बिहार चुनाव में एनडीए की प्रचंड जीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय में धन्यवाद सभा को सम्बोधित किया। इस दौरान उन्होंने कांग्रेस पर बड़ा हमला बोलते हुए कहा था कि हो सकता है कांग्रेस का एक और विभाजन हो जाए। पीएम के इस बयान ने राजनीतिक हलकों में बहस को जन्म दिया, वहीं इसको बल दिया कांग्रेस सांसद शशि थरूर के छठे रामनाथ गोयनका व्याख्यान के दौरान मोदी के भाषण की खुलकर प्रशंसा ने। थरूर के इस रुख के बाद फिर से यह कयास लगने लगे हैं कि क्या कांग्रेस में एक और विभाजन की जमीन तैयार हो रही है? राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि थरूर का रुख कांग्रेस हाईकमान से अलग दिख सकता है। इससे पार्टी के भीतर विचारधारा और नेतृत्व से जुड़ी पुरानी खींचतान फिर सतह पर आ सकती है और यही वजह है कि कांग्रेस में सम्भावित विभाजन की चर्चा एक बार फिर जोर पकड़ रही है। गौरतलब है कि पीएम मोदी की खुली तारीफ करते हुए शशि थरूर ने अपने आधिकारिक एक्स हैंडल पर उनके भाषण की सराहना करते हुए लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी ने विकास के लिए भारत की रचनात्मक अधीरता की बात की और औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत अब सिर्फ उभरता हुआ बाजार नहीं बल्कि दुनिया के लिए उभरता हुआ मॉडल है। यही नहीं थरूर ने प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के उस हिस्से की भी प्रशंसा की जिसमें पीएम ने मैकाले की 200 साल पुरानी गुलामी मानसिकता को पलटने की आवश्यकता पर जोर दिया था। थरूर ने लिखा कि कुल मिलाकर प्रधानमंत्री का भाषण एक आर्थिक दृष्टि और सांस्कृतिक बदलाव की अपील दोनों था, जिसमें उन्होंने देश को प्रगति के लिए उत्सुक रहने का आह्वान किया।
पंजाब की तरन तारन सीट पर हुए उपचुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। फरवरी 2027 में प्रस्तावित विधानसभा चुनावों से पहले सभी प्रमुख दल नए राजनीतिक समीकरण तलाशने में जुट गए हैं। तरन तारन उपचुनाव में आम आदमी पार्टी की जीत हुई, जबकि अकाली दल दूसरे स्थान पर रहा। यह परिणाम भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए चेतावनी माना जा रहा है। भाजपा उम्मीदवार महज 6 हजार 239 वोट हासिल कर चौथे स्थान पर रहे, जबकि कांग्रेस पांच साल में पहली बार मुकाबले से लगभग बाहर दिखी। ऐसी स्थिति में भाजपा और शिरोमणि अकाली दल के बीच एक बार फिर गठबंधन की सम्भावनाओं पर चर्चा शुरू हो गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या 2027 से पहले दोनों दल साथ आएंगे? राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि गठबंधन को लेकर भाजपा के भीतर मतभेद हैं। कुछ नेता गठबंधन को जरूरी मानते हैं तो कई नेता अकेले चुनाव लड़ने के पक्ष में हैं, वहीं तरन तारन में दूसरे स्थान ने अकाली दल को नई ऊर्जा दी है। पार्टी मानती है कि अगर दोनों दल 2027 चुनाव में फिर साथ आते हैं तो वे आप और कांग्रेस के खिलाफ मजबूत चुनौती पेश कर सकते हैं। लेकिन अकाली दल का सबसे बड़ा डर है किसान आंदोलन के बाद भाजपा से गठबंधन करने पर किसान नाराज न हो जाएं। यही नहीं उसे सिख जाट वोटरों का भरोसा खोने का भी खतरा है। धार्मिक और सामाजिक मुद्दों पर बीजेपी और शिरोमणि की राय कई बार टकराती रही है। गौरतलब है कि 2007 से 2017 तक साथ शासन करने वाले भाजपा और शिरोमणि अकाली दल की राहें 2020 के किसान आंदोलन के दौरान अलग हो गई थीं। कृषि कानूनों पर असहमति के बाद अकाली दल ने एनडीए गठबंधन से नाता तोड़ लिया था। तब से दोनों दल लगातार चुनावी हार झेलते आए हैं। ऐसे में भाजपा और शिरोमणि एक साथ आएंगे या नहीं यह समय ही बताएगा।
हाल में आए बिहार विधानसभा चुनाव नतीजों में इंडिया गठबंधन की करारी हार का असर अब झारखंड की राजनीति पर भी पड़ता दिख रहा है। एक ओर जहां राजद के प्रदेश महासचिव संजय यादव पर बिहार की वोटर सूची में नाम होने का आरोप लगा है तो वहीं भाजपा प्रवक्ता डॉ. अजय आलोक ने एक्स पर लिखा श्नया बम झारखंड में, हेमंत अब जीवंत होंगे्य। इसके बाद झारखंड सरकार में राजद कोटे से मंत्री संजय प्रसाद यादव की कुर्सी को लेकर घेराबंदी शुरू हो गई है। संजय यादव के राजनीतिक सफर की बात करें तो वर्तमान में वे गोड्डा से तीसरी बार विधायक और राजद के प्रदेश महासचिव पद पर हैं। उन्हें राजद प्रमुख लालू और तेजस्वी का करीबी माना जाता है। वषज् 1999, 2009 और 2024 में गोड्डा सीट जीती। झारखंड में राजद के केवल चार विधायक होने के बावजूद संजय यादव को उनकी नजदीकी और चुनावी योगदान के कारण दिसम्बर 2024 में श्रम कौशल विकास और उद्योग मंत्री बनाया गया। लेकिन अब उन पर झारखंड के साथ बिहार की वोटर सूची में नाम होने का आरोप लगा है। उनके पुत्र ने कहलगांव से राजद टिकट पर चुनाव लड़ा लेकिन हार गए। वोट देने की तस्वीरें सामने आने के बाद विपक्ष ने संजय यादव पर निशाना साधा है। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि झामुमो ने गठबंधन की समीक्षा की बात कही है, जबकि बिहार की हार के बाद तेजस्वी यादव पर भी दबाव बढ़ा है। गौरतलब है कि बिहार चुनाव के दौरान झामुमो को सीटें नहीं मिलने से वह गठबंधन से अलग हो गया था। झारखंड में झामुमो, कांग्रेस और राजद साथ में सरकार चला रहे हैं, लेकिन बहुमत होने के कारण झामुमो की साझेदारों पर निर्भरता कम है। झामुमो की नाराजगी खास तौर पर राजद से अधिक रही है। राजद की बिहार में हार के बाद झारखंड में भी तनाव बढ़ गया है।
बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की भारी जीत के पीछे एक नया सामाजिक सूत्र रहा श्नया एमवाई्य फैक्टर यानी महिला और युवा। यह सिर्फ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि उस बदलते सामाजिक माहौल का संकेत है जहां महिलाएं अब सिर्फ वोटर नहीं चुनाव की निणार्यक शक्ति बनकर उभरी हैं। अब असली चुनौती यह है कि क्या सरकार उन महिलाओं की जिंदगी में वास्तविक बदलाव ला पाएगी जिनके भरोसे वह सत्ता में लौटी है? क्या अब बिहार में महिलाओं का भविष्य बदल जाएगा? राजनीतिक विशेषज्ञ और आंकड़े बताते हैं कि एनडीए की जीत का असली संदेश यही है कि बिहार की महिलाएं अब निर्णायक शक्ति हैं। वे नारों में नहीं, परिणामों से प्रभावित होती हैं। नई सरकार पर अब यह साबित करने की जिम्मेदारी है कि महिलाओं का वोट सिफज् चुनाव का साधन नहीं, नीतियों की दिशा तय करने वाली असली ताकत है। आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं की कार्यबल भागीदारी 2017-18 में 4 से बढ़कर 2023-24 में लगभग 30 फीसदी हो गई है। लेकिन इस उछाल के पीछे कड़वी सच्चाई है। ग्रामीण महिलाओं में 85 प्रतिशत स्वरोजगार में हैं जिनमें ज्यादातर बिना वेतन वाले फैमिली हेल्पर्स हैं। शहरों में अनपेड हेल्पर्स की हिस्सेदारी 3 से बढ़कर 29 फीसदी हो गई। वेतन वाली नौकरियां लगातार घट रही हैं। यानी महिलाओं का काम बढ़ा है, पर आर्थिक स्वतंत्रता नहीं। न नियमित आय, न सामाजिक सुरक्षा। सबसे बड़ी बाधा शिक्षा है। 35 फीसदी आरक्षण तभी असरदार होगा जब महिलाएं योग्य हों, लेकिन बिहार में स्थिति चिंताजनक है। जहां ग्रामीण महिलाओं में 45 प्रतिशत निरक्षर हैं, वहीं शहरी महिलाओं में 27 फीसदी पढ़-लिख नहीं पातीं। ग्रामीण क्षेत्र में ग्रेजुएट महिला ग्रामीण 3.1 तो शहरी 13.4 फीसदी हैं। बड़ी चिंता लड़कियों का एसटीईएम यानी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित विषयों से दूर होना जबकि सरकारी नौकरी की सबसे अधिक सम्भावनाएं इन्हीं क्षेत्रों में हैं। एक सर्वे के अनुसार बिहार की महिलाएं पुरुषों से पांच घंटे ज्यादा घरेलू और देखभाल सम्बंधी काम करती हैं। चाइल्ड केयर और एल्डर केयर की सरकारी सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं। सुरक्षित परिवहन की कमी, रोजगार के विकल्प सीमित है। आरक्षण नौकरी तक तो ले जा सकता है, लेकिन नौकरी करने के लिए समय और सहूलियत चाहिए जो महिलाओं के पास नहीं है। नई सरकार को महिलाओं के हित में कई महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे तभी महिलाओं के भविष्य में बदलाव सम्भव होगा।

