उत्तराखण्ड को ‘देवभूमि’ कहा जाता है, लेकिन यहां की राजनीतिक जमीन पर अगर दलित समाज की हिस्सेदारी की बात करें तो तस्वीर कुछ और ही नजर आती है। राज्य बनने के करीब ढाई दशक बाद भी दलित राजनीति न तो अपने स्वतंत्र स्वरूप में उभर पाई है और न ही मुख्यधारा की राजनीति में उसे पर्याप्त प्रतिनिधित्व मिला है। उत्तराखण्ड की जनसंख्या में दलित समुदाय लगभग 18-19 प्रतिशत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कुमाऊं और गढ़वाल दोनों क्षेत्रों में दलितों की उपस्थिति है, विशेषकर हरिजनों (जिन्हें अब अनुसूचित जाति कहा जाता है), कोली, पासी, डोम और वाल्मीकि समुदाय के लोगों की। सामाजिक-आर्थिक रूप से ये समुदाय लम्बे समय से पिछड़े हुए हैं और राजनीतिक दृष्टिकोण से भी वे प्रतिनिधित्व से वंचित रहे हैं। विधानसभा में समय-समय पर दलित विधायकों की उपस्थिति रही है लेकिन यह केवल आरक्षित सीटों तक सीमित रही। ये विधायक भी अक्सर अपनी पार्टी लाइन पर चलते हैं और दलित मुद्दों को लेकर स्वतंत्र आवाज नहीं उठाते
उपौराणिक सब पात्र तुम्हारे
आत्मनिष्ठ अब मात्र तुम्हारे
दिशाभ्रमित सब छात्र तुम्हारे
सुनो गुमानी!
बामण बनिए कब थे कंगले
कब बन गए चमार के बंगले
तू जैसे चाहे वैसे रंग ले
चित्र नहीं ये आम गुमानी।
औरत सर पर नहीं चढ़ाओ
बगल में डुमड़ा नहीं बिठाओ
लेसिंगटनख्14, सलाम गुलामी।
सुनो गुमानी!
तुम जो चाहे वही हो गया
अंग्रेज गया, सब सही हो गया
दूध सड़कर, दही हो गया,
छलकाओ अब जाम गुमानी।
उत्तराखण्ड के प्रथम कवि माने जाने वाले लोकरत्न गुमानी की कविता की ये पंक्तियां उत्तराखण्ड के पितृसत्तात्मक और सवर्णवादी मानसिकता के उस दौर की सच्चाई को एक हद तक सामने लाती हैं जब का समाज आज के दौर की तरह कथित रूप से आधुनिक नहीं था। दलित और स्त्रियों के विमर्श की चर्चा हर दौर में होती जरूर है लेकिन क्या इस विमर्श से दलितों और स्त्रियों की दशा में कुछ बदलाव लाया? शायद नहीं। 14 अप्रैल को जिस भव्यता के साथ पूरा देश डाॅ. भीमराव अम्बेडकर की जयंती मनाता दिखा है उससे लगता है कि वर्तमान में विमर्श के केंद्र में दलित ही हैं लेकिन क्या जमीनी हकीकत यही है? राजनीति में दलित और उभार की बात करें तो दलित नेता समाज के नेता कम, राजनीतिक सौदागर ज्यादा नजर आते हैं। तो क्या इस वक्त विमर्श केे केंद्र में होने के बावजूद दलित राजनीति हाशिए पर है? भारत और उत्तराखण्ड के परिपेक्ष्य में देखें तो ये एक हद तक सही भी लगता है कि भले ही विमर्श की धुरी कें केंद्र में लट्टू की तरह दलित हो लेकिन उसे खींच के नचाने वाली डोर उन लोगों के हाथों में है जो उसे स्वतंत्र समाज के रूप में नहीं देखना चाहते। शायद यही कारण है कि समाज का अहम अंग होने के बावजूद आज भी निर्णय लेने की प्रक्रिया में उसकी भागेदारी कहीं नजर नहीं आती। खासकर राजनीतिक निर्णयों में उसकी भागीदारी शून्य है। हां, दलित उत्थान का श्रेय लेना हर कोई राजनीतिक दल चाहता है लेकिन दलित नेतृत्व को केंद्र में लाकर उसे निर्णयों में भागीदारी देने से परहेज करता है। कांग्रेस के पूर्व राज्यसभा सांसद प्रदीप टम्टा का कहना है कि ‘दलित राजनीति ही नहीं इस वक्त दलित समाज ही हाशिए पर है।’ हालांकि राजनीतिक प्रतिबद्धताओं के चलते राजनीतिक दलों से जुड़े नेता इस बात से नाइत्तेफाकी भी रखते हैं कि उत्तराखण्ड में दलित राजनीति हाशिए पर है।
दलित समाज से आने वाले बहुत से नेता हैं। यशपाल आर्य, खजानदास, प्रदीप टम्टा इसके उदाहरण हैं। मैं स्वयं शिल्पकार समाज से आता हूं। हां, इतना जरूर है कि कुछ लोगों को छोड़कर राज्य स्तर का दलित नेतृत्व उभर नहीं पाया। नेतृत्व राजनीतिक पार्टियां ही निकालती हैं। अपने बड़े नेता होने का कोई कितना ही दावा कर ले लेकिन राजनीतिक दल ही ऐसे नेतृत्व की खोज आगे बढ़ा सकते हैं। क्षमतावान लोग हर समाज में होते हैं उन क्षमताओं को उभारने का काम राजनीतिक दलों का है। राजनीतिक दलों को भी उन नेताओं का उपयोग समाज के हित में करना चाहिए, न कि सिर्फ कोटा पूरा करने के लिए। ये सिर्फ दलित समाज ही नहीं समाज के हर वर्ग के लिए पैमाना होना चाहिए।
अजय टम्टा, सड़क परिवहन राज्यमंत्री, भारत सरकार
उत्तराखण्ड की बात करें तो आज के दौर में दलित नेताओं के बीच कोई ऐसा बड़ा चेहरा नहीं आता जो दलितों के एक मात्र प्रतिनिधि होने का दावा कर सके। उत्तराखण्ड में दलित आबादी लगभग 20 प्रतिशत के आस-पास मानी जाती है। उत्तराखण्ड का जातिगत समीकरण देखें तो यहां 25 प्रतिशत ब्राह्माण, 35 प्रतिशत राजपूत और 18 प्रतिशत दलित शेष अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग और मुस्लिम हैं। ऊधमसिंह नगर, हरिद्वार और अल्मोड़ा जिलों में दलित आबादी अन्य जिलों की तुलना में अधिक है। उत्तराखण्ड दलित आबादी में शिल्पकार और सीमांत किसान ज्यादा है। हालांकि पहाड़ी और मैदानी इलाकों में परिस्थितियां अलग-अलग है। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद 13 विधानसभा सीटें दलितों के लिए आरक्षित हैं।
पूर्व राज्यसभा सांसद व कांग्रेस नेता प्रदीप टम्टा का कहना है कि दलित राजनीति के हाशिए पर होने की बात एकदम तो नहीं कह सकते क्योंकि कांग्रेस ने यशपाल आर्य को नेता प्रतिपक्ष बनाकर दलित राजनीति को एक ताकत दी है लेकिन इतना जरूर है कि दलित प्रश्न हाशिए पर जरूर चले गए हैं। भाजपा सरकार बनने के बाद दलितों की समस्याओं में इजाफा हुआ है। रोस्टर के चलते सरकारी पदों में दलित संख्या प्रभावित हो रही है। प्रमोशन रोक दिए गए है, जमीन के पट्टों से दलितों को बेदखल करने का प्रयास चल रहा है। प्रदेश में सफाई कर्मचारियों के अधिकार, मंदिर प्रवेश, जातिगत भेदभाव, आरक्षण के पालन की निगरानी जैसे मुद्दे बार-बार उठते रहे हैं, लेकिन इन्हें कोई ठोस राजनीतिक मंच नहीं मिला। राज्य सरकारों ने भी इस दिशा में कोई ठोस नीति नहीं बनाई।
प्रदीप टम्टा, पूर्व राज्य सभा सांसद व कांग्रेस नेता
उत्तराखण्ड की दलित जातियां ही उत्तराखण्ड की मूल जातियां हैं बाकी सवर्ण जातियां यहां विभिन्न प्रांतों से आकर बसी हैं लेकिन समय के साथ बाहर से आई उच्च जातियों का वर्चस्व यहां हो गया। सवर्ण जातियों के चलते यहां की मूल जातियां निचले स्तर की ओर धकेल दी गईं जिनका काम सवर्णों के खेतों में काम करना, खेती के लिए औजार बनाना तथा अन्य शिल्प रह गया। यहां दलित ही सर्वाधिक भूमिहीन हैं। उत्तराखण्ड में शोषण के खिलाफ दलितों के आंदोलन भी हुए। ये आंदोलन राजनीतिक न होकर सामाजिक भेदभाव के खिलाफ ज्यादा थे। 1920 में रामगढ़ में खुशीराम के नेतृत्व में दलितों के विवाह में डोला-पालकी के इस्तेमाल की मनाही के विरुद्ध एक आंदोलन हुआ जिसमें सवर्णों के फरमान को नकार कर डोला-पालकी में बारात ले जाई गई। इसी प्रकार 1923 में गढ़वाल में जयानंद भारती के नेतृत्व में दलितों के डोला-पालकी पर प्रतिबंध खिलाफ आवाज उठाई गई थी। कुलीबेगार प्रथा भी अंग्रेजों के विरुद्ध सवर्णों का आंदोलन था। दलित इससे दूर रहे क्योंकि जिस कुलीबेगार का सवर्ण अंग्रेजों से विरोध कर रहे थे उसी कुलीबेगार के शिकार दलित थे क्योंकि सवर्ण भी उनसे कुलीबेगार कराते थे। समय के साथ सांसद-विधायक के रूप में दलित नेता लोकसभा, विधानसभा में तो चुनकर गए लेकिन वो दलितों की आवाज नहीं बन सके। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद 13 विधानसभा सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित रखी गईं लेकिन उन विधायकों में ऐसा कोई बड़ा नेता नहीं था सिवाय यशपाल आर्य और प्रदीप टम्टा को छोड़कर। उत्तराखण्ड राज्य बनने के बाद यशपाल आर्य जरूर एक मजबूत दलित नेता नजर आए लेकिन 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद उत्तराखण्ड की राजनीतिक परिस्थितियों के चलते उनका कद बढ़ा नहीं।
दलित राजनीति हाशिए पर है, कहना उचित नहीं है। कांग्रेस ही नहीं पूरे उत्तराखण्ड में दलित नेताओं की एक लम्बी सूची है। जहां तक कांग्रेस की बात करें तो दलित हमेशा कांग्रेस के एजेंडे में रहा है। कमजोर, शोषित और वंचित वर्ग की बात कांग्रेस हमेशा से करती रही है। आज हम जिस भाजपा युग में जी रहे हैं उसमें सबसे ज्यादा उत्पीड़न दलित और वंचित तबके का हो रहा है। जो तबका हाशिए पर है उससे सामाजिक समरसता की बात जरूर कही जा रही है लेकिन हो इसके उलट रहा है। कल्याणकारी योजनाओं में कटौती हो रही है। आरक्षण को कम किया जा रहा है। आरक्षित पदों में पदोन्नति बंद है। कमजोर वर्ग को हाशिए पर धकेला जा रहा है। संवैधानिक समस्याओं को भाजपा कमजोर कर रही है। दलित नेतृत्व की आप बात कर रहे हैं तो हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे दलित वर्ग से आते हैं। मुझे कांग्रेस ने उत्तराखण्ड में नेता प्रतिपक्ष का दायित्व दिया है। राहुल गांधी ने हमेशा वंचित समाज, दलित और महिलाओं की बात की है। उत्तराखण्ड में दलित राजनीति के कमजोर होने का सवाल ही पैदा नहीं। मैंने हमेशा दलित समाज की आवाज को विधानसभा और विधानसभा से बाहर मुखरता से उठाया है। विधानसभा की कार्यवाई में उसे आप देख सकते हैं। हां, आपको दलित राजनीति में दूसरी पंक्ति के नेताओं की कमी की बात सही कही। मैं भी इस बात को महसूस करता हूं। जैसी परिस्थितियां पैदा की जा रही हैं उसके लिए जरूरी है कि नया नेतृत्व उभरे जो दलितों की मजबूत आवाज बन सके। सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों को इस विषय पर पहल करनी चाहिए।
यशपाल आर्य, नेता प्रतिपक्ष, उत्तराखण्ड
आर्य उत्तराखण्ड के सबसे बड़े दलित चेहरों में से एक हैं। वे विधानसभा अध्यक्ष, कैबिनेट मंत्री और भाजपा-कांग्रेस दोनों ही पार्टियों में उन्होंने शीर्ष पद सम्भाले। लेकिन आलोचकों का मानना है कि उन्होंने कभी भी एक स्पष्ट दलित एजेंडे के तहत काम नहीं किया। उन्होंने दलितों की सामूहिक चेतना को राजनीतिक ताकत में नहीं बदला। इस मुद्दे पर यशपाल आर्य का तर्क है कि उन्होंने कभी भी जाति आधारित राजनीति नहीं की है।
देवभूमि में दलित नेताओं के उभर न पाने का कारण नेताओं की अपने राजनीतिक दलों के प्रति प्रतिबद्धता ज्यादा रही जो पार्टी अनुशासन के चलते अपने समाज में अपना कद नहीं बना पाए। हरिप्रसाद टम्टा और खुशीराम आर्य आजादी से पहले दलितों को अधिकार दिलाने में अग्रणी रहे थे। जिस प्रकार की आवाज उन्होंने दलितों के लिए उठाई आज उनके कद के नेता दलित समाज में आज नजर नहीं आते। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि 2017 तक यशपाल आर्य जरूर दलित राजनीति के जरिए अपना खासा दखल रखते थे। 2012 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस ने उनके अध्यक्ष रहते ही जीता था। लेकिन अब आर्या भी दलित मुद्दों से दूर हो चले हैं।
इस वक्त उत्तराखण्ड में यशपाल आर्य के अलावा कोई नया बड़ा दलित नेता उभर कर सामने नहीं आया है। कांग्रेस के अंदर दलित में कोई लीडरशिप उभर नहीं पा रही है। कांग्रेस ही नहीं भारतीय जनता पार्टी में भी कोई प्रभावी दलित चेहरा नहीं है। नई लीडरशिप नहीं उभर पाने का एक कारण दलित वोटों में बिखराव भी एक कारण है जिस कारण आरक्षित सीट पर दलित प्रत्याशी ने ही जीतना है लेकिन योग्य नेतृत्व नहीं उभर पा रहा है।
प्रो. जीतराम, थराली से पूर्व विधायक व कांग्रेस नेता
पूर्व आप नेता और सामाजिक कार्यकर्ता हरीश आर्य मानते हैं कि ‘उत्तराखण्ड ही नहीं पूरे भारत में दलित राजनीति हाशिए पर है। भले ही दलित विमर्श के केंद्र में हों लेकिन सिर्फ वोट पाने के लिए। राजनीतिक दल खासकर कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को दलित वोट तो चाहिए लेकिन मजबूत दलित नेताओं से उन्हें परहेज है। उत्तराखण्ड में आरक्षित क्षेत्रों से चुने गए नेता जीतने के बाद बड़े राजनीतिज्ञ तो बन गए लेकिन दलित समाज के लिए बोलने से संकोच कर रहे हैं क्योंकि दलितों के पक्ष में मुखर होने से उनकी राजनीति और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं बाधित होती हैं। आरिक्षत सीटों में राजनीतिक दल इन्हें इसी पैरामीटर से प्रत्याशी बनाते हैं ताकि इनका अपने समाज की चेतना से कोई वास्ता न हो। हालांकि अब समाज में जागरूकता आई है लेकिन राजनीतिक दलों की दलित या कहें शिल्पकार समाज के प्रति उदासीनता ने नया नेतृत्व उभरने नहीं दिया और जो नेता बने भी वो अपनी पार्टी के दायरे से बाहर निकलकर समाज की ओर देख नहीं पाए।’
ये नहीं कह सकते कि उत्तराखण्ड में दलित राजनीति हाशिए पर है। मुझ जैसे साधारण कार्यकर्ता को पार्टी ने आज सम्मान की स्थिति में पहुंचाया है। कांगे्रेस ने दलितों पर सिर्फ राजनीति की है उससे आगे बढ़कर उसने दलितों को कुछ दिया नहीं।
खजान दास, विधायक और भाजपा नेता
नए नेतृत्व का अभाव और सामाजिक चेतना की कमी
दलित समाज में उत्तराखण्ड में वह जागरूकता और संगठन नहीं बन पाया जो उत्तर प्रदेश या महाराष्ट्र जैसे राज्यों में देखने को मिलता है। डाॅ. अम्बेडकर की विचारधारा से जुड़ी संस्थाएं और बहुजन आंदोलन यहां कमजोर रहे हैं। न बीएसपी जैसी कोई दलित केंद्रित पार्टी न तो राजनीतिक ताकत बन पाई, न ही स्थानीय नेतृत्व उभर सका। राजनीतिक जागरूकता का सीधा सम्बंध शिक्षा और सामाजिक चेतना से होता है। प्रदेश में दलित समुदाय में अभी भी शिक्षा का स्तर अपेक्षाकृत कम है, खासकर ग्रामीण इलाकों में। सामाजिक संगठनों को इस दिशा में प्रयास तेज करने होंगे ताकि दलित समाज अपने अधिकारों के लिए संगठित और जागरूक हो।
आज उत्तराखण्ड में दलित समाज की राजनीति का संकट यह भी है कि किसी भी राजनीतिक दल में इस समाज की दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व दूर-दूर तक नजर नहीं आता। दलित समाज में नए नेतृत्व के बारे कांशीराम ने कहा था कि ‘राजनीतिक दल आपके लिए नेतृत्व तैयार करेंगे भूल जाएं। वो अपनी पार्टी के लिए नेता पैदा करेंगे, समाज के लिए नहीं। इसलिए दलित समाज में अपना नेता पैदा करने की कवायद निरंतर चलती रहनी चाहिए। उत्तराखण्ड में दलित राजनीति, राजनीतिक दलों की सीमाओं में ही कैद होकर रह गई है। शायद इसी कारण नया दलित नेतृत्व उभर नहीं पाने के कारण उसकी राजनीति का हाशिए पर जाना लाजिमी है।
बात अपनी-अपनी
राजनेता दलित वोटों के लिद दिन-रात एक कर रहे हैं इसलिए दलित राजनीति हाशिए पर है, कहना उचित नहीं होगा। हां, दलित नेता हाशिए पर जरूर हैं क्योंकि सरकारों के निर्णय लेने की प्रक्रिया में न उनकी भागीदारी है, अगर भागीदारी है भी तो वो उसे ज्यादा प्रभावित करने की स्थिति में नहीं हैं। आज की राजनीति में क्या कोई नेता अपनी स्वतंत्र सोच विकसित करने की स्थिति में है? क्योंकि राजनीति का आधार जो कि विकास होना चाहिए था, शिक्षा के स्तर में सुधार और स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होना चाहिए था लेकिन अब सिर्फ जीत राजनीति का आधार है तो किसी भी वर्ग में नए राजनेता के उभरने की उम्मीद कैस कर सकते हैं? अब हर कोई अम्बेडकर तो हो नहीं सकता जिन्होंने महिलाओं और वंचित वर्ग के कल्याण के लिए अपना मंत्री पद त्याग दिया था। समाज का नेता बनने के लिए त्याग की भावना चाहिए, न कि सत्ता का लालच। क्या दलित समाज के किसी नेता ने अपना इतना बड़ा कद बनाया है कि वो आरक्षित सीट छोड़कर अनारक्षित सीट से चुनाव लड़ सके? आरक्षित सीट से चुनाव जीतकर सांसद या विधायक तो बन सकते हैं किन समाज के नेता नहीं।
डाॅ. जगदीश प्रसाद, पूर्व उच्च शिक्षा निदेशक और शिक्षाविद, उत्तराखण्ड
दलित राजनीति अगर हाशिए में है तो उसके लिए नेताओं को दोष नहीं दे सकते क्योंकि हमारा सामाजिक तानाबाना ही ऐसा है कि सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर जो भेदभाव है उसमें दलित समाज क्या तय कर सकता है? सामान्य सीट पर तो सामान्य वर्ग का मतदाता निर्णायक है लेकिन आरक्षित सीट पर भी निर्णायक सामान्य मतदाता ही है। वहां पर उसकी पसंद का उम्मीदवार जीतता है। अगर कोई दलित योग्य उम्मीदवार सामान्य वर्ग के मतदाताओं को पसंद नहीं है तो वो जीत ही नहीं सकता। तो इसलिए आप स्वतंत्र पहचान की सोच ही नहीं सकते। दलित समाज की राजनीति के ड्राइवर राजनीतिक दल ही हैं दलित नहीं। राजनीतिक दलों के पास विकल्प मौजूद हैं अगर कोई स्वतंत्र पहचान बनाने की कोशिश करेगा तो वो एक नया नेता खड़ा कर देंगे तो विभाजित समाज में आप एक सक्षम नेतृत्व की उम्मीद कर ही नहीं सकते। राजनीति में चेक और बैलेंस भी काम करता है। राजनीतिक दल चाहते हैं कि कोई दलित नेता उतना ही बोले जितने से उसका बहुसंख्यक वोट प्रभावित न हो।
डाॅ. संजय टम्टा, प्रोफेसर, कुमाऊं विश्वविद्यालय नैनीताल


दलित समाज से आने वाले बहुत से नेता हैं। यशपाल आर्य, खजानदास, प्रदीप टम्टा इसके उदाहरण हैं। मैं स्वयं शिल्पकार समाज से आता हूं। हां, इतना जरूर है कि कुछ लोगों को छोड़कर राज्य स्तर का दलित नेतृत्व उभर नहीं पाया। नेतृत्व राजनीतिक पार्टियां ही निकालती हैं। अपने बड़े नेता होने का कोई कितना ही दावा कर ले लेकिन राजनीतिक दल ही ऐसे नेतृत्व की खोज आगे बढ़ा सकते हैं। क्षमतावान लोग हर समाज में होते हैं उन क्षमताओं को उभारने का काम राजनीतिक दलों का है। राजनीतिक दलों को भी उन नेताओं का उपयोग समाज के हित में करना चाहिए, न कि सिर्फ कोटा पूरा करने के लिए। ये सिर्फ दलित समाज ही नहीं समाज के हर वर्ग के लिए पैमाना होना चाहिए।
पूर्व राज्यसभा सांसद व कांग्रेस नेता प्रदीप टम्टा का कहना है कि दलित राजनीति के हाशिए पर होने की बात एकदम तो नहीं कह सकते क्योंकि कांग्रेस ने यशपाल आर्य को नेता प्रतिपक्ष बनाकर दलित राजनीति को एक ताकत दी है लेकिन इतना जरूर है कि दलित प्रश्न हाशिए पर जरूर चले गए हैं। भाजपा सरकार बनने के बाद दलितों की समस्याओं में इजाफा हुआ है। रोस्टर के चलते सरकारी पदों में दलित संख्या प्रभावित हो रही है। प्रमोशन रोक दिए गए है, जमीन के पट्टों से दलितों को बेदखल करने का प्रयास चल रहा है। प्रदेश में सफाई कर्मचारियों के अधिकार, मंदिर प्रवेश, जातिगत भेदभाव, आरक्षण के पालन की निगरानी जैसे मुद्दे बार-बार उठते रहे हैं, लेकिन इन्हें कोई ठोस राजनीतिक मंच नहीं मिला। राज्य सरकारों ने भी इस दिशा में कोई ठोस नीति नहीं बनाई।
दलित राजनीति हाशिए पर है, कहना उचित नहीं है। कांग्रेस ही नहीं पूरे उत्तराखण्ड में दलित नेताओं की एक लम्बी सूची है। जहां तक कांग्रेस की बात करें तो दलित हमेशा कांग्रेस के एजेंडे में रहा है। कमजोर, शोषित और वंचित वर्ग की बात कांग्रेस हमेशा से करती रही है। आज हम जिस भाजपा युग में जी रहे हैं उसमें सबसे ज्यादा उत्पीड़न दलित और वंचित तबके का हो रहा है। जो तबका हाशिए पर है उससे सामाजिक समरसता की बात जरूर कही जा रही है लेकिन हो इसके उलट रहा है। कल्याणकारी योजनाओं में कटौती हो रही है। आरक्षण को कम किया जा रहा है। आरक्षित पदों में पदोन्नति बंद है। कमजोर वर्ग को हाशिए पर धकेला जा रहा है। संवैधानिक समस्याओं को भाजपा कमजोर कर रही है। दलित नेतृत्व की आप बात कर रहे हैं तो हमारे राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे दलित वर्ग से आते हैं। मुझे कांग्रेस ने उत्तराखण्ड में नेता प्रतिपक्ष का दायित्व दिया है। राहुल गांधी ने हमेशा वंचित समाज, दलित और महिलाओं की बात की है। उत्तराखण्ड में दलित राजनीति के कमजोर होने का सवाल ही पैदा नहीं। मैंने हमेशा दलित समाज की आवाज को विधानसभा और विधानसभा से बाहर मुखरता से उठाया है। विधानसभा की कार्यवाई में उसे आप देख सकते हैं। हां, आपको दलित राजनीति में दूसरी पंक्ति के नेताओं की कमी की बात सही कही। मैं भी इस बात को महसूस करता हूं। जैसी परिस्थितियां पैदा की जा रही हैं उसके लिए जरूरी है कि नया नेतृत्व उभरे जो दलितों की मजबूत आवाज बन सके। सामाजिक संगठनों और बुद्धिजीवियों को इस विषय पर पहल करनी चाहिए।
इस वक्त उत्तराखण्ड में यशपाल आर्य के अलावा कोई नया बड़ा दलित नेता उभर कर सामने नहीं आया है। कांग्रेस के अंदर दलित में कोई लीडरशिप उभर नहीं पा रही है। कांग्रेस ही नहीं भारतीय जनता पार्टी में भी कोई प्रभावी दलित चेहरा नहीं है। नई लीडरशिप नहीं उभर पाने का एक कारण दलित वोटों में बिखराव भी एक कारण है जिस कारण आरक्षित सीट पर दलित प्रत्याशी ने ही जीतना है लेकिन योग्य नेतृत्व नहीं उभर पा रहा है।
ये नहीं कह सकते कि उत्तराखण्ड में दलित राजनीति हाशिए पर है। मुझ जैसे साधारण कार्यकर्ता को पार्टी ने आज सम्मान की स्थिति में पहुंचाया है। कांगे्रेस ने दलितों पर सिर्फ राजनीति की है उससे आगे बढ़कर उसने दलितों को कुछ दिया नहीं।