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कठघरे में न्यायाधीश

दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर मिली नकदी ने न्यायपालिका को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी रिपोर्ट में अधजले नोटों के वीडियो और तस्वीरों का जिक्र किया गया है जो इस पूरे मामले को और भी पेचीदा बना देता है। न्यायपालिका के भीतर और बाहर सवाल उठ रहे हैं कि जस्टिस वर्मा पर आगे क्या कार्रवाई होगी? क्या सिर्फ ट्रांसफर या सस्पेंशन काफी होगा या फिर यह मामला महाभियोग तक जाएगा? कानूनविदों का कहना है कि यह मामला न केवल व्यक्तिगत तौर पर जस्टिस वर्मा के लिए गम्भीर है, बल्कि इससे पूरी न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर चोट पहुची है। इन सभी सवालों का जवाब यह मामला साबित करेगा कि कानून का तराजू सबके लिए बराबर है या नहीं। अब न्यायपालिका की साख इस जांच के निष्कर्ष पर टिकी हुई है

देश में इन दिनों एक ओर जहां इलाहबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की पीठ की यह टिप्पणी कि ‘पीड़िता के स्तनों को पकड़ना, उसके पजामे का नाड़ा तोड़ना, उसे खींचकर ले जाने की कोशिश करना रेप या रेप की कोशिश नहीं मान सकते’ सोशल मीडिया और मीडिया की सुर्खियां बनी हुई है, वहीं दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के घर मिले नकदी ने देश की न्यायपालिका को एक बार फिर कटघरे में खड़ा कर दिया है।’ सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी रिपोर्ट में अधजले नोटों के वीडियो और तस्वीरों का जिक्र किया गया है जो इस पूरे मामले को और भी पेचीदा बना देता है। न्यायपालिका के भीतर और बाहर सवाल उठ रहे हैं कि जस्टिस वर्मा पर आगे क्या कार्रवाई होगी? क्या सिर्फ ट्रांसफर या सस्पेंशन काफी होगा या फिर यह मामला महाभियोग तक जाएगा? क्या यह महाभियोग केस बन सकता है? जज को हटाना कितना मुश्किल है? जज कैसे चुने जाते हैं? आगे क्या होगा? क्या न्यायपालिका की साख पर असर पड़ेगा? जैसे प्रश्न सड़क से संसद तक उठने लगे हैं।

सीजेआई संजीव खन्ना जस्टिस यशवंत वर्मा

कानूनविदों का कहना है कि यह मामला न केवल व्यक्तिगत तौर पर जस्टिस वर्मा के लिए गंभीर है, बल्कि इससे पूरी न्यायपालिका की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते हैं। इन सभी सवालों जबाब यह मामला साबित करेगा कि कानून का तराजू सबके लिए बराबर है या नहीं। अब न्यायपालिका की साख इस जांच के निष्कर्ष पर टिकी हुई है।

इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय ने कहा है कि यह मामला गहरी जांच की मांग करता है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि जस्टिस यशवंत वर्मा ने आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि यह उनके खिलाफ साजिश है और उन्हें बदनाम करने की कोशिश की जा रही है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज एसएन ढींगरा ने इस मामले को लेकर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि पुलिस ने क्राइम सीन को सुरक्षित नहीं किया, जिससे सबूतों के साथ छेड़छाड़ की संभावना बनी। अगर आउटहाउस सील नहीं हुआ तो पूरे मामले की जांच पर असर पड़ेगा। मुझे नहीं लगता कि क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन से कुछ ठोस सबूत निकल पाएंगे। ‘जजों को उनके न्यायिक कार्यों के लिए इम्युनिटी मिलती है, लेकिन इस तरह के आरोपों के मामले में नहीं। दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और सीजेआई को जब इस घटना की जानकारी मिली तो उन्हें तुरंत घर और क्राइम सीन को सील करने और एफआईआर दर्ज करने के आदेश देने चाहिए थे।’

क्या है पूरा मामला?

बीते 14 मार्च को जस्टिस वर्मा के आधिकारिक निवास के स्टोर रूम में आग लगने की घटना सामने आई। इस आग में कथित रूप से भारी मात्रा में कैश जल गया। दिल्ली पुलिस की शुरुआती रिपोर्ट में बताया गया कि चार से पांच बोरियों में अधजला कैश मिला जिसे लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने इस मामले की जांच का जिम्मा दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय को सौंपा था। डीके उपाध्याय की रिपोर्ट के अनुसार 15 मार्च को जब पुलिस ने उन्हें सूचना दी तो उन्होंने तुरंत सुप्रीम कोर्ट को अवगत कराया, वहीं दूसरी तरफ जस्टिस यशवंत वर्मा ने आरोपों को साजिश करार दिया है। उन्होंने कहा कि घटना के समय वे मध्य प्रदेश में थे और 15 मार्च की शाम को दिल्ली लौटे। उन्होंने इस बात से इनकार किया कि उनके या उनके परिवार के किसी भी सदस्य ने स्टोर रूम में कैश रखा था। उनका तर्क है कि स्टोर रूम उनके मुख्य निवास से अलग था और उसमें घर के नौकरों और मालियों का भी आना-जाना था। उनका कहना है कि वे हमेशा बैंक से नकद निकालते हैं और उनके पास सभी लेन-देन का ब्यौरा मौजूद है।

मामले की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तीन जजों की एक कमेटी गठित की है जिसमें जस्टिस शील नागू (पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट), जस्टिस जीएस संधावालिया (हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट) और जस्टिस अनु शिवरामन (कर्नाटक हाई कोर्ट) शामिल हैं। कमेटी की रिपोर्ट के बाद यह तय होगा कि जस्टिस वर्मा दोषी हैं या नहीं। यदि उन पर लगे आरोप सही साबित होते हैं तो उन्हें या तो इस्तीफा देना होगा या फिर उनके खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के बार एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट काॅलेजियम द्वारा जस्टिस यशवंत वर्मा का ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट में करने का विरोध कर अनिश्चितकालीन हड़ताल पर जाने की चेतावनी देते हुए यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की मांग की है।

गौरतलब है कि 14 मार्च 2025 को होली की रात जस्टिस वर्मा के दिल्ली स्थित बंगले में आग लगने के बाद जले हुए काफी नोट बरामद हुए थे। आग बुझाने पहुंचे दमकल कर्मियों ने कमरे में बड़ी मात्रा में नकदी देखी जिसके बाद यह मामला सुर्खियों में आ गया है। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो यह राशि करोड़ों में हो सकती है। दिल्ली हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की रिपोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना का वर्मा पर लगे आरोपों की जांच के लिए 3 जजों की कमेटी का गठन करना बता रहा है कि सुप्रीम कोर्ट फिलहाल इस मामले पर काफी सख्ती बरत रहा है।

बेदम है आउटहाउस की दलील!

जस्टिस वर्मा की तरफ से जो जवाब सुप्रीम कोर्ट को दिया गया है उसमें उन्होंने दावा किया कि उनके या उनके परिवार के किसी भी सदस्य ने स्टोररूम में कोई नकदी नहीं रखी थी। उनके मुताबिक जिस कमरे में आग लगी और जहां से कैश मिला वह मुख्य घर का हिस्सा नहीं था, बल्कि आउटहाउस था। लेकिन इस पर भी सवाल उठ रहे हैं। जस्टिस ढींगरा का कहना है कि कोई भी जज अपने आउटहाउस में जो हो रहा है उससे बच नहीं सकता। पूरा बंगला उन्हीं को अलाॅट किया गया था यानी यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि नकदी जिस हिस्से में पाई गई वह जस्टिस वर्मा के अधिकार क्षेत्र से बाहर था।

क्या सिर्फ ट्रांसफर या सस्पेंशन काफी होगा

बीजेपी नेता और वरिष्ठ वकील उज्ज्वल निकम ने इस पूरे मामले पर कहा, ‘सुप्रीम कोर्ट ने इन-हाउस इन्वेस्टिगेशन शुरू करके न्यायपालिका में पारदर्शिता की मिसाल पेश की है। किसी भी देश की स्थिरता दो चीजों पर निर्भर करती है, एक आम नागरिकों का देश की करेंसी में भरोसा और दूसरा न्यायपालिका में विश्वास।’ जस्टिस वर्मा के घर से मिली भारी मात्रा में नकदी के मामले में केवल ट्रांसफर, सस्पेंशन या टर्मिनेशन पर्याप्त नहीं होंगे। अगर इस मामले में ठोस सबूत मिलते हैं तो क्रिमिनल प्राॅसिक्यूशन भी हो सकता है। संसद को यह तय करना होगा कि क्या इस मामले में महाभियोग लाया जाए।

क्या यह महाभियोग केस बन सकता है?

कानून विशेषज्ञों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्ट सिर्फ यह संकेत देती है कि मामले की गहराई से जांच होनी चाहिए लेकिन आजाद भारत के इतिहास में अभी तक किसी भी जज के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव की प्रक्रिया पूरी नहीं की जा सकी है। प्रसिद्ध वकील हरीश साल्वे ने कहा कि अगर किसी आम इंसान के घर इतना पैसा मिलता तो जांच एजेंसियां तुरंत छापा मारती और गिरफ्तारी करतीं। लेकिन जजों के खिलाफ ऐसा नहीं होता उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए लम्बी और जटिल जांच होती है।

क्या है महाभियोग की प्रक्रिया?

भारतीय संविधान के तहत किसी भी जज को हटाने का अधिकार केवल राष्ट्रपति को है जो संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित महाभियोग के आधार पर फैसला लेते हैं। जजों को हटाने की प्रक्रिया ‘जज इंक्वायरी एक्ट, 1968’ में तय की गई है। महाभियोग लोकसभा या राज्यसभा में पेश किया जा सकता है।

लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों को इस पर हस्ताक्षर करने होंगे जबकि राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों की सहमति जरूरी होगी। अगर स्पीकर या चेयरमैन इसे मंजूरी देते हैं तो एक तीन-सदस्यीय जांच कमेटी गठित की जाएगी जिसमें एक सुप्रीम कोर्ट जज, एक हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। यह कमेटी आरोपों की जांच करेगी और जज को अपनी सफाई देने का मौका मिलेगा। अगर जांच में जज को दोषी पाया जाता है तो रिपोर्ट संसद के सामने रखी जाएगी जिस पर संसद के दोनों सदनों में बहस होगी और अगर दो-तिहाई बहुमत से प्रस्ताव पास होता है तो राष्ट्रपति जज को पद से हटा सकते हैं।

कैसे चुने जाते हैं जज?

भारत में जजों की नियुक्ति काॅलेजियम सिस्टम से होती है। इसमें सुप्रीम कोर्ट के पांच सीनियर जज मिलकर नाम सुझाते हैं। सरकार इन पर खुफिया जानकारी मांग सकती है और नाम वापस भेज सकती है। लेकिन अगर काॅलेजियम दोबारा वही नाम भेजे तो सरकार को मंजूरी देनी पड़ती है। वर्ष 2014 में मोदी सरकार ने नेशनल ज्यूडिशियल अप्वाइंटमेंट कमिशन (एनजेएसी) कानून बनाया था। इसमें कहा गया था कि जजों के नाम छह लोगों की एक समिति सुझाएगी। इस समिति में भारत के प्रधान न्यायाधीश, सुप्रीम कोर्ट के दो सीनियर जज, कानून मंत्री, दो सम्मानित व्यक्ति होंगे। इन सदस्यों का चयन चीफ जस्टिस, पीएम और विपक्ष के नेता करते। खास बात यह थी कि अगर समिति के दो सदस्य किसी नाम को नकार देते तो वह जज नहीं बन सकता। लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सरकार का इसमें दखल न्यायपालिका की स्वतंत्रता को नुकसान पहुंचाता है।

आगे क्या होगा?

यशवंत वर्मा का मामला सरकार के लिए काॅलेजियम सिस्टम में सुधार का मौका हो सकता है। सरकार फिर से एनजेएसी लाने की कोशिश कर सकती है लेकिन सुप्रीम कोर्ट इसे पहले रद्द कर चुका है तो यह आसान नहीं होगा। यह विवाद सरकार और न्यापालिका को जजों की नियुक्ति पर साथ मिलकर सोचने के लिए मजबूर कर सकता है। ऐसे में अब देखना है कि कुछ बदलाव होता है या नहीं।

जजों के खिलाफ कब-कब लाया गया महाभियोग

जस्टिस वी रामास्वामी सुप्रीम कोर्ट के पहले ऐसे जज थे जिनके खिलाफ महाभियोग लाया गया था। वह जांच में दोषी पाए गए लेकिन कांग्रेस के समर्थन न देने से महाभियोग का प्रस्ताव लोकसभा में गिर गया था। इसके बाद जस्टिस सौमित्र सेन का केस आया। राज्यसभा ने उन्हें हटाने के लिए वोट किया लेकिन लोकसभा में वोटिंग से पहले उन्होंने इस्तीफा दे दिया। जस्टिस सीवी नागार्जुन का मामला भी चर्चित है। 2017 में उनके खिलाफ महाभियोग शुरू हुआ लेकिन सांसदों ने हस्ताक्षर वापस ले लिए तो विफल रहा। बतौर सीजेआई जस्टिस दीपक मिश्रा के खिलाफ भी महाभियोग आया था,लेकिन राज्यसभा के सभापति ने इसे शुरू में ही खारिज कर दिया था। इसी तरह जस्टिस पीडी दिनाकरन ने जांच शुरू होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था। पिछले साल के अंत में जस्टिस शेखर कुमार यादव के खिलाफ विपक्ष द्वारा सदन में महाभियोग प्रस्ताव लाया गया लेकिन विपक्षी दलों के पास दोनों ही सदनों में संख्या बल नहीं था तो यह प्रस्ताव खारिज हो गया। भारत के इतिहास में आज तक एक भी जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी है यानी किसी भी जज को महाभियोग के जरिए नहीं हटाया गया है। ऐसे में दिल्ली हाई कोर्ट के जज यशवंत वर्मा के खिलाफ अगर महाभियोग लाया भी जाता है तो इसका सफल होना सम्भव नहीं लगता।

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