तप और तत्व का तीर्थ/भाग-1
श्वेता मासीवाल
सामाजिक कार्यकर्ता
बहुत सालों पहले की बात है। मैं उन दिनों एडवरटाइजिंग में थी और टीवी पर आने वाली एड फिल्म्स बनाती थी। इस नाते पूरे देश के कई रचनात्मक लोगों से और नामचीन उद्योगपतियों से मिलना होता रहता था। एक बार बंगलौर में ह्युंडई की एक कार के लिए शूट करते हुए मेरी मुलाकात एक अद्भुत छायाकार से हुई। वो इंडस्ट्री में काफी सीनियर हैं तथा उन्होंने बाॅलीवुड तथा साउथ की कई फिल्म्स को शूट किया है। हमारी फिल्म की शूट के बाद वो मुझसे ऐसे ही पूछने लगे कि मैं कहां से हूं? मैं हमेशा ही सबको बड़े उत्साह से बताती थी कि मैं हिमालय के उत्तराखण्ड से हूं। फिर उन्होंने पूछा उत्तराखण्ड में गढ़वाल या कुमाऊं। मैं थोड़ा चैंकी क्योंकि साउथ के लोगों को इतने विस्तार में पहाड़ के विषय में कम ही पता होता है। रानीखेत और नैनीताल, मैंने तुरंत जवाब दिया।
उसके आगे एक मलयाली मूल के स्थापित छायाकार के मुख से द्वाराहाट सुनकर मुझे करंट-सा लगा था। उनके कुकुछीना बाड़ेचीना कहते ही मैं भावुक हो गई। वैसे भी दस दिनों से दक्षिण भारतीय भोजन करते-करते मुझे घर की याद भी आने लगी थी। मैंने उत्साह से पूछा आप कैसे जानते हैं इस स्थान के विषय में? उनका जवाब अप्रत्याशित था। दक्षिण के महान अभिनेता रजनीकांत ने उन्हें महावतार बाबाजी और दूनागिरी के विषय में बताया था। और उनके कहने पर वो वहां गए भी थे।
बचपन से दूनागिरी के दर्शन करने हेतु जाती रही थी लेकिन इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ थी कि उस स्थान पर महावतार बाबाजी ने साधना की थी। आज तो बहुत लोग इस विषय में जानते हैं लेकिन 15-18 साल पूर्व मेरे लिए ये जानकारी भी नई थी कि मेरे ननिहाल की ईष्ट देवी के स्थान पर लेजेंडरी सुपरस्टार रजनीकांत हर वर्ष आते थे। मैं तब ग्लानि से भर उठी थी। कितना कम जानते हैं हम अपने ही गृह राज्य के विषय में। मोहन सर ने मुझे कहा था कि ‘मैं भाग्यशाली हूं कि ऐसी अद्भुत संतों की तपस्थली के आंगन में, मैं पली-बढ़ी हुई हूं।’

‘उत्तराखण्ड एक आध्यात्मिक खोज’ के इस अंक में आज इसी दिव्य स्थान दूनागिरी के विषय में मैं आपको यथा सामर्थ्य बताने का प्रयास करूंगी। हिम क्षेत्र में जिस-जिस स्थान पर माता सती के अंग गिरे वहां-वहां कालांतर में शक्तिपीठ स्थापित कर दिए गए। लेकिन दूनागिरी विशिष्ट स्थान है क्योंकि इस स्थान में माता अम्बा वैष्णवी रूप में पूजी जाती हैं इसलिए यहां बलि प्रथा कभी प्रचलन में नहीं आई। मंदिर में भेट स्वरूप अर्पित किया गया नारियल भी मंदिर परिसर में नहीं फोड़ा जाता है। पूरे भारत में माता वैष्णो देवी के बाद वैष्णवी रूप में माता यहीं साक्षात निवास करती हैं।
सनातन भारत के बच्चे-बच्चे को सतयुग में लक्ष्मण मूच्र्छा और द्रोणगिरि पर्वत का प्रसंग ज्ञात है। कहते हैं ये स्थान दरअसल द्रोणगिरि ही है जो कालांतर में अपभ्रंश में दूनागिरी नाम से प्रचलित हो गया। वैष्णो देवी के बाद उत्तराखण्ड के कुमाऊं में ‘दूनागिरी’ दूसरा वैष्णो शक्तिपीठ है। मंदिर के विषय में उत्तराखण्ड से अधिकांश तीर्थों की तरह यहां भी हर युग की अपनी एक कथा है।
यहां स्थित मंदिर निर्माण के बारे में मान्यता है कि त्रेतायुग में जब लक्ष्मण को मेघनाद द्वारा शक्ति लगी थी तब सुशेन वैद्य ने हनुमान जी को द्रोणाचल नाम के पर्वत से संजीवनी बूटी लाने को कहा था। हनुमान जी उस स्थान से पूरा पर्वत उठा रहे थे तो वहां पर पर्वत का एक छोटा-सा टुकड़ा गिर गया। आगे चलकर इस स्थान में दूनागिरी का मंदिर बनायाा गया। मंदिर में लगी हुई हजारों घंटियां प्रेम, आस्था और विश्वास की प्रतीक है, जो भक्तों का मां दूनागिरी के प्रति है।
दूनागिरी मंदिर के गर्भगृह में कोई मूर्ति नहीं है। प्राकृतिक रूप से निर्मित सिद्ध पिण्डियां माता भगवती के रूप में पूजी जाती हैं। दूनागिरी मंदिर में अखंड ज्योति का जलना मंदिर की एक विशेषता है। जैसा मैंने ऊपर उल्लेख किया है ‘दूनागिरी’ का वर्णन सर्वप्रथम राम कथा में आता है, जब मेघनाद के वाण से आहत हो लक्षमण मूर्छित हो गए थे और हनुमान को ‘वैद्य सुशेन’ ने दूनागिरी के पर्वत से ‘संजीवनी बूटी’ लाने के लिए कहा था। बात द्वापर की करें तो ऐसा माना जाता है कि कौरवों और पांडवों के धनुर्विद्या के गुरु द्रोणाचार्य का आश्रम भी दूनागिरी में ही था। द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा जिन्हें चिर यौवन का वरदान मिला था आज भी दूनागिरी में ही वास करते हैं। कहा जाता है कुछ भाग्यवान लोगों को वो दर्शन भी दे चुके हैं। 1949 में दूनागिरी के पास ही हाट नामक गांव की एक गरीब महिला लकड़ी काटने जंगल में जा रही थी। रास्ते में उसे एक साधु मिले, स्त्री ने साधु के प्रति बहुत श्रद्धा भाव प्रकट किया। इस पर साधु ने प्रसन्न हो स्त्री को धनवान होने का आशीर्वाद दिया और अंतर्ध्यान हो गए। उसी समय उस स्त्री ने देखा कि उसकी लोहे की दरांती सोने में बदल गई। वो ठगी-सी रह गई। उस स्त्री ने दरांती को बेचकर अपने परिवार के लिए एक बहुत विशाल भवन का निर्माण किया। आज भी यह भवन मौजूद है। जो भी उस गांव में जाता है उसे इस कथा से अवश्य अवगत कराया जाता है।

ऐसा माना जाता है कि वो साधु गुरु द्रोण के वरदान प्राप्त पुत्र अश्वत्थामा थे। परंतु द्रोण पुत्र हमेशा वर ही नहीं देते, अपितु कभी-कभी क्रोधित भी होते हैं, खास करके जब कोई जीव हत्या करता है। इसलिए दूनागिरी और उसके आस-पास वन्य प्राणियों की प्रचुरता है। इन सभी कथाओं को जोड़कर देखा जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि अलग-अलग युग में भी इसी पर्वत पर मां प्रकृति की अपार सम्पदा रही हैं। चाहे फ्लोरा फौना हो या वन्यजीव जंतु।
1972 के दिनों में कुछ लकड़हारों ने एक और अचम्भा देखा। दरअसल, उन्होंने देखा कि जंगल से प्रतिदिन एक भालू निकलता है और दूनागिरी पर्वत पर स्थित दुर्गा मंदिर की दिशा में दोनों पांव पर खड़े होकर नमन करता है। लोगों को यह अद्भुत दृश्य बहुत ही चमत्कारिक लगा, इसलिए गांववालों ने विमर्श करके एक दुर्गा मंदिर ठीक उसी जगह बना दिया जहां से खड़े होकर भालू नमन किया करता था। कहते हैं कि आज भी वह भालू आकर उस मंदिर में नमन करता है। दूनागिरी की पहाड़ियों और आस-पास की एक बड़ी विशेषता यहां पाए जाने वाले औषधीय पौधे हैं जो रात में दमकते हैं और ये पौधे सिर्फ दूनागिरी में ही पाए जाते हैं।
खैर, ये सभी कथाएं तो मैं बड़े होते-होते सुनती रहती थी क्योंकि मेरी माता जी अंगिरस गोत्र की थी और दूनागिरी मैया उनकी ईष्ट थी। इसलिए लगभग हर साल गर्मियों में इस सिद्ध स्थान पर जाना होता था। बहुत पहले यहां एक बोर्ड लगा होता था जिसमें लिखा होता था – वे टू हैवेन। सुलभ स्थान होने के बावजूद अभी तक यहां भक्तों का वो रैला नहीं आया है जो कैंची धाम तक पहुंच गया है और उत्तराखण्डी होने के नाते मुझे इस बात का संतोष है। एक तो अध्यात्म सभी के लिए नहीं है।
माता के दरबार में भक्त मन्नत साधने ही जाते हैं। यहां नए जोड़े और नवजात बच्चे बहुत दिखते हैं जो इस बात का प्रतीक है कि माया के जीवन में आने वाले सभी पड़ावों में माता का आशीर्वाद अपने शिष्यों पर सदैव रहता है परंतु इन बातों और माया से बहुत ऊपर उठ चुके साधकों ने भी इस स्थान को चुना है। न मालूम कितने संत अभी भी सूक्ष्म रूप में यहां विचर रहे हों। अस्तित्व तो पूरा खेला ही ऊर्जा का है। भक्ति शोर, कीर्तन में भी है और शांति में भी। ऊपर मंदिर परिसर के सन्नाटे को जो चीरती है वो है चीड़ के जंगल की हवा की आवाज और बीच-बीच में बजने वाली घंटी की प्रतिध्वनि। इस शून्य सन्नाटे में अस्तित्व के होने के प्रमाण केवल महसूस किए जा सकते हैं और एक बार इस सन्नाटे को अगर अपने भीतर गहरा उतार लिया तो संसार का शोर थोड़ा बेमतलब लगने लगता है। ये दशा तो मुझ जैसे सामान्य भक्त की हो जाती है तो न मालूम साधकों को शोर से कितनी तकलीफ होती होगी।
‘उत्तराखण्ड एक आध्यात्मिक खोज’ लिखने के पीछे मेरी मंशा इसी शांत साधना के विषय में प्रकाश डालने की है। दुखद ये है कि राजस्व बढ़ाने के चलते सरकार लगातार हमारे पवित्र स्थानों को पर्यटन स्थलों में बदलती जा रही है। हाल ही में कई स्थानों पर जैन समुदाय के संत साधकों और अनुयायियों ने प्रर्दशन किए हैं और कई स्थानों पर उनके तीर्थस्थलों को पर्यटन स्थल परिवर्तित करने के फैसले वापस लिए गए। आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो इन तपस्थलियों के मायने बहुत गूढ़ है। कलयुग का प्रभाव सभी जगह देखा जा सकता है। भाई-भाई को लेकर अदालत में विवाद है। ऐसे में पुण्यात्माओं का तप ही है जिस पर दुनिया टिकी हुई है। इन स्थलों पर शोर करने का पाप नहीं होना चाहिए।

एक दशक पहले तक हम घर से ही चाय, पूरी-आलू बनकर ले जाते थे क्योंकि द्वाराहाट के बाद इस स्थान तक केवल एक या दो चाय की दुकान मिलती थी। ये सुखद है कि इतने वर्षों बाद उन्हीं दुकानों पर अब सुविधाएं बढ़ गई हैं लेकिन अन्य स्थानों की तरह अभी यहां वो भीड़ नहीं आई है जो तीर्थ भी तब करते हैं जब कोई स्थान ट्रेडिंग हो जाता है। पहले की तरह नीचे इन दुकानों पर जीवन में बहुत कुछ हासिल कर लेने के बाद हिमालय की शरण में बाबा की साधना से पलायक (मूव) होकर आए कुछ साधक नजर आ रहे थे। वो आपस में वही बात कर रहे थे जो इस पावन स्थान की मर्यादा को भंग नहीं करती अपितु आपके अनुभव को और गहरा कर देती है और फिर आपको याद आता है कि सतही शोर से परे शून्य सन्नाटे में ही आपको ब्रह्मा के दर्शन होते हैं।
‘योगी कथामृत’ (Autobiography of A Yogi) एक ऐसी पुस्तक है जिसने करोड़ों लोगों के जीवन को एक सकारात्मक दिशा दी है। आस्तिक से लेकर नास्तिक और हर धर्म की अनुयायियों ने इस पुस्तक के अध्ययन के बाद अपने जीवन में परिवर्तन अनुभव किए हैं।
परमहंस योगानंद ने अपनी इस आत्मकथा ‘योगी कथामृत’ में दूनागिरी पर्वत को एक अत्यंत पवित्र, रहस्यमय और उच्च कोटि की साधना भूमि के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यह वही स्थान है जहां महावतार बाबाजी ने आधुनिक युग में पहली बार क्रियायोग का पुनर्जागरण किया। यह स्थल आज भी अनेक साधकों और योगियों के लिए एक तीर्थ स्थल के रूप में माना जाता है। पुस्तक में वर्णन है कि लाहिड़ी महाशय को उनके सरकारी कार्य से अल्मोड़ा जिले के पास रानीखेत भेजा गया था। वहीं से उन्हें एक दिन पहाड़ों की ओर बुलावा मिला और उन्हें दूनागिरी पर्वत पर ले जाया गया। यही वह स्थान है जहां महावतार बाबाजी ने पहली बार उन्हें दर्शन दिए और क्रियायोग की दीक्षा दी। योगानंद जी लिखते हैं कि महावतार बाबाजी लाहिड़ी महाशय को एक गुफा में ले गए जो कि सामान्य लोगों के लिए अदृश्य थी और वह स्थान दूनागिरी पर्वत पर स्थित था।
साम्ब सदाशिव!
क्रमशः
(लेखिका रेडियों प्रजे़न्टर, एड फिल्म मेकर तथा
वत्सल सुदीप फाउंडेशन की सचिव हैं)


श्वेता मासीवाल