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Galgotia Institute of Technology
 
 
   
 
 

ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
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लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान और इसके कुछ दिन पूर्व की हिंसक द्घटनाओं ने जैसे लोकतंत्र का चीर हरण शुरू कर दिया ...
 
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संजय ग्रोवर
 

गजल

बीमारों की असली तबीयत पता हो, हमें उनकी मेहनत की नीयत पता हो।

तुम्हें गर मेरे सच की जुर्रत पता हो, तो आएगी किस दिन कयामत पता हो।

पिता सर पे, पलकों पे मां को रखेंगे बशर्ते कि उनकी वसीयत पता हो।

क्या तोड़ोगे आईना, कुचलोगे चेहरा? करोगे भी क्या गर हकीकत पता हो।

वो इजहारे-उल्फत संभलकर करें गर, जो है होने वाली वो जिल्लत पता हो

 

गजल

गो तीर छूटा पर हदों के दरमियान रहा न बेईमान हुए और न ईमान रहा

पहुंच भी पाऊंगा मंजिल पे, खुदपे शक है मुझे मैं आए दिन अगर उतारता थकान रहा

मैं बूढ़े द्घाद्घ तजुर्बों से बचके रहता हूं यही है राज कि मासूम और जवान रहा

वो अपने बारे में थोड़ा तो जानते होंगे मुझे था उनपे, उन्हें खुद पे ये गुमान रहा

लो एक तीर भी साबुत-कमर नहीं निकला मैं खामख्वाह ही ताने हुए कमान रहा

छुआके पांव, दुआएं तो उसको दी मैंने वो टांग खींच न ले, ये भी मुझको ध्यान रहा

जबसे धरती के पास रहता है चांद अकसर उदास रहता है

आओ झुग्गी से ये पता पूछें किस गली में विकास रहता है

साफ गोई से डरती भाषा में अलंकार औ' समास रहता है

जबकि कहने को कुछ नहीं रहता क्यूं खलिश है कि खास रहता है

छोड़ पाया नहीं 'वरन' वरना कहने को वो बिन्दास रहता है

 
 
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बहरहाल इस बचवा प्रकरण के चलते गदाआँार बाबू अपने भाई- बहनों की तुलना में कुछ ज्यादा ही कहना चाहिए जरूरत से बहुत-बहुत ज्यादा ही लाड़-प्यार और महत्व पा गए। सुनते हैं किसी ज्योतिषी ने भी जाने किस तुफैल में उनकी कुंडली-वुंडली देख के उन्हें रतन-वतन बता दिया। बस इसी चक्कर में ...
 
जड़ें कुछ वृक्षों की, पौधों की, ऊपर तक आ जातीं लिपटीं तनों से। नसों की तरह उभरी। ज्यादातर धरती के नीचे अंधेरे में, कैसे कसकसातीं, पर, जीवन जगाती हैं ,....
 
उनका सारा भय निकल गया, ठेला और रिक्शा धकेलने में ही इसलिए निश्चिंत हो सो गए-सड़क की बीच वाली पटरी पर।
 
भाषा और साहित्य का भविष्य क्या होगा? इसमें केवल निराशा ही दिखाई देती है या आशा के भी कुछ बिन्दु हैं? प्रस्तुत है वरिष्ठ साहित्यकारों से युवा आलोचक साधना अग्रवाल की बातचीत ...
 
यह क्रांतिकारी सामाजिक- सांस्कृतिक चेतना चौदहवीं- पन्द्रहवीं सदी के भारत में सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों में आए मूलभूत बदलावों के कारण आई ...
 
क्यूबा यात्रा के पूर्व मैं प्रो. मैनेजर पांडेय की पुस्तक 'संकट के बावजूद' में राबर्टो फर्नांडीज पर न केवल जोफ्रेडो और जॉन बेवरली की बातचीत ..
 
हाल ही तक टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कथा धारावाहिक अब तक सास-बहू के रिश्तों और परिवार के भीतर चलने वाले षड्यंत्रों पर ही ज्यादातर केंद्रित रहे हैं।...
बीमारों की असली तबीयत पता हो, हमें उनकी मेहनत की नीयत पता हो। तुम्हें गर मेरे सच की जुर्रत पता हो, तो आएगी किस दिन कयामत पता हो। ...
यह उन दिनों की बात है जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था। इस बीच मुझ जैसे बेरोजगार को एक अर्से पश्चात पंजाब यूनिवर्सिटी से लेक्चरर पोस्ट के लिए बुलावा आ गया था। ...
 
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