जब हम बड़े हो रहे थे, हमें भारत की पहचान के रूप में जिस सांस्कृतिक सूत्र का पाठ पढ़ाया गया, वह था, गंगा-जमुनी तहजीब। यह केवल एक मुहावरा नहीं था बल्कि यह साझा जीवन-पद्धति का नाम था। इसमें मंदिर की घंटियों और मस्जिद की अजान के बीच कोई दीवार नहीं थी वरन् एक रोजमर्रा का संवाद था। इसमें होली की अबीर और ईद की सेवइयों के बीच कोई प्रतिस्पर्धा नहीं थी बल्कि साझेदारी थी। इस संस्कृति की सबसे
मार्मिक गवाही साहित्य देता है जहां भिन्न आस्थाओं के कवि- लेखक एक-दूसरे के प्रतीकों में अपना हृदय रख देते हैं। मैं पुनः दोहराता हूं गंगा-जमुनी संस्कृति केवल एक सांस्कृतिक मुहावरा नहीं है, यह भारतीय समाज की वह खूबसूरती है जिसने सदियों तक विविधताओं को संघर्ष में नहीं, संवाद में बदला। हम में से अधिकतर ने बचपन में यही सुना कि भारत अनेकताओं का देश है, जहां गंगा और जमुना की धाराएं मिलकर एक ऐसी धारा बनाती हैं जिसमें भाषा, पहनावा, खान-पान, संगीत, आस्था और उत्सव सब एक-दूसरे से संवाद करते हैं।
भारतीय साहित्य इस प्रश्न का सबसे विश्वसनीय साक्षी है। भक्ति और सूफी परम्परा ने जिस सांस्कृतिक समन्वय को जन्म दिया, वह केवल आध्यात्मिक नहीं था, सामाजिक भी था। मुस्लिम जन्म के कवि रसखान ने जिस प्रेम से कृष्ण और ब्रज की होली का वर्णन किया, वह गंगा-जमुनी तहजीब का उज्ज्वल उदाहरण है। उनकी पंक्तियां, ‘खेलत फाग सुहाग भरी, अनुरागहि लालन को धरि के, मारत कुंकुम केसरि के पिचकारिन सो रंग झरि के’ सिर्फ एक उत्सव का दृश्य नहीं रचतीं। वे यह भी बताती हैं कि सांस्कृतिक आत्मीयता धर्म की सीमाओं से बड़ी हो सकती है। रसखान का यह कहना कि वे मनुष्य होकर गोकुल में बसना चाहेंगे या पशु होकर नंद की गाय बनना चाहेंगे, उस गहरे तादात्म्य का प्रमाण है जिसमें आस्था जन्म से नहीं, अनुभव से बनती है। इसी परम्परा में रहीम के दोहे प्रेम और नैतिकता का ऐसा सेतु बनाते हैं जिसमें राम और रहीम का कोई विरोध नहीं दिखता। कबीर ने निर्गुण भक्ति के माध्यम से मंदिर और मस्जिद दोनों की रूढ़ियों पर चोट की और मनुष्य को केंद्र में रखा। सूर और मीरा की भक्ति में भी वह खुलापन है जिसमें कोई भी शामिल हो सकता है। इन सबकी वाणी मिलकर यह कहती है कि भारतीयता का मूल तत्व सह-अस्तित्व है।
इतिहास के स्तर पर भी गंगा-जमुनी संस्कृति कोई कल्पना नहीं थी। उत्तर भारत के नगरों में भाषा का मिश्रण, संगीत की साझी परम्पराएं, स्थापत्य की संयुक्त शैलियां और त्योहारों का साझा उत्सव इस बात के प्रमाण हैं कि समाज ने विविधताओं को शत्रुता में नहीं बदला। यह सच है कि इतिहास में संघर्ष भी रहे लेकिन संघर्ष के बावजूद साझा जीवन की प्रवृत्ति अधिक प्रबल रही। यदि यह संस्कृति केवल अभिजात वर्ग तक सीमित होती तो रसखान और रहीम की पंक्तियां लोकगीतों में जीवित न रहतीं। होली के फाग गांवों में गाए जाते रहे, किसी कवि की धार्मिक पहचान पूछे बिना। यही उस संस्कृति की शक्ति थी।
स्वतंत्र भारत ने जब अपना संविधान अपनाया तो उसने इसी ऐतिहासिक अनुभव को आधुनिक राजनीतिक रूप दिया। संविधान की प्रस्तावना में समानता, स्वतंत्रता और बंधुता के जो मूल्य हैं, वे किसी एक धर्म के लिए नहीं, सभी नागरिकों के लिए हैं।
धर्मनिरपेक्षता का अर्थ धर्म-विरोध नहीं बल्कि सभी आस्थाओं के प्रति समान सम्मान है। अनुच्छेद 25 से 28 तक धार्मिक स्वतंत्रता की जो गारंटी दी गई है, वह इस विविध समाज की रक्षा के लिए है। संविधान निर्माताओं ने समझा था कि भारत को किसी एक धार्मिक पहचान में बांधना उसकी बहुलता के साथ न्याय नहीं होगा। इसलिए राज्य को किसी एक धर्म का पक्षधर नहीं बनाया गया।
परंतु वर्तमान समय में परिदृश्य बदलता हुआ दिखता है। धार्मिक पहचान राजनीतिक विमर्श का केंद्रीय मुद्दा बनती जा रही है। हिंदू राष्ट्र की अवधारणा को सांस्कृतिक पुनरुत्थान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है जबकि उसके आलोचक इसे बहुलतावादी ढांचे के लिए खतरा मानते हैं। चुनावी मंचों से लेकर सोशल मीडिया तक धार्मिक प्रतीकों का उपयोग राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए किया जा रहा है। छोटी-छोटी घटनाएं साम्प्रदायिक तनाव का कारण बन जाती हैं। अविश्वास का वातावरण धीरे-धीरे सामाजिक सम्बंधों को प्रभावित करता है। ऐसे माहौल में गंगा-जमुनी संस्कृति की सहजता कमजोर पड़ती दिखाई देती है। साझा त्योहार मनाने की स्वाभाविकता पर भी संदेह की परछाईं पड़ जाती है।
यह मान लेना कि गंगा-जमुनी संस्कृति पूरी तरह समाप्त हो गई है शायद अतिशयोक्ति होगी। भारत के अनेक हिस्सों में आज भी लोग मिलकर त्यौहार मनाते हैं, एक-दूसरे के दुख-सुख में शामिल होते हैं। किंतु यह भी सच है कि सार्वजनिक विमर्श में विभाजन की भाषा अधिक मुखर हो गई है। यह बदलाव केवल राजनीतिक नहीं, मनोवैज्ञानिक भी है। जब पहचान को सुरक्षा और श्रेष्ठता के प्रश्न से जोड़ा जाता है, तब संवाद की जगह प्रतिस्पर्धा ले लेती है। इस प्रतिस्पर्धा में इतिहास को भी चुनिंदा ढंग से प्रस्तुत किया जाता है जिससे अतीत का जटिल और बहुआयामी स्वरूप एकरेखीय कथा में बदल जाता है।
होली जैसे त्यौहार का सांस्कृतिक अर्थ इसी संदर्भ में और महत्वपूर्ण हो जाता है। होली रंगों का उत्सव है, और रंगों का स्वभाव है मिलना। जब गुलाल उड़ता है तो वह भेद नहीं करता कि किसके चेहरे पर जा रहा है। रसखान की होली में कृष्ण हैं, गोपियां हैं, पर साथ ही एक मुस्लिम कवि का अनुराग भी है। यह दृश्य बताता है कि सांस्कृतिक साझेदारी किसी पर थोपी नहीं जाती, वह प्रेम से जन्म लेती है। यदि हम होली को केवल एक धार्मिक अनुष्ठान के रूप में सीमित कर देंगे तो उसके सामाजिक अर्थ को खो देंगे। होली की असली शक्ति इसी में है कि वह मनुष्यों को क्षण भर के लिए समान बना देती है, रंगों में डुबोकर।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी सांस्कृतिक स्मृति को पुनः पढ़ें। शिक्षा में संत और सूफी परम्परा का संतुलित और समावेशी परिचय बच्चों को दिया जाए। साहित्यिक गोष्ठियों और सांस्कृतिक आयोजनों में साझा विरासत को रेखांकित किया जाए। मीडिया को भी केवल तनाव और टकराव की खबरों से आगे बढ़कर उन उदाहरणों को सामने लाना चाहिए जहां समाज अभी भी संवाद की राह पर है। यह काम केवल राज्य का नहीं, समाज का भी है। नागरिक समाज, लेखक, कलाकार और शिक्षक मिलकर उस स्मृति को जीवित रख सकते हैं जिसे राजनीतिक शोर दबा देना चाहता है।
भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग करने वालों का तर्क है कि यह बहुसंख्यक आस्था का सम्मान है। परंतु प्रश्न यह है कि क्या किसी राष्ट्र की पहचान केवल बहुसंख्यक की आस्था से तय होती है या वह उन सभी नागरिकों की साझी प्रतिबद्धता से बनती है जो उसमें रहते हैं। यदि राष्ट्र की अवधारणा से समान नागरिकता का भाव कमजोर पड़ता है तो लोकतंत्र की आत्मा भी आहत होती है। गंगा-जमुनी संस्कृति का सार यही है कि बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक की विभाजक रेखा के पार भी एक साझा नागरिकता सम्भव है।
अंततः यह बहस केवल अतीत की स्मृति या वर्तमान की राजनीति की नहीं, भविष्य की दिशा की भी है। क्या हम आने वाली पीढ़ियों को एक ऐसा समाज देना चाहते हैं जहां पहचान दीवारें बनें या ऐसा समाज जहां वे पुल बनें। रसखान, रहीम, कबीर और सूर की परम्परा हमें बताती है कि पुल बनाना सम्भव है। संविधान हमें उस पुल की कानूनी और नैतिक नींव देता है। चुनौतियां कठिन हैं, पर समाधान असम्भव नहीं।
होली के रंग हमें यही याद दिलाते हैं कि जब रंग मिलते हैं तो वे एक-दूसरे को मिटाते नहीं बल्कि नया रंग रचते हैं। भारत की पहचान भी ऐसी ही हो सकती है जहां विविधताएं प्रतिस्पर्धी नहीं, सह-अस्तित्व की साझेदार हों। यदि हम इस दिशा में कदम बढ़ाएं तो शायद आने वाले वर्षों में गंगा-जमुनी संस्कृति फिर से केवल एक मुहावरा नहीं बल्कि जीवित अनुभव बन सकेगी।
होलित्सव की रंगों भरी खुशियां और रमजान की पवित्रता, शांति व बरकत की हार्दिक शुभकामनाएं।
