ख्याति प्राप्त अमेरिकी पत्रकार और लेखक एंडी रूनी का एक कथन पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद मीडिया- सोशल मीडिया में चल रहे कुकुरहाव चलते स्मरण हो आया। रूनी का कहना है कि ‘People will gererally accept facts as truth only if the facts agree with what they already believe’ (लोग आमतौर पर उन्हीं तथ्यों को सच मानते हैं जो उनकी पहले से बनी धारणाओं से मेल खाते हैं।)
कश्मीर के पहलगाम में हुआ हमला दिल दहलाने वाली ऐसी घृणात्मक घटना है जिसकी जितनी निंदा की जाए वह कम है। लेकिन इस आतंकी घटना के बाद जिस प्रकार से मीडिया के एक बड़े हिस्से ने, खासकर ‘सरकार पोषित’ बड़े मीडिया चैनलों ने इसे हिंदू-मुसलमान का नैरेटिव गढ़ सामने रखा वह इस आतंकी हमले से कहीं अधिक घातक और निदंनीय है। यहां यह भी हमें स्वीकारना होगा कि भारतीय जनता पार्टी, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से इत्तेफाक न रखने वाले कई यू-ट्यूबर्स, कई नामचीन पत्रकारों की भी एक फौज ने इस आतंकी हमले की विवेचना के बहाने अपने ‘हेट मोदी’ एजेंडे को सामने रख निष्पक्ष पत्रकारिता के उच्च मापदंडों, जिनका वे दम्भ भरते हैं, का खुला अतिक्रमण कर यह साबित कर दिया कि अंध मोदी भक्तों और अंध मोदी विरोधियों के चलते सच कहीं गहरे कुहासे में खो चुका है और नफरती माहौल का विस्तार लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए बड़ा खतरा बन उभर रहा है। अनुच्छेद 370 के हटाए जाने तथा जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र शासित राज्यों में बदले जाने पश्चात अंध भक्तों और अंध विरोधियों के मध्य अपनी-अपनी धारणाओं को सच साबित करने की होड़ सी लग गई थी। अंध भक्तों ने इसे मोदी की ऐतिहासिक सफलता बतौर सामने रखा, एक अद्भूत रणनीतिक कदम करार दिया तो अंध विरोधियों ने इसे महाराजा हरि सिंह के साथ भारत द्वारा 26 अक्टूबर 1947 के दिन किए गए विलय संधि पत्र का उल्लंघन करार दिया। अंध भक्तों की मानें तो अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में पूर्ण शांति स्थापित हो चुकी है, कश्मीर समस्या का अंत हो चुका है। दूसरी तरफ अंध विरोधियों का मानना है कि अनुच्छेद 370 को हटाकर कश्मीरी पहचान को पूरी तरह कुचल दिया गया है। वे दावा करते हैं कि इस कदम के बाद कश्मीर में अलगाववाद की भावना ज्यादा तेज हुई है। अंध भक्त मानते हैं कि मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने कश्मीर समस्या का स्थाई हल निकाल दिया है और यह भी कि पाकिस्तान इस मुद्दे पर पूरी तरह हाशिए पर डाल दिया गया है। उनका यह भी दावा है कि कश्मीरी पंडितों की ‘जलावतनी’ अब समाप्त हो गई है और वे लोग न केवल घाटी में वापस लौट रहे हैं, बल्कि खुद को वहां सुरक्षित भी पा रहे हैं। ये अंध समर्थक हर सड़क, पुल या मेडिकल काॅलेज इत्यादि की घोषणा को कश्मीर का पूर्ण विकास कह पुकारते हैं। दूसरी तरफ अंध विरोधियों का खेमा गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाता रहता है कि पूरी घाटी मोदी सरकार के खिलाफ है और भारत ने कश्मीरियों के साथ जबरदस्ती की है। ये अंध विरोधी विकास परियोजनाओं को पूरी तरह दिखावा करार देते हैं। सच इन दोनों के नैरेटिव बीच कहीं दबकर रह गया है। अंध भक्त सिर्फ उजाले रंग से तस्वीर को देख रहे हैं और बेरोजगारी, आतंकी घटनाओं को तथा कश्मीरियों की मनोवैज्ञानिक असुरक्षा को नजरअंदाज कर रहे हैं। दूसरी तरफ अंध विरोधी केवल काले रंग से तस्वीर को देखने के आदि हो चले हैं और जो सकारात्म्क बदलाव हुए हैं, जैसे हिंसा में गिरावट, विकास कार्यों में आई तेजी और पर्यटन उद्योग का फिर से गति पकड़ना, उन्हें स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। सच यह है कि कश्मीर की सच्चाई इन दोनों नैरेटिवों से कोसों दूर अत्यंत जटिल, बहुपरतीय और बेहद संवेदनशील है। इन दोनों नैरेटिवस से इतर, बगैर किसी धारणा, किसी विचारधारा का चश्मा लगाए यदि कश्मीर के वर्तमान हालातों को निष्पक्ष भाव से परखा जाए तो मेरी दृष्टि में हालात कुछ यूं हैं। अनुच्छेद 370 हटने के बाद आतंकी घटनाएं कम जरूर हुईं लेकिन उसकी जड़ें अभी तक उखाड़ी नहीं जा सकी हैं। कश्मीरी पंडितों की घर वापसी का प्रयास केंद्र सरकार कर रही है किंतु जमीनी हकीकत बता रही है कि बड़े पैमाने पर न तो पंडित वापस लौटे हैं और न ही उनके सुरक्षित पुनर्वास की व्यवस्था चाक-चैबंद है। सड़कें, सुरंगे, मेडिकल काॅलेज, पर्यटन तथा अन्य क्षेत्रों में केंद्र सरकार द्वारा बड़ी परियोजनाओं की नींव रखी गई है जिनके परिणाम आने में अभी खासा वक्त लगना तय है और आम कश्मीरी तक इनका लाभ सीमित रूप से पहुंच पाया है। पाकिस्तान अब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कश्मीरी मुद्दे उठाता रहता है लेकिन उसका प्रभाव अब कम हो चला है।
आतंकवाद निश्चित तौर पर घटा है लेकिन जैसा पुलवामा और अब पहलगाम ने साबित कर दिया है, वह वक्ती तौर पर कम जरूर हुआ है किंतु पाकिस्तान समर्थक आतंकी संगठन पूरी तरह सक्रिय हैं और मौका मिलते ही अपने कुत्सित कारनामों को अंजाम दे रहे हैं। जो यह दावा करते हैं कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद घाटी में रामराज स्थापित हो गया है या फिर जिनका दावा है कि हालात ज्यादा खराब हुए हैं, दोनों की दृष्टि बाधित है। कश्मीर न तो पूरी तरह से शांत है और न ही टूटा हुआ है। वहां बदालव की प्रक्रिया चल रही है। अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद सबसे बड़ा सकारात्मक बदलाव पहलगाम आतंकी हमले के बाद देखने को मिला जब पुराने श्रीनगर में इस घटना का भारी विरोध स्थानीय जनता ने किया, दुकानें बंद रखी गईं। यहां तक कि अलगाववादियों का गढ़ कहलाए जाने वाला लालचैक भी बंद रहा और वहां भी इस घटना के विरोध में प्रदर्शन हुए। पहलगाम में तो मुख्य सड़क पर स्थानीय कश्मीरियों ने बड़ा प्रदर्शन किया। पहलगाम से सुरक्षित बाहर निकले पर्यटकों ने इस सच को देश के सामने रखा है कि कैसे हमले के दौरान और हमले के बाद स्थानीय मुसलमानों ने उनकी जान बचाई और खुद को खतरे में डाल हर सम्भव मदद की। श्रीनगर के उन अखबारों ने भी जो पहले अलगाववादियों के पक्ष में नरम रुख रखते थे, इस घटना के खिलाफ खुलकर लिख रहे हैं। इससे बड़ा सकारात्मक बदलाव भला क्या हो सकता है कि पुराने श्रीनगर में लालचैक में आतंकी हमले के खिलाफ बंद रखा गया और जामा मस्जिद में जुम्मे की नमाज के दौरान मीरवाइज द्वारा एक मिनट का मौन रखवाया गया तथा आतंकी हमले की कड़े स्वर में निंदा की गई?
मेरा मानना है कि अनुच्छेद 370 की समाप्ति बाद घाटी की युवा पीढ़ी को अपना भविष्य संवारने का, जेहादी मानसिकता से दूर जाने का मौका मिला। ऐसा मौका जिसे घाटी के अधिकतर मुसलमानों ने खुद के लिए, अपनी अगली पीढ़ी के लिए एक सुअवसर मान स्वीकारा है। उन्हें समझ में आने लगा है कि इन आतंकी घटनाओं से या अलगाववादी सोच से कुछ सार्थक हासिल होने वाला नहीं है। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग था और आगे भी रहेगा। ऐसे में यदि श्रीनगर स्मार्ट सिटी बन रही है, पर्यटकों की आवाजाही बढ़ रही है तो इसका सीधा लाभ उन्हें ही, उनकी अगली पीढ़ी को ही मिलेगा। पहलगाम आतंकी हमले के बाद जिस प्रकार घाटी के मुसलमानों ने अपना रोष व्यक्त किया उससे समझा जा सकता है कि कुछ तो बदला है, अच्छे के लिए बदला है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों से असहमति रखने वालों को भी चाहिए कि वे अपनी दृष्टि को बाधित न रखें और इन बदलाव को समझने का प्रयास करें। हालांकि केंद्र सरकार, विशेषकर केंद्रीय गृहमंत्री को शायद स्वयं इस बदलाव पर यकीन नहीं है। यदि होता तो वे हमले के बाद बुलाई गई सुरक्षा सम्बंधी बैठक में राज्य के चुने गए प्रतिनिधि, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला को जरूर आमंत्रित करते। स्मरण रहे पूर्व में कई मर्तबा ऐसा हुआ है जब हमारे नेताओं द्वारा अब्दुल्ला परिवार की देशभक्ति को शक की निगाहों से देखा गया और इस शक की बिना पर ऐसे फैसले लिए गए जिनसे कश्मीर समस्या गहराई। उमर अब्दुल्ला के दावा शेख अब्दुल्ला पंडित नेहरू के मित्र हुआ करते थे। नेहरू ने शेख की सरकार को लेकिन बर्खास्त करने की भूल कर घाटी में भारत विरोधी भावनाओं को उकसाने का काम किया। 1984 में उमर के पिता फारुख अब्दुल्ला राज्य के मुख्यमंत्री थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने भी अपने सलाहकारों की सलाह मान उन्हें बर्खास्त कर नेहरू वाली भूल को दोहरा घाटी में अलगाववाद को भड़काने का काम किया था। मोदी सरकार में भी ऐसों की कमी नहीं जो अब्दुल्ला और सैय्यद परिवारों की देशभक्ति को शक की निगाहों से देखने के आदि हैं। इस मनोवृति को बदलना होगा, तभी अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद आए सकारात्मक बदलाव स्थाई और प्रभावी रह पाएंगे। जिन्हें मेरी बात से, मेरी समझ से इत्तेफाक नहीं, उन्हें कश्मीर में पले-बढ़े आशीष शर्मा की गत् फरवरी को प्रकाशित पुस्तक ‘रीइमैजिनिंग जम्मू एंड कश्मीर: ए पिक्टोरियल जर्नी (Reimagining Jammu and Kashmir : A Pictorial Journey) पढ़नी चाहिए। बकौल आशीष- ‘मेरा बचपन, मेरी पढ़ाई उसी लालचैक में हुई है जो खौफ का एपीसेंटर था। मैंने बम फूटते देखे हैं, बगल में आतंकियों द्वारा सम्पादक को गोली मारते देखा है और मैं फोटोग्राफर हूं तो मेरी आंखों देखी यादों में 2019 से पहले का लाल चौक है, घाटी है तो उसे बाद जो देखा है, शूट किया है वह मेरे लिए अकल्पनीय था और है। इसलिए तस्वीरें अब नया कश्मीर बताते हुए हैं तो वह मेरे लिए, सबके लिए ‘रीइमैजिनिंग ही है।’
स्मरण रहे यदि हम अंध भक्ति अथवा अंध विरोध के चश्मे से कश्मीर को देखेंगे, हम कश्मीर को अशांत बनाने की चाह रखने वालों के हाथों में खेलेंगे, उनके घातक-घृणात्मक एजेंडे का न चाहते हुए भी हिस्सा बन जाएंगे।

