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साहित्य से दूर होते जा रहे हैं धारावाहिक
 
हाल ही तक टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कथा धारावाहिक अब तक सास-बहू के रिश्तों और परिवार के भीतर चलने वाले षड्यंत्रों पर ही ज्यादातर केंद्रित रहे हैं। इधर कुछ विषयांतर नज़र आ रहा है। बाल विवाह पर आधारित 'बालिका वधू' और इसी तरह से कुछ अलग ही तरह के विषयों पर भी धारावाहिक सामने आ रहे हैं। वैसे कथा धारावाहिकों की जगह काफी हद तक रियलिटी शो ले चुके हैं। निजी मनोरंजन चैनलों का तो लगभग यही हाल है। सरकारी नियंत्रण वाले दूरदर्शन का हाल भी कुछ ज्यादा अच्छा नहीं है।

लगभग एक ही तरह की कहानी कहने वाले इन धारावाहिकों से दर्शक ऊब रहे हैं लेकिन अब तक इस बुद्धू बक्से के नशे की आदी गृहणियां अब भी अपने कुछ चुने हुए धारावाहिक देखती जरूर हैं।साहित्य से इन कथा धारावाहिकों का दूर का रिश्ता भी नहीं रह गया है। दूरदर्शन पर सप्ताहांत पर जरूर साहित्य पर आधारित कार्यक्रम प्रसारित होते हैं लेकिन उनका किसी तरह का पूर्व प्रचार नहीं होता। जो दर्शक इन्हें देखना चाहते हैं उन्हें पता भी नहीं चल पाता कि वे कब प्रसारित हो जाते हैं। इनके नियमित दर्शक न के बराबर हैं। यह याद दिलाने की जरूरत नहीं है कि धारावाहिकों का नियमित प्रसारण जब दूरदर्शन ने 'हम लोग' धारावाहिक से शुरू किया था तब उसे लिखने के लिए हिंदी के जाने-माने लेखक और किसी जमाने में साप्ताहिक हिंदुस्तान जैसी पत्रिका के संपादक मनोहर श्याम जोशी की सेवाएं ली गई थीं। इसे हिंदी का पहला सोप ऑपेरा माना जाता है। वैसे नाटककार चिरंजीत का मानना है कि उससे पहले प्रसारित होने वाला २६ किस्तों का उनका लिखा धारावाहिक 'दादामां जागी' हिंदी का पहला सोप माना जाता चाहिए। इस हिसाब से तो उससे भी पहले लखनऊ दूरदर्शन ने व्यंग्यकार केपी सक्सेना का लिखा धारावाहिक 'बीबी नातियों वाली' को भी हिंदी का पहला सोप कहा जा सकता है। दरअसल 'हम लोग' को दूरदर्शन ने काफी ताम-झाम के साथ प्रचारित-प्रसारित किया था। इसके लिए एक निजी कंपनी मुद्रा वीडियोटेक के साथ कोलैबरेशन किया गया था। मनोहर श्याम जोशी ने इसके बाद एक धारावाहिक रमेश सिप्पी के लिए भी लिखा 'बुनियाद'। वह भी 'हम लोग' की ही तरह खासा लोकप्रिय रहा। कमलेश्वर ने भी टेलीविजन के लिए कई धारावाहिक लिखे। इनमें से 'चंद्रकांता' खासा लोकप्रिय भी रहा। इसे हालांकि शुरू में देवकीनंदन खत्री के इसी नाम के उपन्यास पर आधारित बताया गया था लेकिन उनके कुछ पात्रों के नामों के अलावा बाकी सब कुछ कमलेश्वर के दिमाग की उपज थी। स्वतंत्रता आंदोलन पर आधारित कमलेश्वर का एक धारावाहिक 'युग' भी काफी चला। 'एक कहानी' जैसे कहानियों पर आधारित धारावाहकों ने भी खासे दर्शक जुटाए। गोविंद निहलानी ने भीष्म साहनी के उपन्यास 'तमस' पर छह किस्तों का एक लद्घु द्घारावाहिक बनाया जो इतना लोकप्रिय हुआ कि पुस्तक के प्रकाशक ने इसके नए संस्करण छापे। श्याम बेनेगल ने पं जवाहरलाल नेहरू की पुस्तक 'डिस्कवरी ऑफ इंडिया' पर आधारित एक धारावाहिक 'भारत एक खोज' बनाया जो मील का पत्थर साबित हुआ। शरतचंद्र चटर्जी के उपन्यास 'चरित्रहीन' और 'श्रीकांत' पर आधारित धारावाहिक बने और चले भी।

राही मासूम रज़ा ने दूरदर्शन के लिए एक धारावाहिक 'नीम का पेड़' लिखा था जिसमें पंकज कपूर ने बहुत ही जानदार भूमिका निभाई थी। रांगेय राद्घव के उपन्यास 'कब तक पुकारूं' पर भी धारावाहिक बनाया गया। इसमें भी पंकज कपूर थे। श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास 'राग दरबारी' पर आधारित धारावाहिक खासा पसंद किया गया। लेकिन साहित्यकारों के लिखे या साहित्यिक रचनाओं पर आधारित धारावाहिकों का ग्राफ नीचे ही उतरता चला गया। मनोहर श्याम जोशी ने धारावाहिक 'मुंगेरी लाल के हसीन सपने' की शुरू की कुछ किस्तें लिखीं जिसे बाद में अन्य लेखकों से लिखवाया गया। मनोहर श्याम जोशी के धारावाहिक 'हमराही' को भी लोगों ने ज्यादा पसंद नहीं किया। निजी टीवी चैनलों के आने के बाद ज़ीटी पर मनोहरश्याम जोशी का एक धारावाहिक 'ज़मीन आसमान' भी प्रसारित हुआ था लेकिन चल नहीं पाया।

दूरदर्शन ने तो फिर भी एक हद तक साहित्य के प्रति अपना प्रेम बनाए रखा, संभवतः इसलिए भी कि कमलेश्वर, यादव और चित्रा मुद्गल जैसी साहित्यिक हस्तियां दूरदर्शन से सीधे या प्रसार भारती के माध्यम से जुड़ी रही हैं। लेकिन निजी चैनलों ने साहित्य के प्रति किसी तरह का लगाव नहीं दिखाया। देशी ही नहीं अमेरिकी साहित्य पर आधारित धारावाहिकों को भी दूरदर्शन ने दिखाया। इनमें जेन ऑस्टिन के उपन्यास 'प्राइड एंड प्रिज्युडिस' पर आधारित इसी नाम का एक सीरियल भी था। टीवी पर साहित्य के हाशिए पर चले जाने का जो प्रत्यक्ष कारण समझ में आता है वह है व्यावसायिक दबाव। दरअसल निजी चैनलों के आने के बाद इन चैनलों और धारावाहिक निर्माताओं को आपस में ही व्यावसायिक प्रतिद्वंद्विता का सामना करना पड़ा। पहले टीवी की दुनिया में दूरदर्शन ही अकेला खिलाड़ी था और एक तरह से उसका एकाधिकार था। लेकिन अब ऐसा नहीं रहा था।

इन सभी चैनलों को अपने लिए न सिर्फ दर्शक जुटाने थे बल्कि उन्हें अपने साथ बनाए रखना था। इनके बीच एक तरह की गलाकाट प्रतियोगिता शुरू हो गई जो समय के साथ हल्की पड़ने के बजाय और अधिक कड़ी होती चली गई। हालांकि सोप ऑपेरा की शुरुआत 'हम लोग' और 'बुनियाद' जैसे धारावाहिकों के जरिए हो गई थी लेकिन डेली सोप की तरफ कदम बढ़ाने की हिम्मत काफी देर से की जा सकी। इसके लिए शाम के प्राइम टाइम के बजाय दोपहर के समय को चुना गया। पहले यूटीवी के 'शांति' और फिर प्लस चैनल के 'स्वाभिमान' की शुरुआत दूरदर्शन पर हुई। 'शांति' एक ऐसी लड़की की कहानी है जिसकी मां के साथ फिल्मी दुनिया की दो बड़ी हस्तियों ने बलात्कार किया था और जिसके नतीजे में वह गर्भ में आई थी। अब वही लड़की इन दोनों से अपनी मां का बदला लेने के लिए कमर कस चुकी है। शांति की भूमिका इसमें मंदिरा बेदी ने निभाई थी। 'स्वाभिमान' एक व्यवसायी द्घराने के प्रमुख के मारे जाने के बाद कंपनी का चेयरमैन बनने और सत्ता हासिल करने के लिए उसके परिवार के भीतर पनपने वाले झगड़ों और षड्यंत्रों की कहानी है। दिलचस्प बात यह है कि ये दोनों ही धारावाहिक पसंद किए गए। 'स्वाभिमान' का निर्देशन महेश भट्ट ने किया था और इसे शोभा डे ने लिखा था। इनकी सफलता ने यह भी साबित कर दिया कि पुरुषों की तुलना में महिलाएं काफी बड़ी संख्या में धारावाहिक देखती हैं।

सफलता का एक फार्मूला दिया एकता कपूर के बालाजी टेलीफिल्म्स ने। बालाजी के दो धारावाहिकों 'कहानी द्घर द्घर की' और 'क्योंकि सास भी कभी बहू थी' ने प्राइम टाइम पर सबसे ज्यादा दर्शक जुटाए। इन्हीं की बदौलत स्टार प्लस चैनल बाकी सभी चैनलों को पीछे छोड़ता हुआ तेजी से आगे बढ़ा। एकता यह तो जान ही गई थी कि कोई भी धारावाहिक हिट करवाना है तो उसे महिलाओं को नज़र में रखकर बनाया जाए। ये दोनों धारावाहिक इसी लाइन पर थे। इनमें ऊपरी तौर पर तो पारिवारिक मूल्यों की बात की जाती थी लेकिन वास्तव में कहानी द्घर की औरतों के बीच सत्ता के लिए चली गई चालबाजियों की होती थी। सकारात्मक भूमिका की बजाए नकारात्मक भूमिका वाली महिलाओं को ज्यादा प्रमुखता के साथ पेश किया गया। ये सभी द्घर-समाज के समृद्ध तबके से संबंधित थे और इनकी महिलाएं हमेशा गहनों से लदी रहती थीं। संवाद के नाम पर इनके मुंह से हमेशा जली-कटी ही निकलती थी। इन धारावाहिकों के बारे में भी वह बात सही है जो अक्षय कुमार ने अपनी फिल्मों के बारे में कही थी कि इन्हें देखने के लिए दिमाग को बाहर छोड़ देना ही बेहतर है। दर्शकों को बांधे रखने के लिए एकता ने और भी कई तरह के प्रयोग किए। सफलता पाने के लिए दूसरे धारावाहिक निर्माता भी ज्यादातर एकता की ही राह पर चले। इन धारावाहिकों की कहानी सुस्त रफ्तार से चलती थी। शॉट की लंबाई बढ़ाने के लिए हर संवाद के बाद कैमरा वहां मौजूद हर पात्र के चेहरे पर जूम इन होता था और ांय की जोरदार आवाज के साथ संगीत बजता था।

हर दो मिनट में कोई गाना आ जाता था, जिसके साथ उससे संबंधित पात्र के चेहरे के विभिन्न कोणों से क्लोज़अप और फ्लैश बैक भी सीपिया टोन में दिखाए जाते थे। इस सब के बीच में साहित्य और साहित्यकारों की जैसे याद भी नहीं आई। गुजराती के कुछ उपन्यासों पर भी धारावाहिक बने लेकिन सफलता पाने की दौड़ में उनकी कहानी को भी अपनी तरह से उलट-पलट दिया गया। सास-बहू के इस फार्मूले को पहला झटका मिला धारावाहिक 'जस्सी जैसी कोई नहीं' से। इसमें एक ऐसी लड़की के संद्घर्ष की कहानी थी जो एक निम्नमध्य वर्ग की थी लेकिन सपने बड़े देखती थी। उसके अंदर किसी तरह का आडंबर नहीं था। अपनी सरलता और ईमानदारी के बल पर ही वह आगे बढ़ती है। किसी तरह के जोखिम से बचने के लिए कुछ ऐसे चरित्र भी डाल दिए गए थे जो हमेशा षड्यंत्रों में लगे रहते हैं। लेकिन जल्द ही यह धारावाहिक भी उसी लाइन पर चला गया। आज हालत यह है कि दर्शक सास-बहू के फार्मूले से ऊब चुका है और उसे कुछ नया चाहिए। इसी का परिणाम है कि कलर्स चैनल 'बालिका वधू' और 'उतरन' जैसे धारावाहिक दिखाने की हिम्मत कर सका। 'बालिका वधू' टेलीविजन टीआरपी के मामले में आज सभी कार्यक्रमों को पीछे छोड़ चुका है। खुद एकता कपूर ने एनडीटीवी इमेजिन के लिए दो सीरियल 'बंदिनी' और 'कितनी मुहब्बत है' बनाए। इनका प्रसारण शुरू हो चुका है। यह बताना जल्दबाजी होगा कि एकता अपने पुराने ढ़यों के हिसाब से चलाना चाहती है। वह बाल विवाह की समर्थक है। गौने से पहले विधवा हुई लड़की के प्रति उसके दिल में नफरत ही है। अपने अधेड़ विधुर बेटे वसंत के लिए उसे कुंआरी लड़की चाहिए और पैसे के बल पर वह एक गरीब परिवार की अठारह साल की लड़की से उसकी शादी करा भी देती है। वसंत आंख बंद करके अपनी मां की हर बात को ईश्वरीय आदेश मानकर चलता है।

इनके बरअक्स कल्याणी का छोटा बेटा भैरों और उसकी पत्नी आज की परिस्थितियों के हिसाब से चलने में विश्वास रखते हैं। लेकिन मां के सामने उसकी जबान नहीं खुलती। 'बालिका वधू' की केंद्रीय भूमिका आनंदी की है जिसकी शादी बचपन में ही भैरों के बेटे जगदीश से करा दी जाती है। शादी को लेकर उसके द्घर में उसे जो कुछ बताया जाता है, उसके मन में उत्साह जगाता है। उसके अपने सपने हैं जो शादी के बाद टूटते चले जाते हैं। लेकिन उसका बाल मन जरा सी राहत में अपने आप को संतुष्ट भी कर लेता है। द्घर में पहली बार विद्रोह करती है वसंत की पत्नी गहना। उसे भैरों और उसकी पत्नी का मूक समर्थन प्राप्त है। इस धारावाहिक में दादीसा को हम उस तरह का बुरा चरित्र नहीं कह सकते जिस तरह के बुरे चरित्र सास-बहू वाले धारावाहिकों में नजर आते हैं, जो स्वार्थी हैं, लालची हैं और किसी भी हद तक बुरे हो सकते हैं। दादीसा अपनी सोच को लेकर स्पष्ट है। अपने तई वह कुछ भी गलत नहीं कर रही है। उसके हिसाब से जो कुछ पुरानी मान्यताओं के खिलाफ है, वह गलत है और उसका न सिर्फ वह मुखर विरोध करती है, बल्कि ऐसा करने वाले को दंडित भी करती है। भले ही आज के हालात में वह सही ही क्यों न हो। अपने पोते को पाने के लिए वह इस बात की परवाह नहीं करती कि बहू की जान भी जा सकती है।

उस कोशिश में बहू को खोने का उसे कोई गम नहीं है, उसे गम है कि उसका बेटा अकेला रह गया है और वह उसकी शादी की फिराक में लग जाती है। नई बहू के साथ भी कुछ ऐसे ही हालात बन रहे हैं तो वह सास के विरुद्ध उठ खड़ी होती है। लेकिन जब देखती है कि उसके माता-पिता पर बन आई है तो वह समझौता कर लेती है और बच्चे को पैदा करके अपनी जान देने के लिए तैयार हो जाती है। एक सार्थक कहानी को लेकर चल रहे धारावाहिक का निर्देशक इतना जरूर करता है कि बहुत सी स्थितियों को लाउड हो जाने देता है क्योंकि यह व्यावसायिकता की मांग है। ऐसे धारावाहिक दर्शकों की रुचि को बेहतर बनाने में सहायक होते हैं। अगर दर्शक इन्हें पसंद करते हैं तो उम्मीद की जा सकती है कि हमें टीवी पर कुछ बेहतर चीजें देखने को मिलेंगी। हो सकता है जो साहित्य इन धारावाहिक निर्माताओं के लिए त्याज्य हो गया था, उसकी ओर वे फिर लौटें।

 
 
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