उत्तराखण्ड के पहाड़ों में मनुष्य और जंगली जानवरों के बीच बढ़ता संघर्ष अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। जंगलों के सिमटने और भोजन की कमी के बीच भालू और गुलदार लगातार गांवों में उतर रहे हैं, जिससे गढ़वाल क्षेत्र के अधिकतर गांव दहशत में जीने को मजबूर हैं। एक महीने के भीतर भालू के हमलों में मौत, गम्भीर घायल, स्कूलों का बंद होना और ग्रामीणों का खेत-जंगल जाना तक बंद हो गया है जबकि वन विभाग अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है
शीतकाल की शुरुआत के साथ उत्तराखण्ड में मनुष्य और जंगली जानवरों के बीच संघर्ष एक बार फिर गम्भीर रूप ले चुका है। पहाड़ों में जंगल सिकुड़ रहे हैं, मानव बस्तियां तेजी से बढ़ रही हैं और वन्यजीवों के प्राकृतिक खाद्य स्रोत कम होते जा रहे हैं। इस असंतुलन के कारण भालू और गुलदार जैसे जानवर बार-बार ग्रामीण इलाकों तक पहुंच रहे हैं। सर्दियों में ऊंचाई वाले क्षेत्रों में भोजन की कमी, सड़क निर्माण से बढ़ता शोर और मैदानी इलाकों से पकड़े गए भालुओं को पहाड़ों में छोड़ने की सरकारी नीति, इन सबने हालात को और अधिक गम्भीर बना दिया है। नतीजा यह कि मानव-वन्यजीव संघर्ष अब गांवों की चौखट पर खड़ा है जहां लोग खेतों तक जाने और बच्चों को स्कूल भेजने से डर रहे हैं।
गढ़वाल क्षेत्र इस समय सबसे अधिक प्रभावित है। चमोली जिले में एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है जबकि कई लोग गम्भीर रूप से घायल हैं। उनका इलाज जिला अस्पतालों से लेकर एम्स ऋषिकेश में चल रहा है। ग्रामीणों के लगातार फोन, शिकायतों और जनप्रतिनिधियों की चेतावनियों के बावजूद वन विभाग अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठा पाया है। अब तक एक भी भालू न पकड़ा गया, न मार गिराया गया।
ग्रामवासी कहते हैं कि वन विभाग की गश्त केवल कागजी तौर पर दिखाई देती है। हमलों की लगातार बढ़ती घटनाओं के बाद मामला आखिरकार मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक पहुंचा। उन्होंने मुख्य वन संरक्षक को तुरंत और कठोर कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन अभी तक जमीन पर कुछ भी बड़ा कदम दिखाई नहीं देता।
अक्टूबर में जोशीमठ ब्लाॅक के डुमक गांव में पति-पत्नी पर भालू ने हमला किया था, जिसमें पति की मौत हो गई। पत्नी को हेलीकाॅप्टर से गोपेश्वर और फिर एम्स भेजना पड़ा। इस घटना को बदरीनाथ विधायक लखपत बुटोला ने 3 नवम्बर को विधानसभा के विशेष सत्र में उठाया, लेकिन शासन-प्रशासन ने गम्भीरता से नहीं लिया। परिणाम यह हुआ कि एक माह के भीतर गढ़वाल क्षेत्र के 80 प्रतिशत से अधिक गांव भालुओं के आतंक की गिरफ्त में आ गए हैं।
पौड़ी गढ़वाल के पौखड़ा ब्लाॅक में गुलदार के आतंक से 300 छात्र घरों में कैद रहे। 14 से 18 नवम्बर तक 12 स्कूल बंद करने पड़े। एक महिला की मृत्यु भी गुलदार के हमले में हुई, लेकिन वन विभाग इससे आगे कोई कदम नहीं उठा पाया।
19 नवम्बर को चमोली जिले के पोखरी ब्लाॅक के पाव गांव की 50 वर्षीय रामेश्वरी देवी घास लेने जंगल गई थीं। देर शाम तक घर न लौटने पर गांव वालों ने पुलिस और वन विभाग के साथ खोज शुरू की। खून के धब्बे और सामान मिलने के बाद अगले दिन सुबह उनका बेटा अजय साथियों के साथ खोज में निकला और जंगल में पेड़ के सहारे गम्भीर घायल मां को पाया। उन्हें हेलीकाॅप्टर से एम्स ऋषिकेश ले जाया गया, जहां उपचार जारी है।
टिहरी, उत्तरकाशी, पौड़ी और रुद्रप्रयाग, हर जगह भालू और गुलदार के हमले जारी हैं। उत्तरकाशी में तीन लोग घायल हुए, पौड़ी में लक्ष्मी देवी पर हमला हुआ जबकि कई क्षेत्रों में ग्रामीण बिना सुरक्षा के जंगल जाने को मजबूर हैं। लोग कहते हैं कि कई बार सूचना देने पर भी वन विभाग घंटों देर से पहुंचता है।
लगातार बढ़ती घटनाओं और सोशल मीडिया पर उभरते जनआक्रोश के बाद जनप्रतिनिधियों, बदरीनाथ विधायक लखपत बुटोला, पूर्व कैबिनेट मंत्री राजेंद्र भंडारी, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट और पर्यटन मंत्री सतपाल महाराज ने भी वन अधिकारियों से तुरंत कार्रवाई की मांग की है। लेकिन विभाग अभी गश्त और कागजी औपचारिकताओं से आगे नहीं बढ़ पाया है।
सीएम धामी ने कहा है कि आमजन की सुरक्षा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है। लेकिन गांवों में डर का माहौल बना हुआ है और ग्रामीण रात होते ही घरों में कैद हो जाते हैं।

