Uttarakhand

उत्तराखण्ड एक आध्यात्मिक खोज-24 : अलौकिक स्पर्श और आत्मा का जागरण

भारत का मानचित्र यदि कोई चेतन आत्मा हो, तो उसकी साधना की  धड़कनें उत्तराखण्ड की वादियों में सुनी जा सकती हैं। यह मात्र एक राज्य नहीं, देवभूमि है, वह भूमि जहां हर नदी, हर शिला, हर वनस्पति में कोई ऋषि का स्पर्श, कोई साधक की तपस्या, कोई मौन की गूंज समाई है। यही वह क्षेत्र है जहां महा अवतार बाबाजी, हैड़ाखान बाबा, नीम करौली महाराज, सोमवारी महाराज, नानतिन महाराज जैसे संतों ने न केवल ध्यान लगाया, बल्कि एक चेतन विरासत छोड़ी जो आज भी जीवित है। उत्तराखण्ड की यह परम्परा केवल अतीत का गौरव नहीं, वर्तमान की चेतना भी है। गंगोत्री और यमुनोत्री से लेकर केदारनाथ और बदरीनाथ तक और फिर बागेश्वर से लेकर चम्पावत जैसे सीमांत क्षेत्रों तक साधना का प्रवाह आज भी अनवरत जारी है। यह वही भूमि है जहां मौन साधना स्वयं वाणी बन जाती है और तपस्वियों का मौन भी अनुगूंजित होता है। ऐसे ही एक सजीव चेतना स्वामी प्रेम सुगंध संग मेरा परिचय हुआ। यह एक मात्र परिचय नहीं, बल्कि एक आंतरिक यात्रा की शुरुआत थी।

वर्षों से मैं उत्तराखण्ड के सामाजिक और आध्यात्मिक जीवन में सक्रिय रहा हूं, लेकिन कुछ अनुभव शब्दों से परे होते हैं। ऐसे ही एक दिन मेरे कार्यालय में प्रसिद्ध अभिनेता और अब राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय राजा बुंदेला पधारे। उनके साथ कई विषयों पर चर्चा हुई, लेकिन उन्होंने एक क्षण कहा, ‘‘तुम्हें एक साधक से मिलवाना है, जिनसे बात करोगे तो अनुभव होगा कि साधना केवल मार्ग नहीं, चेतना की अवस्था है।’’
राजा बुंदेला ने अपने मोबाइल से काॅल मिलाया। दूसरी ओर थे स्वामी प्रेम सुगंध, जो उस समय उत्तराखण्ड के सीमांत जनपद चम्पावत के एकांत आश्रम में साधना कर रहे थे। बातचीत लम्बी नहीं थी, लेकिन वह कुछ शब्द मेरे भीतर घंटों तक गूंजते रहे। उनके स्वर में एक गहराई थी, एक शांति थी, जो कह रही थी कि यह व्यक्ति केवल साधक नहीं, एक घटित अनुभव है। उनकी आवाज मानो ओशो की मौन परम्परा का प्रतिध्वनि थी। वह केवल उत्तर देते नहीं थे, प्रश्नों को भीतर गूंजने देते थे। इस अल्प बातचीत के बाद मैंने उनका नाम पहली बार खोजा और पाया कि उन्होंने कोई प्रचार नहीं किया है, कोई संस्था नहीं चलाई है और फिर भी उनके मौन की गूंज बहुत से जीवनों को छू रही है।
उत्तराखण्ड के जनपद चम्पावत स्थित स्वामी प्रेम सुगंध का आश्रम
जन्म से पूर्व की घोषणा
स्वामी प्रेम सुगंध का जीवन किसी साधारण कथानक की तरह नहीं, वह उन अपूर्व जीवों में आते हैं जिनकी उपस्थिति की घोषणा जन्म से पहले ही हो जाती है। कहा जाता है कि उनके गर्भ में आने से पूर्व स्वामी पूरणानंद जी, एक सिद्ध संत, ने यह उद्घोषणा की थी कि एक दिव्य आत्मा इस धरा पर अवतरित होने जा रही है, जो मौन, प्रेम और साधना की मिसाल बनेगी। जन्म के कुछ ही समय बाद, शैशव अवस्था में ही उन्हें ओशो की मौन उपस्थिति का अनुभव हुआ। उन्होंने ओशो को न प्रवचन के रूप में सुना, न ग्रंथों से पढ़ा, लेकिन ओशो का मौन उनके भीतर बीज बनकर उतर गया, जो वर्षों तक भीतर पकता रहा।
सांसारिक सफलता से साधना की ओर
स्वामी प्रेम सुगंध का सांसारिक जीवन विभोर बत्रा के रूप में प्रारम्भ हुआ। वे एक सफल व्यवसायी थे, एक प्रभावशाली युवा नेता, जिनके पास सम्पत्ति थी, प्रतिष्ठा थी और राजनीति में उभार की पूरी सम्भावना थी। लेकिन वर्ष 2014 में उनके जीवन में एक ऐसी घटना घटित हुई, जिसने समस्त दिशा बदल दी। यह कोई सामाजिक या भावनात्मक निर्णय नहीं था, यह एक आध्यात्मिक विस्फोट था। बिना किसी सार्वजनिक घोषणा के, बिना किसी औपचारिक विदाई के उन्होंने जीवन की समस्त सांसारिक उपलब्धियों को त्याग दिया। न कोई प्रेस विज्ञप्ति, न कोई आधिकारिक ‘ब्रेक’ बस एक दिन वे चुपचाप संसार से हटकर साधना की ओर बढ़ चले।
कभी-कभी आत्मा इतनी स्पष्ट हो जाती है कि वह विचार नहीं करती, केवल आगे बढ़ती है। उनके साथ यही हुआ। उन्होंने न अपने साथियों को कोई सफाई दी, न समाज को कोई संदेश। उन्होंने केवल मौन चुना।
तप की भूमि की ओर
संन्यास के पश्चात उन्होंने एकांत स्थलों की यात्रा की। गुजरात के नर्मदा तट, झारखंड के आदिवासी वन, मध्यप्रदेश के विंध्यांचल और फिर उत्तराखण्ड के चम्पावत क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन तपोभूमि और साथ ही उत्तर प्रदेश के जनपद पीलीभीत के पूरनपुर गांव में आश्रम। उत्तराखण्ड की भूमि उनके लिए अनुकूल थी। यह न केवल ऋषियों की तपस्थली रही है, बल्कि यहां की प्रकृति भी साधना के लिए अनुकूल है। चम्पावत के जिस क्षेत्र में उनका आश्रम है, वहां की हवा में ही एक तरह की शांति है। वहां सुबह की ध्वनि केवल पक्षियों की नहीं, आत्मा की होती है।
एक छोटे से आश्रम में, उन्होंने मौन की साधना को ही अपना धर्म बना लिया। वहां कोई संगठन नहीं, कोई प्रचार नहीं। सिर्फ मौन, आत्मावलोकन और प्रेम। वही किया जो कभी बुद्ध ने किया था, वही जो यीशु ने किया था, अपने भीतर उतर कर स्वयं को जानना।
भीतर की क्रांति
उनका यह रूपांतरण महर्षि वाल्मीकि की कथा जैसा है। वाल्मीकि, जो कभी रत्नाकर नामक लुटेरा था, नारद की वाणी सुनकर बदल गया और आदि कवि बन गया। उसी तरह विभोर बत्रा का रूपांतरण स्वामी प्रेम सुगंध में हुआ।
‘‘कायः पापमपि कृत्वा यो हि धर्मे स्थितो भवेत्। स च पूज्यो मुनिश्रेष्ठो यत्र तत्र विमुच्यते॥’’
यह श्लोक मानो उनके जीवन को परिभाषित करता है। उन्होंने अपने अतीत को नकारा नहीं, बल्कि उसे आत्मबोध का आधार बनाया। उन्होंने अपने भीतर उसी आत्मा को खोजा जो सदा से वहां थी, बस पहचान नहीं पाई गई थी।
प्रत्येक साधक की तरह उन्हें भी अपने अतीत की परछाइयों से संघर्ष करना पड़ा। जब वे साधना में लीन थे, तो कुछ पुराने व्यापारिक साझेदारों, और कुछ स्वार्थी रिश्तेदारों ने उन्हें ‘गायब’ मानते हुए उनकी सम्पत्ति को लेकर मुकदमे दर्ज करवा दिए। कुछ मामलों में फर्जीवाड़े और अवैध दस्तावेजों का भी सहारा लिया गया। लेकिन उन्होंने प्रतिक्रिया में कोई क्रोध नहीं दिखाया। उन्होंने अपने सभी सहयोगियों से कहा कि हर विवाद कानूनी, पारदर्शी और सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाया जाए। आज की स्थिति यह है कि सभी 13 के 13 कानूनी मामले अब सुलझ चुके हैं। किसी भी अदालत में अब कोई लम्बित मामला नहीं है। स्वामी प्रेम सुगंध ने न केवल मानवता की दृष्टि से इन विवादों को निपटाया, बल्कि यह सिद्ध किया कि करुणा, विनम्रता और मौन भी न्याय का मार्ग बन सकते हैं।
आज जब कोई चम्पावत के उस आश्रम में जाता है तो वह केवल एक साधक को नहीं, एक सजीव ऊर्जा को महसूस करता है। वहां की हवा में मौन है, वहां की दीवारों में प्रेम है। उत्तराखण्ड की जिस आध्यात्मिक परम्परा में नीम करौली महाराज की दया, हैड़ाखान बाबा की अग्नि, महा अवतार बाबाजी की सिद्धि, और नानतिन महाराज की आत्मवेदना शामिल रही है ‘स्वामी प्रेम सुगंध उसी परम्परा की आधुनिक कड़ी हैं। वे न तो
सोशल मीडिया इत्यादि में प्रवचन देते हैं, न यूट्यूब चैनल चलाते हैं। उनके पास न तो पीठ है, न ही प्रचारक। लेकिन जो एक बार उनके आश्रम जाता है, वह मौन के भीतर एक वाणी सुनकर लौटता है।
कभी-कभी जीवन किसी योजना के तहत नहीं, किसी ईश्वरीय हस्तक्षेप से बदलता है। स्वामी प्रेम सुगंध का जीवन हमें यही सिखाता है कि त्याग महज वस्त्रों का नहीं होता, वह भीतर की आकांक्षाओं का विसर्जन होता है। उनकी साधना हमें यह सिखाती है कि आध्यात्मिकता प्रदर्शन नहीं, अनुभव है। वे कोई मिशन नहीं चलाते, कोई संस्था नहीं बनाते, लेकिन उनकी मौन उपस्थिति ही वह कार्य कर रही है जो अनेक संस्थाएं नहीं कर पातीं, मनुष्यता को भीतर की ओर मोड़ देना। उनकी यह यात्रा, विभोर से प्रेम सुगंध तक, एक गाथा है साहस की, मौन की, प्रेम की और आत्मबोध की। वे हमारे समय में मौन के महत्व की पुनस्र्थापना कर रहे हैं। यह केवल संन्यास की कहानी नहीं है, यह एक ऐसे युग की पुकार है जिसमें शोर बढ़ता जा रहा है और मौन विलुप्त होता जा रहा है। स्वामी प्रेम सुगंध उस मौन को जीवित रखे हुए हैं। और शायद इसी मौन में हमारे समय का सबसे बड़ा उत्तर छिपा है।

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