पोल इससे भी खुलती है कि यहां अब तक मात्र तीन अस्पतालों में ही स्पेशल न्यू बॉर्न बेबी केयर यूनिट की स्थापना हो सकी है। कई अस्पतालों में न्यू बॉर्न बेबी केयर यूनिट की स्थापना नहीं हो सकी। जिससे जन्म के समय कमजोर बच्चे या फिर समय पूर्व जन्म लेने वाले बच्चे भगवान भरोसे ही बच पाते हैं। सूबे की वर्तमान जन्म दर १९७ प्रति हजार है तो वहीं मृत्यु दर ६५ प्रति हजार है। इसी से प्रदेश में न्यू बॉर्न बेबी केयर यूनिट के महत्व को समझा जा सकता है। यदि यह यूनिट तहसील स्तर या फिर जनपद स्तर पर लगायी जाती तो मृत्यु दर कम हो सकती है।
राज्य के पर्वतीय जनपदों में आज भी
अधिकतर बच्चों का जन्म द्घरों में ही होता है। द्घरों पर ही दाई गर्भवती महिलाओं की 'डिलेवरी' कराती है। हलांकि ग्राम सभा स्तर पर आशा कार्यकत्री को प्रशिक्षित किया गया है। लेकिन बहुत कम कार्यकत्रियों के पास ही मेडिकल किट हैं। मिशन के अधिकारी दावा करते हैं कि एनआरएचएम के तहत सभी कार्यकत्रियों को मेडिकल किट दिये गये हैं। जबकि टिहरी की एक दुरुह ग्रामसभा की कार्यकत्री इसे नकारती है। पुहाना ग्राम सभा की आशा कार्यकत्री सुषमा नेगी का कहना है कि मुझे २००७ में आशा बहन के रूप में प्रशिक्षण दिया गया था। प्रशिक्षण के कई वर्ष तक हमें कुछ नहीं मिला। दो साल पूर्व किट के नाम पर एक प्लास्टिक का बक्सा और कुछ मेडीसिन दिया गया। यह भी नियमित नहीं मिलती हैं। जबकि आस-पास के गांवों की गर्भवती
महिलाओं को गांवों में बच्चा पैदा करना होता है। इसके अलावा छोटी -मोटी बीमारी की दवाएं भी लोग यहीं से ले जाते हैं।
प्रदेश में आईएमआर ४१ प्रति हजार और एमएमआर ३१५ प्रति लाख है। ये आंकड़े सूबे में एनआरएचएम के ७ साल के सफर की सच्चाई को उजागर कर रहे हैं। अनियोजित प्लानिंग एवं कमजोर होमवर्क के कारण नेशनल रूरल हेल्थ मिशन सूबे में अपेक्षित परिणाम नहीं दे सका है। मिशन का पहला चरण पूरा होने को है। लेकिन यहां की स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बेहद चिंताजनक है। जब एनआरएचएम योजना की शुरूआत की गई थी तब मौजूदा स्वास्थ्य सेवाओं से आहत जनता में उम्मीद की एक किरण जगी थी। लेकिन वक्त बीतने के साथ ही लोगों की उम्मीदें धराशायी होती गई। जबकि साल दर साल इसके बजट में बढ़ोतरी की गई है। ऐसे तो राज्य सरकार हमेशा केन्द्र पर मदद न करने का आरोप लगाती रही है। लेकिन एनआरएचएम में करोड़ों-अरबों रुपए केन्द्र ने राज्य को दिए। उन पैसों का कितना इस्तेमाल हुआ, उसका सरकारी कागजों पर हिसाब तो है पर जमीन पर किए गए कार्य कहीं नजर नहीं आते।
उत्तरकाशी के समाजिक कार्यकर्ता द्वारिका प्रसाद सेमवाल कहते हैं कि प्रदेश के सभी जिला अस्पतालों में आधे से अधिक डॉक्टरों के पद खाली हैं। रोगियों को दवाइयां बाजार से खरीदनी होती हैं। सभी प्रकार से जांच एवं एक्सरे के लिए भी उन्हें बाजार पर ही निर्भर रहना पड़ता है। फिर सरकार ने करीब साढ़े पांच सौ करोड़ रुपए खर्च कहां और कैसे किए। यह पूरा भ्रष्टाचार और द्घोटाले का मामला लगता है। आशंका है कि
प्रदेश में भी उत्तर प्रदेश की तर्ज पर एनआरएचएम महाद्घोटाला हुआ हो। सरकारी कागजों पर करीब ५२५ करोड़ रुपये एनआरएचएम के तहत खर्च किए गए हैं। लेकिन दूर शहरी क्षेत्र में स्थित २१५ अतिरिक्त प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में से १०८ में ३२२ राज्य एलोपैथिक हेल्थ सेंटर में से ११९ में अभी तक एक भी डॉक्टर नहीं हैं।
प्रदेश में मिशन के डायरेक्टर पीयूष सिंह कहते हैं कि एनआरएचएम में कई काम हुए हैं और हो रहे हैं। प्रदेश भर में आशा कार्यकत्रियों को प्रशिक्षित करने से लेकर उन्हें किट उपलब्ध कराये गये हैं। इसके अलावा कुल १७ मोबाइल हेल्थ वैन चालू किए गए हैं। मिशन आपातकालीन सेवा १०८ को भी कई मद में आर्थिक सहायता करता है ताकि दुर्गम क्षेत्रों के लोगों को अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें। हां, हमलोग पूरी
धनराशि खत्म नहीं कर पा रहे हैं क्योंकि प्रदेश में स्वास्थ्य विभाग में
डॉक्टरों, अधिकारियों और कर्मचारियों की कमी है। जिस कारण लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाए हैं। लेकिन उम्मीद है, जल्द से जल्द इसे पूरा कर लेंगे।
 
प्रमुख योजनाओं की हकीकत
 
जननी सुरक्षा कार्यक्रम से महज ५० फीसदी लाभान्वित
 
केवल तीन जनपदों में मोबाइल हेल्थ वैन
 
नवजात शिशु सुरक्षा कार्यक्रम के तहत एएनएम को प्रशिक्षित करने के अलावा कुछ नहीं
 
चिरायु स्कूल हेल्थ कार्यक्रम में पहले चरण का काम भी पूरा नहीं
 
एसएनसीयू सुविआँाा दून अस्पताल, दून महिला अस्पताल और हल्द्वानी में ही उपलब्आँा
 
शहरी स्वास्थ्य कार्यक्रम का लक्ष्य सिर्फ २५ फीसदी हासिल
 
मोबाइल मेडिकल केयर यूनिट में दवा और उपचार की सुविआँाा भी नहीं
 
आशा कार्यक्रम में केवल कार्यकत्री नियुक्त
 
राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना केवल दो जनपद में
 
 
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आय के कोई नए साआँान नहीं, बकायेदारों से वसूली की कोई योजना नहीं। कर्मचारियों को तीन माह से वेतन नहीं, मगर नगर
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उत्तराखण्ड में अभी तक उत्तर प्रदेश की तरह एनआरएचएम द्घोटाला उजागर नहीं हुआ है, लेकिन इस छोटे से प्रदेश की