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ऐसे जनादेश के बाद क्या अगली सरकार दबावमुक्त होकर स्वेच्छा से कार्य कर सकेगी?

 
 
   
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लोकसभा चुनाव के प्रथम चरण के मतदान और इसके कुछ दिन पूर्व की हिंसक द्घटनाओं ने जैसे लोकतंत्र का चीर हरण शुरू कर दिया ...
 
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हिन्दी का भविष्य, भविष्य की हिन्दी
 
भाषा और साहित्य का भविष्य क्या होगा? इसमें केवल निराशा ही दिखाई देती है या आशा के भी कुछ बिन्दु हैं? प्रस्तुत है वरिष्ठ साहित्यकारों से युवा आलोचक साधना अग्रवाल की बातचीत

हिन्दी समाज कोई एक तो है नहीं, गांव के जो किसान वगैरा हैं, उनका एक समाज है, दूसरा गांव, कस्बों और शहरों में पढ़ने वाले विद्यार्थी हैं, अध्यापक हैं, जिनको मोटे तौर से निम्न मध्यम वर्ग और मध्य वर्ग का मान सकते हैं। इसके बाद बहुत बड़ा समुदाय है व्यापार करने वालों का, अफसरों का जो सरकारी गैर-सरकारी नौकरियों में काम करने वाले, बड़े अफसर सिविल सर्वेन्ट जिन्हें कहते हैं, पुलिस में हैं, आर्मी में हैं, वो पढ़ा-लिखा समुदाय है, काफी बड़ा है। इस बीच हुआ यह है मध्य वर्ग में बहुत वृद्धि हुई है, जो महत्वपूर्ण है और इस मध्यवर्ग में हमारे राजनीतिज्ञ नेता भी शामिल हैं तो सांसद हैं, विधायक हैं, मंत्री हैं और इसमें अध्यापकों को शामिल कर लेना चाहिए। तो आम लोगों में कुल मिलाकर देखो तो बहुत से लोग टेलीविजन चैनल आने के बाद इसलिए कि स्टेटस सिम्बल है, अखबार मंगा लेते हैं द्घर पर ज्यादातर इंग्लिश का, कुछ लोग हिन्दी का भी, दोनों मंगा लेते हैं, पढ़ते नहीं हैं।

इसलिए इस मध्यवर्ग में पढ़ने की प्रवृत्ति बहुत कम है, देखने की है, पढ़ने की नहीं है। और वो समुदाय जहां तक विद्यार्थी हैं, उनके पाठ्यक्रम में किताबें हैं और अंग्रेजी माध्यम से ज्यादातर पढ़ते हैं। जिनको किसी काम्पटीशन वगैरा में बैठना है, अच्छी किताबें मिलती हैं तो कुछ पढ़ लेते हैं। साहित्य के विद्यार्थी होते हैं हिन्दी पढ़ने वाले, वे जो उनके पाठ्यक्रम में होता है, पढ़ते हैं। शौकिया उनमें से कुछ निकलते हैं, जो साहित्य पढ़ते हैं, पत्र-पत्रिकाएं पढ़ते हैं तो संख्या की दृष्टि से तो पहले के दौर से कुछ बढ़ोत्तरी है बड़े पैमाने पर, लेकिन महत्वपूर्ण ये संख्या की वृद्धि नहीं है। साहित्य के लिए वृद्धि होती है एक सुगठित समुदाय जिसको कहते हैं, पढ़ने वालों का समुदाय और वो समुदाय शहरों में अड्डेबाजी कह लो, कहीं बैठते हैं तो बात करते हैं कि भाई, आज क्या पढ़ा। कुछ गोष्ठियां अपनी चलाते हैं। साहित्य के लिए महत्व उस छोटे-छोटे हर कस्बे, हर शहर का है, यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि जिस पाठक समुदाय से मेरा मतलब है, जो साहित्य को जीवित रखता है और जो साहित्यकारों को खुराक भी पहुंचाता है, वो समाज संख्या की दृष्टि से बहुत बड़ा नहीं होता। उदाहरण के लिए देखो, हिन्दी की जो पुरानी कविताएं हैं, जीवित रह गई हैं, जिन लोगों ने जीवित रखा, बचपन में हमारे यहां रीतिकाल की कविताओं को कंठस्थ याद रखा जाता था। सुनाते थे लोग, उनका अर्थ बताते थे, उन पर बात करते थे देव, द्घनानंद, बिहारी पद्माकर इन तमाम कवियों को पढ़ते थे, याद रखते थे उन लोगों को।

छोटे-छोटे समुदाय थे। भक्तिकाल की कविता को यानी तुलसीदास को तो गाते ही थे,सूर को गाते थे, कबीर को गाते थे, इन कवियों को जीवित रखा, किताबें तब छपी नहीं थीं, तब भी जीवित थीं। आधुनिक साहित्य के लिए वो काम, आधुनिक कह रहा हूं तो मैं केवल समकालीन नहीं, आजादी के बाद का नहीं बल्कि २०वीं शताब्दी का कह लो एक जमाने में १९वीं शताब्दी के अंत और २०वीं शताब्दी के शुरू में शहरों में लोग इस तरह के हुआ करते थे। बिहार में होते थे, यूपी में होते थे। दूर-दूर तक हिन्दी भाषी समाज में समुदाय होते थे जो अनौपचारिक रूप से बैठते थे। वो आज की तरह खबरें छपवाने के लिए नहीं, आज की तरह कि अखबार में खबर छप जाए, बल्कि बिना इसकी परवाह किए नियमित मिलते थे। अब इस समकालीन साहित्य के पाठक समुदाय की जांच केवल हिन्दी में प्रकाशित होने वाली पत्रिकाओं की पाठक संख्या के आधार पर ही हम कर सकते हैं। इसके अलावा जानने को कोई साधन नहीं है। कुछ संस्थाएं हैं, जिनमें कभी-कभी बैठक होती है, जिनसे हम अंदाजा लगा सकते हैं, ये संख्या कुल मिलाकर शायद पूरे हिन्दी समाज की कुछ लाख में पहुंच सकती है, इससे ज्यादा दिखाई नहीं पड़ती। यद्यपि इससे हमें संतोष तो करना चाहिए लेकिन असंतोष होना जिन्दा होने का लक्षण होता है। ये कमी भी लोग महसूस नहीं करते कि साहित्य को हम नहीं पढ़ते। तकलीफ की बात यह है, यह नहीं कि कम है, बल्कि यह एहसास नहीं कि कम है। दुनिया में जो बहुत विकसित देश हैं, उन देशों के बारे में भी जो पढ़ने को मिलता है, अमेरिका, इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी तो इन जगहों में भी जिसको कहें रीडिंग हैवेट वाली चीज है, वो जितनी १९वीं शताब्दी में थी, जब प्रिंटिंग शुरू हुई थी, तब पढ़ने की भूख बड़ी थी,

धीरे-धीरे हम अभ्यस्त हो गए तो १९वीं शताब्दी में बहुत लेख लिखे जाते थे, 'प्लेजर्स ऑफ रीडिंग,' आज कोई आदमी पढ़ने के आनंद पर लेख लिखना पसंद नहीं करेगा। का जो मजा है, प्लेजर्स ऑफ रीडिंग पर इतनी किताबें लिखी जाती थीं, लेख लिखे जाते थे और लोग अपने अनुभव बताते थे कि हमने वो किताब पढ़ी तो कैसा लगा। अब लोग किताब की समीक्षा तो लिखते हैं लेकिन समीक्षा से ये मालूम नहीं होता कि उसे किताब पढ़ने में मजा आया था नहीं। वो अनुभव जो है, वो अब नहीं हो रहा है। एक जमाने में सोचो हम लोग साक्षरता और बाकी चीजें होती थीं। गांव में साक्षरता आंदोलन चलाया गया था। पहली बार प्रौढ़ लोगों को ब्लैक बोर्ड पर लिखे शब्दों को देखकर इतनी खुशी होती थी, एक कविता है न, चम्पा काले-काले अक्षर नहीं चीह्नती- कि देखो ये जब उच्चारण करते हैं तो जो ये आवाज निकलती है, लोगों के नाम निकलते हैं, वो विस्मय, आश्चार्यचकित वाली बात जो है, वो नहीं रह गई है। लेकिन जैसा मैंने कहा कि असर तो पड़ा है प्रिंट मीडिया पर, श्रव्य माध्यमों का, जिससे लोग सुनना ज्यादा पसंद करते हैं क्योंकि जितनी देर में आप सुन लेते हैं उतनी देर में आप पढ़कर हासिल नहीं कर सकते।

समय की बचत होती है। देख और सुनकर जितना हम जान लेते हैं लेकिन में टाइम लगता है। इसलिए इंग्लैण्ड में भी ऐसा नहीं कि वहां के बड़े स्टेबलिस्ट जो मैग्जीन और अखबार वीकली निकला करते थे, अगर नहीं पड़ा होगा शायद मैं कह नहीं सकता, कहते हैं फ्रांस पर नहीं पड़ा है, जर्मनी पर नहीं पड़ा है, कहते हैं, मैं जानता नहीं। उदाहरण के लिए इन प्रदेशों में देखो कम संख्या, हिन्दी को नहीं क्योंकि हिन्दी की संख्या तो बहुत ज्यादा है, मैं एक मिसाल देना चाहूंगा- पुस्तक मेले लगते हैं। बिहार में सबसे ज्यादा भूख है किताबें बहुत बिकती हैं, यह किसी भी प्रकाशक से पूछ लो कि पटना बुक फेयर में किताबें जितनी बिकती हैं-मुजफ्फरपुर में, भागलपुर में सारी किताबें बिक जाती हैं। ये हैं बिहार में, मध्य प्रदेश में, दो जगह का तो बता सकता हूं उसकी तुलना में बल्कि उत्तर प्रदेश में कम है।

उत्तर प्रदेश में कुछ शहरों में तो मिल जायेगा, पर अन्य भाषा-भाषी राज्यों में देखो तो बंगाल का पुस्तक मेला किताबों के लिए सालभर बंगाली पैसा बचा कर रखता है कि पुस्तक मेले में हम किताबें खरीदेंगे। एक संस्कृति है बंगाल की, यह बात महाराष्ट्र में है, असम में है, उसकी तुलना में विचित्र बात है गुजरात में नहीं है। जबकि आर्थिक दृष्टि से गुजरात बहुत सम्पन्न है महाराष्ट्र से। तमिलनाडु में है, केरल में सबसे ज्यादा है। केरल में मलयालम भाषी क्षेत्र बहुत छोटा है लेकिन केरल में मलयालम भाषा की किताबें, एक तो सस्ती छपती हैं, यद्यपि देखने में उतनी आकर्षक नहीं होती, कागज खराब, हाई बाऊंस ज्यादातर नहीं होती, पेपर बैक ज्यादा होती है, कम दाम होता है, तमाम लोग खरीदते हैं। उसकी तुलना में कर्नाटक में मलयालम से कम है लेकिन कर्नाटक में है भी हिन्दी समाज से ज्यादा है।

बल्कि तेलगु का आंदोलन जब से हुआ है, तो जितना मलयालम और तमिल में है, उसकी तुलना में कन्नड़ में नहीं है क्योंकि कन्नड़ तो बहुत आधुनिक हो गया है। बंगलुरु तो जैसा हाई-फाई सिटी है, वैसा तो कोई है ही नहीं तो अंग्रेजी का चलन बहुत है। तेलगु में भी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। उड़िया में अच्छी है, असमिया में अच्छी है, बंगाल में तो है ही, उसको देखते हुए हिन्दी में तो सही है कि पाठकों की कमी है। पढ़ने की संस्कृति का जैसा विकास होना चाहिए, वैसा न होकर, शिथिल हुआ है। जहां तक साहित्य के भविष्य का सवाल है तो साहित्य पर इसका कोई असर पड़ने वाला नहीं है क्योंकि लिखने वाले तो लिखेंगे ही। हिन्दी में पत्रिकाओं को अगर देखे तो जितनी निकल रही हैं, उससे ये मालूम होता है, कम बिकने के बावजूद, सरकारी खरीद में ही बिकती हैं ज्यादातर, बावजूद इसके लेखकों की संख्या में तो कमी नहीं हुई- कहानीकारों की संख्या देखो, कवियों की, आलोचकों की संख्या देखो। बात है हम लोगों की आदत है अंत सुखांत देखना चाहते हैं अर्थात अंत भला तो सब भला, तो ये कहने में कोई हर्ज नहीं है कि भविष्य उज्ज्वल है। मेरा तो एक ही शौक है और एक ही नशा है पढ़ना क्योंकि इसके बिना मैं रह नहीं सकता।

 
राजेन्द्र यादव
 
वरिष्ठ कथाकार एवं संपादक 'हंस':
 

तुम्हारे सवाल में दो-तीन बातें एक साथ जुड़ी हुई हैं- हिन्दी का भविष्य और भविष्य की हिन्दी। हिन्दी का भविष्य जब हम कहते हैं तो भाषा की हिन्दी भाषा की बात जहां तक है, वहां तक मैं समझता हूं, इस समय मुख्य रूप से तीन-चार भाषाएं सामने हैं, जो हिन्दी कहलाती हैं। एक भाषा सरकारी है,जो निहायत नकली है, जिसका सरकारी दफ्तरों में इस्तेमाल होता है, उसको कोई नहीं पढ़ता बल्कि हिन्दी के साथ उसमें जो अंग्रेजी लिखी होती है, लोग उसको पढ़कर ज्यादा गहराई से समझते हैं, उसका कोई भविष्य नहीं है। दूसरी भाषा हमारे अखबारों की है जहां आजकल अखबारों की बाढ़ आई हुई है।

दिल्ली से ही ६-७ ऐसे दैनिक अखबार निकल रहे हैं, जिनकी प्रसार संख्या लाखों में है- 'अमर उजाला', 'भास्कर', 'जागरण' या दूसरे अखबार हैं दो अखबार 'नई दुनिया' और 'आज समाज' भी है जो मुख्य दिल्ली के साथ जुड़े हैं। एक और 'देशबंधु' भी है। इसके अलावा 'सहारा' 'हिन्दुस्तान', 'नवभारत', 'जनसत्ता' पहले से ही निकल रहे हैं, इन अखबारों की भाषा अलग है। ये बड़े अखबार हिन्दुस्तान और नवभारत निःसंकोच अंग्रेजी के शब्द इस्तेमाल करते हैं, अंग्रेजी भरी हुई है इनमें। दूसरी भाषा बोलचाल की या बाजार की है, जिसमें विज्ञापन भी बनते हैं, समाचार भी बनते हैं, मुंबई में जो हिन्दी भाषा बोली जाती है, उसमें मराठी और गुजराती के शब्द हैं, इधर जो पूरब की बरक बोली जाती है, उसमें बंगाली ज्यादा मिली हुई है, तो जिन-जिन बॉडर्स पर हिन्दी बोली जाती है, वहां-वहां उसका रूप बदल जाता है। तीसरी हमारे साहित्य की भाषा है। साहित्य में भी दो धाराएं हैं- एक विश्वविद्यालयों में बोली या लिखी जाती है और दूसरी सर्जनात्मक में आती है, सब लोगों के लिए अनिवार्य है,

उसमें हर व्यक्ति अपनी मानसिक और भौतिक जरूरतों को व्यक्त करता है। मुझे लगता है कि जो भविष्य की हिन्दी है, वो ये बाजार वाली हिन्दी तय करेगी। बाजार से मेरा मतलब विज्ञापनों की भी है और दैनिक रोजमर्रा की बोलचाल की भी और सबसे ज्यादा भविष्य मुझे इसी का दिखाई देता है। मुझे सरकारी भाषा का भविष्य दिखाई नहीं देता, अखबारों की भाषा रोज बदलेगी, बदल भी रही है और जो साहित्यिक भाषा है, जो विश्वविद्यालयों से अलग है, वो भाषा भी मुझे नकली लगती है। हमारे सामने चूंकि विकल्प के रूप में अंग्रेजी है लेकिन जहां विकल्प नहीं है और उसी भाषा से काम चलाना है, भाषा वहीं बनती है और वहीं वो जीवन के साथ हुई होती है।

मैं अंग्रेजी का इस्तेमाल खास तौर से इसलिए कर रहा हूं कि जितने भी पढ़े-लिखे लोग हैं-चाहे अंग्रेजी जानते हों या न जानते हों लेकिन पूरे परिवेश में जिस तरह की भाषा सुनाई देती है, उसके आधार पर वो किसी दिशा में चले जाते हैं। चूंकि अंग्रेजी एक इंटरनेशनल भाषा है, आज इंटरनेट से लेकर हर जगह अंग्रेजी सुनाई देती है तो हमारे लिए विकल्प के रूप में बहुत आसान है, शहरी मध्य वर्ग के लिए कि वे या तो मिली-जुली भाषा बना लें या हमेशा एक खास किस्म के अनुवाद के चक्कर में रहें शब्द अंग्रेजी का होता हैे और हम उसका अनुवाद े बहुत उम्मीद दिखाई देती है क्योंकि वेरायटी और विविधता दिखाई देती है। मुझे लगता है कि हिन्दी में जो भविष्य दिखाई देता है वो रचनात्मक लेखन के माध्यम से खासकर आत्मकथा के माध्यम से दो वर्गों का ही दिखाई देता है, वो हैं- दलित और महिला क्योंकि इनके पास अपना कोई अतीत नहीं है, यदि है तो वो बहुत यातनापूर्ण है, वो बहुत दमनकारी है, उनके सपनों को कुचलने वाला रहा है।

 
शिव कुमार मिश्र
 
वरिष्ठ आलोचक
 

सबसे बड़ा संकट आज छपे हुए शब्द पर है, ये जो आया है इलैक्ट्रानिक मीडिया, अब किसी के पास इतना समय नहीं है कि उपन्यास-कहानी पढ़ें। सबसे बड़ी चिंता हमारी साहित्यिक अभिरुचि की है, जितना तेजी से क्षरण इस समय हुआ है, उतने पहले नहीं था। मैं कानपुर का रहने वाला हूं तो कानपुर में किराना की दुकान पर भी 'सरस्वती' जैसी पत्रिका मिल जाती थी क्योंकि वो लोग उसके सदस्य होते थे। आम लोगों की साहित्य की प्रति रूचि रहती थी, भले ही वो कोई भी कार्य करता हो, उसका साहित्य से संबंध हो या नहीं लेकिन आज पढ़े-लिखे लोगों की गंभीर साहित्य से रुचि हटती जा रही है और जैसा माहौल है उसमें लोग आज थ्रिल चाहते हैं, रोमांच चाहते हैं। सब चाहते हैं कि कोई ऐसा मसाला सामने आए, जो रोमांचित कर सकें। आज के समय में रचनाकार का लिखना ही पर्याप्त नहीं है,

जिस साधारण जन के पक्ष में, मानवीयता के पक्ष में, कविता के पक्ष में आज का साहित्यकार टकरा रहा है, आज यदि आपको जनता तक उसे पहुंचाना है तो यदि आप नाटककार हैं, तो नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से पहुंचाइए यदि गीत लिखते हैं तो जनगीत से पहुंचाइए। ये अगर नहीं करेंगे तो जनता तक बातें नहीं पहुंचेंगी। बंद कमरों में विमर्श करना बेमानी लगता है। देखिए, साहित्य के भविष्य के प्रति मैं निराश नहीं हूं क्योंकि साहित्य का संबंध हमारी संवेदनाओं से है। लेकिन आज हिन्दी समाज में गंभीर साहित्य के प्रति अभिरुचि द्घट रही है। इसलिए हमें जनता की भाषा में लिखना होगा और लिखे हुए को जनता के बीच में पहुंचाना होगा। आज इसमें एक दरार आ गई है। आज का युवा करियर बिल्ंिडग में इस तरह से तब्दील हो गया है कि उसे देश-दुनिया की कोई चिंता नहीं है तो साहित्य किसके बल पर बचा रहेगा। आज प्रकाशक इतनी महंगी किताबें छाप रहे हैं, तो आज किताबें पाठक नहीं खरीद रहा बल्कि किताबें सप्लाई हो रही हैं, जिन्हें कोई नहीं पढ़ता। आज कितने लोग हैं जो खरीद कर किताबें पढ़ रहे हैं? आज के समय में तो कहानीकार दूसरे रचनाकारों पर कहानियां लिख रहे हैं। आज बाजारवाद का प्रभाव है, जो बाजार में बिक रहा है, वही छप रहा है। कविता कहानी लिखकर स्त्री मुक्त नहीं हो सकती। दूर-दराज में नजरें दौेड़ाकर देखिए उस स्त्री की तरफ, जिसको मुक्ति के मायने नहीं मालूम। मुक्त तो उसको होना है।

 
पंकज बिष्ट
 
सुपरिचित कथाकार व संपादक 'समयांतर'
 

हर भाषा के कई स्तर होते हैं मतलब लेयर होते हैं। उसमें भाषा का काम मात्र संवाद करना नहीं होता। उसका काम संवाद के अलावा ज्ञान का संचयन भी होता है और वो बाजार में बात करने में भी काम आता है। दूसरी बात ध्यान रखने की यह है कि भाषा कई स्तरों पर काम करती है और वही भाषा बनती है, जो सारे स्तरों पर एक साथ चलती है। जो भाषाएं ऐसा नहीं करतीं, मान लीजिए कोई भाषा सिर्फ बोलचाल की भाषा रहती है तो वो बोली में बदल जाती है और अगर कोई भाषा सिर्फ ज्ञान की रहती है, जैसे लेटिन और संस्कृत है, तो वो शिष्टता की भाषा बन जाती है, व्यवहार में नहीं आती। तो अच्छी भाषाएं, जिनको विकसित करना होता है और जो बढ़ती हैं, कुछ अंग्रेजी की तरह उसमें हरेक चीज, हर पक्ष समाज का, भाषा का जो काम है, वो आना चाहिए, वही भाषा बचेगी। इसलिए हिन्दी जो विश्व की हिन्दी अगर होगी तो उसमें ज्ञान के संचयन की क्षमता भी होनी चाहिए, वो मात्र बाजारू भाषा नहीं होनी चाहिए। क्योंकि अगर केवल बाजारू भाषा होगी तो उसकी कोई उपयोगिता ज्ञान के लिए नहीं होगी। इसलिए ये प्रयत्न अगर नहीं होगा कि उसमें ज्ञान का सृजन हो, ज्ञान से मेरा मतलब हर क्षेत्र में सृजनात्मक हो, वैज्ञानिक हो, सामाजिक हो, आर्थिक हो, हर विषय का अगर उसमें संचयन नहीं होगा, उसका लेखन-कृतित्व नहीं होगा तो हिन्दी का कोई भविष्य नहीं है।

आज जो स्थितियां बन रही हैं उनमें लगातार अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है और हिन्दी लगातार किनारे हो रही है। चूंकि हिन्दी इतने बड़े इलाके में बोली जाती है और इतने ज्यादा लोग उससे जुड़े हुए हैं तो वो लगातार बनी हुई है। पर अब दिक्कत ये हो रही है अंग्रेजी के कारण जो बेहतर रूप है, अद्यतन ज्ञान है, जो विकसित ज्ञान है, वो उन तक नहीं पहुंच पा रहा है। उनकी उसमें हिस्सेदारी हो रही है। भाषा का काम यह भी है कि जो जनता है, उसकी भी हिस्सेदारी हो तो इतने बड़े समाज को काटकर आप एक पराई भाषा पर निर्भर नहीं हो सकते। अंततः हमको यदि एक समाज को विकसित करना है तो अपनी भाषा को तो अपनाना ही पड़ेगा। दूसरी बात ज्ञान की हिन्दी का इस्तेमाल न करके और एक विदेशी भाषा का इस्तेमाल करके, जो करोड़ों लोग हैं, उनको सत्ता से, ज्ञान से, प्रशासन से, व्यवसाय की बहुत सारी चीजों से वंचित कर रहे हैं। उदाहरण स्वरूप बैंक हैं। बैंक में आदमी पैसा रखता है और अगर वो अंग्रेजी नहीं जानता तो उसको यह पता नहीं है कि

बैंक में पैसा कितना है क्योंकि पास बुक अंग्रेजी में मिलती है। दूसरा उदाहरण है दवाओं पर नाम के अतिरिक्त जो छपा होता है वो इसलिए कि जो खा रहा है, उसको पता हो कि वो कौन सी दवा खा रहा है लेकिन अधिकांश वो अंग्रेजी में होता है, तो ये अपने-आप में एक मरीज का और एक नागरिक का अधिकार है, उससे उसको वंचित करना है इसलिए लगता है कि यदि हिन्दी को बचाना है तो केवल संद्घर्ष के अलावा और कोई रास्ता दिखाई नहीं देता और भाषा को राजनीतिक रूप में लिया जाना बहुत जरूरी है।

 
रवीन्द्र कालिया
 
वरिष्ठ कथाकार एवं संपादक 'नया ज्ञानोदय'
 

अक्सर हिन्दी समाज को पिछड़ा बताने के लिए लोग उसे संस्कृतिविहीन, उजड्ड पता नहीं किन-किन विशेषणों से नवाजते हैं, जबकि सच यह है कि चाहे राजनीतिक सत्ता हो, साहित्यिक सत्ता हो, वो केवल हिन्दी समाज द्वारा ही संभव है हिन्दी के लिए। जिस तेजी से हिन्दी समाज में साक्षरता बढ़ी है और आज की स्थितियों में भी थोड़ा सुधार लक्षित होता है। पत्रिकाओं के प्रति प्रारंभिक रूप से यह देखा जा रहा है कि लोगों में काफी उत्साह बढ़ा है शायद विश्व में सबसे अधिक छपने वाली पत्रिकाएं हिन्दी की ही हैं और ये हिन्दी भाषी समाज की बदौतल ही संभव हो पाया है। कितने ही हिन्दी के दैनिक समाचार पत्रों की संख्या २-२ करोड़ तक पहुंच गई है, इसलिए हिन्दी समाज को लांछित करना दुर्भाग्यपूर्ण है।

कई लोग कहते हैं हिन्दी समाज बहुत नाशुक्रा है। यह भी एक गलत धारणा है, जब हिन्दी समाज के पास पेट भरने के लिए दो जून खाने के लिए अन्न नहीं था, तब वो सोचते थे कि साहित्य-संस्कृति की रक्षा करें और ये कुछ खाए-पिए, अद्घाए लोगों का रोना है। मैं नहीं समझता विश्व में कहीं भी इलैक्ट्रॉनिक मीडिया ने लिखित शब्द को चुनौती नहीं दी है और विकसित देशों में भी आज जो प्रामाणिकता लिखित शब्द की है, वो इलैक्ट्रॉनिक मीडिया की नहीं है। भारत में भी इलैक्ट्रॉनिक मीडिया जनता से दूर जा रहे हैं क्योंकि वो जनता का कोई न तो मनोरंजन करते हैं, केवल अंधविश्वास फैलाते हैं। जो काम हिन्दी पत्रकारिता शायद नहीं करती। जहां तक साहित्य को जनता तक पहुंचाने की बात है, मुझे भी लगता है कि पहुंचना तो चाहिए लेकिन दोनों ही अपने कर्त्तव्य का ठीक से निर्वाह नहीं कर रहे हैं। कुछ वर्ष पूर्व दोनों ही अधिक जागरूक थे। साहित्य, कला और संस्कृति के प्रति ज्यादा जागरूक थे, लेकिन धीरे-धीरे इसका क्षरण हुआ है।

 
विभूति नारायण राय
 
कुलपति म.गा.अ. हि.वि.वि एवं वरिष्ठ उपन्यासकार
 

देखिए, दुनिया के सारे समाजों में साहित्य का यदि ऊपर से देखें तो कोई बहुत उज्ज्वल भविष्य दिखाई नहीं देता। जबसे ये ग्लोबलाइजेशन और अंधी दौड़ का जमाना आया है, यह कहा जाने लगा है कि साहित्य निरर्थक हो गया है, साहित्य अप्रासंगिक हो गया है। साहित्य के बहुत सारे विकल्प यदि आप उसे कोट-अनकोट कहना चाहें तो आ गए हैं। मैं नहीं समझता कि साहित्य का कोई विकल्प ऐसा है जो साहित्य को समाप्त कर दे। आज से सौ, सवा सौ साल पहले जब अखबार आए तो कहा गया कि शिक्षण खत्म हो जाएगा, जब टेलीविजन आया तो कहा गया कि अखबार खत्म हो जाएंगे, जब इंटरनेट आया तो पत्र-पत्रिकाएं खत्म हो जाएंगी लेकिन कोई चीज खत्म नहीं होती।

खासतौर से जो छपे हुए शब्द का महत्व है, वो तो कभी खत्म नहीं होता। इसलिए साहित्य का भी महत्व या उपयोगिता हिन्दी समाज में बनी रहेगी। उसी तरह जैसे दुनिया के दूसरे समाजों में बना रहेगा। देखिए जो मुख्य धारा का साहित्य होता है, वो तो आम पाठक की पहुंच के हमेशा बाहर होता है क्योंकि उस साहित्य को समझने के लिए थोड़े-बहुत डिसिप्लिन की जरूरत होती है, थोड़ी-बहुत संस्कार की जरूरत होती है, तैयारी की जरूरत होती है लेकिन मैं यह भी नहीं कह रहा हूं कि जो शुरुतावादी या कलावादी दृष्टि है साहित्य की, वो सही है, लेकिन यह तो निश्चित ही है कि एक सजग पाठक के लिए, एक अच्छे पाठक के लिए थोड़ी बहुत तैयारी जरूरी है। आम पाठक से यदि आपका मतलब एक ऐसे पाठक समूह से है जो बिना तैयारी किए मुख्य साहित्य का रसास्वादन करना चाहे तो निराशा होगी लेकिन थोड़ी सी तैयारी करके मुख्य धारा का आनन्द लिया जा सकता है।

 
असगर वजाहत
 
वरिष्ठ कथाकार
 

देखो, ऐसा है हिन्दी समाज में साहित्य का भविष्य मुझे इसलिए अच्छा दिखाई देता है क्योंकि मुझे लगता है कि हिन्दी का भविष्य जो है, वो रचनात्मक भाषा के रूप में है, साहित्य की भाषा के रूप में है, सिनेमा की भाषा के रूप में है, नाटक की भाषा के रूप में है, कलाओं की भाषा के रूप में है। विज्ञान के रूप में या मेडिकल की भाषा के रूप में या तकनीकी रूप में तो मुझे नहीं लगता है। इसलिए हिन्दी में साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है। लेकिन हम उसके लिए अभी से स्थान बनाने की कोशिश करेंगे, तब और वो स्थान बनाने की कोशिश मेरे हिसाब से नहीं हो रही है जैसे स्कूल में है जो हिन्दी के पाठ्यक्रम हैं, स्कूल में बच्चा हिन्दी पढ़ता है, सबसे अरुचि का विषय उसे हिन्दी लगता है। सबसे खराब पुस्तकें हिन्दी की हैं, सबसे खराब टीचर हिन्दी के हैं, सबसे कम ध्यान हिन्दी पर दिया जाता है तो ऐसी स्थिति में जब बच्चे के संस्कार स्कूल से ही हिन्दी में रुचि के नहीं बन पाते हैं तो आगे चलकर हिन्दी क्या पढ़ेगा? तो आप बड़े तादाद के ऊपर हिन्दी के पाठकों को स्कूल लेबल से पैदा करो।

क्या हमने कोई सर्वेक्षण किया है ऐसा कि हमको पता चले कि स्कूल में हिन्दी की स्थिति क्या है? कोई स्टडी नहीं है ऐसी। जबकि हिन्दी की संस्थाओं को चाहिए, पत्रिकाओं को चाहिए स्टडी करवाएं- स्कूलों में हिन्दी की? स्थिति क्या है क्योंकि हम लोग अपने निजी अनुभवों से ही जानते हैं जो टीचर हमको बताते हैं कि हिन्दी की स्थिति वहां बहुत शोचनीय है। तो हिन्दी का भविष्य साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है यदि हम उसके चहुंमुखी विकास को एक प्रकार से आगे बढ़ा सकें। दरअसल ऐसा है कि हमारे देश का जो दर्शन है फिलॉसफी है, वही अनुवाद से पैदा होती है, ये महादेश है। देश का काम तो अनुवाद से चल सकता है लेकिन महादेश का काम अनुवाद के बिना नहीं चल सकता तो इस महादेश को अगर महादेश बने रहने देना है तो एक अनुवाद का आपके पास व्यापक कार्यक्रम होना चाहिए, भारतीय भाषाओं से हिन्दी और हिन्दी से भारतीय भाषाएं। सारी भाषाओं को आप बराबर का सम्मान दीजिए। हिन्दी से विदेशी भाषाएं, विदेशी भाषाओं से हिन्दी, ये अनुवाद करने की हमारे पास कोई मशीनरी नहीं है और ये साहित्य अकादमी वगैरा यदि है, भी तो ये साल में केवल दो किताबें छापते हैं तो इन दो किताबों से कोई मतलब नहीं निकलता। अनुवाद का एक पूरा मंत्रालय होना चाहिए। केन्द्रीय सरकार अनुवाद मंत्रालय बनाये और वो अनुवाद मंत्रालय कम से कम हजार-पांच सौ किताबें साल में छापे-दूसरी भाषाओं में और हिन्दी में, तमिल में, मलयालम में, उर्दू में, कन्नड़ में, तो ये हजार किताबों का आदान-प्रदान दूसरी भाषाओं में हो, देश की और विदेश की, तब जाकर हमारे यहां एक प्रकार का अंतरराष्ट्रीय सीन बनेगा। अगर मान लीजिए आपको फ्रेंच साहित्य है तो हम आपको हिन्दी में उपलब्ध कराते हैं

ऐसे ही स्पेनिश साहित्य पढ़ना है तो उसे हम हिन्दी में उपलब्ध कराते हैं। तो लोगों को पता चलेगा कि हिन्दी राष्ट्रभाषा है। इसके अंदर शक्ति है, सामर्थ्य है। अभी आपसे कहा जाए कि आपने स्पेनिश के कितने उपन्यास पढ़े हैं तो जवाब मिलेगा कि तीन या चार पढ़े हैं तो भई आप कहां सो रहे हैं, पचास साल का, साठ साल का तुम्हारा गणतंत्र हो गया और तुम चार अनुवाद किए हुए बैठे हो, क्या मतलब हुआ इसका तो अनुवाद की ताकत को और हिन्दी को विश्व परिदृश्य पर लाने के लिए यह बहुत जरूरी है कि हम अनुवाद के काम को गंभीरता से लें, जो हम अभी बिल्कुल नहीं ले रहे हैं। देखो साधना, मैं बात करता हूं हिन्दी कल्चर की, जिसमें सिनेमा और टेलीविजन उसका एक हिस्सा है, साहित्य भी एक हिस्सा है, नाटक भी उसका एक हिस्सा है, विज्ञापन भी हिस्सा है, तकनीकी हिन्दी भी हिस्सा है तो ये सब एक-दूसरे को शक्ति देता है, विरोध नहीं करता। आपने देखा होगा कि जिन उपन्यासों पर धारावाहिक बने जैसे भीष्म साहनी जी का 'तमस' या श्रीलाल शुक्ल का 'राग दरबारी' तो उन उपन्यासों की सेल बढ़ गई। उपन्यास इलैक्ट्रॉनिक मीडिया को बल देता है और इलैक्ट्रॉनिक मीडिया प्रिंट मीडिया को बल देता है। ये दोनों साथ में फलते-फूलते हैं। सवाल यह है कि इनके बीच में कोई रिश्ता कैसे बने। कहा जाता है कि फिल्मों में सब्जैक्ट्स की बहुत कमी है। क्या साहित्य में किसी संस्था ने यह कहा कि हमारे यहां विषय की कोई कमी नहीं है,

हमारे यहां बड़े नए-नए विषयों पर कहानी, उपन्यास, नाटक लिखे जाते हैं, हम आपको ये विषय सुझा सकते हैं, बात कर लीजिए आप लेखक से, हम आपको विषय सुझाएं, आप फिल्म बनाइए, सीरियल बनाइए। हमारे यहां कोई ऐसा लिंक नहीं है दो माध्यमों के बीच में, दोनों का काम हिन्दी में होता है, तो ये लिंक होना चाहिए। ये दोनों माध्यम विकसित होंगे, जो नहीं हैं। हमने कभी भी बड़े परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा, हम बहुत छोटे परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। हिन्दी का मतलब हिन्दी के चार-छह, दस लेखक, इतने ही आलोचक, बस ये है। जबकि हिन्दी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है, इसका इतना बड़ा क्षेत्र है, उन सबको पहचानना होगा और ये बिल्कुल जरूरी नहीं है कि कविता, कहानी, उपन्यास या साहित्य की केवल एक भूमिका हो समाज में। वो बहुआयामी भूमिकाएं हैं, इसको चार साल के बच्चे से लेकर अस्सी साल के तक चाहते हैं। तो, क्या आप चार साल के बच्चे को वहीं किताब दोगी जो अस्सी साल केको ? नहीं न, तो जो आदमी चाहे बच्चे के लिए लिख रहा है या बुजुर्गों के लिए, उसका अपना महत्व है। तो योजनाबद्ध तरीके से इसको मानना है और क्रियान्वित करना है। तभी हिन्दी साहित्य को बड़ी भूमिका मिल सकती है।

पॉपुलर कल्चर का भी अपना महत्व है क्योंकि वह हाई कल्चर की एक सीढ़ी है तो इन चीजों के ऊपर हिन्दी में बहस होनी चाहिए। भारत में हिन्दी का दर्जा संवैधानिक रूप से दूसरी भाषाओं से ऊंचा है, उसको इसी ऊंचे रूप में स्थापित होना है। अगर आप अपने को ऊंचा नहीं उठाओगे तो राजभाषा का दर्जा लेने का आपको कोई अधिकार नहीं है। दूसरे, हिन्दी को दूसरी भारतीय भाषाओं में लीडरशिप की भूमिका में आना होगा।

 
 
 
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