आपातकाल में न्याय की लौ बचाने वाले हंसराज खन्ना भारतीय लोकतंत्र की आत्मा के रक्षक माने जाते हैं जबकि हालिया सेवानिवृत्त हुए मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति बी.आर. गवई का कार्यकाल राज्यपालों को मिले असीमित विवेक, पर्यावरण मामलों में जस्टिस ओका के फैसले को पलटने, बुलडोजर मामलों में अधूरी राहत, काॅलेजियम विवाद और अवमानना के असमान मानकों के कारण खन्ना की नैतिक ऊंचाई तक नहीं पहुंच पाता। इतिहास न्यायमूर्ति गवई के कार्यकाल की जब कभी भी निष्पक्ष और निर्मम समीक्षा करेगा तो निश्चित तौर पर वे न्यायमूर्ति खन्ना के बरअक्स बेहद कमजोर और बौने साबित होंगे
भारत के 52वें मुख्य न्यायाधीश के रूप में न्यायमूर्ति बी. आर. गवई का कार्यकाल बहुत छोटा था, केवल छह महीने, लेकिन ऐसा नहीं है कि उनकी भूमिका महत्वहीन थी या उनके समय में कुछ भी ऐसा नहीं हुआ जिसे इतिहास याद रखे। उल्टा, इतनी कम अवधि में भी कुछ ऐसे निर्णय और घटनाएं न्यायिक परिदृश्य पर दर्ज हो गईं जिनके प्रभाव आने वाले वर्षों तक महसूस किए जाएंगे। भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक संरचना, संघवाद, पर्यावरणीय न्याय, न्यायिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकारों से जुड़े कई बड़े प्रश्न न्यायमूर्ति गवई के कार्यकाल में उठे। इनमें से कुछ फैसले प्रशंसा के पात्र थे, कुछ बेहद विवादित रहे और कुछ ऐसे थे जिन्होंने यह सवाल खड़ा कर दिया कि क्या न्यायपालिका अपनी उस स्वतंत्र और नैतिक ऊंचाई पर कायम है जिसकी मिसाल न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना जैसे महान न्यायाधीशों ने कायम की थी।
गवई के कार्यकाल में सबसे भारी बहस पर्यावरण मामलों से जुड़े ‘वनशक्ति’ फैसले को लेकर छिड़ी। 16 मई 2025 को न्यायमूर्ति अभय एस. ओका की अगुवाई वाली पीठ ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा था कि किसी भी प्रकार की पोस्ट-फैक्टो या रेट्रोस्पेक्टिव पर्यावरणीय मंजूरी मूल रूप से अवैध है। उनका कहना था कि पर्यावरण कानून का मूल सिद्धांत ही यह है कि परियोजना शुरू होने से पहले पर्यावरणीय प्रभाव का आकलन किया जाए, न कि परियोजना पहले शुरू हो, नुकसान हो जाए और बाद में मंजूरी दे दी जाए। न्यायमूर्ति ओका ने यह भी स्पष्ट किया था कि ऐसी मंजूरियां न केवल पर्यावरणीय जवाबदेही को समाप्त करती हैं बल्कि ‘सतत विकास’ की धारणा का भी निषेध करती हैं। उनके इस फैसले से हजारों करोड़ की परियोजनाएं प्रभावित होती दिख रही थीं, अस्पताल, काॅलेज, सड़क परियोजनाएं, औद्योगिक निर्माण और कई सार्वजनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाएं अचानक कानून की नजर में अवैध स्थिति में आ गईं। इस निर्णय के चलते पर्यावरण संरक्षण के सिद्धांत और विकासवादी तर्क आपस में टकराने लगे और काॅरपोरेट जगत असहज हो गया।
इसके बाद सरकार और अनेक परियोजना हितधारकों ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष पुनर्विचार की मांग रखी। उनका कहना था कि न्यायमूर्ति ओका का फैसला विकास को ठप कर सकता है। इसी पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए 18 नवम्बर 2025 को न्यायमूर्ति गवई की अध्यक्षता वाली तीन न्यायाधीशों की पीठ ने बहुमत से न्यायमूर्ति ओका का पूरा फैसला ही रद्द कर दिया। इस पुनर्विचार पीठ ने कहा कि कई परिस्थितियों में रेट्रोस्पेक्टिव मंजूरी ‘असाधारण स्थिति में’ दी जा सकती है और अदालत को यह समझना चाहिए कि कई परियोजनाएं सार्वजनिक हित की होती हैं जिनमें देरी तकनीकी या प्रक्रियात्मक कारणों से हुई हो सकती है। न्यायमूर्ति गवई की पीठ ने यह भी कहा कि पर्यावरण कानून का उद्देश्य ‘व्यावहारिक प्रशासनिक जरूरतों’ से पूरी तरह कटकर नहीं देखा जा सकता। इस पीठ के सदस्य न्यायमूर्ति उज्जल भूयान ने असहमति दर्शाते हुए तीखी टिप्पणी की कि यह फैसला पर्यावरणीय न्यायशास्त्र को कई वर्ष पीछे धकेल देता है और इससे ‘एहतियाती सिद्धांत’ जैसी मूल अवधारणा कमजोर पड़ती है। यह विरोध इतना तीखा था कि इसने पूरे फैसले को विवादों के केंद्र में ला दिया। पर्यावरणीय कार्यकर्ता और कई वकील इसे ‘परियोजना पूंजी के दबाव के समक्ष न्यायपालिका के झुकाव’ के रूप में देखने लगे। न्यायमूर्ति ओका के फैसले को पलटना न्यायमूर्ति गवई के पूरे कार्यकाल की पहचान बन गया क्योंकि इसने सुप्रीम कोर्ट की अपनी ही स्थापित दृष्टि को तोड़ा और यह संदेश दिया कि व्यावसायिक और शासन सम्बंधी व्यावहारिकताएं कभी-कभी पर्यावरणीय सुरक्षा पर भारी पड़ सकती हैं।
इसके विपरीत न्यायमूर्ति गवई का एक फैसला ऐसा भी रहा जो व्यापक प्रशंसा का पात्र बना वह निर्णय है बिना नोटिस या सुनवाई के सम्पत्तियों को बुलडोजर से गिराने पर अदालत की टिप्पणी। ऐसी कार्रवाइयां कई राज्यों में देखने को मिली थीं जहां किसी व्यक्ति पर अपराध का केवल संदेह होते ही उसका मकान या दुकान बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के ढहा दी जाती थी। न्यायमूर्ति गवई की पीठ ने इसे ‘कानून-विहीन राज्य की निशानी’ और ‘माइट इज राइट के दर्शन का पुनरुत्थान’ बताते हुए न केवल निंदा की बल्कि प्रशासन को स्पष्ट दिशा-निर्देश भी जारी किए। अदालत की भाषा बहुत मजबूत थी और इस फैसले का नैतिक महत्व बहुत बड़ा है लेकिन फिर वही समस्या सामने आन खड़ी हुई, पीड़ितों को कोई मुआवजा नहीं दिया गया है, न ही प्रशासनिक अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की गई। इस फैसले को नैतिक रूप से ऊंचा माना जा सकता है परंतु न्यायिक परिणाम की दृष्टि से अधूरा ही कहा जाएगा।
न्यायमूर्ति गवई के कार्यकाल की एक और बड़ी बहस काॅलेजियम प्रणाली को लेकर हुई। उनके नेतृत्व में काॅलेजियम ने एक ऐसे न्यायाधीश को सुप्रीम कोर्ट के लिए चुना जिसकी अखिल भारतीय वरिष्ठता सूची में रैंक 57वीं थी। काॅलेजियम के भीतर ही एक वरिष्ठ न्यायाधीश ने इस निर्णय का विरोध किया और कहा कि यह सिफारिश न्यायिक प्रशासन को नुकसान पहुंचाएगी, क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ेगी और काॅलेजियम की विश्वसनीयता को कमजोर करेगी। न्यायमूर्ति गवई का कहना है कि निर्णय बहुमत से लिया गया था लेकिन आलोचना का प्रश्न यह कि क्या काॅलेजियम वास्तव में किसी राजनीतिक या प्रशासनिक झुकाव से मुक्त रह पा रहा है। इसी समय एक अन्य केस में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश न्यामूर्ति अतुल श्रीधरन ने हाईकोर्ट न्यायाधीश जिन्होंने वहां के एक मंत्री की भारतीय सैन्य अधिकारी कर्नल सोफिया कुरैशी पर अमर्यादित टिप्पणी पर कठोर आदेश दिया था, को पहले छत्तीसगढ़ फिर सीधे इलाहाबाद स्थानांतरित कर दिया गया। यह घटनाक्रम इस शंका को जन्म देता है कि काॅलेजियम अपने निर्णयों में केंद्र की इच्छा के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त नहीं रहा।
अवमानना के मामलों में भी न्यायमूर्ति गवई के समय यह सवाल उठ खड़ा हुआ कि क्या अदालत सभी आरोपों को समान मानक पर परखती है। एक यूट्यूबर/पत्रकार अजय शुक्ला के खिलाफ कोर्ट ने तुरंत अवमानना की कार्यवाही शुरू की जबकि दूसरी तरफ एक सांसद द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पर लगाए गए गम्भीर आरोपों पर अदालत ने कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इससे यह धारणा बनी कि अवमानना का प्रयोग कभी-कभी चयनात्मक हो जाता है, जहां अदालत की गरिमा का दायरा आरोप लगाने वाले की पहचान और राजनीतिक वजन के अनुसार छोटा-बड़ा होता दिखता है।
इन विवादों और फैसलों के बीच अगर न्यायाधीश हंसराज खन्ना का नाम लिया जाए तो तुलना और भी स्पष्ट हो जाती है। न्यायमूर्ति खन्ना भारतीय न्यायिक इतिहास का वह उज्ज्वल अध्याय हैं जिन्होंने आपातकाल के समय ‘एडीएम जबलपुर’ मामले में सरकार के विरुद्ध खड़े होकर अकेले उसके खिलाफ निर्णय दिया था और कहा था कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता सरकार की दया पर निर्भर नहीं हो सकती। यह फैसला उन्हें मुख्य न्यायाधीश बनने से वंचित कर गया लेकिन उन्हें भारतीय लोकतंत्र का गौरव बना गया। अमेरिकी अखबार ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ ने उनके बारे में लिखा था कि ‘‘वह अकेली आवाज थी जिसने भारत में स्वतंत्रता की अंतिम लौ को बुझने नहीं दिया।’’ न्यायमूर्ति खन्ना सत्ता के विरुद्ध खड़े हुए जबकि न्यायमूर्ति गवई के कई फैसले इस आशंका को जन्म देते हैं कि उनका झुकाव सत्ता-व्यवस्था की सुविधा की ओर अधिक था।
इतिहास किसी के भाषणों, व्यक्तित्व या अवसरों को प्राथमिकता नहीं देता। वह केवल यह दर्ज करता है कि किसने संविधान की आत्मा को मजबूत किया और किसके फैसलों ने शक्ति-संतुलन को किस दिशा में धकेला। गवई का कार्यकाल, राज्यपालों की असीमित शक्तियों से लेकर पर्यावरणीय मंजूरियों के पलटाव तक, संविधान की उस मूल भावना के अनुरूप नहीं खड़ा दिखता जो नागरिक स्वतंत्रता, पर्यावरणीय सुरक्षा और संघीय संतुलन को प्राथमिकता देती है। न्यायपालिका का सबसे बड़ा दायित्व राज्य और नागरिक के बीच संतुलन बनाना होता है, पर न्यायमूर्ति गवई के कुछ फैसले इस संतुलन को सत्ता की ओर झुका देते हैं।
इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि इतिहास न्यायमूर्ति गवई को न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना की श्रेणी में नहीं रखेगा। न्यायमूर्ति खन्ना ने भारतीय लोकतंत्र की रीढ़ को बचाया और संवैधानिक मूल्यों के लिए अपने पद का बलिदान दिया, जबकि गवई का कार्यकाल अधिकतर ऐसे फैसलों से पहचाना जाएगा जिनकी दिशा सत्ता-संरचना और प्रशासनिक ‘व्यावहारिकताओं’ के अनुरूप रही। उनका समय न्यायपालिका के इतिहास में एक विवादित, मिश्रित और आलोचनात्मक अध्याय के रूप में दर्ज होगा, न कि लोकतंत्र-रक्षा के स्वर्णिम अध्याय की तरह जैसा कि न्यायमूर्ति हंसराज खन्ना का नाम स्थायी रूप से अंकित है।

