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| Welcome
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| खौफ़ |
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| यह उन दिनों की बात है जब पंजाब में आतंकवाद चरम पर था। इस बीच मुझ जैसे बेरोजगार को एक अर्से पश्चात पंजाब यूनिवर्सिटी से लेक्चरर पोस्ट के लिए बुलावा आ गया था। मगर यह जानकर मां और पिताजी को खुशी नहीं हुई, वे बोले, 'बेटा, आतंकवादियों का कोई भरोसा नहीं कि किस समय क्या कर बैठें, उनका कोई ईमान तो होता नहीं।' पास-पड़ोसियों की भी राय मेरे विपरीत ही बैठ रही थी, किंतु मैंने फैसला कर लिया था कि मुझे हर हालात में इंटरव्यू देने जाना ही है। मां और पिताजी से अश्रुपूरित नयनों से विदाई लेकर मैंने रिजर्वेशन टिकट खरीदा और पंजाब जाने वाली गाड़ी में सवार हो गया था। द्घर से निकलते समय ऐसा लग रहा था कि जैसे मैं बार्डर पर शहीद होने जा रहा हूं। रास्ते भर मेरे मन-मस्तिष्क कई विचार आते। जालंधर स्टेशन पर उतरते ही मेरे अंदर लोगों द्वारा की गई बातों का खौफ समा गया था और फिर मैं हर आने-जाने वाले को आतंकवादी ही समझ रहा था। मैंने सोचा कि अपने यहां के पांडेय चाचा का मकान मिल जाए तो अच्छा है। इतने में ही मेरे पास से एक सरदारजी गुजरे और बोले, 'पुत्तर! तुसी बड़ा परेशान दिख रहे हो, की गल है मैन्नू दस्सो।' मैंने पूर्णरूप से सतर्क होकर कहा, 'कुछ नहीं, कुछ नहीं।' सरदारजी ने साइकिल खड़ी कर झोले में हाथ डाला तो मैं समझा कि अब पिस्तौल से गोली निकली और मैं गया काम से। वे फिर बोले, 'द्घबराओ नहीं पुत्तर।' तो मैंने उन्हें पता बताया और कहा कि मुझे इसी जगह पर जाना है। उन्होंने कुछ देर पश्चात मुझे साइकिल पर बैठा लिया और मकान पर पहुंचाते हुए कहा, 'यही मकान है।' और सरदारजी सतश्रीअकाल करके चले गए। मेरे दिमाग पर छाये खौफ़ का साया हट चुका था और मैं सोच रहा था कि अखबारों और समाचारों से तो पंजाब की तस्वीर कुछ ज्यादा ही भयानक और दहशत भरी लगती है। |
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| अवमूल्यन |
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| एक अध्यापक अक्सर अपने छात्रों को पढ़ाते समय आदिकाल की सम्मानजनक गुरु-शिष्य परंपरा को बड़े ही गर्व के साथ शिष्यों को बताया करते थे और लंबी सांस लेकर कहते-तब गुरु का सम्मान शिष्य करते थे और सही मायने में विद्या ग्रहण करते थे, उनके अंदर जिज्ञासा थी, गुरुओं के प्रति सम्मान था। आजकल के छात्र अध्यापक को गाली, धौंस, चाकू दिखा परीक्षा में नकल के लिए प्रतिदिन बेइज्जत करते हैं, अब यह कार्य सम्मान का नहीं रहा। रोज-रोज के धाराप्रवाह भाषण से ऊबकर एक दिन एक छात्र ने उत्तर दिया कि तब से अब के इस लंबे अंतराल के बीच क्या आप गुरुजनों के अंदर परिवर्तन नहीं आया। तब शिक्षा देना आप अपना आदर्श, कर्त्तव्य, जीवन का ध्येय समझते थे और अब आपका ध्यान शिक्षा पर कम अपने वेतनमान और ट्यूशन पर अधिक रहता है। अध्यापक महोदय सोच रहे थे कि अवमूल्यन कहां से हुआ है। |
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| साक्षरता मिशन |
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गांव मीरपुर की आबादी, मिलकीपुर ब्लॉक के गांवों में सबसे अधिक थी। इस गांव में ब्राहण, ठाकुर, यादव, कुर्मियों, दलितों के कुल मिलाकर दो हजार से अधिक द्घर थे। इन दिनों सभी सवर्णों को जिन्होंनें अपनी खेती बटाई पर दे रखी थी, खेत मजदूरों की कमी का सामना करना पड़ रहा था, कारण जुताई-बुआई के लिए मजदूर आने को तैयार न थे।
गांव के सवर्ण वर्गीय ठाकुरों, ब्राहणों की देर रात गांव के प्रधान रामानंद चौबे के द्घर बैठक हुई। बैठक में बड़का ठाकुर बोले, 'ई गांव में मजूरन कय दिमाग खराब हुई गवा है, वहिकै कारण है कि गांव मा जौन नवा साक्षरता केंद्र खुला है वहिमा काफी अंट-शंट सिखावा जाय रहा है।' दुबे ने ठाकुर की हां में हां मिलाई, 'आप बिल्कुल ठीक हव, ई केंद्र बंद होय का चाही।' बैठक में लिए गए निर्णय के अनुसार दूसरे दिन छप्पर में चल रहे साक्षरता केंद्र को आग लगा दी गई। मजदूरों ने जब देखा कि उनके भीतर आती जागरूकता और लिखाई-पढ़ाई की लहर से सवर्णों की सत्ता हिल रही है तो साक्षरता केंद्र दुगुने जोश के साथ देर रात को खुलेआम चलने लगा। मजदूरों के भीतर साक्षरता के प्रति बढ़ती जागरूकता से गांव के प्रगतिशील मानसिकता वाले सवर्ण वर्ग के लोग चिंतित नजर आ रहे थे। उन्हें 'साक्षरता मिशन' मनुवादी सामाजिक व्यवस्था पर चोट मारता दिख रहा था। |
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| तंत्र-मंत्र |
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| स्टेशन परिसर में द्घुसते ही अभिजित गुहा ने चारों तरफ नजर दौड़ाई। कहीं बैठने की कोई जगह नहीं। फिर भी आगे बढ़े। सामने बेंच पर कई लोग थे। उन्होंने किनारे बैठे बच्चे को आंखों से ही थोड़ा खिसकने का इशारा किया। बच्चे ने मां की ओर देखा। मां ने हल्के से सहमति में सिर हिला दिया। गाड़ी आने में अभी देर थी। किसी तरह अधलटके बैठे बेसब्री से गाड़ी का इंतजार करने लगे। माथे पर बड़ा-सा रोली-चंदन का टिका लगाये गुहा किसी पंडित से कम नहीं लग रहे थे। अचानक बच्चे की तेज रोने की आवाज सुनी तो देखा उनके पांव के पास एक छोटा-सा बच्चा जार-बेजार रोये जा रहा था। उन्हें आश्चर्य हुआ, अभी तो यह बच्चा यहां नहीं था अचानक कहां से आ गया! थोड़ी देर उसे देखकर उन्होंने अपनी नजरें द्घुमा लीं। पर कब तक? वह लगातार रोये जा रहा था। आसपास देखा उसकी मां कहीं नजर आ रही थी और न ही कोई और। आखिर उनसे रहा नहीं गया। उन्होंने अपना बैग खोला और बिस्किट का पैकेट निकाल उसमें से दो बिस्किट बच्चे के हाथ में थमा दिये। रोता हुआ बच्चा जैसे ही बिस्किट मुंह के पास लेकर गया पता नहीं कहां से ट्रेन की तरह धड़धड़ाती एक औरत आ गयी। उसने बच्चे के हाथ से बिस्किट छीना और फेंकते हुए चिल्लाने लगी, 'अरे कोई बचाओ रे, इस ढ़ाने ले जा रहा था ़ ़ ़अरे दादा रे! अगर मैं सही समय पर नहीं आती तो यह तो मेरे कलेजे का कलेजा ही निकाल लेता!' पुलिस तुरंत हाजिर। गुहा के झोले की मुस्तैदी से तलाशी ली गई। कोई आपत्तिजनक सामान नहीं मिला। फिर भी औरत का चिल्लाना बदस्तूर जारी रहा। गुहा की हालत ीलीं तभी एक पुलिस वाला पास आया और संकेत से बुलाकर गुहा को दूर ले गया, 'कुछ इसे ले-देकर हटाइये ़ ऩहीं तो यह ऐसे ही बवाल काटती रहेगी अंततः हमें आपके खिलाफ केस फाइल करना पड़ जायेगा ़इसलिए जल्दी सलटाइये!' आखिर थक-हार कर उन्होंने महिला के हाथ में कुछ रुपये थमाये। उसने चुप होकर गिने फिर बच्चे उठाकर दुलारती हुई चली गई। मन मंत्र गूंज रहा था, 'फ फंसाइये, |
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| बल-दल |
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| 'भैया, चुनाव तो फिर आ गया सिर पर!' गोविंद के चेहरे पर चिंता की बूंदें चुहचुहा उठीं। 'अरे, तो क्या हुआ? तू काहे द्घुले जा रहे हो?' विधायक जी ने मूंछों पर ताव दिया। 'चुनाव जीतने के बाद तो आप एक बार भी उस जनता के पास नहीं गये जो दूर-दराज के गांवों में है ़ ़ क़्या ऊ सब इस बार आपको वोट देंगे? ़ ़ ़और पिछली बार तो आपके पास पार्टी का नाम भी था और ताकत भी ़ ़ ज़बकि इस बार जरा-सी भूल के चलते पार्टी ने ़ ़ ़मैं तो समझ नहीं पा रहा ़ ़ ऩैया इस बार कैसे पार लगेगी ़ ़ ़' स्वर में गहरा दर्द था। 'अरे, पार्टी की क्या चिन्ता! मैंने जो एक्शन किया, सोच-समझकर ही किया, गलती से भूल नहीं हुई थी ़ ़ ़सोचो न! इस एक्शन में हमें जो अटैची भर कर मिला, क्या यह सब पार्टी कभी दे पाती? ़ ़ य़ों भी हमेशा गाय की तरह एक ही खूंटे से बंधकर रहने का जमाना लद गया ़ ़ ़अब तो जब-तब सरकार के सिर पर विश्वास मत की चुनौती टंगी ही रहती है ़ ़ ़ऐसे में बे-दल वालों का ही तो मोल-महत्व बढ़ जाता है ़ ़ ़इसलिए यह बे-पार्टी वाली हैसियत सबसे सुविधाजनक है। ़ ़ ऱही बात चुनाव जीतने की तो अब हमारे पास बल भी है और अपना यह भरा-पूरा हाईटेक दल भी!' उन्होंने बगल में कतार से रखे अत्याधुनिक हथियारों पर हाथ फिराया। गोविंद ने मुड़कर सहयोगी मुच्छड़ों पर नजर डाली। नेताजी भी इधर ही मुखातिब थे। ठहाकों से हवा का रेशा-रेशा हिल रहा था। |
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| संवेदनाशून्य |
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| दीदी, दीदी ़ ़ ़। सुबह सोते हुए मेरे कानों में यह आवाज पड़ी। आंखें खोलकर देखा तो मनु खड़ी थी। 'मनु' मेरी काम वाली बाई की दस वर्षीय बेटी। मैंने अलसाई आवाज में कहा, 'क्या है?' 'आज मम्मी काम पर नहीं आ पायेगी।' उसने जल्दी में बताया। 'क्यों? क्या हुआ?' मैंने स्वाभाविक प्रश्न किया। मनु बोली- 'कल से मम्मी को उल्टियां हो रही हैं और बुखार भी है। अभी वह अस्पताल में है।' 'और तुम्हारा भाई कैसा है? अब वह ठीक है?' मैंने यह पूछना जरूरी समझा क्योंकि अपने बेटे की वजह से कमलेश्वरी ने एक दिन की छुट्टी ली थी। 'ठीक है।' उसने संक्षिप्त सा उत्तर दिया और जाने को उद्धत हुई। उसकी व्यग्रता देखकर मैंने उसे जाने के लिए कह दिया। उसे जाने की इतनी जल्दी थी कि वह उल्टे पांव लौट गई। तभी मेरी रूममेट बाथरूम से निकली और पूछा, कौन था? मैंने कहा- 'मनु थी। बताने आई थी कि उसकी मां की तबियत ठीक नहीं है वह अस्पताल में भर्ती है।' 'और बताकर चली गई, काम-वाम कुछ नहीं किया?' उसने प्रत्युत्तर दिया। 'उसकी मां अस्पताल में है और तुम उससे काम की आशा करती हो?' मैंने मनु का पक्ष लिया। 'तुम तो ऐसे कह रही हो जैसे रोज उसकी मां ही काम करती हो। वह तो बैठी रहती थी।' उसने प्रतिवाद किया। 'उसकी मां रोज यहां बैठी रहती थी और आज वह अस्पताल में लेटी है, दोनों में फर्क है।' मैंने उसे समझाना चाहा। लेकिन वह मुंह के अंदर कुछ बड़बड़ाती हुई दूसरे कमरे में चली गई। शायद उसे ऑफिस के लिए देर हो रही थी और सुबह-सुबह वह किसी बहस में पड़ना नहीं चाहती थी। |
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| दवा |
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| 'भइया! अब तो दवा दे दो, उधार मांग कर लाई हूं।' पच्चीसवय एक गहरे सांवले रंग की युवती ने दुकानदार से आग्रह किया, जो बहुत देर से अपने पांच वर्षीय बेटे के साथ खड़ी थी। उसने अपने सभी मुड़े-तुड़े नोट काउंटर पर डाल दिए और अधीरता से प्रतीक्षा करने लगी। थोड़ी देर बाद उसने फिर काउंटर पर आग्रह किया-'भइया, थोड़े कम हैं अगली बार ले आउंगी, अभी दवा दे दो, बहुत जरूरी है।' लेकिन दुकानदार उसे अनसुना करके दूसरे ग्राहकों में व्यस्त रहा। उस युवती में दवा लेने के प्रति इतनी व्यग्रता थी कि वह इंतजार नहीं करना चाह रही, पूरे रुपये न होने के बावजूद वह दवा लेने का अपना आग्र्रह नहीं छोड़ पा रही थी। इसलिए वह पुनः बोल उठी-भइया, 'थोड़े ही तो कम हैं, अगली बार जरूर दे दूंगी।' यह कहते हुए उसने रुपये फिर आगे बढ़ाये। उसके बार-बार आग्रह से आजिज आकर दुकानदार ने १५ रुपये मूल्य की दवा उसे दे दी। उस युवती ने दवा को अपनी फटी साड़ी के छोर में बांध कर कमर में कस लिया और बेटे का हाथ पकड़कर चलने लगी। तभी उसका बेटा केला लेने के लिए मचल पड़ा। उस युवती ने अपने मासूम बेटे को चुप कराते हुए कहा-'बेटा, तुझे केला मैं कल ले दूंगी, आज डॉक्टर साब ने बाहर की दवा लिख दी है न। अब पैसे नहीं बचे हैं।' यह कहकर वह बच्चे को लगभग द्घसीटते हुए आगे बढ़ने लगी। थोड़ी ही देर में वह सरकारी अस्पताल से काफी दूर निकल गयी। |
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