Editorial

क्या भारत अपने ‘मामदानी’ को स्वीकारेगा?

न्यूयॉर्क की ताजा राजनीतिक हलचल केवल अमेरिका की बात नहीं है बल्कि यह दुनिया के तमाम लोकतंत्रों को दर्पण दिखाने का काम कर रही है। विश्व के सबसे प्रभावशाली शहर का मेयर एक 34 वर्षीय भारतीय मूल का युवा बन जाता है, वह भी ऐसे माहौल में जब डोनाल्ड ट्रम्प जैसी शख्सियत उसे मंच दर मंच अपमानित कर रही थी, सौ प्रतिशत पागल वामपंथी (100% communist lunatic) कह रही थी और उसे जनता से काट देने की पूरी कोशिश कर रही थी। ट्रम्प की पूरी राजनीतिक मशीनरी, धनबल, मीडिया-उन्माद और ध्रुवीकरण की ताकतों के बावजूद जोहरान मामदानी न केवल टिके रहे बल्कि जनता ने उन्हें ऐतिहासिक जीत दी। उनकी जीत एक असाधारण राजनीतिक घटना है क्योंकि यह जीत न धन की है, न धर्म की, न पहचान की, यह जीत पूरी तरह नैतिक साहस, जनता की जरूरतों को समझने और सत्ता से सवाल पूछने की है।

जोहरान मामदानी को समझना केवल उनके राजनीतिक अभियानों को समझ लेना नहीं है। उनकी बौद्धिक और भावनात्मक जड़ें जानना भी जरूरी है। उनके पिता महमूद मामदानी दुनिया के सबसे सम्मानित राजनीतिक सिद्धांतकारों में गिने जाते हैं। उपनिवेशवाद, नस्लवाद और सत्ता-संरचनाओं पर उनका कार्य आज भी मानक है। उनका जीवन दमन के अनुभव से शुरू हुआ। युगांडा के क्रूर तानाशाह ईदी अमीन शासन द्वारा एशियाई मूल के लोगों पर किए गए अत्याचार और देश निकालने की त्रासदी को मामदानी परिवार ने जिया है। एक ऐसे पिता जिसने दमन झेला भी और समझा भी और जिसने अपने बेटे को यह सिखाया कि सत्ता का पहला कर्तव्य डर पैदा करना नहीं न्याय देना है। उसका प्रभाव जोहरान मामदानी की हर राजनीतिक गतिविधि में दिखाई देता है।
दूसरी तरफ उनकी मां मीरा नायर, भारत की सबसे प्रतिष्ठित फिल्मकारों में से एक, जिनकी फिल्मों ने हमेशा उन चेहरों को आवाज दी जो समाज के किनारे धकेल दिए जाते हैं। ‘सलाम बाॅम्बे’ का स्ट्रीट बच्चा हो या ‘नेमसेक’ की पहचान खोजता प्रवासी, मीरा नायर की दुनिया संवेदनशीलता की दुनिया है और यही संवेदनशीलता जोहरान की राजनीति के भीतर एक गहरे मानवीय ताप की तरह मौजूद है। ऐसे घर में राजनीतिक चेतना और सामाजिक करुणा एक साथ पनपती है। यही मिश्रण एक नेता को भीड़ से अलग करता है।

जोहरान मामदानी की राजनीति की सबसे शक्तिशाली बात यह है कि उन्होंने कभी अपनी मुस्लिम पहचान को राजनीतिक शील्ड नहीं बनाया लेकिन उससे दूर भी नहीं भागे। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से उस पहचान को सामान्य नागरिक की तरह जिया और राजनीति को उन मुद्दों पर केंद्रित रखा जो हर न्यूयाॅर्कवासी को प्रभावित करते हैं। उनकी राजनीति हाउसिंग अफॉर्डेबिलिटी, नीतिगत सुधार अप्रवासियों के लिए न्याय और आर्थिक असमानता जैसे वास्तविक मुद्दों पर आधारित रही।

सबसे साहसिक कदम उनका ‘आइस’ (Immigration and Customs Enforcement) पर हमला था। अमेरिका में यह एजेंसी प्रवासियों के छापों, अचानक डिटेंशन, परिवारों को अलग करने और अक्सर क्रूर तरीकों के इस्तेमाल के लिए बदनाम है। हर नेता जानता है कि ‘आइस’ को खुलेआम चुनौती देना राजनीतिक आत्महत्या जैसा है। लेकिन मामदानी ने इसे अपने निशाने पर रखा और कहा कि जनता ने उनको इस साहस के लिए दंड नहीं, पुरस्कार दिया।

इजरायल-फिलीस्तीन का प्रसंग अमेरिकी राजनीति का सबसे विस्फोटक विषय है। जिस देश में दोनों बड़ी पार्टियां इजरायल समर्थक हैं, वहां एक मुस्लिम प्रवासी मूल का नेता इजरायल की नीतियों को नरसंहारक (genocidal) कहता है, धार्मिक राज्य होने के कारण उसकी आलोचना करता है और कहता है कि यदि नेतन्याहू न्यूयाॅर्क आया तो वह उसे गिरफ्तार कराएगा, यह सब किसी जादू से कम नहीं। 1100 रब्बियों ने चुनाव से पहले उसके खिलाफ खुला पत्र जारी किया। लेकिन उसने अपना स्टैंड नहीं बदला और फिर भी जनता ने उसे गले लगाया। यह बताता है कि नैतिक राजनीति अभी भी जिंदा है।

इन सभी घटनाओं के बाद सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत में भी एक मामदानी उभर सकता है? क्या भारत ऐसी राजनीति को जन्म दे सकता है जो धर्म और पहचान के शोर से ऊपर उठकर जनता के जीवन की असली समस्याओं जैसे रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा, आवास, असमानता पर केंद्रित हो? भारत की मौजूदा राजनीतिक और सामाजिक स्थितियां इस सवाल को और कठिन बना देती हैं। यहां मुस्लिम पहचान को सामान्य नागरिकता नहीं बल्कि राजनीतिक संदिग्धता की श्रेणी में रखा गया है। पिछले एक दशक में मुस्लिम नागरिकों के खिलाफ जो विभाजनकारी विमर्श बनता गया है, भीड़ हिंसा का सामान्यीकरण, बुलडोजर संस्कृति, ‘लव जिहाद’ जैसे
काल्पनिक आरोप, मुस्लिमों को आवास न देना, रोजगार में भेदभाव, सीएए, यूसीसी, एंटी-कन्वर्जन कानून, इन सबने मिलकर भारत में मुस्लिम नेतृत्व की सम्भावनाओं को लगभग समाप्त कर दिया है।

मामदानी जिस साहस से इजरायल की आलोचना करते हैं, भारत में कोई मुस्लिम नेता उसी साहस ‘सीएए’ की आलोचना नहीं कर सकता। जिस सहजता से मामदानी ‘आइस’ को चुनौती देते हैं, भारत में कोई मुस्लिम नेता पुलिस प्रणाली या बुलडोजर राजनीति पर मुखर नहीं हो सकता। यहां जैसे ही कोई मुस्लिम आवाज असहमति व्यक्त करती है, उसे देशद्रोही या कट्टरपंथी कहकर मतदाताओं की नजर में नष्ट कर दिया जाता है।

भारत में 22-23 करोड़ मुसलमानों के बावजूद सिर्फ भारतीय संसद में 26 सदस्य, भारतीय अल्पसंख्यकों की दयनीय स्थिति सामने लाने के लिए काफी हैं। यह बताती है कि भारत की राजनीति मुस्लिम नेतृत्व को एक बोझ की तरह देखने लगी है। विपक्ष भी मुसलमानों को टिकट देने से डरता है क्योंकि उसे ध्रुवीकरण का डर होता है। ऐसे माहौल में मामदानी जैसी आवाज उभर तो सकती है लेकिन उसे इतना दबा दिया जाएगा कि वह चमक भी न सके। लेकिन यह कहना गलत होगा कि भविष्य में कोई सम्भावना नहीं है। भारत का समाज स्थायी रूप से विभाजनकारी राजनीति को स्वीकार नहीं करता। यहां हमेशा एक प्रतिरोध की लहर मौजूद रहती है, छात्रों में, किसानों में, मजदूर आंदोलनों में, साहित्य और कला की दुनिया में संवैधानिक नैतिकता में विश्वास रखने वाले नागरिकों में। यही वे तत्व हैं जो भविष्य के किसी भारतीय मामदानी के बीज हैं। एक ऐसा नेता जो अपनी पहचान छुपाए बिना लेकिन उस पहचान को राजनीतिक हथियार बनाए बिना, जनता के वास्तविक मुद्दों पर एक नैतिक, साहसी, विचार-आधारित राजनीति खड़ी करे तो वह भी उभर सकता है।

यहीं से यह प्रश्न केवल जोहरान मामदानी या किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह जाता बल्कि भारतीय लोकतंत्र की आत्मा से टकराने लगता है। असल सवाल यह नहीं है कि भारत में मामदानी जैसा नेता पैदा हो सकता है या नहीं बल्कि यह है कि क्या भारतीय राजनीति उस तरह के नेतृत्व को सहन करने की मानसिक तैयारी रखती है क्योंकि मामदानी जैसी राजनीति सत्ता के आरामदेह ढांचे को चुनौती देती है। वह वोट बैंक की जगह विवेक की बात करती है, पहचान की जगह अधिकार की बात करती है और भय की जगह भरोसे पर
राजनीति खड़ी करती है। ऐसी राजनीति हमेशा असुविधाजनक होती है, खासकर उन सत्ताओं के लिए जो नफरत, ध्रुवीकरण और स्थायी दुश्मनों के सहारे टिकी हों। भारत में आज राजनीति का बड़ा हिस्सा इसी स्थायी दुश्मन की अवधारणा पर टिका है और दुर्भाग्य से मुसलमान उस दुश्मन की भूमिका में धकेल दिए गए हैं। ऐसे माहौल में यदि कोई मामदानी उभरता है तो वह केवल एक नेता नहीं होगा, वह पूरी व्यवस्था के लिए एक सवाल बन जाएगा।

यह भी समझना जरूरी है कि मामदानी की सफलता केवल उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा का परिणाम नहीं है बल्कि उस समाज की भी परीक्षा है जिसने उन्हें स्वीकार किया। न्यूयॉर्क के मतदाता यह तय करने में सक्षम थे कि वे एक नेता को उसके विचारों, उसके आचरण और उसकी नीतियों के आधार पर परखें, न कि उसके नाम, धर्म या
पृष्ठभूमि के आधार पर। भारत में यह परिपक्वता अभी संघर्षरत अवस्था में है। यहां अक्सर नेता का मूल्यांकन उसके भाषण से अधिक उसकी पहचान के चश्मे से किया जाता है। यही कारण है कि नैतिक राजनीति यहां या तो हाशिए पर चली जाती है या फिर उसे इतना दबा दिया जाता है कि वह प्रभावहीन हो जाए।

फिर भी इतिहास यह बताता है कि कोई भी समाज स्थायी रूप से एक ही मानसिक अवस्था में नहीं रहता। आज जो असम्भव लगता है, वह कल सामान्य हो सकता है। एक समय था जब भारत में दलित नेतृत्व की कल्पना भी सत्ता के केंद्र में नहीं की जा सकती थी लेकिन सामाजिक आंदोलनों और लोकतांत्रिक संघर्षों ने उस असम्भव को सम्भव बनाया। इसी तरह, आज भले ही मुस्लिम नेतृत्व को संदेह और डर की दृष्टि से देखा जा रहा हो लेकिन यह स्थिति भी अपरिवर्तनीय नहीं है। जैसे-जैसे आर्थिक संकट गहराएगा, बेरोजगारी बढ़ेगी, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी सवाल राजनीति के केंद्र में लौटेंगे, वैसे- वैसे पहचान की राजनीति की चमक फीकी पड़ने लगेगी। उस समय समाज को ऐसे नेतृत्व की जरूरत होगी जो नफरत नहीं, समाधान दे सके और वहीं से मामदानी जैसी राजनीति की जमीन तैयार होगी।

अंततः एक भारतीय मामदानी का भविष्य इस बात पर निर्भर नहीं करेगा कि वह कितना प्रतिभाशाली है बल्कि इस पर करेगा कि भारतीय समाज अपने लोकतंत्र को कितना गम्भीरता से लेता है। यदि लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने की तकनीक बनकर रह गया तो मामदानी जैसे नेता हमेशा असंगत ठहराए जाते रहेंगे लेकिन यदि लोकतंत्र को नैतिक जिम्मेदारी, समान नागरिकता और संवैधानिक मूल्यों के रूप में फिर से समझा गया तो वही समाज एक दिन ऐसे नेतृत्व को न केवल स्वीकार करेगा बल्कि उस पर गर्व भी करेगा। उस दिन मामदानी कोई अपवाद नहीं होगा बल्कि उस राजनीति का प्रतीक होगा जिसे भारत ने बहुत समय तक टाल रखा था और शायद तभी यह सवाल ‘‘क्या भारत अपने मामदानी को स्वीकार करेगा?’’ एक आशंका नहीं बल्कि एक ऐतिहासिक सत्य में बदल जाएगा। हालांकि ऐसा होना निकट भविष्य में सम्भव नजर नहीं आ रहा है। धर्म को हथियार बना राजनीति का दौर इस समय अपने चरम पर है। बुनियादी मुद्दों को हाशिए में रख एक धर्म विशेष को टारगेट करने की रणनीति हाल-फिलहाल सफल नजर आती है। ऐसे समय में ‘हिंदुस्तान’ शायद ही अपने मामदानी को
स्वीकार कर पाएगा। हां उम्मीद अवश्य की जा सकती है कि जब धर्म का भूत बहुसंख्यक के सिर से उतरेगा तब शायद ‘भारत’ अपने मामदानी को स्वीकारने के लिए तैयार हो जाएगा।

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