देहरादून के जिलाधिकारी सविन बंसल
भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था को अक्सर जड़, असंवेदनशील और नियमों की कठोर जकड़न में बंधी हुई कहा जाता है लेकिन इसी व्यवस्था के भीतर समय-समय पर ऐसे अफसर भी सामने आते रहे हैं जिन्होंने साबित किया कि यदि इच्छाशक्ति हो तो नौकरशाही जनता की सबसे बड़ी ताकत बन सकती है। टी.एन. शेषन ने चुनाव आयोग को नई पहचान दी, एस.आर. शंकरन ने दलित अधिकारों के लिए सत्ता से टकराव मोल लिया और कन्नन गोपीनाथन ने व्यवस्था की सीमाओं पर सवाल उठाए। उत्तराखण्ड कैडर के आईएफएस अधिकारी संजीव चतुर्वेदी भी इसका बड़ा उदाहरण हैं जिन्होंने भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए कई बार सिस्टम से टकराव मोल लिया। ऐसे अफसर इस बात की याद दिलाते हैं कि पद से बड़ा कर्तव्य होता है। देहरादून के वर्तमान जिलाधिकारी सविन बंसल का कामकाज भी इसी परम्परा की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में देखा जा रहा है जहां जिलाधिकारी का दफ्तर सत्ता का नहीं बल्कि आम आदमी के न्याय और भरोसे का केंद्र बनता दिखाई देता है


लोकतंत्र में प्रशासन की असली कसौटी तब होती है जब वह नियमों और संवेदनशीलता के बीच संतुलन बना सके। जिला प्रशासन इस व्यवस्था की वह इकाई है जहां सरकार और नागरिक आमने-सामने होते हैं। यही वह बिंदु है जहां से जनता का भरोसा बनता या टूटता है। वर्षों से यह शिकायत रही है कि जिलाधिकारी का दफ्तर आम आदमी के लिए दूर, डरावना और जटिल होता जा रहा है। फाइलें चलती हैं, आदेश निकलते हैं लेकिन जमीनी हकीकत में बदलाव नहीं दिखता।

ऐसे माहौल में यदि कोई जिलाधिकारी यह साबित कर दे कि प्रशासनिक पद जनता की समस्या सुलझाने का औजार बन सकता है तो यह सामान्य घटना नहीं रह जाती। उत्तराखण्ड में आईएएस अधिकारी सविन बंसल का कार्यकाल इसी वजह से चर्चा में रहा है। उन्होंने न केवल प्रशासनिक प्रक्रियाओं को तेज किया बल्कि यह संदेश भी दिया कि जिला प्रशासन का मूल उद्देश्य जनता की सेवा और न्याय है।

महज 15 महीनों के कार्यकाल में सविन बंसल ने जिस तरह जनसुनवाई को सक्रिय और प्रभावी बनाया उसने वर्षों से चली आ रही औपचारिकता की परम्परा को तोड़ा है। जनसुनवाई पहले भी होती थी, लेकिन वह अक्सर एक औपचारिक अभ्यास बनकर रह जाती थी जहां शिकायतें दर्ज तो होती थीं पर समाधान का इंतजार लम्बा होता था। सविन बंसल के कार्यकाल में जनसुनवाई केवल सुनने का मंच नहीं बल्कि समाधान का केंद्र बन उभर रही है।

देहरादून कलेक्ट्रेट परिसर में आयोजित जनसुनवाई के आंकड़े खुद इसकी गवाही देते हैं। मात्र 15 महीनों में लगभग ढाई हजार शिकायतें सामने आईं। इनमें भूमि विवाद, अवैध कब्जे, बैंक उत्पीड़न, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ अन्याय, सरकारी विभागों की लापरवाही और निजी संस्थानों की मनमानी जैसे मामले शामिल थे। इन शिकायतों में से करीब 80 प्रतिशत मामलों का निस्तारण किया गया है। यह प्रतिशत केवल आंकड़ा नहीं बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति का संकेत है।

जनसुनवाई के दौरान यह भी सामने आया है कि अनेक मामले ऐसे थे जिनका समाधान पुलिस, तहसील या स्थानीय प्रशासन स्तर पर वर्षों पहले हो जाना चाहिए था। लेकिन सरकारी तंत्र की सुस्ती और जवाबदेही की कमी के कारण लोग वर्षों तक दफ्तरों के चक्कर काटते रहे। जिलाधिकारी स्तर पर हस्तक्षेप होते ही इन मामलों में तेजी आई। इससे यह सवाल भी खड़ा होता है कि निचले स्तर पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

राजपुर क्षेत्र की 97 वर्षीय बुजुर्ग महिला लीला देवी का मामला प्रशासनिक उदासीनता का प्रतीक बन चुका था। वर्ष 1988 में उन्होंने अपनी भूमि गैस एजेंसी के गोदाम के लिए लीज पर दी थी। लीज की अवधि समाप्त होने के बाद भी न तो जमीन खाली कराई गई और न ही उन्हें उचित किराया मिला। वर्षों तक महिला प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर काटती रहीं। जनसुनवाई में मामला सामने आते ही जिलाधिकारी ने तत्काल जांच के आदेश दिए। जांच में तथ्य सही पाए जाने पर जमीन खाली कराकर महिला को कब्जा दिलाया गया। यह कार्रवाई प्रशासन के मानवीय चेहरे की मिसाल बनी।

इसी तरह बैंक प्रबंधन द्वारा आम नागरिकों, विशेषकर महिलाओं को परेशान करने के कई मामले सामने आए। डीबीएस बैंक से जुड़ा एक मामला खास तौर पर उल्लेखनीय रहा। जिलाधिकारी द्वारा कई बार आदेश दिए जाने के बावजूद बैंक प्रबंधन ने महिला की समस्या का समाधान नहीं किया। अंततः 18 जून 2025 को देहरादून के क्राॅस माॅल रोड स्थित डीबीएस बैंक शाखा की चल सम्पत्ति कुर्क कर शाखा को सील कर दिया गया। इस कार्रवाई के बाद बैंक प्रबंधन झुका और महिला को न्याय मिला। यह कदम बैंकिंग सेक्टर के लिए भी एक स्पष्ट संदेश था कि उपभोक्ताओं के अधिकारों की अनदेखी अब स्वीकार्य नहीं होगी।

बैंक आॅफ बड़ौदा से जुड़ा एक अन्य मामला भी सामने आया, जिसमें ऋण और बीमा से सम्बंधित  अनियमितताओं के कारण मृतक के परिजनों को परेशान किया जा रहा था। जांच में बैंक प्रबंधन की लापरवाही उजागर हुई और जिलाधिकारी के निर्देश पर कार्रवाई करते हुए बैंक को भुगतान करना पड़ा। इसी तरह बुजुर्ग परमजीत सिंह के मामले में सम्पत्ति विवाद में प्रशासनिक हस्तक्षेप से उन्हें राहत मिली।

बुजुर्गों के उत्पीड़न के मामलों पर सविन बंसल की संवेदनशीलता विशेष रूप से उल्लेखनीय है। देहरादून में ऐसे कई मामले सामने आए जहां सम्पत्ति के लालच में माता-पिता को प्रताड़ित किया गया या घर से बेदखल कर दिया गया। जनसुनवाई में इन मामलों पर त्वरित कार्रवाई करते हुए न केवल बुजुर्गों को उनके घरों में सुरक्षित रहने की व्यवस्था कराई गई बल्कि दोषियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने के आदेश भी दिए गए। इससे बुजुर्ग नागरिकों में यह भरोसा जगा कि प्रशासन उनके साथ खड़ा है।

सरकारी भूमि पर अवैध कब्जों के खिलाफ भी जिलाधिकारी सख्त रुख अपना रहे हैं। उनके द्वारा भूमि कानून लागू होने के बाद बड़े पैमाने पर कार्रवाई करते हुए 900 बीघा से अधिक भूमि सरकार में निहित कराई जा रही है। इसके अलावा 75 से अधिक मामलों में कार्रवाई की प्रक्रिया जारी है। यह कार्रवाई केवल छोटे कब्जेदारों तक सीमित नहीं रही बल्कि प्रभावशाली लोगों और संस्थाओं के खिलाफ भी की गई। इससे यह संदेश गया कि कानून सबके लिए समान है।

सरकारी विभागों की लापरवाही और भ्रष्टाचार पर भी प्रशासनिक सख्ती सविन बंसल की प्राथमिकताओं में शामिल है। घटिया राशन, मिलावटी चावल, सरकारी गोदामों में अनियमितता, शराब की दुकानों में नियम उल्लंघन जैसे मामलों में सम्बंधित अधिकारियों के खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणी, वेतन रोकना और जांच के आदेश इसमें शामिल हैं। यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अक्सर प्रशासन अपने ही विभागों पर कार्रवाई करने से बचता रहा है।

स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी जिलाधिकारी सक्रिय, देहरादून जिले के 12 सरकारी अस्पतालों का उनके द्वारा निरीक्षण किया गया है। निरीक्षण के दौरान डाॅक्टरों की अनुपस्थिति, लैब सुविधाओं की कमी, दवाओं की अनुपलब्धता और टीकाकरण में अनियमितताएं सामने आईं। इन खामियों को दूर करने के लिए स्पष्ट निर्देश जारी किए गए और जवाबदेही तय की गई। निजी अस्पतालों द्वारा सरकारी सुविधाओं के बावजूद मरीजों को महंगे अस्पतालों में रेफर करने की प्रवृत्ति पर भी रोक लगाने का प्रयास किया गया।

स्मार्ट सिटी परियोजनाओं और सड़क खुदाई के मामलों में भी पहले की उदासीनता को समाप्त करने की कोशिश भी डीएम कर रहे हैं। गैस पाइप लाइन बिछाने के नाम पर बार-बार सड़कों की खुदाई से आम जनता को भारी परेशानी होती है। जिलाधिकारी द्वारा इस पर सख्ती दिखाते हुए नियमों के उल्लंघन पर कार्रवाई की गई और कई अनुमतियां रद्द की गईं। इससे शहर की बुनियादी संरचना को नुकसान से बचाया जा सका है।

शिक्षा क्षेत्र में सुभारती मेडिकल काॅलेज का मामला प्रशासनिक सख्ती का बड़ा उदाहरण बन उभरा है। काॅलेज पर 87 करोड़ 50 लाख रुपए की वसूली का वारंट जारी कर यह स्पष्ट किया गया कि चाहे संस्था कितनी ही बड़ी क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है। छह वर्षों तक 300 छात्रों से शुल्क वसूलने के बावजूद ढांचा विकसित न करने और हाईकोर्ट के आदेशों की अवहेलना करने के मामले में यह कार्रवाई ऐतिहासिक मानी जा रही है।

उल्लेखनीय है कि हरियाणा मूल के 2009 बैच के आईएएस अधिकारी सविन बंसल ने मात्र 25 वर्ष की उम्र में सिविल सेवा में चयनित होकर 31वीं रैंक हासिल की थी। आईआईटी रुड़की से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक, बैच टाॅपर और गोल्ड मेडलिस्ट रहे बंसल ने यूनिवर्सिटी काॅलेज लंदन से रिस्क एंड रेजिलिएंस में अध्ययन किया। यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उनके प्रशासनिक निर्णयों में दीर्घकालिक सोच और सिस्टम आधारित दृष्टिकोण को दर्शाती है।

2012 से 2022 के बीच उन्हें कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। संयुक्त राष्ट्र के मंचों पर चयन, ब्रिटेन में सतत विकास लक्ष्यों से जुड़े सम्मेलनों में प्रतिनिधित्व और विभिन्न विषयों पर उत्कृष्ट योगदान के लिए मिले सम्मान उनकी प्रशासनिक क्षमता को रेखांकित करते हैं।

सविन बंसल की कार्यशैली यह दिखाती है कि नौकरशाही केवल आदेश देने और फाइलें निपटाने की व्यवस्था नहीं है। यदि अफसर चाहें तो यह व्यवस्था न्याय, संवेदनशीलता और जवाबदेही का सबसे मजबूत औजार बन सकती है। संजीव चतुर्वेदी जैसे अफसरों की परम्परा में सविन बंसल का काम यह भरोसा जगाता है कि सिस्टम के भीतर रहकर भी बदलाव सम्भव है।

जब आम नागरिक का भरोसा व्यवस्था से लगातार कमजोर होता जा रहा हो, ऐसे समय में ऐसे अफसर यह साबित करते हैं कि नौकरशाही का मानवीय चेहरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। यही वजह है कि सविन बंसल का कार्यकाल केवल प्रशासनिक उपलब्धियों का नहीं बल्कि जनता के भरोसे की बहाली की कहानी भी बनता है।

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