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vad 14 23-09-2017
 
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सृजन संसार
 
मां और पहाड़

सीढ़ियों पर चढ़ता हूं

तो सोचता हूं मां के बारे में

कैसे चढ़ती रही होगी पहाड़

 

जेठ के उन तपते घामों में

जब मैं या दीदी या फिर छोटू बीमार पड़े होंगे

तो कैसे हमें उठाकर लाती रही होगी

हमारा लाश-सा बेसुध तन

डॉक्टर के पास

 

घास और लकड़ी के बड़े-बड़े गट्ठर

चप्पल जितनी चौड़ी पगडंडियों पर लाना

कोई लतीफा तो न रहा होगा

वह भी तब जब कोई ऊंचाई से खौफ खाता हो

 

जंगलों की लाल तपती धूप

नई और कमजोर मां पर रहम भी न करती रही होगी

मां के सांवलेपन में ईष्टदेव सूरज

करीने से काजल मढ़ते होंगे

और मां उन्हें सुबह-सुबह ठंडा जल पिलाती होगी

 

पूर्णिमा पर चांद की पूजा करने वाली

अंधेरे में डरते-डरते छत पर जाती होगी

और भागती होगी पूजा जल्दी से निपटाकर

डर से जैसे सन्नाटा पीछा कर रहा हो

खुद को संभालती हुई तंग छज्जे पर

 

हममें से कोई रो पड़ता

और उसकी नींद स्वाहा हो जाती

 

हमें सुलाने के लिए कभी-कभी

रेडियो चलाती

धीमी आवाज में गढ़वाली गीत सुनती

गुनगुनाती भी

 

उन पहाड़ों की परतों के पार

शायद ही दुआएं प्रार्थनाएं जाती रही होंगी

जाती थी सिर्फ एक रोडवेज की बस

सुबह-सुबह

जो कभी अपनों को लेकर नहीं लौटती थी

 

पिताजी एक गरीब मुलाजिम रहे

आप शायद दोनों का अर्थ बखूबी जानते होंगे

गरीब का भी और मुलाजिम का भी

छब्बीस की उम्र में

चार कदम चलकर थकने लगता हूं मैं

सांस किसी बच्चे की तरह

फेफड़ों में धमाचौकड़ी करने लगती है

बात-बात पर मैं अक्सर बिखर-सा जाता हूं .

 

क्या इसी उम्र में मां भी कभी निराश हुई होगी

अपने तीन दुधमुंहे बच्चों से

पति का पत्र न मिलने की चिंता भी बराबर रही होगी

 

थकता टूटता हूं तो करता हूं मां से बातें

(फोन पर ही सही)

निराशा धूप निकलते ही

कपड़ों के गीलेपन के जैसे गायब हो जाती है

सोचता हूं

वह किससे बातें किया करती होगी तब

दुःख दर्द में

अवसाद की झाड़ियों में

ससुराल की तकलीफ किसे कहती होगी

वह जिसकी मां उसे ५ साल दरअसल में ही छोड़कर चल बसी थी।

 

यहां के रहे न वहां के


मैंने महसूस किया अपनी नकली कविता की पंक्तियों को

मंहगे आवरण में लिपटे सस्ते माल की तरह

मैंने लम्बे समय तक धूल से वह वस्तु बचाये रखी

जो शायद उतनी कीमती नहीं थी

 

मैंने महसूस किया कि जिसे मैं

मैं-मैं लिखता रहा

वह अंत में कोई और निकला

जिसे मैं या तो पहचान न सका

या समय के साथ भूल-सा गया।

 

मैंने कागजों पर जिक्र किया सलीके से बने तालाबों का

इस जिक्र में जमीन गांव की थी

पर तालाब कुछ-कुछ पांच सितारा होटलों के स्वीमिंग पूल जैसा

 

मैंने विदेशी कुत्ते को सहलाते हुए मवेशियों के बारे में रचा

सोफे पर पैर पसारकर कहवा पीते हुए

मैं आलसी बैल की नस्ल को 'पमेलियन' तक लिख गया

मैं अपनी ढोंगी शहरी सभ्यता के चलते गोबर न लिख पाया

मैं डरता रहा अपनी मंहगी कलम के बदबूदार हो जाने से

और इस गंध से सरस्वती के प्राण त्याग देने के भय से

 

स्कूल से चुराई हुई रंगीन चाकों का

बुझी बीड़ी के टुकड़ों को फिर से लाल करने का

अपनी कक्षा में फिसड्डी होने का

मैंने कभी जिक्र करना उचित नहीं समझा

या यूं कह लें

मैंने ये बातें समझदारी से छिपा लीं

 

मैं कंचे गिल्ली-डंडे की बलि चढ़ाकर क्रिकेट-क्रिकेट चिल्लाया

कुछ दिन सिक्कों को सामने बने छिद्र में डालने वाला खेल खेला

माचिस के पत्तों की ताश भी खेली

पत्थरों की बट्टियां भी

मोजे से बनी गेंद और पिटू भी

मगर मैंने बराबर ध्यान रखा कि

मेरा देहातीपन गले में बंधे ताबीज की तरह झांकने न लगे

दरअसल मैं तुलसी-पीपल तो लिख ही नहीं पाया

स्याही में निब डुबो-डुबोकर

सिर्फ धन-वृक्ष लिखता रहा

 

मैं अपनी पैंट के छिद्रों को शब्दों से ढांपता रहता

जैसे मां रफू किया करती थी

मगर मेरे ढांपने में

वह सलीके वाला रफूपन हमेशा नदारद रहा

 

किसान काका के दर्द को लिखते हुए

मैंने अपने गालों पर कुटिल हंसी महसूस की

उसके दर्द की कराह पर

स्वयं के होंठों पर तर्जनी रख दी

और फिर शहरी बनने का स्वांग करता रहा 

न मेरा अधकचरा शहरीपन उसकी तकलीफ कम कर पाया

न मेरा भीतरी गंवारपन उसकी जान बचा पाया

 

मैं भीतर ही भीतर खेत के पुस्तों-सा टूटता रहा

किताब की जिल्द-सा उधड़ता रहा  

दरकता रहा समुद्र तट पर बनी मूरत जैसा

सावन के धारों-सा बहता रहा अनवरत अकेला

मैं शहर में रहा खोखली शान से

संपन्नता के दरमियान

मैं विलासिता की सीमा पर सुखमय जीवन गुजारता रहा

और फिर उसी महंगी कलम से 

'सीएफएल' की दूधिया रौशनी में  

एक गरीब की कविता लिखता रहा।

 

आशीष नैथानी

जन्म : ८ जुलाई १९८८ पौड़ी-गढ़वाल (उत्तराखण्ड)

युवा रचनाकार। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएं 

प्रकाशित। कविताओं में अपने पर्वतीय अंचल और स्मृतियों के अनूठे बिंब। 

सम्प्रति : सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैदराबाद

संपर्क : ०९६६६०६०२७३ 


 

किसी समय पृथ्वी पर

वाविलोव और डायमंड के बीच मारी इस प्यारी धरती पर  एक बड़ी सौगात है जीवन की विविधता इतनी कि डार्विन के समय से १५० वर्ष बीत जाने के बाद भी आज तक इसकी पूरी कैटलॉगिंग नहीं हो सकी। एक विशेष कृषि वैज्ञानिक निकोलाई वाविलोव याद आते हैं। निकोलाई पहले वैज्ञानिक थे जिन्होंने जैव विविधता को मनुष्य मात्र की अमूल्य धरोहर के बतौर पहचाना विभिन्न फसलों  के उत्पत्ति  केंद्रों को सूचीबद्ध किया बहुत से सीड और वाइल्ड प्रजातियों के बीजों को भी इकट्ठा किया। १०० साल पहले उन्होंने पांच महाद्वीपों में द्घूम-द्घूमकर हजारों मीलों की यात्रा करके दुनिया के विभिन्न हिस्सों से २०० हजार  किस्म के बीज संग्रहित कर पहला 'सीड बैंक' बनाया। 

 

निकोलाई ने जिस समय बीजों  को एकत्र  करना शुरू किया उस वक्त तक जेनेटिक्स  जानकारी बहुत सीमित थी सिर्फ दो दशक ही बीते थे ३० सालों तक ठंडे बस्ते में पड़े मेंडल के सिद्धांतों की फिर से खोज को जेनेटिक्स का टर्म बमुश्किल इस्तेमाल में आया ही था। जेनेटिक मैटीरियल क्या है इसके इर्द-गिर्द बीसवीं सदी के पहले पचास वर्ष निकल गए। निकोलाई की मौत के करीब बीस वर्ष के बाद डीएनए को आखिरकार जेनेटिक मैटीरियल माना गया। अतः  बीजों का संग्रहण किसी काम आएगा दुनिया की खाद्य सुरक्षा इसके जरिये सुनिश्चित हो सकेगी का सपना इसकी समझ उनके समकालीन कुछ वैज्ञानिकों के अलावा किसी के पास नहीं थी। उस समय रूस की सर्वहारा क्रांति के बाद का और दो विश्वयुद्धों के बीच उथल-पुथल का सामना था। अकाल से द्घिरे दुनिया से लगातार कटते जा रहे रूस में स्टालिन विज्ञान से चमत्कार जैसा कुछ चाहता था। दूरदर्शी मेहनती और संजीदा  वाविलोव किसी चमत्कार का सपना नहीं दिखा सकते थे। 

 

एक औसत से निम्न दर्जे के वैज्ञानिक स्लेमदाव जो स्टालिन के सर्कल में ज्यादा राजनीतिक पैठ रखता था ने हवामहल खड़े किए और स्टालिन को जो चमत्कार चाहिए थे उनका वादा किया उसका दावा था कि  बीजों को बोने से पहले ठंडे पानी में भिगोकर इस लायक बनाया जा सकता है कि वह बड़ी संख्या में अंकुरित हो सकें और सिर्फ भौगोलिक बदलाव उपज को बढ़ाने के लिए काफी हैं। वाविलोव और उनके सहयोगियों ने  विज्ञान के सरलीकरण का विरोध  किया और इसके  बदले अकाल के समय रिसर्च पर अतिशय संसाधन बर्बाद करने के इल्जाम में वाविलोव और कई प्रतिभावान वैज्ञानिको को  बंदी बनाकर साइबेरिया भेज दिया गया जहां देशद्रोह के आरोप में उन्हें जेल प्रताड़ना और भूख से मौत मिली। उधर वाविलोव के सहयोगियों ने अपनी जान दांव पर लगाकर भूखे रहकर अपनी आंखों के आगे अपने परिवार को भूखे मरते देखकर भी उस समय के एकमात्र सीड बैंक की रक्षा की। मालूम नहीं क्या आशा और किनके लिए आशा उनके मन में रही होगी? आज यही संग्रह बदलते पर्यावरण जीवाणु और दूसरे परजीवियों से फसलों को बचाने का बीमा है मानव जाति के अस्तित्व में बने रहने का बीमा है। 

 

इधर सिर्फ सौ वर्ष बीतें हैं और खेती मानव मात्र की धरोहर के बजाय ग्लोबल कॉर्पोरेशन की मुनाफाखोरी का जरिया बन गयी है रोज-ब-रोज जैव विविधता कुछ कम हो जाती है। आधुनिक खेती के तरीके ले-दे कर पूरी प्रकृति के संपूर्ण दोहन पर आधारित है और बड़ी तेजी से पूरी दुनिया में एक से होते जा रहे हैं। तात्कालिक फायदे के लिए भविष्य दांव पर लगाने की हिचक किसी भी नीति नियंता और समाज को नहीं है। बेहिसाब लूट खसोट और संसाधनों की भागीदारी में जिस तरह का असंतुलन आज पृथ्वी पर है उसके मद्देनजर मशहूर एंथ्रोपोलॉजिस्ट जेरेड डायमंड कह रहे हैं कि अगर समय रहते हम नहीं चेते तो सिर्फ अगले १०० वर्षों के भीतर मानव सभ्यता एक बार फिर पाषाणयुग में चली जाएगी।

 

 

सुषमा नैथानी

रचना-प्रकाशन के मामले में संकोची लेखिका। पेशे से वैज्ञानिक। एक कविता-संग्रह 'उड़ते हैं अबाबील' 

प्रकाशित। 'स्वप्नदर्शी' नाम के ब्लॉग की मॉडरेटर। मूलतः उत्तराखण्ड की हैं इन दिनों अमेरिका में रह रही हैं। 

 
         
 
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चुनाव के समय भाजपा ने अन्य राजनीतिक दलों के नेताओं के लिए दरवाजे खोलकर एक तरह से प्रदेश की राजनीति की दिशा और दशा बदल कर रख दी। प्रदेश में

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