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करने के पीछे का उद्देश्य, जमीनी स्तर पर जो कुछ हुआ है, उससे पूरी तरह धूल-धूसरित हो चुका है। आज अधिकांश ऐसी सीटें बड़े नेताओं की पत्नियों, बहनों अथवा माताओं के हवाले है। यानी नाम के लिए तो गांव की सरपंच रमा भारद्वाज हैं लेकिन असली सरपंच उनके पति सुनील भारद्वाज हैं। शासन भी इन्हें पूरी मान्यता देता है और ऐसे पतियों को एसपी यानी सरपंच पति कह कर पुकारता है। जिला पंचायत अपनी प्रतिनिधि के तौर पर चुनता तो विमला रावत को है लेकिन जिला प्लान बनाते वक्त उनके पति धन सिंह जी सक्रिय हो उठते हैं। हालांकि कई मामलों में ऐसा भी होता है कि कुछ समय पश्चात रमा असली सरपंच बनने की पूरी व्यवहारिक योग्यता हासिल कर आगे बढ़ जाती हैं और जिला पंचायत के प्लान विमला तय करने लगती हैं। लेकिन ऐसा बहुत कम होता है।कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी
के दामाद रॉबर्ट वाडरा भी अब 'देश सेवा' में सक्रिय योगदान देना चाहते हैं। उन्होंने पिछले दिनों रायबरेली में चुनाव प्रचार के दौरान यह इच्छा सार्वजनिक तौर पर व्यक्त की है। कुछ दिलजले इस पर व्यर्थ ही शोर मचा रहे हैं। जिस प्रकार के सामंती लोकतंत्र का हमने पिछले ६४ वर्षों के दौरान पोषण किया है उसमें ऐसी इच्छा (ओं) का सम्मान किया जाना चाहिए। यूं इसे सामंती लोकतंत्र कह मैं खारिज नहीं कर रहा। सच तो यह है कि हम अपने लोकतंत्र पर गर्व महसूसते हैं। १९४७ में एक दिन के अंतराल से जन्मे दो देशों की कुंडली में इतना भारी उलटफेर रहा है कि पाकिस्तान में ६४ वर्ष की यात्रा के बाद भी लोकतंत्र की जड़ें कमजोर हैं। दूसरी तरफ भारत में दिनोंदिन इसको मजबूती मिली। हमारे यहां सैनिक हस्तक्षेप की नौबत न तो आई और न ही आने की कोई आशंका ही है। १९७५ का आपातकाल एकमात्र ऐसी द्घटना है जिसने हमारे लोकतंत्र को जड़ से हिलाने का काम किया। हालांकि उसके खिलाफ जनाक्रोश ने बाद के वर्षों में इसको मजबूती देने का काम किया। हमारे यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। न्यायपालिका स्वतंत्र है और हर पांच साल बाद राज्यों और केंद्र में सत्ता का हस्तांतरण बगैर किसी रुकावट के होते आया है। और भी अनेकानेक खूबियां हमारे
लोकतंत्र में हैं जो हमें गर्व की अनुभूति कराते हैं। दूसरी तरफ हमारा यही तंत्र मुल्क की आधे से अधिक आबादी को रोटी, कपड़ा और मकान जैसी बुनियादी सुविधाएं मयस्सर कराने में
असमर्थ रहा है। यहां ८० प्रतिशत आबादी प्रतिदिन मात्र २० रुपये कमाती है और अमीर-गरीब के बीच विषमता की खाई में दिनोंदिन विस्तार हो रहा है। राजनीति अपराधियों की शरणस्थली बन चुकी है। भ्रष्टाचार की हद यह कि रिश्वत का खरबों रुपया विदेशी बैंकों में जमा है। यह मात्र
कयासबाजी नहीं, देश की शीर्ष जांच एजेंसी सीबीआई के निदेशक का इसी सप्ताह दिया बयान इसकी पुष्टि करता है। बकौल एपी सिंह भारतीयों का लगभग २४ लाख करोड़ रुपया विदेशी बैंकों में जमा है। केंद्रीय मंत्री, सांसद और वरिष्ठ
नौकरशाहों का जेल जाना अब चौंकाता नहीं है। मुंबईया फिल्मों में नेता रूपी खलनायक को जब बचपन में देखता था तो यकीन करने का जी नहीं करता था। अब मुंबईया खलनायक असली खलनायकों के मुकाबिल कहीं ठहरता नजर नहीं आता। यूं हर पांच वर्ष में चुनाव होते हैं लेकिन जैसे होने चाहिए वैसे कतई नहीं। मुद्दों पर आधारित चुनाव तो शायद पहली लोकसभा तक ही सीमित रहे। आज जाति, धर्म, धन और
बाहुबल के दम पर चुनाव लड़े और जीते जाते हैं। इतना ही नहीं लगभग हर छोटे-बड़े राजनीतिक दल में नेतृत्व परिवार विशेष के हाथों में कैद होकर रह गया है। देश की सबसे बड़ी
राजनीतिक पार्टी कांग्रेस नेहरू-गांधी परिवार की प्राइवेट प्रॉपर्टी के समान है। पंडित जवाहरलाल नेहरू अपनी काबीलियत के दम पर कांग्रेस अध्यक्ष और बाद में प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने कभी भी प्रत्यक्ष तौर पर अपनी पुत्री इंदिरा को
राजनीति में आगे लाने का काम नहीं किया। बचपन से ही द्घर में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को देखती आई इन्दू ने स्वयं भी वानर सेना बना
आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया। भले ही नेहरू के आलोचक उन पर आरोप लगाते हैं कि उन्होंने भारतीय राजनीति में परिवारवाद का बीज बोया, इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि इंदिरा में नेतृत्व की अद्भुत क्षमता और करिश्माई छिव थी। हां यदि किसी ने सही में परिवारवाद को भारतीय राजनीति में पनपने का खुला अवसर दिया तो वह इंदिरा गांधी थीं। उन्होंने आपातकाल के दौरान अपने पुत्र संजय गांधी को असंवैधानिक शक्ति केंद्र के तौर पर उभरने दिया। संजय गांधी पूरे आपातकाल के दौरान एक तरह से डी-फेक्टो प्राइम मिनिस्टर थे। १९८० में एक हवाई दुर्द्घटना में संजय के मारे जाने के बाद इंदिरा ने अपने बड़े बेटे राजीव गांधी को कांग्रेस का महासचिव बना स्पष्ट कर दिया कि पार्टी का नेतृत्व परिवार विशेष के पास ही रहेगा। तब से आज तक कांग्रेस में इस परिवार का एकछत्र राज रहा है। राजीव गांधी की मृत्यु के बाद नरसिम्हा राव के शासनकाल में कुछ वर्ष अवश्य गांधी परिवार बैकफुट पर रहा। हालांकि तब भी नरसिम्हा राव से असंतुष्टों के लिए दस जनपथ ही एकमात्र आसरे के तौर पर उभरा था।
कांगे्रस से इतर प्रदेशों में फले-फूले क्षेत्रीय दलों में भी परिवारवाद की बीमारी हावी हो चुकी है। उत्तर प्रदेश की समाजवादी पार्टी, अपना दल, राष्ट्रीय लोकदल, तमिलनाडु में द्रविड़ मुन्नेत्र कष्गम् (डीएमके), बिहार में रामविलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी, लालू यादव का जनता दल, पंजाब में अकाली दल आदि तमाम ऐसे उदाहरण हैं जो हमारे लोकतंत्र को सामंती बनाते हैं। यह हमारी राजनीतिक व्यवस्था की एक बड़ी कमी है जो लोकतांत्रिक मूल्यों पर कड़ा प्रहार कर रही है। समाजवादी विचारधारा हमारे राजनीतिक परिदृश्य से आज लुप्त है। वामपंथ को कचडे़ के डिब्बे में डाला जा चुका है और हिन्दुत्व भी काफी हद तक हाशिए में जा पड़ा है। ऐसे में इस देश में यदि कोई फल-फूल रहा है तो वह है हमारा सामंती लोकतंत्र। और इसका फलना- फूलना केवल शीर्ष तक ही सीमित नहीं है। हमने इस सामंती चरित्र को पूरी तरह अपना लिया है। यदि कांग्रेस में शीर्ष पद पर गांधी परिवार की
बपौती है तो पंचायत और ब्लॉक स्तर पर भी यह परंपरा बन चुकी है। महिलाओं के सशक्तीकरण के लिए संविधान में व्यवस्था है कि त्रिस्तरीय शासन प्रणाली के तहत कुछ सीटें इनके लिए सुरक्षित रहेंगी। इस व्यवस्था को लागू करने के पीछे का उद्देश्य, जमीनी स्तर पर जो कुछ हुआ है, उससे पूरी तरह धूल-धूसरित हो चुका है। आज अधिकांश ऐसी सीटें बड़े नेताओं की पत्नियों, बहनों अथवा माताओं के हवाले है। यानी नाम के लिए तो गांव की सरपंच रमा भारद्वाज हैं लेकिन असली सरपंच उनके पति सुनील भारद्वाज हैं। शासन भी इन्हें पूरी मान्यता देता है और ऐसे पतियों को एसपी यानी सरपंच पति कहकर
पुकारता है। जिला पंचायत अपनी प्रतिनिधि के तौर पर चुनता तो विमला रावत को है लेकिन जिला प्लान बनाते वक्त उनके पति धन सिंह जी सक्रिय हो उठते हैं। हालांकि कई मामलों में ऐसा भी होता है कि कुछ समय पश्चात रमा असली सरपंच बनने की पूरी व्यवहारिक योग्यता हासिल कर आगे बढ़ जाती हैं और जिला पंचायत के प्लान विमला तय करने लगती हैं। लेकिन ऐसा बहुत कम होता है। यद्यपि रमा भारद्वाज और विमला रावत असल जिंदगी के ऐसे उदाहरण हैं जिन्होंने स्वतः निर्णय लेने की क्षमता हासिल कर ली है। दोनों मेरे परिवार से हैं, मेरे मित्रों की पत्नियां हैं इसलिए मैं जानता हूं कि इन दोनों महिलाओं ने कम समय में ही अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझ कर कमान अपने हाथ में ले ली है लेकिन ऐसा बहुत कम होता है। अधिकांश में पति ही असल कमान रखते हैं। यह हमारे सामंती
लोकतंत्र की विद्रूपता का परिचायक ही तो है।
यह सामंती लोकतंत्र ऐसे राजनीतिक परिवारों की उत्तरोत्तर उन्नति का काम करता है तो दूसरी तरफ लोकतंत्र की नींव को कमजोर करता है। ६४ वर्ष बाद यदि अस्सी प्रतिशत जनता भूखी है, भ्रूण हत्या आम बात है, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार अपने चरम पर हैं और हम दुनिया के सर्वाधिक गरीब देशों की सूची में अव्वल हैं तो इसके पीछे कहीं न कहीं लोकतंत्र की यही विद्रूपता जिम्मेदार है। इसके साथ एक सच यह भी है कि आज भी आम मतदाता ऐसे सामंती चरित्र वाले नेताओं की चमक-दमक से खासे प्रभावित रहते हैं। प्रियंका और राहुल से अभिभूत, नेताजी के पुत्र अखिलेश पर फिदा और छोटे चौधरी के बेटे जयंत पर जान छिड़कने वाला मतदाता यदि इन युवाओं की अधकचरी सोच वाले भाषणों और झूठे वादों पर यकीं कर मत देता है तो भला क्यों राबर्ट वाडरा साहब राजनीति में प्रवेश न करें? आखिर वे भी तो गांधी परिवार के दामाद हैं। उन्होंने कम समय में ही बिजनेस में खासा नाम कमाया है। मुरादाबाद जैसे छोटे शहर से निकल आज वे देश की राजधानी में अपनी जड़ें आईटी, रियल स्टेट, हैन्डीक्राफ्ट, होटल इंडस्ट्री आदि में जमा चुके हैं तो क्यों नहीं अब 'देश सेवा' के लिए राजनीति में भी उतरें। निसंदेह वे अपनी पत्नी के राजनीतिक सहचर के रूप में भी अच्छा काम करेंगे और राहुल-प्रियंका के साथ-साथ कांग्रेस को भी एक और करिश्माई नेता मिल जाएगा। जय हो! |