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स्वर्णयुग की अंतिम धरोहर का निधन

कामिनी कौशल: 24 फरवरी 1927 - 14 नवम्बर 2025
हिंदी सिनेमा की स्वर्णयुगीन अभिनेत्री कामिनी कौशल का 98 वर्ष की आयु में 14 नवम्बर को निधन हो गया। फिल्म ‘नीचा नगर’ से लेकर ‘लाल सिंह चड्ढा’ तक फैला सात दशक का अद्भुत सफर इस तरह समाप्त हो गया। खास बात यह कि स्वर कोकिला लता मंगेशकर ने अपने करियर का पहला फिल्मी गीत 1948 की फिल्म ‘जिद्दी’ में कामिनी कौशल पर ही रिकाॅर्ड किया था। सहज अभिनय, नैतिक दृढ़ता और निरंतर सक्रियता चलते वे भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित और दीर्घजीवी कलाकारों में शामिल रहीं


भारत के फिल्म इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं जिनके साथ सिर्फ एक ­युग नहीं बल्कि कई युगों का विकास जुड़ा होता है। हालांकि ऐसे नाम बहुत कम हैं। कामिनी कौशल उन्हीं दुर्लभ कलाकारों में थीं। 14 नवम्बर 2025 की रात मुम्बई स्थित अपने आवास पर 98 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली और इसी के साथ भारतीय सिनेमा की एक दीर्घजीवी, शांत और गरिमामय यात्रा विराम को पहुंची। आज जब देशभर में फिल्म-जगत शोक में डूबा है तो उनकी याद सिर्फ एक अभिनेत्री के रूप में नहीं की जा रही बल्कि उस व्यक्तित्व के रूप में की जा रही है जिसने अपनी सरलता, संयम और अद्भुत अभिनय-प्रतिभा से पीढ़ियों को प्रभावित किया।

कामिनी कौशल का जन्म 1927 में अविभाजित भारत के शहर लाहौर में हुआ था। तब भारतीय समाज परम्परा और आधुनिकता के बीच नई राह तलाश रहा था। उच्च शिक्षित परिवार में जन्मी उमा कश्यप जो आगे चलकर कामिनी कौशल बनीं, अपने घर के बौद्धिक माहौल से बहुत प्रभावित थीं। उनके पिता शिवराम कश्यप एक प्रतिष्ठित बाॅटनिस्ट थे और लाहौर के शिक्षण वातावरण ने कामिनी को बचपन से ही ज्ञान, कला और संवेदना के सम्पर्क में रखा। ऐसा कहा जाता है कि उनका अभिनय के प्रति रुझान बहुत स्वाभाविक था पर उन्होंने इसे कभी करियर के रूप में नहीं सोचा था। रेडियो, नाटक और साहित्य में रुचि के बावजूद उन्होंने जीवन को शांत गति से जीने की इच्छा रखी थी लेकिन नियति उन्हें फिल्म जगत में ले आई जहां उन्होंने जो मुकाम प्राप्त किया वह इतिहास बन गया।

1946 में बनी चेतन आनंद की फिल्म ‘नीचा नगर’ हिन्दी सिनेमा की उन पहली फिल्मों में से थी जिसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान कराई। यह वही फिल्म थी जिसे कान फिल्म फेस्टिवल के पहले संस्करण में सर्वोच्च सम्मान, ‘पाम द’ प्राप्त हुआ। इस महान फिल्म की नायिका थीं कामिनी कौशल। किसी नवोदित अभिनेत्री का अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहली ही फिल्म में इस तरह चमकना असाधारण घटना थी। लेकिन फिल्म की सफलता से भी अधिक उल्लेखनीय था उनकी स्क्रीन प्रेजेंस का वह सहज आकर्षण जिसने उन्हें तुरंत उस दौर की प्रमुख अभिनेत्रियों में स्थापित कर दिया।

‘नीचा नगर’ के बाद वे लगातार सुपरहिट फिल्मों का हिस्सा बनती चली गईं। ‘दो भाई’, ‘नदिया के पार’, ‘जिद्दी’, ‘शबनम’, ‘अरमान’, ‘बिराज बहू’, ये वे फिल्में हैं जिनमें उन्होंने उस समय के लगभग सभी शीर्ष अभिनेताओं के साथ काम किया। दिलीप कुमार, राजकपूर, देव आनंद  सरीखे सुपरस्टारों के साथ उनकी जुगलबंदी दर्शकों को प्रिय थी। 1954 की ‘बिराज बहू’ उनके करियर का मील का पत्थर बन गई जिसके लिए उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। फिल्म समीक्षकों के अनुसार कामिनी की अभिनय शैली अपने समय से आगे थी, भावुकता के स्थान पर संयम, संवाद से अधिक अभिव्यक्ति और चरित्र की गहराई को बारीक निगाह से पकड़ लेने की क्षमता।

दिलीप कुमार के साथ उनकी जोड़ी अपने समय में खूब चर्चा में रही। कई दफा बाद के साक्षात्कारों में यह बात सामने आई कि दोनों के बीच गहरी भावनात्मक मित्रता थी पर कामिनी कौशल ने उसे उस सीमा से आगे नहीं जाने दिया। अपने परिवार की जिम्मेदारी, अपनी बहनों के प्रति कर्तव्य और अपनी सामाजिक दृष्टि को उन्होंने हमेशा प्राथमिकता दी। वह एक ऐसा दौर था जब निजी जीवन की सीमाएं धूमिल थीं और फिल्म जगत में रिश्तों के लिए गाॅसिप आम था, पर कामिनी कौशल ने अपनी गरिमा को कभी टूटने नहीं दिया। यही वह गुण था जिसने उन्हें दर्शकों के साथ-साथ इंडस्ट्री में भी सम्मान दिलाया।

1950 का दशक और शुरुआती 1960 उनके लिए सफलता का स्वर्णकाल था पर विवाह और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बाद उन्होंने मुख्य अभिनेत्री के रूप में काम करना कम कर दिया। लेकिन यह किसी तरह का अवसान नहीं था यह उनके अभिनय के दूसरे अध्याय की शुरुआत थी। 1965 के बाद वे चरित्र भूमिकाओं में नजर आने लगीं। भारतीय सिनेमा में यह संक्रमण अक्सर कठिन माना जाता है लेकिन कामिनी कौशल ने इसे भी सहजता से स्वीकार किया। एक समय की शीर्ष नायिका का मां, चाची, दादी या वरिष्ठ महिला किरदार निभाने के लिए सहज होना, वह भी बिना किसी अहंकार के, यह उनके व्यक्तित्व की महानता दर्शाता है।

इन्हीं वर्षों में उन्होंने बाल कार्यक्रमों, रेडियो नाटकों और टेलीविजन धारावाहिकों में भी योगदान दिया। 1970 और 80 के दशक की कई फिल्मों में उनकी उपस्थिति दर्शकों को भावनात्मक स्तर पर जोड़ती थी। ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘कृष्णा’, ‘संतोष’ जैसी फिल्मों में उनके किरदार छोटे होने पर भी प्रभावशाली थे। वे केवल ‘मां का रोल’ निभाने वाली अभिनेत्री नहीं थीं, वे हर भूमिका में जीवन का अनुभव जोड़ती थीं।

कई लोग भूल जाते हैं कि कामिनी कौशल ने अपने करियर को कभी अलविदा नहीं कहा। 1990 के बाद जब कई दिग्गज कलाकार पर्दे से गायब होने लगे तब भी वे निरंतर सक्रिय रहीं। 2013 में ‘चेन्नई एक्सप्रेस’ में उनकी छोटी-सी भूमिका ने नए दर्शकों को उनसे परिचित कराया। शाहरूख खान के साथ स्क्रीन पर उनका उपस्थित होना उस विरासत का प्रतीक था जिसमें हिंदी सिनेमा के तीन युग, स्वर्णयुग, मध्यम युग और आधुनिक युग, एक साथ खड़े दिखाई देते हैं।

2019 में ‘कबीर सिंह’ में उन्होंने दादी का किरदार निभाया था और उनके सहज अभिनय ने फिर दिखाया कि उम्र केवल एक संख्या है, अभिनेता का जीवन उसकी संवेदना और ईमानदारी में बसता है। इसी फिल्म के लिए उन्हें कई पुरस्कारों के लिए नामित किया गया और आश्चर्यजनक रूप से 2022 में आई ‘लाल सिंह चड्ढा’ में भी उन्होंने कैमियो किया, यह इस बात का प्रमाण था कि कामिनी कौशल जैसी कलाकार कभी बूढ़ी नहीं होती, वे केवल और अधिक अनुभवी होती जाती हैं।

अपने निजी जीवन में कामिनी कौशल बेहद संकोची, अनुशासित और पारिवारिक मूल्य-प्रधान रहीं। जिस दौर में ग्लैमर और विवाद कलाकारों की पहचान बन जाता था, उस समय भी वे अपने जीवन को अत्यधिक निजी रखती थीं। पत्रकार उनकी विनम्रता की मिसाल देते थे। कहा जाता है कि वे कभी किसी इंटरव्यू को टालती नहीं थीं पर कभी भी अपनी उपलब्धियों का बखान नहीं करती थीं। न बच्चों जैसी उत्सुकता, न दिग्गज होने का दम्भ, यह संतुलन उन्हें बाकी अभिनेत्रियों से अलग करता रहा।

2025 में उनके निधन के बाद इंडस्ट्री के वरिष्ठ और युवा कलाकारों दोनों ने सोशल मीडिया पर उन्हें याद किया। शाहरूख खान से लेकर शाहिद कपूर और कियारा आडवाणी तक सभी ने कहा कि कामिनी कौशल जैसी अभिनेत्री के साथ काम करना सम्मान की बात थी। नए कलाकारों ने उन्हें सिनेमा का ‘जीवित इतिहास’ कहा क्योंकि वे उन कुछ कलाकारों में थीं जिन्होंने भारत के विभाजन से पहले की फिल्म इंडस्ट्री, स्वतंत्रता का दौर, श्वेत-श्याम से रंगीन का परिवर्तन, 70-80 के दशक का व्यावसायिक दौर, 90 के बाद की नई लहर और 21वीं सदी के आधुनिक बाॅलीवुड, सभी को अपनी आंखों से देखा था।

कामिनी कौशल का जाना सिर्फ एक अभिनेत्री का जाना नहीं बल्कि भारतीय सिनेमा के सात दशक का एक चलायमान दर्पण बुझने जैसा है। उनकी विरासत किसी पुरस्कार, किसी उपलब्धि या किसी एक फिल्म से नहीं मापी जा सकती। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वे एक ऐसी कलाकार थीं जो अपने समय से आगे थीं पर अपने समय से दूर कभी नहीं हुईं। वे नई पीढ़ियों से सहजता से जुड़ती थीं और पुरानी पीढ़ियों के लिए यादों की महक थीं।

आज जब हम उन्हें विदा करते हैं तो उनकी स्मृतियां सिर्फ उनकी फिल्मों में नहीं बसतीं, वे फिल्म जगत की उस गरिमा में मौजूद रहती हैं जहां काम को पूजा और अभिनय को साधना माना जाता है। कामिनी कौशल इस परिभाषा का सबसे सुंदर रूप थीं। एक शांत, सरल, अनुशासित और सतत् समर्पित कलाकार जो कैमरे से कभी दूर नहीं हुईं और जिनका चेहरा सदैव भारतीय सिनेमा की गरिमा के रूप में याद किया जाएगा। उनकी लम्बी जीवन यात्रा हमें सिखाती है कि कलाकार उम्र से नहीं, अपने नैतिक साहस और अपने कला प्रेम से बड़ा होता है। कामिनी कौशल इस सत्य की सर्वश्रेष्ठ मिसाल थीं।

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