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क्यूबा यात्रा के पूर्व मैं प्रो. मैनेजर पांडेय की पुस्तक 'संकट के बावजूद' में राबर्टो फर्नांडीज पर न केवल जोफ्रेडो और जॉन बेवरली की बातचीत पढ़ चुका था, उनके परिचय और प्रतिबद्धता से भी परिचित हो चुका था। १९३० में जन्मे राबर्टों फर्नाडीस रेतामार क्यूबा |
के प्रसिद्ध कवि, समायोजक और निबंआँाकार हैं। वे क्यूबा की क्रांति से द्घनिष्ठ रूप में जुड़े रहे। उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, फ्रेंच, इतावली, पुर्तगाली, जर्मन और अन्य अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। वे १९६५ से हवाना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। अमेरिका के याले विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफेसर के रूप में उन्होंने काम किया और साथ ही अमेरिका के अन्य विश्वविद्यालयों तथा यूरोप के विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान भी दिए। 'कासा दे लास अमेरिकाज़' नामक क्यूबाई सांस्कृतिक संस्था के वे संप्रति अध्यक्ष हैं और १९६५ से उसकी प्रमुख पत्रिका के संपादक भी।
साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की ओर से जब मई २००७ के अंत में भारतीय लेखक प्रतिनिधि मंडल के एक सदस्य के रूप में क्यूबा जाने का मुझे आमंत्रण मिला, मेरे लिए सचमुच प्रसन्नता की बात थी। अवसर था- 'संस्कृति और विकास पर आयोजित ५वीं अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस! यह भी पता चला कि इस प्रतिनिधि मंडल में साहित्य अकादमी से पुरस्कृत अंग्रेजी के कवि केकी एन दारूवाला, 'जनसत्ता' के संपादक ओम थानवी, कन्नड़ की कवयित्री ममता जी सागर के साथ उर्दू त्रैमासिक 'अदब साज़' के संपादक नुसरत जहीर भी हैं, तो मेरे लिए खुशी की बात ही थी। मेरे पास विभागीय पासपोर्ट तो था लेकिन व्यक्तिगत पासपोर्ट नहीं। मुझसे एक गलती यह हो गई थी कि अवकाश ग्रहण के बाद विभागीय पासपोर्ट को मैंने नहीं लौटाया था। अब मेरे सामने दुहरी दिक्कत थी। पहले, विभागीय पासपार्ट को लौटाना और प्रमाण-पत्र लेना और फिर तत्काल नया व्यक्तिगत पासपोर्ट बनवाना। आईबी के कार्यकाल में मैं वीआईपी सुरक्षा में रहते हुए लगभग १५-२० देशों की यात्रा कर चुका था। विदेश यात्रा का आकर्षण मेरे लिए बड़ा नहीं था। लेकिन स्कूल और कॉलेज के दिनों से मेरा एक बड़ा सपना था- मास्को जाने का और लेनिन के पार्थिव शरीर को देखने का। इसी से जुड़ा बड़ा सपना था कांगो जाने का जिसके नाम पर साठोत्तरी दशक में मास्को में पैट्रिस लुमुम्बा यूनिवर्सिटी बनाने का एक बड़ा सपना था। दुनिया के क्रांतिकारियों में मैं चे गुवेरा से बहुत प्रभावित था। वे अभिन्न रूप से क्यूबा की क्रांति से जुड़े हुए थे।
इसलिए मैंने यात्रा पूर्व क्यूबा के स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास ही नहीं बल्कि उसका भूगोल भी पढ़ा। मुझे लगा अटलांटिक महासागर के किनारे बसा यह देश स्वतंत्रता के बाद अमेरिका के लिए बड़ी चुनौती है। मैंने पहले ही चे गुवेरा की बोलिविया डायरी के अंतिम सप्ताह का अनुवाद हिन्दी में किया था, इसलिए भी मेरे भीतर एक बेचैन उत्सुकता थी। क्यूबा जाने की तैयारी मन ही मन मैंने कर ली थी। लेकिन एक बड़ा व्यवधान आया साहित्य अकादमी के अधिकारी के फोन से ८ जून को यूके की ओर से मेरा ट्रांजिट वीसा रिजेक्ट कर दिया गया है। समय कम था और इस स्थिति से मैं हैरान और परेशान था। अंततः ८ जून को मैं ब्रिटिश हाईकमीशन पहुंचा और वीजा न दिए जाने की उनकी भ्रांति दूर। वे शर्मिदा हुए और अंततः मुझे वीजा मिल गया। भारतीय लेखक प्रतिनिधि मंडल १० जून को क्यूबा की राजधानी लीहवाना पहुंच गया। हम होटल पाल्कों में अवस्थित हुए। मेरा कमरा नं ़था ३२०। इस यात्रा की एक बड़ी उपलब्धि रही क्यूबा-लैटिन अमेरिका के अप्रतिम स्पेनिश कवि राबर्टो फर्नार्ंडीस रेतामार से कासा लास नामक क्यूबाई सांस्कृतिक संस्था के अध्यक्ष से मुलाकात ।
न केवल उन्होंने अपनी संस्था में मुस्कुराते हुए हमारा स्वागत किया बल्कि हमसे बातचीत भी की। हमने उनके साथ फोटो खिंचवाई। लेकिन हमने उनको एक बड़ा सरप्राइज दिया। ओम थानवी स्वच्छंद प्रवृति के ही नहीं, प्रकृति से भी अद्भुत व्यक्तित्व हैं। प्रतिनिधि दल से बाहर द्घूमते-द्घामते पता नहीं कहां से उन्होंने राबर्तो का वर्ष २००० में प्रकाशित कविता संकलन 'कहां है फर्नाडीस? तथा अन्य कविताएं' की प्रति खरीद ली थी और उनसे यह पुस्तक झटक ली थी दारुवाला ने सचमुच राबर्तो के लिए आश्चर्यजनक था जब उक्त संग्रह पर दारुवाला के आग्रह पर वे अपना ऑटोग्राफ दे रहे थे। उन्होंने लिखा- 'ूपजी तिपमदकेीपचश् फ्रांस रेतामार जून/०७ यह एक बड़ी बात थी। कविता के बारे में मेरे द्वारा पूछे गए एक प्रश्न के उत्तर में उन्होंने कहा- 'कविता हमारे समय का एक बड़ा विमर्श है। सामाजिक सरोकारों का नहीं, संबंधों के बीच बदलती दुनिया के हाहाकार और चीत्कार से मुक्ति के अहसास का भी।' इस बात का हमें हमेशा मलाल रहेगा कि उनके मुख से हमने उनके कविता-पाठ का आग्रह नहीं किया। (फोटो प्रस्तुत है) राबर्तो की कमर लगभग ८० साल में भी नहीं झुकी है और वे अब भी आधुनिक स्पेनिश कविता के शिखर हैं। दिव्य और प्रखरता में चमकते हुए। क्यूबा यात्रा के पूर्व मैं प्रो ़ मैनेजर पांडेय की पुस्तक 'संकट के बावजूद' में राबर्तो फर्नांडीस पर न केवल जोफ्रेडो और जॉन बेवरली की बातचीत पढ़ चुका था, उनके परिचय और प्रतिबद्धता से भी परिचित हो चुका था। १९३० में जन्मे राबर्तो फर्नाडीस रेतामार क्यूबा के प्रसिद्ध कवि, समायोजक और निबंधकार हैं।
वे क्यूबा की क्रांति से द्घनिष्ठ रूप में जुड़े रहे। उनकी रचनाओं का अंग्रेजी, फ्रेंच, इतावली, पुर्तगाली, जर्मन और अन्य अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ है। वे १९६५ से हवाना विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। अमेरिका के याले विश्वविद्यालय में अतिथि प्रोफेसर के रूप में उन्होंने काम किया और साथ ही अमेरिका के अन्य विश्वविद्यालयों तथा यूरोप के विभिन्न विश्वविद्यालयों में व्याख्यान भी दिए। 'कासा दे लास अमेरिकाज़' नामक क्यूबाई सांस्कृतिक संस्था के वे संप्रति अध्यक्ष हैं और १९६५ से उसकी प्रमुख पत्रिका के संपादक भी।
फ्रांस के क्यूबाई दूतावास में वे सांस्कृतिक सलाहकार के अलावा क्यूबा के कलाकार और लेखक संद्घ के सचिव और क्यूबा में भर्ती अध्ययन केन्द्र के निदेशक भी रहे। निकारागुआ के कवि अर्नेस्तो कार्दिनाल और निकानोर पार्दा के साथ रेतामार दक्षिण अमेरिका में संवादधर्मी कविता के प्रवर्तक माने जाते हैं। वर्ष २००० में प्रकाशित उनके उल्लेखनीय संग्रह 'कहां है फर्र्नांडीस तथा अन्य कविताएं' से मैंने, जिसमें उनकी १९५३ से लेकर १९९४ तक की महत्वपूर्ण कविताएं संकलित हैं, पांच कविताओं का अनुवाद प्रस्तुत किया है पत्रिका के संपादक क्षितिज शर्मा के विशेष के आग्रह पर। इन कविताओं के अनुवाद इसी संग्रह में अंग्रजी किए गए हैं। एक आक्रमणकारी का समाआिँा लेख |