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किसका खेल बिगाड़ेंगे आरसीपी औैर पीके?

बिहार में साल के अंत में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। जिसके लिए सभी राजनीतिक दल अभी से सक्रिय हो गए हैं। इस बीच प्रशांत किशोर के साथ मिलकर नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल चुके आरसीपी सिंह ने अपनी पार्टी ‘आप सबकी आवाज’ का विलय ‘जनसुराज’ में कर दिया है। वहीं पीके ने उदय सिंह को ‘जनसुराज’ का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त कर दिया है। पप्पू सिंह के राजनीतिक रसूख की बात करें तो पूर्णिया लोकसभा सीट से वे दो बार भाजपा के सांसद रह चुके हैं और 2019 में भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। 2024 के लोकसभा चुनाव में उन्होंने चुनाव नहीं लड़ा। लेकिन उन्होंने निर्दलीय चुनाव लड़ रहे पप्पू यादव का समर्थन किया था जिसके चलते पप्पू यादव पूर्णिया से निर्दलीय चुनाव जीते थे। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि चुनाव में आरसीपी और पीके किसका खेल बिगड़ेंगे?

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बिहार की राजनीति में प्रशांत किशोर की ‘जन सुराज पार्टी’ और आरसीपी सिंह की पार्टी ‘आप सबकी आवाज’ के विलय ने 2025 के विधानसभा चुनाव से पहले सियासी समीकरणों को और जटिल कर दिया है। प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह दोनों ही नीतीश कुमार के नजदीकी रहे हैं और उनकी राजनीति को करीब से समझते हैं। आरसीपी सिंह कुर्मी समुदाय में प्रभाव नीतीश के पारम्परिक वोट बैंक को नुकसान पहुंचा सकते हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि आरसीपी सिंह की भूमिका मुख्य रूप से वोटकटवा की हो सकती है, जैसा कि 2020 में चिराग पासवान ने किया था। इससे जदयू की सीटें कम हो सकती हैं, जिसका अप्रत्यक्ष लाभ महागठबंधन को मिल सकता है। वहीं नीतीश कुमार की घटती लोकप्रियता के कारण बीजेपी उन्हें मुख्यमंत्री चेहरा घोषित करने से बच रही है। प्रशांत किशोर ने दावा किया है कि अगर एनडीए जीतता है, तो बीजेपी अपना मुख्यमंत्री लाएगी। यह स्थिति जदयू-बीजेपी गठबंधन में तनाव पैदा कर सकती है। प्रशांत किशोर शुरू से ही तेजस्वी यादव और राजद को निशाने पर लेते रहे हैं। उनकी रणनीति राजद के युवा वोट बैंक, खासकर यादव और मुस्लिम मतदाताओं को आकर्षित करने की है। अगर जन सुराज महागठबंधन के वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल होती है तो तेजस्वी यादव के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

प्रशांत किशोर की पार्टी और आरसीपी सिंह की पार्टी में विलय का तात्कालिक नुकसान एनडीए, खासकर जदयू को होने की संभावना ज्यादा है, क्योंकि प्रशांत किशोर और आरसीपी सिंह दोनों ही नीतीश कुमार को मुख्य निशाना बना रहे हैं। हालांकि, अगर जन सुराज महागठबंधन के वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल होती है तो मुकाबला त्रिकोणीय हो सकता है जिससे दोनों गठबंधनों को नुकसान हो सकता है। दूसरी तरफ पप्पू सिंह के जनसुराज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने से बिहार की राजनीति में एक नए समीकरण की शुरुआत हो सकती है। उनके राजनीतिक अनुभव और लोकप्रियता को देखते हुए यह बदलाव पार्टी के लिए एक मत्वपूर्ण कदम हो सकता है। पार्टी की रणनीति और दिशा में भी बदलाव आने की संभावना है। प्रशांत किशोर के साथ मिलकर पप्पू सिंह बिहार की राजनीति में एक नए मोड़ की शुरुआत कर सकते हैं। गौरतलब है कि पप्पू सिंह जन सुराज के स्थापना काल से ही खुलकर पार्टी संयोजक प्रशांत किशोर का साथ देते आ रहे हैं। उन्होंने न केवल पार्टी का समर्थन किया है, बल्कि पटना में प्रशांत किशोर को पार्टी चलाने के लिए शेखपुरा हाउस भी दिया है। साथ ही पटना में प्रशांत किशोर के आमरण अनशन के दौरान जो लग्जरी गाड़ी की चर्चा हुई थी वह गाड़ी भी पप्पू सिंह की ही थी। इसके अलावा जब भी प्रशांत किशोर सीमांचल दौरे पर जाते हैं तो पूर्णिया स्थित उदय सिंह के निजी आवास पर ही ठहरते हैं।

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