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| Welcome
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| जड़ें : एक श्रृंखला |
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एक
जड़ें कुछ वृक्षों की, पौधों की, ऊपर तक आ जातीं लिपटीं तनों से। नसों की तरह उभरी। ज्यादातर धरती के नीचे अंधेरे में, कैसे कसकसातीं, पर, जीवन जगाती हैं पत्तों, मंजरियों, और फूलों-फलों में। |
दो
दिखतीे नहीं। थामे मजबूती से वृक्षों और पौधों को। जल्दी उखड़ती नहीं। सोखती पानी को। माटी जरूर जब बाढ़ में वर्षा में बह जाती कटकर है, अटकीं अधर में कहीं, बिछुड़न एक गहरी दिखलातीं।
तीन
जड़ें हैं कभी कहीं दूर तक चली जातीं नीचे ही नीचे धरती को चीर कर भीतर कहीं खो जातीं। कितनी ही चीजों से हैं खुद को पोसतीं। माटी में धुलती हुई चीजों से अपना रसायन एक आप ही बनातीं।
चार
रेत में भुरभुरी माटी में कुछ विशेष वृक्षों को धारे हुए, चंचल हवाओं में, उनको बचातीं। कभी-कभी चट्टानों बीच भी दृढ़ता से जम जातीं। पांच गुट्ठल सी कुछ जड़ें। जड़ें रेखाओं-सी। लहरिया। द्घुमावदार। जड़ें जटाओं-सी सुंदर दिखलातीं। धरती से ऊपर आ चौंककर पक्षियों चींटियों चींटों, मधुमाक्खीयों गिलहरियों को देखतीं, देखती रह जातीं।
छह
देख उन्हें हम हैं ठिठक जाते। किन्हीं बहुत ऊंचे द्घने वृक्षों की ऊपर तक उभर आई जड़ों में कभी-कभी दिखती कुछ हरी-सी कोंपलें मानो स्वयं वृक्ष ही ही जातीं जड़ें। कभी-कभी लेती हैं बैठा किसी जुगल जोड़ी को, पथिक को, वृत्त में अपनी- झरतीं आशीष-सी पत्तियां उन पर।
सात
धारे हुए अंधड़ में, तेज हवाओं में, तनों सहित डालें टहनियां चिड़िया द्घोंसले गहरे एक धीरज से जड़ें हमें विस्मित कर जाती हैं चांद सितारे सूरज आते और जाते हैं। फैलाकर रोशनी। वृक्षों को जड़ें और ऊपर उठा देतीं, अपने ही कंधों पर ऊपर और ऊपर को, छूने आकाश! कभी-कभी हरियातीं बंजर और ऊसर को।
आठ
धरती आकाश के मर्म पहचानतीं। छिपी हुई रहकर भी जानतीं, भेद वे, अंधेरे, प्रकाश के। जीवन के रूप कई रह-रह बखानती चुपचाप! चुपपचाप!! अपने में लीन तल्लीन वे रही चली आतीं!
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| तीन तल्ला शयनयान |
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तीन तल्ला शयनयान छह खीसों वाली पतलून शुरुआती सर्दी की सुबह सुबह आठ बजे लंबी यात्रा वाली यह टे्रन। झाग भरे मुंह में टूथ बुरुश मांजता गर्दन पर डाले तौलिया फिल्मी अदा से सण्डास के बाहर आईने में निहारता मुदित भाव पंजाब से लौटता वह, खुद के अनुसार दुनियादारी में सिद्धहस्त हो चुका, युवा कामगार पिचके |
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| गालों वाला/तीनतल्ला शयनयान। झाड़े चला जा रहा वह छोटा बच्चा छोटे से झाडू से मूंगफली के छिक्कल, पूड़ी के टुकड़े, प्याले प्लास्टिक के और मार गन्द-मन्द डब्बे के इस छोर से झाड़ता-बटोरता बढ़ रहा आगे खुद में ही कल्मष सा वह बच्चा बढ़ा चला आ रहा आगे इस तीन तल्ला शयनयान में, आई, फिर वह आई, तीन बरस की बेटी नटिनी की।
गालों में उंगली से लाल रंग के टुपके भोली-प्यारी आंखों में मोटा-मोटा काजल तीन बरस की बेटी नटिनी की आई गलियारे में डिब्बे के इस छोर से उस छोर तक दौड़ी अपनी मुण्डी हिलाती साभिनय कुछ भी बोले बगैर द्घूमता बस टोपी का फुंदना। फिर थोड़े करतब, कुछ कठिन कलाबाजियां पीछे से युवती अम्मा ताल ठोंकती एक दफ्ती के डब्बे पर आगे वह, तीन बरस की भोली प्यारी बेटी नटिनी की। हैरत में सभी खिंचे वाह-वाह-वाह-वाह भेजो जी भेजो इनको ओलंपिक में 'रुपिया दो रुपिया
मैंने भी सोचा कुछ रख दूं उस लाल टुपका लगी नन्हीं गोदली पर पर खुदरा न था। जेब में एक हाथ डाले सहलाता किया वह बड़ा नोट दूसरे हाथ से बच्ची के सर पर प्रोत्साहन भरी थपकी जो ताल की तरह तो नहीं मगर कुछ बजी मेरे ही भीतर 'धत्-धत्-धत्-धत्' तीन तल्ला शयनयान छह खीसों वाली पटलून। |
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| तीन कविताएं |
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विचाराधीन
मैंने उसे दिमाग के विचाराधीन खाने में डाल दिया है। उसने मुझे धोखा दिया है झूठ बोला है जबकि किसी से दो शब्द सच्चाई के बोलने में भाषा जवान होती है वरना इतना कपट भरा है इस संसार में कि नफरत ही शासन करती है। आजकल इतना डर हेै इस तनावग्रस्त जीवन में कि हर पल लगता है कोई थैला लिए पीछे आ रहा है कचरा डालते वक्त बम फटने की दहशत होती है। किसी साइकिल सवार को देखकर सोचता हूं यह किधर से आया होगा अपने हितचिंतकों की संजीदा गमगीन आंखों में झलकती है उनकी कुशलतम अभिनय कला क्योंकि न तो वे जीवन लौटा सकेंगे और न ही हमारा दुःख कम कर सकेंगे। वे कुछ भी तो नहीं कर सकते हैं पर इतने लाचार होते हुए भी वे हमारे लिए विशिष्ट जन हैं उनके ही दल में शरीक है मेरा दोस्त जो झूठ कहता है कि वह तब शहर में नहीं था कि वह हत्यारों को जरूर सजा दिलवायेगा कि उनके मजहब के बारे में उसे पूरा यकीन है। मैंने उसे अपने दिमाग के विचाराधीन खाने में डाल दिया है। |
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एक कार्यकर्ता की मौत पर
वह बहुत पहले ही मर चुका था। हम कहते तुम मरे हुए हो फिर क्यों परेशान होते हो कि लोग तुम्हारे बुलाने पर आते नहीं हैं बताओ, क्या तुमने पूरी निष्ठा से उन्हें संगठित करने की कोशिश की थी? क्या वाकई तुम अपना महत्व नहीं चाहते थे? मंच का अधिकांश समय खुद हड़पने की आखिर कौन सी प्रतिबद्धताएं थीं? जब चीजें बदलती नहीं हैं तो स्वतः मर जाती हैं आदमी जब किसी अनन्त होती प्रतीक्षा में जीता है तो निशक्त हो जाता है। न तो कोई आंदोलन खड़ा हुआ न किसी विरुद्ध का जमावड़ा हुआ फिर क्यों एक कतार होती जो उसके पीछे चलती सब कोई आर्थिक सुरक्षा के जिरह बख्तर जुटाने में लगे थे लेकिन जो मर चुका था उसे दफन नहीं होने की जिद थी। कितने ही उठाने वाले आए और रास्ते से गुजर गए लाश जहां की तहां पड़ी हुई है।
खोने के लिए कुछ भी नहीं है
जहां काम मिल जाता है चले जाते हैं एक तप्पड़ तान लेते हैं एक टुकड़ा बिछा लेते हैं दो पत्थर रखकर चूल्हा बना लेते हैं हैंडपंप से पानी लाने जाते हैं तो सूखी टहनियां बीन लाते हैं एक असंभव-सा स्वप्न है कि मजदूर से ठेकेदार होंगे खूब सारे रुपये गिनेंगे दूसरों में बांटेंगे मानसून ने छल किया तो द्घर से भाग छूटे जमीन ने कुछ नहीं दिया तो परदेस जाती बस में चढ़ गए हमारे साथ भागते हुए बच्चे स्त्रियां हमारे काम में हाथ बंटाते हैं सब चाहते हैं जीवित रहना क्योंकि जीवन से कीमती तो कुछ भी नहीं है उसके लिए भी जो मर मर कर जीता है और देखता रहता है हमें बिजली पानी राशन जिसकी कृपा है वह भी तो बहुत परेशान है अपनी विभागीय लड़ाइयों से/उसे भी तो उच्च शिक्षा के लिए अपने बेटे-बेटियों की फीस भरनी है कल ही स्वागत पार्टी में कढ़ी में काजू ज्यादा हो गए थे और वह कार से बार-बार उतरकर जंगल की तरफ भागता रहा था। सब के अपने-अपने दुख हैं चिंताएं हैं बड़े लोगों की बड़ी चिंताएं हैं पर फिर भी वे हमारे लिए कुछ करना चाहते हैं गांव तक पक्की सड़कें बनाते हैं ताकि वे हम तक पहुंच सकें रोशनी होगी तो वे देर रात तक हमसे बातें कर सकेंगे हमारे साथ बैठकर खायेंगे हे मारा दुख दर्द सुनेंगे। कहीं न कहीं इस या उस शहर में उनका कुछ खो गया है उन्हें भय है कि कहीं वे इस बाधा दौड़ में पिछड़ नहीं जाएं कहीं कोई उनसे बेहतर कार, द्घर, उपकरण और विदेश यात्राओं का सुख नहीं भोग ले अगर दुर्भाग्यवश ब्याज दर बढ़ी या शेयर गिरे/या पदोन्नति नहीं हुई तो जैसे उनका सब कुछ लुट जाएगा वे इतने निर्जीव और परास्त दिखाई देंगे कि जैसे समूचा ब्रह्मांड ही नष्ट हो गया हो एक हम हैं कि हमारे पास खोने के लिए कुछ भी तो नहीं है। |
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| तीन कविताएं |
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वृष्टि : सृष्टि
किसी ने कहा कि वृष्टि होगी आज दिन की उमस का अंत करने क्षितिज में कौंधते हैं बादलों के आगे दौड़ती बिजलियों के पांव वृष्टि होगी आज मैंने कहा : हां सृष्टि होगी आज चुप्पी भरे उमसीले दिनों बाद आज कौंधती है सजल मेद्घों की विद्युत्-परछाई तन-मन में सृष्टि होगी आज |
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झींगुर बहादुर
झींगुरबहादुर बोला किए रात-भर कि सुनते-सुनते याद आते रहे 'निराला' कहते- 'झींगुर डट कर बोला' वह कोई एक झींगुर, अल्पप्राण इतना बड़ा जिसका ध्वनि-वितान कि जिसका केन्द्र कहां-जान न पड़ता कितना भी सुनो एकाग्र-कान सुना किया रात-भर बादलों को और आगामी सन्ततियों को बुलाने वाला वह अविराम स्वर पौ फटी, तो रात की लंबाई नापने वाला वह स्वर चुपाया और मैं सोचता रहा यह छतनार ध्वनि-वृक्ष उगाने वाला झींगुर सुबह कहां दिखेगा दिखी भी तो वह एक निरीह सी काया होगी उचरुंग की!
ऋतुसंधि
अभद्रपद भाद्रपद चला नगर से भूरे-ऊदे बादलों को समेटे छोड़ता नगर के माथे आश्विन आकाश तितलियों ने जिसमें पंख खोले हैं, रंगबिरंगे पंख तोले हैं मंडराई हैं मगन पराग का अंगराग मल, सज्जित किए सौन्दर्य बची-खुची तितलियां शायद एक अस्तमान् अस्तित्व का उदयाभ उल्लास-नृत्य हम देखते रहे हों अभिभूत, उस पल, दृष्टि-परास में बह रही गंगा को लिए गंगा के सिरहाने नई बनी कॉलोनी में बतियाते खड़े वहां, जहां मकानों ने फालतू जान धरती के एक चप्पे को छोड़ दिया खाली जिसको सबुज रंग में रंग कर जहा रहा तनिक लंगड़ाते पांवों बूढ़े हंसमुख पेंटर-सा सूर्यास्तों से बादली रंग समेट कंधे पे झोला संभाले भाद्रपद अभद्रपद तब देख कर भी हम न चीन्ह पाए उस वक्त उसे क्षितिज में धीरे-धीरे छोटे-से-छोटा होता वह बादल बच्चा अपना रंगीन हाथ विदाई में लहरा रहा था! हां, तब उत्तर दिशा से गंगधार के ऊपर-ऊपर उड़ते आए नगर में अभी-अभी दाखिल हुए खंजन की हिल रही थी चंचल दुम वह खंजन जो पंखकटे हिमगिरी के पंखिल प्राण-कणों की तरह उड़ते खंजन समूहों के आगे-आगे हियवाला हिरावल क्योंकि उसे इधर केवल जाड़ा ही नहीं बिताना नगर में शरद की शुरूआत भी द्घोषित करनी शुभंकर |
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| प्यार अब भी |
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(१)
इस कदर भरपूर था प्यार कि लाचार थी। दे देना ज़रूरी था। वरना सड़ कर सिरका बना होता। यूं ऐसा कोई था तो नहीं जो प्यार के काबिल होता। पाने की काबिलियत से नहीं देने की लाचारी से हुआ करता है प्यार
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(२)
जो भी जैसा भी थोड़ा बहुत मिला प्यार के काबिल, वह खुद खासा लाचार जाने किस खोह में कैद खुद किसी 'प्यार के काबिल' की तलाश में ग़मगीन निखद्द नाकाबिल ज़माने भर का। इतना भी तो उससे हो नहीं सकता था कि पड़ा भी पाता तो उठाता, रख लेता संभालकर जबकि अब तक भी इस ज़माने में भी उसके लिये प्यार का होना संदिग्ध नहीं था। लेकिन पड़ी मिली किसी भी अपरिचित अनजान वस्तु के खतरनाक हो सकने की मुनादी थी।
(३)
सिर्फ ईश्वर को किया जा सकता था प्यार क्योंकि वह अनुपस्थित था। शुक्र है कि अब अंत है एकांत है, अवकाश है अब वह बैठ कर रचेगी अपना ईश्वर और देखेगी वह प्यार के काबिल है या नहीं।
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| छह कविताएं |
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हमारी तरफ यम के नाम का एक पुराना दीया दीवाली की एक रात पहले हर द्घर से निकलता है। सार्वजनिक कूड़े पर 'जमदिपकी' बाली जाती है और फिर उसे द्घेरकर मुहल्ले की गृहणियां प्रार्थना करती हैं कि यमदेवता प्रसन्न हों और अकाल मृत्यु किसी की न हो |
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अच्छा तो ऐसे ही फिरते हैं द्घूरे के दिन! राख ओढ़ कर कहीं पड़ा हुआ ये औद्घड़ द्घूरा जमदिपकी का त्रिपुण्ड धारे हुए सर पर नाच रहा है देखो-कैसै! नाच रहे हैं संग उसके मुहल्ले के एक-एक द्घर में पके आलू-गोभी-मटर के छिलके, आंवला-बहेरा-चिरैता नाच रहे हों शब्द एक समवेत प्रार्थना केः यमदेवता हैं प्रसन्न! वनस्पतियां लहलहाएं इस धरती की! धरती के सब बंधु-बांधव, पशु-पक्षी और जीव-जन्तु जिएं सौ बरस! यमदेवता हों प्रसन्न! छूटें सब हारी-बीमारी, छूटे यह ग्राम-प्रांतर मृत्यु के भय से- खरबूजा पककर ज्यों खुद छूट जाता है अपनी लतर से! नाच रहे हैं शब्द जिएं-मगर, नाच रहे यमदेवता आज बीच शहर- धुंआ-धमाका-भगदड़! और अब लो, अधर! सजी-धजी जमदिपकी बांच रही है टीवी पर ताजा समाचार- दीवाली की पूर्व संध्या पर बम फूटा आज सरे बाजार!
मेक-अप १
दूरदर्शन में मेक-अप मैन थे अपने शौकत अली! इंदिरा गांधी का मेक-अप उन्होंने किया था कभी! इस बात की झुरझुरी उनमें आपातकाल द्घोषित होने के दिन तक बनी रही! फिर कुछ महीने उन्हें लग गया गलाबखोर, कुछ बोला न जाए! बस टुकुर-टुकुर ताकें! कई महीने बाद एक दिन वे बुदबुदाए ये ही सब जब होना था यहां भी क्या बुरी थी रावलपिण्डी?
मेक-अप २
उनके बारे में एक चुटकुला चलता था! वो ये कि इतने रहमदिल थे शौकत अली, भागे भी तो अपनी महबूबा के चार बच्चों के साथ और उसके बाद उसके शौहर को चिट्ठी लिखी- 'माफ कर दें, जनाब! आप अपना खयाल रखें, मैं इनकी देखभाल/ठीक ही करूंगा! आप इनका हलवाटाइट रखते थे। जाहिर है, आप भी खुश तो नहीं थे। अब खुश रहें।' और किसी चीज की जरूरत हो तो मुझे इत्तला करें।
मेक-अप ३
आजिजी की हद बस इतनी थी कि कभी-कभी सर पर रख लेते थे हाथ- कुदरत भी हद करती है कभी-कभी! दुनिया की आर्ट-गैलरी में टांग दिए हैं उसने ज्यादातर चेहरे अपनी रफ कॉपी से सीधा उठकर! खैर, गनीमत यह है कि हर आंके-बांके चेहरे के पीछे रख दी है उसने मेक-अप भी सूची थी। मेक-अप की सूची? हम चौंकते! हां, इसे और क्या कहें! मेक-अप की कूची कहेंगे- कुछ तो हर आदमी में होता है ही प्यार करने लायक! वो ही कर देता है सब मेक-अप। लेकिन हां, मेक-अप नहीं होतीं इतिहास की चूलें! मेक-अप नहीं होती दिल की लगी! कहते-कहते फिर वे खो गए खयालों में!
४
इधर कुछ दिनों से वे पगलाए फिरते हैं इधर-उधर गलत फहमियों-सॉरी चीखते हुए-मेक-अप, मेक-अप, मेक-अप! रूठे हुओं को मना लो! दुनिया की सब गफलतों-सॉरी! सब हसरतों, सॉरी! ़ ़ ़मेक-अप, मेक-अप, मेक-अप, सॉरी-सॉरी-सॉरी वो ़ ़ ़उधर उस गली में रहती हैं वृद्धा मिस इंडिया रीता फारिया, उनके भी ये होंगे मेक-अप मैन! पर आज वे कर रही हैं इनका मेक-अप! हाथ-मुंह धुलाती हैं, खाना खिलाती हैं- बाकी तो सब-के-सब टूट गए, रूठ गए रूठी जो किस्मत। लो, मगर आज ये हुआ क्या? शौकत अली फिर से उठा रहे हैं पाउडर का ़ ़ ़ पाउडर है या उदासी जो झड़ रही है पफ से चेहरे पर वृद्धा उस रूपगर्विता के जिसने देखे थे कई पतझड़ उन कैमरों की चकाचक में कैद! रोशनी भी तेज है-जानते हैं ये दोनों ही! लगता है, अंधियारा आंचल है ओढ़ें इसे और सौ-जाएं थकी हुई आंखें!
जिद्दी
चिड़िया से मत पूछो- चिड़िया क्यों चिड़िया है, पेड़ नहीं! मत पूछो नदियों से क्यों वे उमड़ती हैं- पर्वत को चिक् पर करो पूछकर कि इतना भी क्या अटल रहना! मत भेजो सम्मिलित आवेदन महामहिम बिच्छू परिषद को कि 'श्रीमान, सेवा में सविनय निवेदन है- डंक जरा कम मारें, सुध जरा कम लें हमारी, और अपनी राह जाएं। मत करो बेचारे की कर से प्रार्थना कि आंचल भर दे हमारा वो रस से मताए हुए आमों से! प्रार्थना सुन भी लेगा तो अगर, सुनकर जरा कसमसाएगा, और उसके कसमसाते ही एक और कांटा बेचारे की छाल फोड़कर बाहर आ जाएगा।' अब जाकर समझी हूं मां, तुम्हारी बात थोड़ी-सी- वो भी पूरा तो नहीं समझे- थोड़ा जो समझी वो ये- जो जहां है, कैद है अपने होने में जैसे कि तोड़े हुए फूल प्लास्टिक मढ़े हुए दोने में? जानते हैं हम ये फिर भी कितनी सदियां बीत जाती हैं एक अदद आस तोड़ लेने में! जो जैसा है, उसको वैसा ग्रहण करके चुपचाप हाथ जोड़ लेने में। खुद क्या मैं कम ऐसी वैसी हूं? मेरा सत्यानाश हो, मैं ही कीकर हूं, चिड़िया, नदी और पर्वत, बिच्छू और मंजरी-समेत एक धरती हूं पूरी-की-पूरी मैं ही हूं धरती की जिद्दी धमक- 'क्यों-कैसे- हां न से पूरी हुई रस्सी! और मुई रस्सी के बारे में कौन नहीं जानता- रस जो जल भी गई तो बलखाना नहीं छोड़ती। |
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| दो कविताएं |
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पागल नहीं
कोई पागल ही काटेगा किसी को यूं ही अब जब दत्ता साहब जैसे सज्जन को एक कुत्ते ने काट लिया है स्थापित निष्कर्षों के अनुसार कुत्ता पागल होगा ही उम्रदाराज़ दत्ता साहब सीनियर सिटीजन एक झोला लिए हाथ में द्घूमते हैं दिन भर दफ्तर-दफ्तर पेंशनरों के मसले हल करते हैं मीटिंग करते हैं प्रेस को खबर देते हैं गृहमंत्री को लिखते हैं अब पहले दरयाफ्त कर रहे हैं कि कुत्ता पागल तो नहीं उन्हें आदमी का भौंकना दिखाई दे रहा है उन्हें बताया लोगों ने आप ही को नहीं ठीक आपके पहले, वहीं पर, एक औरत को भी काटा है वो देखिए पैर पकड़ कर बैठी है एक निहायत लोकल ने बताया कुत्ता नहीं कुतिया है वह जिस किसी को हाथ में झोला लिए देख रही है काट दे रही है गच्च से वैसे निश्चित रहें आप ये पागल नहीं है दरअसल इसने बच्चे जने हैं अभी-अभी कोई इसकी झपकी में एक नवजात उठा ले गया है इसने एक झोले वाले को देख लिया था ओझल होते अब इसे हर झोले वाले पर संदेह है पता नहीं किस झोले में मिल जाए उसका बच्चा दत्ता साहब टीस के बीच सोच रहे हैं द्घर जाकर अपने बच्चों की मां से पूछेंगे किसको और कैसे लिखा जाए इस बारे में प्रार्थना पत्र ़ ़ ़ ़ |
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मार्च
१ .
पेड़ खाली हो रहे हैं खजानों की तरह टेंडर दरें कमीशन ये सब फूल फल पत्ती की तरह बोले जाने वाले शब्द हैं या एक ही कोख से जन्मी जारज अभिव्यक्तियां सबसे बड़े गर्भाशय का नाम हो सकता है मार्च सबसे बड़े पनाले का नाम हो सकता है
२ ़
यूं महीनों में सुमेरु है मार्च इसी से मथा जाएगा एक गहन वर्ष और उभरेगा अमृत द्घट जो भागते-भागते छलकेगा चारों ओर
३ ़
मार्च में सबसे महंगे हैं दस्तखत जबकि सूचकांकों के लिए निर्धारित जिंसों में इसका कोई जिक्र नहीं और सबसे सस्ता है ईमान ठेके की आखिरी रात के अल्कोहल की दरों सा
८
लो चला गया मार्च हमल के बाद सी है खजानों की काया जबकि पेड़ों के लिए यह गोद भराई का मौसम है ़ ़ ़ |
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| चार कविताएं |
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एक चश्मदीद का बयान
मैं किसी हत्या के बारे में कुछ नहीं जानता सरकार! मैं उस जगह के बारे में थोड़ा-बहुत जरूर जानता हूं सूत्रों के मुताबिक जहां हत्या हुई मैं जानता हूं उस रास्ते और उससे जुड़ी एक बंद गली के बारे में और उन आवारा कुत्तों के बारे में भी जो भौंकते हैं वहां से गुज.रते ही लेकिन मैं हत्या के बारे में कुछ नहीं जानता अलबत्ता मृतक को मैं जानता हूं एक आत्महंता जोश से भरी उस अड़तीस की उम्र को पत्नी की जवान मजबूरियों और पीछे छूट गए दो छोटे बच्चों की बड़ी-बड़ी अनभिज्ञताओं को भी मैं जानता हूं हुज.ूर इस दुनिया में मैं सिफर्. उतना जानता और नहीं जानता हूं जितना जानने और नहीं जानने से मैं बच सकता हूं आपकी इस महान न्यायप्रिय अदालत में अगली किसी ऐसी ही चश्मदीद गवाही के लिए! |
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इसी रात में द्घर है सबका
इसी रात में द्घर है सबका जो चढ़ती चली आती है छाती पर और पार पाना मुमकिन नहीं जिससे फिलहाल तो इसी में हत्यारे द्घूमते हैं बेनकाब उनके चेहरे चौराहे पर सजी हैलोजेन लाइटों से भी ज्यादा चमकते हैं गाड़ियां गुज.रती हैं हथियारों और लाशों से लदी रास्ते गूंजते रहते हैं बूटों और चेतावनी देती सीटियों की आवाज.ों से लाल और नीली बत्तियों की प्राधिकृत रोशनी में बेखटके कुचली जाती है मानवता इसी रात में जिसमें हम आंख मूंदकर सोने का अभिनय करते हैं इसी रात में चलती रहती हैं बगावत और खि.लाफत की भी पोशीदा कार्रवाईयां लोग कभी फुसफुसाते तो कभी चीखते-चिल्लाते हैं कितना भी हो अंधेरा कुछ उठे हुए हाथ साफ नज.र आते हैं कैसे रात किसी का द्घर नहीं - मेरे समय के बड़े, लोकप्रिय और पुरस्कृत कवि राजेश जोशी बतलाते हैं अपनी चमचमाते शब्दों वाली एक कविता में ! मैं अभागा समझ नहीं पाता उनकी बात और जब भी पढ़ता हूं उनकी यह कविता भीतर-भीतर छटपटाता हूं इसी रात में द्घर है सबका जी हां सबका ! जिसमें दारू पीकर स्त्रियों और नवोदितों पर विमर्श करते हुए हमारे सारे बड़े कवि, आलोचक और चिन्तक भी शामिल हैं कैसे कहूं कि इसी रात में द्घर है उस प्रेम का भी उनके जीवन में दिनों दिन क्षीण होती जाती है जिसकी धार ऐसे में जो बैठे रहते हैं मन मार वही कहते हैं रात किसी का द्घर नहीं उनके लिए खुला हुआ कहीं कोई दर नहीं सिफर्. रोशनी है छद्य भरी दिन के उजाले की अपना मुंह छुपाना बहुत सरल है वहां मुझे याद आता है - अंधेरे के बारे में भी गाया जाएगा - कहने वाला बीते हुए समय का एक चेहरा गीदड़ों की अनवरत हुंआ-हुंआ के बीच भी अमर हो गईं जिसकी कविताएं बहुत खुरदुरे बदन और आत्मा वाली मैं अभी छोटा हूं यह कहने को कि बहुत सरल है क्रांतिकारी हो जाना बिना रात में रहे बिना रात को जाने ! पर बड़े भाई इतना तो आप बताएं अब से क्या हम आपको सिफर्. उजाले का कवि मानें?
एक अविवाहिता का अविस्मरण
जहां पशु पक्षियों में भी जोड़ा बनाने का विधान हो हमारी उस नर-मादा दुनिया में उसने सिर्फ. मनुष्य बनने और अकेले रहने का विकट फैसला लिया अपने चुने हुए एकांत में अपने बुने हुए सन्नाटे में उसने चाहा कि कोई उसे तंग न करे और यह एक ऐसी कार्रवाई थी जिसे उसके अपने द्घेरे के बाहर लोगों ने विवाह विरोधी परिवार विरोधी समाज विरोधी और अंत में चल कर स्वैराचार करार दिया अब उसकी उम्र के पांचवे दशक में उसका वह एकांत अचानक ही द्घुस पड़ा है कई-कई विस्फोटों से भरे मेरे जीवन में उसका वह ज.बरदस्त सन्नाटा भी गूंजता है मुझसे जुड़े दूसरे रिश्तों के आत्मीय कोलाहल के बीच उसे पता नहीं या फिर शायद जान-बूझकर वह चली आई है एक ऐसी ख.तरनाक. जगह पर जो ख.ुद मुझे पांव देने को तैयार नहीं और जिसका कोई स्मरण कभी बाक.ी न रहेगा मालूम होना चाहिए उसे कि मुझ जैसा कायर कवि नहीं उसके इस तरह अविस्मरणीय होने की कथा तो उस जैसा कोई मनुष्य ही कहेगा!
काला-सफेद टी.वी.
े सोचना ही था उस द्घर के बारे में जहां से वह आया था जो ले आया था उसे थके कदम चलता वह शायद उसका मालिक ही था और कितने लोग होंगे वहां उनमें से कुछ तो इसे देखते ही जवान हुए होंगे कुछ बच्चे होंगे सुबह उठकर बासी रोटी मांगते कुछ किशोर अपने समकालीन अपराधी समय में गहरे धंस जाने के बारे में सोचते हुए काम में खटी कुछ बेवक्त बूढ़ी स्त्रियां कुछ होंगी लड़कियां भी गो भले लोगों के द्घर वे होती ही हैं आने वाली बोझिल दुनिया से बाख.बर इस बुद्धू बक्से में दिखती काली-सफेद दुनिया तब भी लुभाती होगी उन्हें जगाती होगी कुछ सपने उनके भीतर भी मरोड़ कर उठता होगा वैभव उस लोक का जिसमें वे कभी नहीं बसेंगी उनके हिस्से में तो होगी वही अधकपारी अलसुबह उठ कर, रात के छूटे बरतन मांजते समय की और जो कभी न हो सकेगा अपना एक हूक उसकी भी इस प्राचीन काले-सफेद टी ़वी ़से निकल कर आ सकता है एक समूचा सोप ओपेरा परदे के बाहर के जीवन का फिलहाल तो सुधरने जा रहा यह लौट भी सकेगा वापस इसका मुझे विश्वास नहीं सुधारने वाला भी पहले तो हंसेगा एक विद्रूप हंसी और फिर दो-चार सौ में बेच देने की सलाह देगा एक दिन इसी साइकिल पर जाता दिखे शायद किस्तों पर लिया कोई रंगीन टी ़वी ़ कौन है जो बदल देता है चीज.ों को और लोगों को भी समय? विचार? या फिर बाज.ार? गो एक विचार ही तो है वह भी कहना चाहता हूं मैं कि वह किसी इतिहास का अंत नहीं और न ही किसी समाज का समय में बहुत आगे कहीं किसी मोड़ पर कभी न कभी बताएगा कोई कि यह किसी कविता का भी अंत नहीं दरअसल शुरुआत है किसी दूसरी समयावधि में जीवन की चिर-उलझी उसी पेचीदा गुत्थी की जरूरी हैं जिसके लिए इतने विशेषण और अमर है कविता जिसकी बदौलत भीतर ही भीतर धुंआती और सुलगती! |
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| चार कविताएं |
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चांद-दूसरी नजर
आसमान के माथे पर पीले पारे की एक जगमग बिंदी वह जब उरूज पर होता है समुद्रों का पानी उफनता बढ़ता है उसकी ओर नजर बरबस अटकी रह जाती है उस पर जवान होने लगती हैं हसरतें मगर यह सुबह का चांद है निर्माणाधीन मेट्रो लाइन के पार शहर की झुग्गी-झोपड़ी गरीबों की बस्ती के ठीक ऊपर कुम्हलाया जैसे लंबे सफर में एक थका हुआ यात्री रोजाना के कामों में लीन दुनिया में वह मनुष्यों का ध्यान खींच पाने में अक्षम रात होगी जब वह क्या कोई दूसरा चांद होगा कोई दूसरी नजर या सिर्फ इतना कि तब अंधेरा होगा झुग्गी-झोपड़ी गरीबों की बस्ती सारा समूंदर समेटे अपनी कोख में। ----
कुछ न लिखकर भी
मैंने खुशी के बारे में लिखना चाहा पर लिखा नहीं कुछ भी कुछ न लिखकर भी मैं खुश हुआ मैंने प्रेम पर लिखना चाहा पर लिखा नहीं कुछ भी कुछ न लिखकर भी मैंने प्रेम किया मैंने मृत्यु पर चाहा लिखना पर लिखा नहीं कुछ कुछ न लिखकर भी मौत को महसूस किया मैंने कुछ न लिखकर भी लोग खुश हुए कुछ न लिखकर भी उन्होंने प्रेम किया कुछ न लिखकर भी लोगों ने गुजारा जीवन। ----
मां का सपूत
जैसे मई के सूने आकाश में कहीं से प्रकट होता है पानी से भरा एक बादल और उम्मीद बनकर छा जाता है ढलती दोपहर में आवाज लगाता दौड़ा आ रहा है पहाड़ की ढलान पर स्कूल से लौटता द्घसियारन मां का सपूत। ---
धूप में एक रविवार
धूप मेरी आत्मा में उष्मा बनकर उतर रही है आकाश का नीला मुझे हरा बना रहा है मैंने आंख मूंदकर पक्षियों की आवाजें सुनीं गाड़ियों और जीवन के शोर के ऊपर तिरती महीन और जाना कि किस तरह वे एक पल को भी खत्म न होती थीं। चारों ओर से हम पर बरसता रहता है कितना जीवन मगर हम ही हैं कभी बुद्धिमान कभी मूर्ख बनकर जिंदगी गंवाने पर तुले रहते हैं। मैं देर तक सोखता रहा धूप करवट बदल-बदलकर काम की हर सोच को मुल्तवी करता अप्रत्याशित इस समय को भरा मां ने अपने बचपन के किस्सों और धूप पर एक लोकगीत से वह जब दिन का खाना बनाने चली गई मैंने उड़ते तोतों को देख अपना बचपन याद किया इस शहर में कितने लोग धूप का आनंद ले पाते हैं चालीस की रवां उम्र में तो यह नामुमकिन हो चला है मगर आज धूप में बेफिक्र लेटा अपनी उपलब्धि पर खुश होता रहा मैं सोचा मैंने लिखूं इस खुशी पर कुछ जिसमें धूप हो, आकाश का नीलापन रविवार की फुर्सत और तोतों की ट्वां ट्वां मगर लिख न पाया धूप मेरे विचारों को सोखती रही मेरे पास थी पेसोआ की कविताओं की किताब मैंने पढ़ी एक के बाद एक उसकी कविताएं अनेक अंततः जब मैं छत से उतर लौटा द्घर के भीतर धूप और कविताओं से भर चुका था इस कदर कुछ भी लिखने-सोचने की चिंता से बेज़ार मैंने मां के हाथ का बना खाना खाया और कंबल ओढ़कर सो गया। |
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| वस्तुजगत |
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१
यह-हमारा/तुम्हारा निथरा या उथला मटमैला और पसरा थकाऊ वर्तमान नहीं है यह-हर समय गंधाए/बौराए चमचमाते या दम साधे पेड़ जिस्मों का वस्तुजगत है! --- इस नए आहंग में बेरंग-हवा का लिबास पहन कर हर कोई हवाखोरी पर निकला है 'हाई-वे' पर या अपनी कॉलोनी के पिछवाड़े तक!! |
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२
यहां से ़ ़ ़बजरी की तरह बिछती चली गई ़ ़ ़ गरीबी का कोहिस्तान दिखाई नहीं देता यह हमारे/तुम्हारे लिए कोई दूसरा वर्तमान है जहां सब नई चाहतों की ज़द में हैं। किसी को अपना किरदार याद नहीं है! बराबरी और उमराओं की लड़ाई में नए चारागाहों में- कौन-कहां और किस हैसियत से खड़ा है? किसी को कुछ नहीं मालूम!! अमीरी के बर्गोबहार में मुफीद-नस्लें परेशान हैं ़ ़ ़ अपने 'ग्रीनलैंड' के बाहर की- बेमेल रिहाइश और रेवड़ से जो उनकी शीशई, चाकलेटी या चौकोर मामूरा-बस्तियों को बस ताकती रहती है- तगार में सनी या भीत की छांट में सुस्ताती हुई!!
३
इस वस्तुजगत में सरफिरी-यादों में टहलने की फुर्सत नहीं है किसी को! सुहानी-खामोशियों के देह-राग मोनालिज़ा की मुस्कराहट के राज़ शक और नफरत के खूबसूरत-कोलाज़ में बदल दिए गए हैं। किताबों की जगह जूतों से और गुदगुदाने वाले-प्लास्टिक के-मोमिया ़ ़ ़ भुतहा चेहरों से-अफलातूनी अजायबद्घरों और महंगे ़ ़ ़ द्घरों के मगरूर कोने सजाने के दिन हैं। नेटवर्किंग के धूर्त-साम्राज्य में सब कुछ बदला-बदला हैं द्घर के द्घर खाली हो गए हैं मेरे भी-मार खाए पड़ोस में! इसका 'क्रेडिट' कमाने वाले नए सपूत/मन में ़ ़ ़ फर्क की एक लकीर खींच कर नई दूरियों पर सीना ताने खड़े हैं या तन्हा अपार्टमेंट्स की सम्पन्नता में खो गए हैं!!
४
चीजें जमाने की रफ्तार से आगे हैं बच्चे उनके पराक्रम से ऊब चुके हैं कोई विकल्प नहीं है- उनका बाजार में! उन्हें 'डिकोड' करने/देखने-परखने की/पारम्परिक ़ ़ ़ कोई विधि नहीं है हमारे पास फिर भी खुश हैं! मार्किट की डिमांड पर- पयोधर की पूंजी छलकाती अभिनेत्रियां अपने दैहिक-विज्ञापनों से रुष्ट हैं उनके सेट पर बिखरी चीजों ने झूठी-कारीगरी के 'क्लोज-अप' चुरा लिए हैं। 'विश्वसनीयता,' 'सांचे' और 'टेग' तेजी से बदलती हुई चीजों के अजायबद्घर हर गली, मोहल्ले, बाजार, शहर में खुल गए हैं-इफरात में! उनके बंडल और बोरों को नए आसामी/ऐसे पटकते हैं- खटारा-बसों में/बेवक्त-गाड़ियों में/जैसे गर्दन तोड़ पिट्ठू से पीछा छुड़ाते हों। चीजों की भयावह-हूंसी और 'साउंड-सिस्टम' ने रोकी हुई हैं-जमाने की सांसें! हमारी धड़कनों और आवारा चाहतों की धुकऽऽ धुकऽऽ बढ़ती हैरानी तक में हवा की तरह शामिल हैं-ये बेगानी चीजें! उनके बहुरूपिया रूपक/कुरूपता/विरूपता और ़ ़ ़ जड़-सूरतें किसी को अपने नजर नहीं आते। उनकी मकरन्द-महक/मांस के जलने की गन्ध जैसी महसूस होती है हादसों के वक्त! उनकी बेवजह मौजूदगी से भगदड़ सी मची रहती है-प्लेटफार्म पर! उनकी आवा-जाही की अफरा-तफरी और दौड़ में जो भी पीछे छूट गया है अधकर्ता परछाई सा-पटरी पर ़ ़ ़ उसके वजूद, की - कोई-'फोटो कॉपी' तक नहीं है हमारे। तुम्हारे पास-इस वस्तुजगत में!!! |
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| पांच कविताएं |
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तलद्घर
स्त्री के अस्तित्व का तलद्घर है गृहस्थी स्मृतियां, संवाद व आत्मीयताओं की गुमनाम बस्तियां इस तलद्घर के अंधकार में परछाईं सी डोलती हैं सूरज कितनी भी सावधानी से उतरे इस तलद्घर की सीलन भरी सीढ़ियां एक शोर संबंधों के झरोखे से उठकर क्रांति में बदल जाता है। |
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फैसला
स्त्री की धूप के खिलाफ ईश्वर अपना फैसला सुना रहा है ़ ़ ़ ़ ़ 'द्घर स्त्री के लिए सबसे महफूज जगह है सुरक्षा की तमाम कवायदों से लैस होता है द्घर' इस फैसले में शामिल है ईश्वर का समाज उसके सत्तासीन आडम्बरों की नैतिक गाथावलियां स्त्री का अपना कोई द्घर या समाज नहीं है इसलिए फैसला अब तक ईश्वर के हाथ में है।
पिता दरवाजा थे
हमारे अंदर उगते शहर को झाड़-झंखाड़ की तरह साफ करते थे पिता फसलों की बोआई और धान की रोपाई के बाद पिता के भीतर एक गांव सरसराता था हमारे शहर हो जाने से द्घबराए पिता की आंखों में अक्सर खदबदाते थे कुछ लम्हे चूल्हे पर चढ़े अदहन की तरह पिता डरते थे कहीं हम मनुष्य होने के खतरे से बचने लगे तो हालांकि पिता दरवाजा थे और उनसे होकर ही हमें गुजरना था।
तुम मिटा सकते हो
आंधियों के सपने नहीं होते सपनों के मिट जाने की कथाओं से बनता है आंधियों का वजूद हवा के आंधी बनने तक डूब चुकी होंगी आस्थाएं समंदर की तली में बचा रह गया होगा थोड़ा-सा नमक थोड़ी सी धूप पृथ्वी के किसी हिस्से में छटपटा रही होगी फूल व खुशबू की किस्मत में लिखा होगा बेवक्.त मर जाना और खून में सफेदी का उतरना आहिस्ता-आहिस्ता समय के प्राचीन नक्शे में आंधियों का वजूद नहीं रहा होगा जब उम्मीदों के पत्थरों को रगड़करपैदा की गयी थी आग आंधियां कहां थीं उस समय जीवन की अल्हड़ हंसी में सब के सब शामिल थे भूख और प्यास के सिद्धांतों में अपने-पराए का ख्याल तक नहीं था एक ही आग पर पकती थीं ़ ़ ऱोटियां और दुःख एक समंदर सबके बीच लहराता था और पूरी पृथ्वी गीली हो जाती थी मेहनत और खुशी की हमख्याली ने जीवन की गति को कितने एहतियात से साधा होगा कितनी सावधानी से रचा गया होगा समाज कोई क्या जानता था कि मूल्यों व सिद्धांतों के हथौड़े से मनुष्यता को इस कदर पीटा जायेगा कि गरम हो जायेगा ब्रह्माण्ड कितनी भावुक थी हवा जब ईर्ष्या की आग में नहीं जली थीं कामनाएं सोचो! हवा के भीतर से उठे बवंडर ने आंधियों की शक्ल क्यों अख्तियार की तुम मिटा सकते हो पृथ्वी के नक्शे से इन आंधियों के निशान।
ठहरा हुआ था सब कुछ
मैं चल रही हूं डोल रही है पृथ्वी स्तब्ध आसमान की आंखों में अजीब कौतूहल है बच्चों की हंसी जैसा-कुछ गतियां मेरी देह से गुजरकर आत्मा में प्रवेश को आतुर हैं कितने युगों तक ठहरा हुआ था सब कुछ समय किसी भारी बोझ की तरह मेरे कंधों पर सवार था रुकी हुई थी नदी जो मेरे आवेश की लहरों पर थिरकती थी रुका हुआ थाभीतर का पानी दर्द से नीला पड़ गया था आसमान बर्फ की झील में ठहरी थीं नौकाएं रुका हुआ था सूरज कोहरे के धुंधलाते कक्षों में धूप के सुनहरे धागे से लिपटा था अंधेरा कितनी ठहरी-ठहरी थी आग राख के ढेर पर हांफती-सी मेरे भीतर जैसे कुछ उगा बहने लगा दृश्य किसी आवाज ने दरवाजे टिका दी अपनी देह बहा एक तरल आवेग जैसा हिम-चट्टानों की अन्तर्गुफाओं में मेरी स्थिर सांसों की रफ्तार को तेज करता हुआ मेरी फ्रिज होती दुनिया में कोई खिला सुगंध से भरपूर और महक उठी धरती। |
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| पांच कविताएं |
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बचपन
बचपन में हमारे पास होती थी निब की नोकदार कलम हमारे पास होती थी दवात, जिसमें भरी रहती थी रोशनाई ज्यादातर नीली कभी काली, तो कभी हरी कभी-कभार लाल इसी रोशनाई से रोशन होते थे तमाम किस्से और किरदार मेज से दवात गुम है न जाने कहां होगी वह रोशनाई |
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आत्मा
आत्मा को न शस्त्र का भय है न आग का इसे न वायु का भय है, न जल का आत्मा को एक ही डर सताता है अहर्निश उसे नई देह नहीं मिली अगर्चे तो भटकना पड़ेगा इसे यूं ही अनंत काल।
पानदान
पानदान अब काम की चीज नहीं रहा पानदान का ककन उठाओ तो डिबियों में न कत्था है, चूना और छालियां सरौता भी नदारद है जर्दे का नामोनिशां नहीं पानदान अब काम की या सजावट कबाड़ चीज को देखो पान नहीं, याद आते हैं मां पिताजी
पहली बार
पहली बार मुखौटों से नहीं चेहरों से डरे लोग-बाग। पहली बार आस्था ने नहीं, खौफ़ ने पलटे वर्क। पहली बार बागीचे में झुलसे दरख्त, सरसब्ज पत्ते हुए स्याह। पहली बार बारुदी गंध में डूबी लोबान की महक पहली बार वर्णक्रम के रंगों पर एक रंग हावी हुआ रातों-रात पहली बार कबूतरों ने गुम्बदों से किया फासला पहली बार इस कदर मुसलसल बहा खून कि उन्होंने कपड़ा मिल की जगह बोतलों का कारखाना लगाने पर किया/संजीदगी से विचार।
नियाग्रा प्रपात
कमजोर होते हैं तो लुढ़कते चले जाते हैं पत्थर मीलों-मील नीचे गहरे खड्ड में शोर मचाते हुए दसों दिशाओं के कानों में मजबूत होते हैं तो सदियों टिके रहते हैं पैर पर पैर टिकाए किसी वीतरागी की तरह निश्चल निस्पंद मगर, जहां बहुत कठोर होते हैं पत्थर वहीं से फूटता है एक दिन निर्मल खूबसूरत नियाग्रा प्रपात। |
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| चार कविताएं |
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पदचाप
उनका सारा भय निकल गया, ठेला और रिक्शा धकेलने में ही इसलिए निश्चिंत हो सो गए-सड़क की बीच वाली पटरी पर। रोज जगा जाता है पुलिस वाला पदचाप से अपनी रात जाने से पहले इसलिए जितना सोते हैं निश्चिंत ़ ़ ़ उस रात कुचल गया उन्हें एक ट्रक जगाने से पहले ही उनको गलती नहीं थी ट्रक की वे ही नहीं पहचान पाए थे, उसकी/पदचाप- वे तो बस एक ही आवाज पहचानते पुलिस वाले की पदचाप इसलिए सोए थे निश्चिंत- और, अभी पुलिस वाले का समय नहीं हुआ था। |
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चिड़िया की बाजीगरी
समुद्रतट पर एक चिड़िया टक्कर ले रही है लहरों से फुदक आती है पीछे की ओर अपने पास आती देख लहर और जाती है पीछे-पीछे पीछे की ओर लौटते हुए उसके- कर रही है यह दुस्साहस वह बार-बार। एकाएक समुद्र को जीतने की ठानी उसने फड़फड़ाए पंख उड़ चली समुन्दर पार समुद्र ताकता रहा उसे हक्का-बक्का सा- वहीं, पास ही एक लड़की भींच रही है मुट्ठी बार-बार मैं देख रहा हूं चिड़िया की बाजीगरी।
मेरे साथ
अपनी इच्छा, अभिलाषा, तृष्णा और चिंता के साथ-साथ जागता हूं मैं रात-रात भर --- जागता है मेरे साथ शहर भी- शहर कभी सोता नहीं।
चार्टर्ड बस की सवारियां
चार्टर्ड बस की सवारियां सभ्य हैं खामोश हैं इसीलिए- चढ़ते ही बस में सवारी देख लेती हैं आस-पास की सीट को पाकर रोज के परिचित को ले आती हैं मुस्कान अधरों पर सिकोड़ लेती हैं आंख किसी अपरिचित को देखकर- करती हैं खुसर-पुसर पास वाले के कान में हिलती है उसकी भी गर्दन 'ज्यॉमितिय' अंदाज में- सवारी को छींक बाद में आती है सॉरी की आवाज पहले सुनाई पड़ती है- होती है कभी-कभार, बात किसी खास बात पर तब पता ही नहीं लगता कौन बोल रहा है- उतरती हैं सवारियां एक-एक करके सधी गर्दन से- खामोश हैं सवारियां, सवारियां सभ्य जो हैं-। |
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