देश की न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति अब तक सुप्रीम कोर्ट काॅलेजियम करता आया है। लेकिन जिस तरह दिल्ली हाईकोर्ट के एक जज के घर कथित तौर पर नकदी मिलने की बात सामने आई है और इसी का परिणाम है कुछ दिन पहले उच्चतम न्यायालय ने अब जजों को अपनी सम्पत्ति का ब्यौरा देने का भी निर्देश दिया है। इस घटनाक्रम से जजों की नियुक्ति का तरीका बदलने पर चर्चा तेज हो गई है। बीजेडी सांसद डाॅ. सस्मित पात्रा ने सरकार से पूछा कि क्या वह एनजेएसी बिल को फिर से लाने पर विचार करेगी और यदि नहीं तो क्या सुप्रीम कोर्ट के 2015 के फैसले के अनुरूप काॅलेजियम सिस्टम में सुधार के लिए कोर्ट के साथ मिलकर काम करने को तैयार है। लेकिन कानून मंत्रालय ने चुप्पी साध सस्पेंस बरकरार रख दिया है। सरकार की इस चुप्पी ने सियासी हलकों में चर्चा छेड़ दी है। जानकारों का मानना है कि एनजेएसी पर सरकार का मौन दर्शाता है कि वह अभी भी इस मुद्दे पर रणनीति बना रही है।

काॅलेजियम में सुधार जरूरी है, लेकिन सरकार को सुप्रीम कोर्ट के साथ मिलकर काम करना चाहिए, न कि टकराव बढ़ाना चाहिए। एनजेएसी को दोबारा लाने के लिए संवैधानिक संशोधन की जरूरत होगी जिसमें लोकसभा और राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत और आधे से ज्यादा राज्यों की मंजूरी चाहिए। फिलहाल सरकार का रुख अस्पष्ट है लेकिन यह साफ है कि जजों की नियुक्ति का मुद्दा आने वाले दिनों में और गरमाएगा ही गरमाएगा। गौरतलब है कि जब विपक्ष द्वारा केंद्र सरकार से नेशनल ज्यूडिशियल अपाॅइंटमेंट कमीशन को दोबारा लाने के बारे में पूछा गया तो जवाब में कानून मंत्री ने इस पर कोई स्पष्ट रुख नहीं जताया, बल्कि पिछले कुछ वर्षों में सुप्रीम कोर्ट के साथ मेमोरेंडम आॅफ प्रोसीजर (एमओपी) को लेकर हुई बातचीत का ब्योरा पेश कर दिया। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले फैसले में संशोधन करते हुए हाईकोर्ट में एड-हाॅक जजों की नियुक्ति के लिए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं।

