भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता संवैधानिक रूप से संरक्षित है, लेकिन हाल के वर्षों में सत्ता के आलोचकों, कलाकारों, पत्रकारों और आंदोलनकारियों को निशाना बनाकर इसे बार-बार चुनौती दी गई है। इमरान प्रतापगढ़ी से लेकर मुनव्वर फारूकी, दिशा रवि और किसान आंदोलन तक – हर उदाहरण यह दर्शाता है कि असहमति को दमन का कारण बनाया जा रहा है। इमरान प्रतापगढ़ी ने एफआईआर रद्द करने की मांग के साथ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ – न्यायमूर्ति ए.एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने इस प्राथमिकी को रद्द करते हुए कहा कि ‘यह वीडियो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती है और इसमें कोई आपराधिक तत्व नहीं है।’ अदालत ने यह भी कहा कि कविता, साहित्य, फिल्म, व्यंग्य और कला मानव जीवन को अधिक सार्थक बनाते हैं और इनका गला घोंटना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। यह स्वतंत्रता लोकतंत्र की नींव है, जो न केवल आलोचना को स्थान देती है, बल्कि सत्ता के खिलाफ उठती आवाजों को भी संवैधानिक संरक्षण देती है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में यह स्वतंत्रता कई बार संकट में पाई गई है। कांग्रेस सांसद इमरान प्रतापगढ़ी के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी और उस पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। राज्यसभा सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने 29 दिसम्बर 2024 को अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक 46 सेकंड का वीडियो साझा किया। इस वीडियो में उनके ऊपर फूल बरसते दिखाई दे रहे थे और पृष्ठभूमि में शायराना अंदाज में एक गीत ‘ऐ खून के प्यासे बात सुनो’ बज रहा था। इस पर गुजरात के जामनगर में प्राथमिकी दर्ज की गई। आरोप था कि यह वीडियो समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा करता है और शांति भंग करने वाला है। इमरान प्रतापगढ़ी ने एफआईआर रद्द करने की मांग के साथ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ न्यायमूर्ति ए.एस. ओका और न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां ने इस प्राथमिकी को रद्द करते हुए कहा कि ‘यह वीडियो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आती है और इसमें कोई आपराधिक तत्व नहीं है।’ अदालत ने यह भी कहा कि कविता, साहित्य, फिल्म, व्यंग्य और कला मानव जीवन को अधिक सार्थक बनाते हैं और इनका गला घोंटना लोकतांत्रिक मूल्यों के विरुद्ध है।
इमरान प्रतापगढ़ी का मामला अकेला नहीं है। इससे पहले भी कई उदाहरण सामने आए हैं, जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमले हुए।
मुनव्वर फारुकी
स्टैंड-अप कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी का मामला
जनवरी 2021 में इंदौर में आयोजित एक शो के दौरान कॉमेडियन मुनव्वर फारूकी को कथित रूप से हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया था, जबकि उस शो की शुरुआत भी नहीं हुई थी। मुनव्वर को लगभग एक महीने तक जेल में रहना पड़ा। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें जमानत दी और कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को यूं ही बाधित नहीं किया जा सकता।
पत्रकारिता और राजद्रोह कानून का दुरुपयोग
पिछले वर्षों में कई पत्रकारों पर राजद्रोह, यूएपीए और अन्य कठोर धाराओं में मुकदमे दर्ज किए गए। केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन को हाथरस गैंगरेप कवर करने जाते समय यूपी पुलिस ने गिरफ्तार किया। उन पर यूएपीए और राजद्रोह जैसे आरोप लगाए गए। उन्हें लगभग दो साल बाद सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली।
कन्हैया कुमार और दिशा रवि
कन्हैया कुमार और जेएनयू विवाद
फरवरी 2016 में जेएनयू छात्रसंघ के तत्कालीन अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर देशद्रोह का मामला दर्ज किया गया था। आरोप था कि कैम्पस में देश विरोधी नारे लगे थे। इस घटना ने देश में राष्ट्रवाद बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की तीव्र बहस को जन्म दिया।
फिल्म और साहित्य पर प्रतिबंध
फिल्म ‘लिप्स्टिक अंडर माई बुर्का’, ‘पद्मावत’ और ‘काशी का असली इतिहास’ जैसी किताबें और फिल्मों को लेकर भी सेंसर बोर्ड और राजनीतिक संगठनों के बीच विवाद रहे हैं। रचनात्मकता को ‘राष्ट्र विरोध’, ‘संस्कृति विरोध’ या ‘धार्मिक भावना आहत’ होने के नाम पर निशाना बनाया गया।
किसान आंदोलन और अभिव्यक्ति का दमन
2019-20 के किसान आंदोलन के दौरान भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर गम्भीर सवाल उठे। कई पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आंदोलन से सहानुभूति रखने वाले नागरिकों पर एफआईआर दर्ज की गईं। पत्रकार मंडोना नारायणन, मौली चक्रवर्ती और स्वतंत्र मीडिया पोर्टलों से जुड़े रिपोर्ट्स पर गलत सूचना फैलाने, देशद्रोह और दंगा भड़काने जैसे आरोप लगाए गए। इसके अलावा, ग्रेटा थनबर्ग टूलकिट केस में दिशा रवि, एक युवा जलवायु कार्यकर्त्ता को गिरफ्तार किया गया, जिसे अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा बताया गया। बाद में दिल्ली की अदालत ने उनकी गिरफ्तारी को अनुचित मानते हुए जमानत दी।
आपातकाल और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
भारत में 1975 से 1977 तक का आपातकाल वह दौर था जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सबसे भीषण हमला हुआ। प्रेस सेंसरशिप लागू की गई, हजारों लोगों को बिना मुकदमे के जेल में डाला गया और आलोचना को राजद्रोह माना गया। लेकिन इस दौर में भी कुछ न्यायिक निर्णयों ने संविधान के मूल स्वरूप की रक्षा की।
केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
यह निर्णय आपातकाल से ठीक पहले का है, लेकिन इसी में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया कि संविधान के ‘मूल ढांचे’ को संसद भी नहीं बदल सकती। इसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र का आधार माना गया।
मनुबाई शाह केस और अन्य निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने कुछ मामलों में राज्य की कार्रवाई को अनुचित ठहराया, लेकिन आलोचना भी हुई कि एडीएम जबलपुर केस (हाबियस कॉपर्स केस) में कोर्ट ने सरकार के पक्ष में खड़े होकर नागरिक अधिकारों की रक्षा करने में असफलता दिखाई। इस ऐतिहासिक भूल को बाद में खुद सर्वोच्च न्यायालय ने सुधारा और स्वीकार किया कि वह निर्णय गलत था।
राजनीतिक संदर्भ और सत्ता की असहिष्णुता
सामाजिक कार्यकर्ता शिव कुमार और नौदीप कौर
यह देखा गया है कि सरकारें चाहे केंद्र की हों या राज्य की, अक्सर आलोचना को सहन नहीं कर पातीं। सोशल मीडिया पर सरकार की आलोचना करने वाले आम नागरिकों पर भी पुलिस केस दर्ज हुए हैं। कई बार सिर्फ एक ट्वीट या फेसबुक पोस्ट पर एफआईआर दर्ज कर दी गई। सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा आलोचक स्वर को दबाने की यह प्रवृत्ति लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए गम्भीर खतरा है।
न्यायपालिका की भूमिका
सुप्रीम कोर्ट और कुछ उच्च न्यायालयों ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा में कई सराहनीय निर्णय दिए हैं। लेकिन निचली अदालतों द्वारा कठोर कानूनों के अंतर्गत बिना पर्याप्त आधार के गिरफ्तारी को मंजूरी देना चिंता का विषय बना हुआ है। न्यायिक सक्रियता के साथ-साथ न्यायिक आत्मसंयम की भी जरूरत है ताकि राज्यसत्ता के दुरुपयोग से नागरिक की स्वतंत्रता सुरक्षित रह सके।
इमरान प्रतापगढ़ी का केस सिर्फ एक नेता की निजी राहत नहीं, बल्कि उस व्यापक विमर्श का हिस्सा है जो भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच खिंचती जा रही रेखा को उजागर करता है। जब कविता, व्यंग्य, कला या आलोचना को आपराधिक ठहराया जाने लगे, तब लोकतंत्र के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। यह जरूरी है कि राज्यसभा असहमति की आवाजों को सम्मान दे, क्योंकि यही लोकतंत्र की आत्मा है।