गजल
बीमारों की असली तबीयत पता हो, हमें उनकी मेहनत की नीयत पता हो।
तुम्हें गर मेरे सच की जुर्रत पता हो, तो आएगी किस दिन कयामत पता हो।
पिता सर पे, पलकों पे मां को रखेंगे बशर्ते कि उनकी वसीयत पता हो।
क्या तोड़ोगे आईना, कुचलोगे चेहरा? करोगे भी क्या गर हकीकत पता हो।
वो इजहारे-उल्फत संभलकर करें गर, जो है होने वाली वो जिल्लत पता हो
गजल
गो तीर छूटा पर हदों के दरमियान रहा न बेईमान हुए और न ईमान रहा
पहुंच भी पाऊंगा मंजिल पे, खुदपे शक है मुझे मैं आए दिन अगर उतारता थकान रहा
मैं बूढ़े द्घाद्घ तजुर्बों से बचके रहता हूं यही है राज कि मासूम और जवान रहा
वो अपने बारे में थोड़ा तो जानते होंगे मुझे था उनपे, उन्हें खुद पे ये गुमान रहा
लो एक तीर भी साबुत-कमर नहीं निकला मैं खामख्वाह ही ताने हुए कमान रहा
छुआके पांव, दुआएं तो उसको दी मैंने वो टांग खींच न ले, ये भी मुझको ध्यान रहा
जबसे धरती के पास रहता है चांद अकसर उदास रहता है
आओ झुग्गी से ये पता पूछें किस गली में विकास रहता है
साफ गोई से डरती भाषा में अलंकार औ' समास रहता है
जबकि कहने को कुछ नहीं रहता क्यूं खलिश है कि खास रहता है
छोड़ पाया नहीं 'वरन' वरना कहने को वो बिन्दास रहता है
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