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नासिरा शर्मा की यह यात्रा एक ऐसे काल्पनिक देश की है जो मानव क्रूरता की त्रासदी का एक ज्वलंत उदाहरण है। यह महज द्घटनाओं और स्थानों का विवरण मात्र नहीं है। इसमें इतिहास और संस्कृति के पतन के पीछे |
के कारण भी हैं तो उत्थान की उत्कंठा भी है। यही इसको एक खास अर्थ देता हैजिनके द्घर नहीं जले वे ही कहां सुकून से अपने द्घरों में रह रहे हैं। भय उनकी भी रातों की नींद उड़ाए हुए है।' डिसूजा की मुस्कुराहट अजीब थी। कुछ कुछ भयभीत करने वाली। शायद माहौल का असर हो।''
उड़ान सुबह चार बजे की थी। रिपोर्टिंग टाइम दो बजे। जिसका मतलब था कि सोने के लिए कोई वक़्त ही नहीं बचा था। तो भी आदत के मुताबिक साढ़े बारह बजे मैं बिस्तर पर कमर सीधी करने के लिए लेट गई। एकाएक शंका उभरी कि मैं इस बार भी यात्रा पर निकल पाऊंगी या नहीं? इस ख्याल के आते ही मैं उठकर बैठ गई। अजीब इत्तफाक़ रहा कि जब भी कहीं जाने का प्रोग्राम बना तो इत्तला मिली कि वहां बम फटे हैं। कुछ-कुछ देर के बाद एक दो नहीं बल्कि दस-बारह बम। हर बार यह सोचकर यात्रा स्थगित करनी पड़ी कि कहीं ठहर-ठहर कर बम फटने का सिलसिला चलता न जाए। दुर्द्घटना में मरना किसको पसंद आएगा। 'इस बार अगर ऐसा हुआ तो मैं यात्रा करना ही छोड़ दूंगी।' मैंने झुंझलाकर सोचा और कॉफी बनाने किचन में गई। 'आखिर यह सब कब तक चलेगा। लेख लिखो, टिकट बुक कराओ, पैकिंग करो फिर जब मन यात्रा पर जाने की खुशी में, नई जगह देखने की उमंग में डूबा हो तो एकाएक ऐसी द्घटनाएं द्घट जाती हैं और सुरक्षा के चलते कार्यक्रम धरे के धरे रह जाते हैं। काफी का द्घूंट भरते हुए मैंने टीवी खोला ताकि जो भी ख़बर मिलनी हो तो द्घर से निकलने से पहले मिल जाए वरना स्टेशन या हवाई अड्डे से लौटना तब बहुत अखरता है जब आप का सेल फोन द्घनद्घनाकर आपको मनहूस खबर दे और सुबह आपको द्घर में चलते-फिरते देख नौकर से डाकिया तक हैरत से पूछे 'अरे आप गई नहीं?' काफी पीने के बावजूद मेरे पपोटे भारी हो रहे थे। एयरपोर्ट के लिए निकलने में अभी देर थी। टीवी बंद कर मैंने आराम की मुद्रा अपना ली। जलती आंखों को कुछ चैन मिला। जहन में अलबत्ता बार-बार यह सवाल उठ रहा था कि नया मुल्क कैसा होगा? दिल्ली से उड़ा हवाई जहाज जब उस नये देश में पहुंचा तो सूरज डूब रहा था। कोयले की खान की तरह अंधेरा चारों दिशाओं को स्याह बना रहा था। मुझे अंदाज़ा नहीं था कि सफर इतना लंबा होगा।
शायर कुसूर उस उपन्यास का था जिसे मैं पढ़ने में डूबी रही। अपनी अटैची ऊपर से निकाल मैं जहाज़ की सीढ़ियां उतरने लगी। आसमान पर काले डैनों के बड़े-बड़े परिंदे उड़ रहे थे। बड़ा अजीब दृश्य था। हवाई अड्डे पर इस तरह परिंदों का मंडराना मुझे खासा डरावना लगा। दिल चाहा कि पूछूं क्या इन परिंदों की उड़ान भरने की आज़ादी सुरक्षा की दृष्टि से ठीक है? 'आप प्लीज बस में बैठें' मुझे आसमान ताकते बीच रास्ते में खड़ा देख किसी कर्मचारी ने कहा। मैंने नज़रें ऊपर से हटा उसके चेहरे को ताका और बस में चढ़ने आगे बढ़ी। तभी मुझे ख्याल सा गुज़रा कि उस आदमी का चेहरा जिन्दा इंसानों वाला नहीं था। एक झटका सा लगा और मैंने पीछे मुड़कर देखा मगर वहां कोई न था। सीट पर अभी बैठ ही रही थी कि ड्राइवर के चेहरे पर नज़र पड़ी तो वह भी मुझे कुछ वैसा ही लगा। मेरे पूरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ गई। 'बेजान आंखें, सूखी ज़िल्द, ठहरी आवाज ़ ़ क़ैसे हैं यहां के स्थानीय लोग?' मैंने दिल ही दिल में कहा और खुद से सवाल-जवाब करती सपनिस्तान के हवाई अड्डे में दाखिल हो गई। सुरक्षा जांच से गुज़रना भी एक बेकार रस्म है, मगर क़ायदा कानून बन जाए तो उसे मानना ही पड़ता है। यहां भी मुसाफिरों की लंबी लाइन थी जिनमें द्घुमक्कड़ी के लिए निकले लोग ज्यादा थे। कपड़ों और चेहरे से लापरवाह अपने में मगन। काउंटर पर भी जो आदमी पासपोर्ट देख रहा था उसका चेहरा भी मुर्दों जैसा लगा। भावहीन और पीला। मुझे अपने दोस्त ख़ालिक़ डिसूजा की याद आई। पिछले कई वर्षों से वह मुझसे मिलना चाह रहा था। अब तय यह हुआ था कि हम बिल्कुल नए मुल्क में मिलें। साथ-साथ द्घूमें और इस बीच अपनी-अपनी उपलब्धियों की चर्चा करें। फिर कुछ ऐसा प्लान बनाएं जिसमें दुनिया को एक नई दृष्टि के साथ देखने के साथ अपने पढ़ने और देखने वालों में एक नई स्फूर्ति भर दें। ख़ालिक़ डिसूजा एक फिल्ममेकर है और नए से नए विषय को उठाना उसके जीवन का लक्ष्य है।
हमारी मुलाक़ात इत्तफ़ाक से जेट एयरवेज़ की उड़ान पर हुई थी। जब वह मंगोलिया जाने की सोच रहा था। बनी बिल्डिंग का नक्शा बाहर से नहीं देख पाई थी मगर हवाई अड्डे पर अब अपने सामने बड़े से लगे पोस्टर पर मेरी नज़रें टिक गईं। मार्डन पेंटिंग की तरह वास्तुकला भी हो सकती है सोचती हुई, वहां हाल में पड़े सोफों पर कुछ लोगों को बैठा देख मैं भी वहीं आकर बैठ गई। ख़ालिक़ डिसूजा का इंतज़ार करना था। उसकी उड़ान के पहुंचने में सिर्फ दस मिनट बचे थे। मुझे शाम की फ्लाइट से वापस भी लौटना था। इसलिए शहर द्घूमते हुए जितनी बातें हो सकती थीं करने के लिए सोचा और जाने क्या-क्या सोचकर साथ में टेप रिकॉर्डर भी रख लिया था कैमरे के साथ। हाल धीरे-धीरे खाली होने लगा। डिसूजा की फ्लाइट से उतरे लोग भी इमारत से बाहर जा चुके थे मगर ख़ुद उन जनाब का कहीं पता न था। मैं पोस्टर, इश्तिहार, दुकानों पर सजी चीज़ों और हर पल बढ़ती खामोशी से बोर हो उठी थी। 'हाय! माफ करना मुझे आने में देर हो गई।' ख़ालिक़ डिसूजा की आवाज मुझे सुनाई पड़ी तो मैंने पीछे मुड़कर देखा। वह तेज़ी से मेरी तरफ बढ़ रहा था। मैं अपनी जगह से उठ खड़ी हुई और दोनों बाहर निकले। हमने सारे दिन के लिए एक टैक्सी कर ली। 'मैं पहले यहां का संग्रहालय देखना चाहता हूं। पूरी दुनिया में यूनिक है। कुछ दिनों पहले ही बनकर तैयार हुआ है।' ख़ालिक़ डिसूजा ने फैसला सुनाया इससे पहले कि हम कुछ पूछताछ करते या कुछ आपस में तय करते। संग्रहालय की इमारत देखकर चौंकी। वैसे तो मुझे सड़क, पेड़, द्घर, लोग झुलसे-झुलसे लग रहे थे।
जैसे बड़े पैमाने पर लगी आग ने बीच में बुझकर इन सारे लोगों की जान बख़्शी हो और इमारतों, पेड़ों को तबाही से बचाया हो मगर संग्रहालय की इमारत तो इंसानी खोपड़ी की तरह थी। देखने में ऐसा दृश्य उभर रहा था जैसे राख के ुटपुटा जैसा अंध्ेरा छाया हुआ था। शुरू में चीज़ें देखने में बड़ी दिक्कत महसूस हुई मगर कुछ देर बाद आंखें अंधेरा की अभ्यस्त हो गईं। सामने का दृश्य देख मैं सन्नाटे में आ गई। काले चेहरे वाले बदन। जैसे कोयले ने इंसानी आकृतियों का रूप धर लिया हो। एक औरत अपने बच्चे को गोद में लिए खड़ी नजर आई। पास में बैठा मर्द कैनवास पर जैसे ब्रश चला रहा हो। पास में कुछ अधजले कपड़े और फर्नीचर बिखरे लगे। कुछ लोगों के आधे धड़ गायब थे। उनके बैठने के अंदाज़ से लगा रहा था कि शायद वे भोजन कर रहे होंगे। कुछ के सर दूर लुढ़के पड़े थे। आंधी, तूफान, भूकंप, बमबारी का मिला-जुला सा माहौल उभर रहा था। 'यह सब क्या है ख़ालिक़ डिसूजा?
यह आर्टिस्टों की बनाई कांसे और लोहे की मूर्तियां हैं या चित्रकारों की पेंटिंग्स?' मैंने आंखों पर ज़ोर डाला। 'यह हक़ीक़त है। एक इंसान का दूसरे इंसान से किया गया बर्ताव ़ ़ ़ ़शोभा सिंह की बनाई सोनी महिवाल की पेंटिंग्स तुम्हें कितनी पसंद है और... वही जो फनकारों के जरिए बनाई कलाकृतियों की अहमियत है। इंसानी जबड़ा वहां भी तो ब्रश, कलम और कभी छेनी-हथौड़ी से कैद किया जाता है। यहां चूंकि स्वयं कलाकार इन हादसों का शिकार हुआ है तो उसी को उठाकर यहां ला खड़ा किया गया है।
गौर से देखो तुम्हें सवाल पूछने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।' ख़ालिक़ डिसूजा हंसा मगर मुझे उसकी हंसी फूटी आंख नहीं भायी। सुरंगनुमा हॉल में जैसे मैं आगे बढ़ रही थी मुझे सब कुछ गुड्ड-मुड्ड सा नज़र आने लगा था। खबरें, टीवी, छपी तस्वीरें और अब यह ़ ़ यथार्थ का चित्रण नहीं। खुद यथार्थ समय के सीने पर खड़ा था। अपने सच की सनद बना हुआ। 'यहां मेरा द्घर भी है। दरअसल, वही देखने मैं आया था। तुम्हें इसलिए बुलाया था कि तुम इस पूरी स्थिति पर कुछ लिखो। ऐसा कुछ लिखो जो पहले न लिखा गया हो।' ख़ालिक़ डिसूजा ने बड़े जोशीले अंदाज़ में कहा। 'तुम्हारा द्घर ़ ़ ़? किधर था? चलो दिखाओ।' मैंने हैरत से कहा।
किसका कौन मरा, बम से उड़ा, गोली से भूना गया, कहां तक हम हिसाब रखेंगे? जिनके द्घर नहीं जले वे ही कहां सुकून से अपने द्घरों में रह रहे हैं। भय उनकी भी रातों की नींद उड़ाए हुए है।' डिसूजा की मुस्कुराहट अजीब थी। कुछ कुछ भयभीत करने वाली। शायद माहौल का असर हो। हम दोनों बाहर निकले। अंदर बाहर की रोशनी में कोई खास फर्क नहीं था। तो भी आंखें चुधियां सी गई थीं।
'असम में भी मैंने नल से आता लाल पानी देखा था। डर गई थी। वह सब याद कर मुझे हंसी आ गई। मेरी हंसी देखकर डिसूजा भी इस बार हंसा। आखिर मैं सुबह से पहली बार हंसी थी। हमारे अंदर का अवसाद द्घट गया था। हम अपने को हल्का महसूस कर रहे थे। 'जरा किताबों की दुकान तक चलते हैं।' मैंने तरंग में आकर कहा। 'जरूर! सुना है उसी से मिली आर्ट गैलरी है और फिल्म सिटी भी ़ ़ ़आई मीन वीडियो ऑडियो कैसिट की दुकान।' डिसूजा मजाक के मूड में आ चुका था। 'बुक शॉप।' कार में बैठते हुए ख़ालिक़ डिसूजा ने ड्राइवर से कहा जो किसी शिला की तरह बेहिस अपनी सीट पर बैठा दिखा। 'बुक शाप!' ड्राइवर के स्वर में ताज्जुब था। वह कुछ पल चुप रहा फिर धीरे से बोला-'ओके सर।' पूरा रास्ता सूखी बेलों, कंटीली झाड़ियों से अटा पड़ा था। पेड़ भी अपनी गिर गई डालियों के साथ चुपचाप आसपास की तरफ मुंह उठाए खड़े नज़र आए। सारे रास्ते हम हरियाली ढ़ते रहे। फूलों को खोजते रहे। हैरत की बात थी कि नेशनल पार्क में भी फूलों की क्यारियां नहीं थीं। पेड़ ज़रूर थे मगर शाखा पत्तियों से खाली थीं। 'तुमने भी इस नए मुल्क में आने का कौन सा वक़्त चुना है? बहार में आते तो प्राकृतिक रंगीनी का मजा लेते।' मैंने कुछ शिकायती स्वर में कहा। 'यहां चार मौसम नहीं होते। जो हैं अभी वही साल भर तक चलता है। यहां का हुस्न इसी उजाड़पन में है। सौंदर्यबोध का अर्थ अब बदल रहा है।' सहज स्वर में ख़ालिक बोला। 'यानी कि हमको अमृता शेरगिल और लैला अत्तार के बनाए चेहरों के लताफत के साथ हिम्मत शाह और टैगोर के बनाए डरावने चेहरों में पक्षपात नहीं करना है। वीरानी को भी कला में दाखला उसी तामझाम से देना होगा।'
मैंने कुछ चिढ़कर कहा। 'जन्नत के मुकाबले में दोज़ख एक हक़ीक़त है। दोज़ख का अपना हुस्न है। उसे हमको अब समझना पड़ेगा।' तीखे स्वर में ख़ालिक़ कह उठा। 'प्लीज! इस तरह की बहस में मुझे नहीं पड़ना है।' 'गुस्सा हो गई बिना यह जाने कि ज़िंदगी दोज़ख बन चुकी है।' 'बुक शॉप।' ड्राइवर की आवाज़ उभरी। उसी के साथ कार एक छोटे से शापिंग कॉम्प्लेक्स के सामने रुक गई। बुक शॉप के बड़े से दरवाजे को खोलकर जब हम अंदर दाखिल हुए तो हैरत में पड़ गए थे। दुकान के दो हिस्से थे जिसमें पानी से फूली किताबें डबलरोटी बनी एक तरफ बिखरी थीं। दूसरी तरफ जली किताबों की राख, सियाह पन्ने और कुछ अधजली किताबों के आधे बंद खुसे हुए थे। 'इन्हें क्या देखना?' मैं इतना ही कह पाई। 'यह हमारी करतूतें हैं। हमने अपनों की मेहनत और इल्म का यह हाल किया है।' ख़ालिक़ ने गहरी सांस ले कहा और हाथ बढ़ाया फिर पीछे खींच लिया। 'इसको हाथ लगाते डर लगता है। इतनी गल चुकी है कि छूते ही सोहन पपड़ी की तरह फूट जाएगी और इन्होंने शोलों की इतनी तपिश सह रखी है कि हाथ लगाते ही खस्ता कचौरी की तरह पन्ना बिखर जाएगा।' ख़ालिक़ ने कहा और जाने को मुड़ा। 'बेहतर है कि हम पेंटिंग्स और कैसिट के शाप की तरफ न जाएं वरना मुझे तो हार्ट अटैक हो जाएगा।' मैंने सीने में होती पीड़ा को पीते हुए कहा। 'इन जुमलों का कोई अर्थ नहीं है। कोई नहीं मरता। जब हम खंडहरों में तारीख तलाश कर लेते हैं, लाशों में जिजीविषा को तो भी, मरते नहीं। अपनी बेहिसी को चेक करने के लिए हमें उधर जाना पड़ेगा।' ख़ालिक़ के स्वर में हठ था। 'चलो।' मरे लहजे में कहा और बुक शॉप से बाहर निकल बगल की दुकान में दाखिल हुई।
कला की दुनिया के प्रकाशन में मास्टरपीस पेंटिंग्स की बोलियों की ऊंची से ऊंची आवाजें कानों में टकराने लगीं। सूरजमुखी के फूल, जूतों का जोड़ा और और ़ ़ ़ य़हां पर कैनवास थे। फटे, टूटे मगर उनके पर्दे पर कोई चित्र न था। सब पर कालिख पुती हुई थी जिस पर दीमकों ने बेलें काढ़ रखी थीं। मिट्टी का भूरा-कत्थई रंग नाक में ही नहीं आंखों में भी महका। इस बार मेरा सीना उतनी जोर से नहीं तड़का। ख़ालिक के चेहरे पर कोई भाव न था बस उसकी बेचैन आंखें उन कबाड़ा बनी पेंटिंग्स के ढ़ लिया और मेरा हाथ तेज़ी से अपनी तरफ खींचकर बोला, 'बस बहुत हुआ।' 'देखने दो ़ ़ ़ज़रा ठहरो तो।' 'यह बेहिसी की शुरुआत है।' वह ज़ोर से चीखा और मुझे द्घसीटता हुआ दुकान से बाहर लाया। कार में हम दोनों बैठे थे। अपनी-अपनी सोच में डूबे या फिर यथार्थ से आतंकित। कोई देश ऐसा उदास और बर्बाद हो सकता है! उस देश के नागरिक जिन्दा इंसानों की जगह मुर्दा चेहरे वाले और ठहरी आंखों वाले हो सकते हैं। यह तभी संभव हुआ होगा जब उन्होंने यातना की स्याह रातें साल-दर-साल गुजारी हों। ख़ालिक ने गला खंखारकर साफ किया और ड्राइवर से पूछा- 'कोई और जगह देखने वाली है?' 'कब्रिस्तान, मक़तलगाह, कैदखाना' पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया। ड्राइवर ने चौंककर पीछे मुड़ कर मुझे देखा फिर धीरे से सपाट स्वर में बोला- 'यहां पर बाड़ा है।' 'किस जानवर का?' 'इंसान और जानवर दोनों का। जिनके दिल सख़्त और आंखें धेखेबाज होती हैं उनके ।' ड्राइवर ने बड़े ठहरे स्वर में कहा। 'चलो, यूनिक होगा ़ ़ ़अजूबा ही देखने निकले हैं।'
ख़ालिक ने इस अंदाज़ से कहा कि मैंने अपने पर्स से कैमरा निकाल लिया। कार कई तरह की सुरंगों, टीलों और कीचड़ सने रास्तों से गुज़रकर एक गहरी द्घाटी में उतरने लगी। आस पास का दृश्य इतना भयानक था कि यदि यह पगडंडी रास्ता न होता तो चारों ओर फैले मोड़दार पर्वतों के बीच जाने कहां हम खो जाते। दिल में गहरे साए उतर आए थे। यहां वनस्पति की जगह कांटेदार झाड़ियां थीं। कैक्टस के इतने रूप मैंने पहले कभी नहीं देखे थे। उनका नुकीलापन अब बदन में ही नहीं आंखों में भी चुभने लगा था। 'अभी और कितनी दूर जाना है।' मैं बेचैन हो कर पूछ बैठी। 'बस अब पहुंचने ही वाले हैं।' ड्राइवर की ठंडी आवाज़ उभरी। कुछ पल बाद हम लाल रंग के बाड़े के सामने खड़े थे। कार की आवाज़ सुनकर बहुत से लोग एक साथ बाहर निकल आए थे। चारों तरफ खिंची दीवार से वे हमें देख रहे थे। उनके बदन पर कांटे थे जिनको वे लगातार नोंच-नोंच कर फेंक रहे थे। उन्हें देख मेरे हाथ-पैर सुन्न हो गए थे। ख़ालिक़ डिसूजा भी हैरत भरी नज़रों से सामने देख रहा था। कुछ पल यूं ही गुज़र गए। 'ये सब क्या है?' ख़ालिक़ बुदबुदाया। 'हम जल्लाद हैं, कातिल हैं, हमने इंसानों को ही नहीं अपनी पैदा की औलादों का भी गला दबाया है।' सामने बोर्ड पर मोटे-मोटे अक्षरों में लिखा था। ख़ालिक और मैं वहां खड़े-खड़े मर्द-औरतों के चेहरों को द्घूरते हुए परेशान थे क्योंकि उसमें बहुत से चेहरे हमारी पहचान के थे, जिनको हमने कोर्स की किताबों में पढ़ा था। ख़बरों और इंटरनेट पर देखा था। उनके दिल दहलाने वाले कारनामों और करतूतों को बहस का मुद्दा बनाया था। वे लोग यहां कांटों को निकालते, कांटेदार बाड़े में कैद थे। 'आगे एक और बाड़ा है।' ड्राइवर ने हमको बताया और बिना हमारा जवाब सुने उसने कार गहरी द्घाटी में उतार दी। यहां परतदार चट्टानें दूर तक फैली थीं।
मलगिजे अंधेरे में कुछ औरत-मर्द कभी अपना सर पीटते तो कभी अपना सीना। कुछ तो जुनूनी कैफियत में अपना सर भी पत्थर की शिला पर पटक रहे थे। ड्राइवर गाड़ी खड़ी कर नीचे उतरा और एक बूे़ जोड़े के पास जाकर खड़ा हो गया जो बड़े दर्द भरे अंदाज़ में विलाप कर रहे थे। ड्राइवर कुछ पल उनके करीब खड़ा रहा फिर उनके कंधे को थपक कर लौट आया। 'तुम इन्हें जानते हो?' ख़ालिक़ ने पूछा। 'हां, ये मेरे मां-बाप हैं। मुझे अपनी बिरादरी से बाहर की लड़की से प्यार हो गया था। इस जुर्म में लड़की के मां-बाप के साथ मिलकर उन्होंने हमको ज़हर दिया था।' 'लड़की के मां-बाप कहां हैं?' मैंने बेकऱार आंखें रोते बूढ़ों पर डालीं। 'वह उधर अपना माथा चट्टान पर मार रहे हैं।' 'लड़की?' ख़ालिक़ पूछ बैठा। वह भी मेरी तरह ड्राइवर है। हम सब जिनको बहुत कुछ देकर छीन लिया वे सब अब यहां मौजूद हैं। बिना किसी आशा, बिना किसी भावना के।' ड्राइवर ने सपाट स्वर में कहा और कार में बैठ गया। हम भी कार का दरवाजा खोल बैठ गए। अब कुछ और देखने का उत्साह बाक़ी न था। लौटते हुए मैंने पर्स से नोटबुक निकाली और उस पर नोट किए विषयों पर नज़र डाली मगर महसूस हुआ कि अब इन मुद्दों पर बात करने का ज़रा भी मूड बचा नहीं है। ख़ालिक़ डिसूजा भी कुछ ऑफमूड में लगा। कार अंधेरे रास्ते में टटोलते हुई आगे बढ़ रही थी। दिल में बार-बार यह सवाल उभर रहा था कि जिस मुल्क का दिन झुटपुटे जैसा हो वहां की रात कितनी स्याह होगी। हवाई अड्डे पर पहुंच हमने राहत की सांस ली। ख़ालिक़ डिसूजा ने द्घड़ी देखी और उदास मुस्कान के साथ बोला-'काश! मैं तुम्हारे साथ ज्यादा वक़्त गुज़ार सकता, मगर मेरी उड़ान का समय हो चुका है। हम कोई बात भी न कर सके तो क्या साथ द्घूम तो लिए।
अगली बार इससे बेहतर कोई मुल्क हम मिलने के लिए तय करेंगे जो नया भी हो और ़ ़ ़ जुमला अधूरा छोड़ उसने हाथ हिलाया। मेरी उड़ान में अभी देर थी। इंतज़ार करते मुसाफिरों के बीच मैं बैठ गई। दिमाग भारी और बदन थका हुआ था। कुछ देर मैं मुर्दा चेहरे वालों को ताकती रही फिर ऊंद्घ गई। सुबह देर से आंख खुली। चाय की गर्म प्याली के साथ अख़बार उठाया। एकाएक नज़रें थरथरा कर ठहर गईं। ख़बर बहुत बड़ी नहीं थी, मगर मेरे सारे वजूद को हिला गई। थोड़ी देर के लिए मुझे महसूस हुआ कि क्या ख़ालिक़ डिसूजा इसीलिए मुझे अपना द्घर दिखाने ले गया था? उसे मरे तो पूरे दस साल गुज़र चुके हैं। इस बीच उसकी रूह शायद उस द्घर में भटकती रही होगी जहां उसकी कलाकृतियां अधूरी और फिल्मों की स्क्रिप्ट एवं सीडी भरी पड़ी थीं। एक किताबों से भरी लाइब्रेरी भी थी। जहां उसकी गर्लफ्रेंड की बड़ी सी तस्वीर लगी थी जिससे शादी करने की एक शर्त मां ने रखी थी। ख़ालिक़ डिसूजा ने मोहब्बत से मुंह मोड़ लिया और मां को हराम मौत मरने से बचा लिया। मैंने एक बार फिर खबर पर नज़रें गाड़ दीं। 'क्लस्टर बमों के गिरने से पूरा इलाक़ा तबाह हो गया। यह वही इलाक़ा है जहां मशहूर फिल्ममेकर ख़ालिक़ डिसूजा का विला था।' |